Imtihaan Mohabbat Ka (Story On Love)
मोहब्बत की हैं हमने तुझसे तो निभाएँगे
खुद की नजरों से तुझको दुनिया दिखाएँगे
कर यकीं हर खुशी से तुझे रुबरू करवाएँगे
बस चलना साथ तू मेरे तुझ बिन मर जाएँगे
सुबह के
आठ बज चुके हैं, सूरज की किरणे
खिड़की की जाली को भेदती हुई सीधे कमरे में बैठे रजत के चेहरे पर पड़ रही हैं।
"रजत बेटा, ऐसे गुमसुम कब तक बैठे
रहोगे, चलो उठो तुम्हारे पापा दुकान जाने के लिए तैयार
हो रहे हैं, तुम भी फ़टाफ़ट तैयार होकर नाश्ता कर लो, और अपने पापा के साथ दुकान चले जाओ।"
रागिनी ने खिड़की के पास उदास बैठे हुए अपने बेटे रजत से
कहा।
"मम्मी तुम और पापा समझने की कोशिश क्यों नहीं करते हो, मैं प्रिया के बिना नहीं रह सकता।"
"रजत
मैं पहले भी कह चुकी हो की मुझे इस बारे में कुछ बात नहीं करनी हैं, और हो सके तो तुम भी अब प्रिया
को भूल जाओ इसी में तुम्हारी भलाई हैं।"
"कितनी आसानी से कह दिया आपने कि भूल जाओ, प्यार हैं वो मेरा अरे ऐसे कैसे भूल जाऊँ।"
"तो ठीक हैं जो तुम्हारी मर्ज़ी हो वो करो।" ऐसा कहते हुए रागिनी गुस्से में कमरे से बाहर चली गई।
दो साल पहले की बात हैं, रजत और प्रिया की मुलाकात रजत के एक दोस्त मनन की शादी में हुई थी, प्रिया दुल्हन सिया की दोस्त के रूप में शादी में शमिल हुई थी, शादी की मौज़ मस्ती में ना जाने कब रजत प्रिया को अपना दिल दे बैठा, "हैलो, मेरा नाम रजत हैं, मनन का दोस्त"
"हैलो मैं प्रिया, सिया की फ्रैंड" इस औपचारिकता के बाद कुछ देर तक वहाँ एक सन्नाटा सा छा गया, फिर रजत ने ही बात करने की पहल की,
"आपने खाना खा लिया?"
"जी, और आपने?"
"मैंने भी"
"आप
अपने बारे में कुछ बताइए"
"क्या
जानना चाहते हैं आप?" प्रिया ने
रजत की ओर सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा, जिसे देख
रजत थोड़ा घबरा गया।
"नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही पूछ रहा था।"
"प्रिया
नाम हैं मेरा, यहीं दिल्ली से ही एम.बी.ए. कर रही हूँ, माँ-बाप
की इकलौती बेटी हूँ, इसलिए शायद थोड़ी ज़िद्दी और सिर चढ़ी
भी हूँ, और क्या जानना चाहते हैं आप मेरे बारे
में"
"कुछ
नहीं आपने तो बिन पूछे ही सब कुछ बता दिया हैं।" रजत ने मुस्कुराते हुए कहा, और प्रिया भी हँसे बिना नहीं रह
सकी, कुछ इस तरह से हुए थी इन दोनों की पहली मुलाकात, प्रिया चाहती थी कि रजत को उसके बारे में सबकुछ मालूम हो, क्यों कि कहीं ना कहीं प्रिया रजत से प्यार करने लगी थी, और रजत भी तो उससे प्यार करने लगा था, लेकिन इस
बात का अहसास प्रिया को बिल्कुल भी नहीं था, लेकिन हाँ
प्रिया के व्यवहार से रजत समझ चुका था कि प्रिया के दिल में उसके लिए कुछ हैं, दो दिन में शादी तो ख़त्म हो गयी, लेकिन इनकी
मुलाकातें खत्म नहीं हुई, और धीर-धीरे दोनों ने एक
दूसरे से प्यार का इज़हार भी कर दिया, इन दोनों का प्यार
दिन पर दिन परवान चढ़ता गया, यहाँ तक की दोनों के
परिवारवालों को भी इनके रिश्ते से कोई ऐतराज़ नहीं था, इससे
अच्छी बात कोई हो भी क्या सकती थी, सब कुछ अच्छा ही चल
रहा था, बस इंतज़ार था तो केवल प्रिया का एम. बी. ए.
