Gunjan (Story On Domestic Violence)
मैं मासूम तरस रहीं हूँ अपनों के प्यार को अपने तो मिलें मुझे लेकिन प्यार ना मिला " गुंजन , अरे ओ गुंजन कहाँ चली गई" शालिनी गुंजन को ढूँढ़ते हुए इधर से उधर घूम रही थी। " जी माँ , आपने बुलाया ?" " हाँ बुलाया , रसोई में झूठे बर्तनों का ढ़ेर पड़ा हैं , वो कौन साफ़ करेगा , और बाथरूम में धुलने के कपड़े भी हैं , वो भी धो देना।" "लेकिन माँ मैं अभी पढ़ रहीं हूँ , थोड़ी देर में सारे काम निबटा दूँगी।" "बेशर्म जुबान चलाती हैं मुझसे , कोई ज़रुरत नहीं हैं पढ़ने की , वैसे भी कौनसा तुझे पढ़-लिखकर नौकरी करनी हैं , चल और काम कर , उसके बाद दोपहर के खाने की तैयारी भी करनी हैं , और हाँ आज खाने में मटर-पनीर बनाना , मेरे रिशु को बहुत पसंद हैं , स्कूल से आते ही उसे बहुत जोरो की भूख लगी होगी , इसलिए उसके आने से पहले बना देना।" "जी माँ" और गुंजन शालिनी के कहे अनुसार काम करने चल दी। बीस साल पहले शालिनी और निशांत की शादी हुई थी , लेकिन बहुत कोशिशों के बावज़ूद भी शालिनी मा...