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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Kaash Koi Samjh Paata / काश कोई समझ पाता (Story On Women)

              “राशि, नाश्ता तैयार है?” डाइनिंग चेयर पर बैठते हुए सामान्य कद-काठी, एवं साँवले रंग वाले 35 वर्षीय पुलकित ने आवाज लगा अपनी पत्नी से पूछा।        “हाँ लाती हूँ।” और फिर कुछ ही देर में सामान्य कद, साँवला रंग, और सामान्य नैन-नक्श वाली 34 वर्षीय राशि ने सैंडविच, और जूस पुलकित के सामने हाज़िर कर दिया।     “ओह गॉड, आज फिर से सैंडविच, राशि यार कभी तो कुछ और बना लिया करो, बोर हो गया हूँ रोज-रोज ये ब्रेड खा कर।” पुलकित ने नाश्ते की प्लेट आगे धकेल कुर्सी से उठते हुए कहा।     “पुलकित यूँ खाने का अपमान मत करो, जो भी है खा लो, मैं कोशिश करूँगी कुछ ओर बनाने की।” राशि ने जैसे ही अनुरोध करते हुए कहा।     “तुम और तुम्हारी कोशिशें, दुखी हो गया हूँ सुन-सुनकर, मुझे तो समझ नहीं आता, ऑफिस जाने से पहले, और आने के बाद तुम्हारे पास काम क्या होता है, जो तुम दो वक्त का खाना भी ढ़ंग से नहीं बना पाती।”     “यही सवाल तो मैं भी पूछती हूँ इससे बार-बार, अरे सुबह जल्दी उठकर कुछ अच्...

Toh Fir Surakshit Kaun Hai ?/ तो फिर सुरक्षित कौन है ? (Story On Saxual Harassment)

    “ मम्मी, मुझे घर पर अकेले नहीं रहना है, आप मुझे अपने साथ ऑफिस ले चलो ना” 10 वर्षीय अथर्व जो कि क्लास 4 th में अध्यनरत है, ने अपनी मम्मी शुचि से कहा।     लंबा कद, तीखे नैन-नक्श, कँधे तक कटे बाल, गोरे रंग की स्वामिनी शुचि, मुंबई स्थित एक आई. टी. कंपनी में कार्यरत है।     “क्यों?”     “मुझे अच्छा नहीं लगता।”     “क्या अच्छा नहीं लगता बेटा, आप घर पर रहकर पढ़ाई कर लेना, थोड़ी देर भास्कर भैया के साथ खेल लेना, टी.वी. देख लेना, विडिओ गेम खेल लेना, आराम कर लेना, बेटा जी आपके पास तो पूरा दिन करने के लिए बहुत सारे विकल्प है, और अगर आप मम्मी के साथ चले तो पूरा वक्त एक ही जगह बैठे रहना पड़ेगा, बोलो क्या कहते हो?” शुचि के पूछते ही,     “कोई बात नहीं, मुझे फिर भी आपके साथ जाना है।”     “अथर्व, ये कैसी जिद हुई बेटा, ऐसे तो आपके स्कूल में हर शनिवार छुट्टी रहेगी, और मेरा ऑफिस, तो क्या आप हर शनिवार मेरे साथ ऑफिस चलोगे?” शुचि के पूछते ही,       “हाँ चलूँगा, लेकिन घर पर नहीं रहू...

Article - Achha Waktaa Ewn Achha shroata / अच्छा वक्ता एवं अच्छा श्रोता

       अक्सर ऐसी परिस्थित होती है कि दो लोग आपस में बात कर रहे होते हैं, एक होता है वक्ता, और दूसरा श्रोता, जितना किसी वक्ता को वाकपटुता में निपुण होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर एक श्रोता को सुनने की कला में माहिर होना चाहिए, जिसमे एक श्रोता का धैर्यवान होना अतिआवश्यक है, क्योंकि सामने वाला क्या कह रहा है, उसकी पूरी बात सुनने का धैर्य होना बहुत जरूरी है, बीच में ही आपा खो वक्ता की बात को बीच में काट देना, या फिर वहाँ से उठकर चले जाना शालीनता की निशानी नहीं मानी जा सकती।      उसी प्रकार दूसरी ओर वक्ता का भी कर्तव्य होता है, समय की कीमत को समझते हुए जितनी जरूरी हो उतनी ही बात श्रोता से कहे, साथ ही बात को इस प्रकार से रखे कि आवश्यक बात ही श्रोता के समक्ष आए, एवं ये ध्यान रखना भी जरूरी है कि वो किससे अपनी बात कह रहा है, सामने कौन व्यक्ति है इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि आपको कौनसी बात कितनी कहनी है, और कितनी नहीं, क्योंकि हर किसी को आपकी ज़िंदगी में घट रही, या घट चुकी घटनाओं को सुनने में रुचि नहीं होती          ...