Premi Sang Katl / प्रेमी संग कत्ल ( Story On Murder)

       दिल्ली N.C.R. स्थित गुरुग्राम के, सेक्टर 23 में बने एक अपार्टमेंट की, 15 वीं मंजिल के एक फ्लैट में, भैया, भैया, दरवाजा खोलो, भैया, भाभी....” 22 वर्षीय पल्लवी पिछले 15 मिनिट से कभी अपने भाई-भाभी के कमरे का दरवाजा खटखटाती, तो कभी उनके फोन पर रिंग देती, लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी।

       “अरे क्या हुआ, क्यों गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही है।” इतने में पल्लवी की मम्मी 55 वर्षीय तारा ने मुख्य द्वार से घर में प्रवेश करते हुए पूछा।

       “मम्मी भैया-भाभी दरवाजा नहीं खोल रहे हैं।”

       “पल्लवी, सुबह के 11 बज रहे हैं, घर के अधिकतर काम हो चुके हैं, मैं मंदिर से वापिस आ गयी, और ये दोनों अभी तक सोकर ही नहीं उठे ?’’ तारा ने आश्चर्यचकित भाव से पूछा

       “नहीं मम्मी” पल्लवी के स्वर में चिंता झलक रही थी।

       “तेरे.... तेरे पापा कहाँ है, उन्हे बताया?” तारा ने काँपती हुई आवाज में घर में चारों ओर नजरें दौड़ते हुए पूछा।

      “नहीं बताया, दरअसल पापा सोसाइटी ऑफिस गए हुए है, वहाँ कोई मीटिंग चल रही है।”

       “फोन कर अपने पापा को, और तुरंत वापिस लौटने के लिए बोल” तारा के कहते ही, पल्लवी फोन लगाने लगी।

 

       कुछ देर बाद, क्या हुआ, कोई आफत आ गयी क्या? जो अर्जन्ट में घर वापिस बुला लिया।” तारा के पति 60 वर्षीय गिरिराज जी ने घर में प्रवेश करते हुए पूछा।

      “पापा........।” और फिर पल्लवी ने गिरिराज जी को सारी स्थिति से अवगत करवाया।

     “अरे यार, संडे है, सो रहे होंगे, उठेंगे तब खोल देंगे, इसमे इतना हंगामा मचाने की क्या जरूरत है।”

     “11 बज रहे हैं जी, और इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ, मुझे तो बहुत चिंता हो रही है।” तारा के कहते ही,

     “मैं सोसाइटी ऑफिस में फोन करता हूँ, शायद वैभव के कमरे की खिड़की के रास्ते कमरे में जाने का कोई तरीका मिल जाए।”

     “लेकिन पापा, हम 15 वीं मंजिल पर रहते हैं, और इतनी ऊपर कौन चढ़ेगा, और कैसे?” पल्लवी ने घबराते हुए कहा।

     “तुम चिंता मत करो, मैं कुछ करता हूँ।”

 

      तकरीबन दो घंटे बाद, अपार्टमेंट के बाहर फायर-ब्रिगेड आकर रुकी, और कुछ देर बाद जब फायर मेन ने खिड़की से प्रवेश कर जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला, तो सामने का द्रश्य देख सभी हक्के-बकके रह गए। कमरे में ज़मीन पर वैभव की लाश पड़ी हुई थी, उसके शरीर पर जगह-जगह चाकू के घाव थे, और आयशा कमरे से नदारद थी।

    “वैभव, वैभव, ये क्या हो गया मेरे बेटे को” रोती-बिलखती तारा जैसे ही वैभव की ओर जाने लगी,

    “मैडम प्लीज, आप कमरे से बाहर ही रहिए, ये पुलिस केस है, मि.गिरिराज जी, पुलिस को कॉल कीजिए।” फायर-मेन ने आदेश देते हुए कहा।

 

    कुछ देर बाद, पुलिस के आने के बाद, कमरे को सील कर दिया गया, और लाश फोरेंसिक लैब में भिजवा दी गयी, और पुलिस गिरिराज जी, तारा, और पल्लवी को पूछताछ के लिए पुलिस-स्टेशन ले गयी, एवं आयशा की तलाश शुरू कर दी गयी।

 