पूरा होने का, दोनों परिवारों ने पहले ही सोच लिया था
कि जैसे ही प्रिया की पढ़ाई पूरी होगी इन दोनों की सगाई
कर देंगे, लेकिन किस्मत को तो शायद कुछ ओर ही मंज़ूर था।
अभी दो
महीने पहले की ही तो बात हैं, प्रिया अपने कॉलेज से स्कूटी से वापिस घर आ रही
थी, कि अचानक से सामने से आती हुई एक कार से उसकी टक्कर
हो गयी, हेलमेट होने की वजह से सिर तो बच गया, लेकिन हाथ-पैरों पर काफी चोट आयी थी, लेकिन वो
सारे घाव वक़्त के साथ धीरे-धीरे भर ही जाते, पर उस घाव
का क्या जो उसके चेहरे पर लगा था, कार का सामने का शीशा
टूट जाने की वजह से प्रिया के चेहरे पर काफी चोट आयी थी, इतना ही नहीं बल्कि शीशे के टुकड़ों की वजह से उसकी आँखों की रोशनी भी जा चुकी थी, अस्पताल में डॉक्टर द्वारा आँखों के कभी भी ठीक ना होने की बात सुनकर दोनों ही परिवारों में मातम का माहौल छा चुका था, और रजत तो जैसे अपना आपा ही खो चुका था, उसने
तो डॉक्टर का कॉलर खींचकर उसे जान से मारने की धमकी तक दे डाली थी, लेकिन डॉक्टर बेचारा भी क्या कर सकता था।
"आप समझाइये ना रजत
को मेरी तो सुन ही नहीं रहा हैं वो, बस प्रिया की ही रट
लगाए बैठा हैं" रागिनी ने अपने पति शेखर से शिकायती लहज़े में कहा।
"समझने की कोशिश तुम
करो रागिनी, प्रिया प्यार हैं उसका, उसे कुछ वक़्त दो प्रिया को भुलाने में"
"मुझे
नहीं लगता कि वो इस दलदल से बाहर आना चाहता हैं।" रागिनी के कहते ही,
"दलदल नहीं प्यार हैं
वो मेरा, कभी नहीं भूल सकता उसे, और हाँ शादी करूँगा तो केवल प्रिया से सुना आप दोनों ने" रजत ने वहाँ
आकर कब अपने मम्मी-पापा की
सभी बातें सुन ली थी उन्हें पता ही नहीं चला।
"रजत बेटा, तुम हमें गलत समझ रहे हो, दरअसल हमारा मतलब यह
था कि तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी तुम्हारे आगे पड़ी हैं, और
प्रिया वो देख भी नहीं सकती, तुम कब तक उसका सहारा बन
पाओगे।"
"मम्मी
एक बात बताइए, अगर यह सबकुछ मेरे
साथ हुआ होता तो, और अगर यही सब मेरे साथ शादी के बाद
होता और प्रिया मुझे छोड़कर चली जाती तो, और हमे छोड़िए
अगर कल को आपके साथ ऐसा हो जाए और पापा आपको छोड़कर चले जाए, यह सोचकर कि कब तक आपका सहारा बनेंगे तो फिर आपको कैसा लगेगा।" रजत
के सवालों ने रागिनी को निरुतर कर दिया।
"मुझे माफ़ कर दे बेटा, बेटे के प्यार में मैंने यह सब सोचा ही नहीं।"
"मैं
समझ सकता हूँ मम्मी, लेकिन आप भी मुझे
समझने की कोशिश कीजिए, और जितना जल्दी हो सके प्रिया के
घरवालों से हमारी शादी की बात कीजिए।"
"हाँ
बेटा अब तो मैं भी चाहती हूँ कि मेरी बहु जल्द से जल्द घर आ जाए।"
"क्या
बात हैं सबकुछ तय हो गया, अरे भई शादी में
मुझे बुलाने का इरादा हैं भी या नहीं" शेखर ने बनावटी शिकायती लहज़े में कहा और उसकी बात सुन तीनों हँसने लगे।
प्रिया के
घर पर, "देखिए भाई
साहब, हम जल्द से जल्द रजत और प्रिया की शादी करवाना
चाहते हैं।" रागिनी के प्रिया के पापा अशोक से कहते ही,
"लेकिन इतनी जल्दी….!"
