Nadani (Story On Immaturity)
नादानी की हैं बच्चों ने पर ख़तावार हैं हम अब ये ख़ता ना हो किसी से ध्यान रखना तुम " रानों , ओ रानों , ना जाने कहाँ चली गई सुबह-सुबह , काकी तुमने देखा हैं कहीं रानों को ?" " अरी क्यों मज़ाक कर रहीं हैं मुझ अंधी के साथ , कुछ तो शर्म कर" "काकी मेरा वो मतलब नहीं था , मैं तो पूछ रही थी कि रानों आपके पास आयी थी क्या ?" " नहीं , अगर आती तो तेरे पूछने से पहले ही बता देती , मुझे तो लगता हैं खेत में चली गयी होगी अपने बापू के पास , वहीं जाकर देख ले" "अरे कहाँ काकी , रानों के बापू तो खुद घर पर बैठे हैं , रात को थोड़ा बुखार हो गया था।" "हाय राम , इतनी बड़ी बात और तू मुझे अब बता रही हैं , सही बात हैं अपने-पराए में फ़र्क तो होता ही हैं।" "बस करो काकी , कुछ नहीं हुआ हैं , अब बिल्कुल ठीक हैं वों , एक तो मैं रानों के लिए परेशान हो रही हूँ और तुम आलतू-फ़ालतू बातें किए जा रही हो।" ऐसा कहते ही गौरा दनदनाते हुए वहाँ से चली गई। " सुनिए जी , मुझे तो कहीं भी नहीं मिल रही हैं रानों ,...