Waham (A Murder Mystery)
हर क़दम तेरी साज़िशों का शिकार होती रही मैं जान ली तूने पर ख़ुदकुशी का दाग लगा बैठी मैं दिसंबर का महीना चल रहा था , और कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी , रात के तक़रीबन दो बजे होंगे , नन्दनी बिस्तर पर काफी देर से करवटे बदल रही थी , नींद उसकी आँखों से कोसो दूर थी , ऐसा नहीं था कि उस दिन वो पहली बार घर पर अकेली थी , इससे पहले भी विक्रम अपने ऑफिस के काम से टूर पर जाता रहा था , फिर ना जाने क्यों नंदनी को अजीब सी घबराहट हो रही थी।घबराहट की वजह से नंदनी का गला सूखने लगा , पानी पीने के इरादे से वो अपने बिस्तर से उठी ही थी कि उसे अचानक से खिड़की पर किसी व्यक्ति की परछाई दिखाई दी , वो घबरा कर फिर से रज़ाई में घुस गयी , " जय हुनमान ज्ञान गुन सागर , जय कपीस तिहुँ लोक उजागर" अपना डर भगाने के लिए वो हनुमान चालीसा का पाठ करने लगी ही थी कि अचानक से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आने लगी। " इस वक़्त कौन होगा! कहीं वो खिड़की वाला इन्सान तो नहीं।" नंदनी बड़बड़ाने लगी।दूसरी ओर दरवाज़े पर दस्तक लगातार बढ़ती ही जा रही थी , घबराती हुई नंदनी जैसे ही दरवाज़े के पास गई , " दरवाज़ा खोलो ...