"जल्दी कहा हैं यह सब पहले से ही तय था कि प्रिया की पढ़ाई पूरी होते ही इन दोनों की शादी करवा
देंगे।"
"हाँ भाभी जी तय तो था, लेकिन अब बात अलग हैं, कहीं ऐसा ना हो बाद में आपको अपने किये पर पछतावा हो और उसका भुगतान मेरी बेटी को करना पड़े, मेरी बेटी बोझ नहीं हैं मेरे ऊपर, मैं ज़िन्दगी भर उसका ख्याल रख सकता हूँ, बस किसी की दया नहीं चाहिए हमें"
"अंकल, यह क्या
बोल रहे हैं आप, हम कोई दया नहीं कर रहे हैं, हम तो वही सब कह रहे हैं जो पहले से तय था, रही
हालात बदलने की बात तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, प्रिया
से प्यार करता हूँ मैं, उसके अलावा किसी ओर के साथ
ज़िन्दगी गुज़ारने की सोच भी नहीं सकता।"
"लेकिन
बेटा"
"क्या
हुआ अशोक जी, आपको विश्वास नहीं
हैं क्या मेरे बेटे पर" शेखर के कहते ही,
"नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, बल्कि मैं तो अपनी
बेटी की किस्मत पर यक़ीन ही नहीं कर पा रहा हूँ।"
"तो
कर लीजिये यक़ीन भाई साहब और हमारी बहु हमे सौंप दीजिए।" इतने में ही वहाँ
प्रिया भी आ गई।
"आओ बेटा बैठो मेरे
पास" रागिनी ने उसे हाथ पकड़कर अपने पास बैठाते हुए कहा,
"मैं कुछ कहना चाहती
हूँ।" प्रिया ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा,
"हाँ बोलो बेटा क्या
कहना हैं।" रागिनी ने उत्सुकता से पूछा,
"मैं अभी शादी नहीं
करना चाहती।"
"लेकिन
क्यों" रजत ने जैसे ही चौंकते हुए पूछा,
"रजत, मुझे इस हादसे से उबरने के लिए थोड़ा वक़्त चाहिए, और मैं नहीं चाहती कि जल्दबाज़ी में लिए गए इस फ़ैसले का तुम्हे बाद में
पछतावा हो, प्लीज, आप लोग
मुझे समझने की कोशिश कीजिए।" प्रिया के कहते ही कमरे में सन्नाटा छा गया, सभी एक दूसरे की ओर देखने लगे।
"क्या हुआ आप सब लोग चुप क्यों हो गए?" इस गहरी चुप्पी को तोड़ते हुए प्रिया ने पूछा,
"मैं सोच रहा था कि कहीं ऐसा ना हो तुम मुझे
छोड़कर किसी ओर के साथ चली जाओ, अगर ऐसा हुआ ना तो सच कह
रहा हूँ जान से मार दूँगा।"
"किसे
मुझे ?"
"नहीं उसे, तुम तो प्यार हो मेरा तुम्हे क्यों मारूँगा।"
"फ़िक्र
मत करो इतनी आसानी से पीछा नहीं छोडूँगी तुम्हारा, ज़िन्दगी भर सेवा करवाऊँगी तुमसे, आई. लव. यू. रजत"
"आई.
लव. यू. टू प्रिया"
"अरे,अरे, अरे
रुको, रुको, हम यही बैठे हैं
पहले हमें यहाँ से जाने दो फिर रोमांस करना।" रागिनी के कहते ही रजत और
प्रिया को छोड़कर सभी वहाँ से ठहाका लगाकर हँसते हुए चले गए, और कुछ ही महीनों बाद दो प्रेमी एक हो गए।

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