Khata Parwarish Mein (Story On Family)
उसके सिवा ख़यालों में भी कुछ ओर सोचा नहीं लेकिन उसके ख़्यालों में तो मैं शामिल ही नहीं ऐसा क्या हुई खता परवरिश में मुझसे उसकी फ़ितरत में तो वफ़ा भी नहीं पैंसठ वर्षीय दयाशंकर जी अपने घर के बरामदे में बैठे भजन गुनगुना रहे थे ," रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता-राम , सीता-राम , सीता राम भज प्यारे तू सीता-राम” इतने में ही उनकी बहु मोहिनी चाय लेकर वहाँ आ गई , " पापाजी , ये लीजिए आपकी चाय खास अदरक डालकर बनाई हैं आपके लिए" "जुक-जुक जियो बेटा ईश्वर तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करें।" "अच्छा पापाजी आप चाय पीजिए मैं चलती हूँ।" मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा , " तुम भी मेरे पास बैठकर चाय पीती तो अच्छा था।" "ज़रूर पीती पापाजी अगर मेरे पास टाईम होता तो , अब देखिए ना आप , अभी तो ऑफ़िस से आई हूँ और अब बच्चों को डांस क्लास के लिए छोड़ने जाना हैं।" "माफ करना बेटा मैं तो भूल ही गया था , दरअसल बूढा होने लगा हूँ ना शायद अब इसलिए कुछ याद नहीं रहता।" "ऐसा कुछ नहीं हैं पापाजी , अच्छा अब मैं चलती हूँ ,...