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Dusri Shaadi (Story On Marriage)

   थामा था हाथ जिसका बनकर हमसफ़र छोड़ा उसने तन्हा माना था जिनको ग़ैर बन गए वो हमसफ़र    सूरज की पहली किरण आज भी वैसे ही गुलाब के फूलों पर गिरी जैसे हमेशा गिरती हैं , दिन की शुरुआत में भी कोई परिवर्तन नहीं था , वही दूधवाले का आना , न्यूज़पेपर आना और कामवाली का बेवक़्त आना सबकुछ तो हमेशा जैसा ही था फिर क्यों सबकुछ नया-नया सा लग रहा था , आज अनीता के चेहरे पर मुस्कान थी जो शायद बरसों पहले कहीं खो गयी थी , बालकनी में बैठी हुई अनीता चाय की चुस्कियाँ लेते हुए ना जाने कब अतीत की ओर चली गई पता ही नहीं चला।   बात उस समय की हैं जब अनीता और अशोक अपनी बेटी पलक के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर रहे थे , पलक केवल तीन साल की थी , दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं बस अपने खेल-खिलौनों में ही मस्त रहना , माँ और पापा की इकलौती होने के नाते लाड़-प्यार तो होना ही था , ऐसा लगता था मानो दुनिया की सारी ख़ुशियाँ आकर एक ही आँगन में समां गयी हो , फिर ना जाने अचानक किसकी नज़र लग गयी , वैसे तो घर में छोटे-मोटे झगड़े होते रहते थे लेकिन आज अशोक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा , अनीता के सब्र का बाँध भी टूट गया व...