     पुलिस स्टेशन में, “गिरिराज जी, ये बात तो साफ है कि आपके बेटे वैभव का कत्ल हुआ है, और जिस हिसाब से आपकी बहु आयशा गायब है शक उसके ऊपर ही जाता है।” इन्स्पेक्टर गौतम के कहते ही,

    “इन्स्पेक्टर साहब, ये भी तो हो सकता है कि हमारी बहु स्वंय किसी मुसीबत में हो, उसका अपहरण हुआ हो” इसी दौरान तारा ने संभावना जताई।

    “हाँ होने को तो कुछ भी हो सकता है, ये भी हो सकता है कि आप लोग भी कातिल के साथ मिले हुए।” इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही,

    “अरे साहब, ये आप क्या कह रहे है, हम ऐसा क्यों करेंगे?”

    “गिरिराज जी ऐसा क्यों नहीं हो सकता, अब आप हो सोचिए आपके फ्लैट में इतना कुछ हो गया, और आप लोगों को भनक तक नहीं लगी, और यही बात मुझे शक करने पर मजबूर कर रही है।“ इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही,

   “लेकिन हम बेकसूर हैं।” तारा ने रोते हुए कहा।

   “देखते हैं, फिलहाल आप तीनों को पुलिस हिरासत में रहना होगा।” और फिर गिरिराज जी, तारा, और पल्लवी को शक के आधार पर वैभव की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया, जिन्हे अगले दिन किसी जानकार के द्वारा पुख्ता सबूत नहीं होने की वजह से जमानत पर रिहा भी करवा लिया गया।

 

    एक हफ्ते बाद, “इन्स्पेक्टर साहब, हमें जानकारी मिली है कि वो सेक्टर 23 के वैभव हत्याकांड में फरार महिला आयशा को मुंबई में देखा गया है।” कांस्टेबल वीर सिंह ने इन्स्पेक्टर गौतम को जानकारी दी।

    “मुंबई !”

    “जी, सर”

    “खबर पक्की है?”

    “जी बिल्कुल पक्की है, हमारे खबरी ने देखा है उसे वहाँ।”

    “ठीक है तो जल्द से जल्द हमारी पुलिस टीम को मुंबई के लिए रवाना होने के लिए कहो, वो महिला हमारे हाथ से निकलनी नहीं चाहिए।” और फिर गुरुग्राम से रवाना हुई पुलिस टीम ने मुंबई जाकर वहाँ के उस एरिया में तलाश शुरू कि, जहाँ आयशा को देखा गया था, कुछ दिनों की खोजबीन के बाद आयशा का पता चला।

    “तुम ही आयशा हो?” कांस्टेबल वीर सिंह ने मुंबई के चर्च गेट इलाके में चाय की टपरी चला रही एक महिला से पूछा।

    “कौन आयशा?, मैं तो सलोनी हूँ”

    “लेकिन तुम्हारी शक्ल तो....”

    “आपको कोई गलतगहमी हुई है, चाय पियेंगे?” इतना कह वो महिला पूरे विश्वास के साथ चाय बनाकर वहाँ खड़े ग्राहकों को देने लगी।

    “नहीं.......श्रीपत मैं कह रहा हूँ तुझसे, ये ही आयशा है।” कांस्टेबल वीर सिंह ने कुछ दूर ले जाकर अपनी साथी पुलिसकर्मी से कहा।  

    “कहीं दूर खड़े होकर, इस पर नज़र रखते हैं, जल्द ही सच्चाई सामने आ जाएगी।” और फिर दोनों पुलिसकर्मी वहाँ से कहीं दूर चले गए, जिससे कि चाय की टपरी वाली सलोनी को शक न हो।

 

     रात को सलोनी चाय की टपरी बंद कर अपना सामान समेट जब वहाँ से निकली तो कांस्टेबल वीर सिंह, एवं श्रीपत भी चुपके से उसके पीछे हो लिए।

     कुछ देर बाद एक बस्ती में बने टूटे-फूटे जर्जर घर में जैसे ही सलोनी घुसी, दोनों पुलिसकर्मी चुपके से बाहर खड़े होकर अंदर क्या हो रहा है ये सुनने, और समझने की कोशिश करने लगे। 

     सलोनी ने घर में घुसते ही, “देव, हमें कुछ करना होगा।” सलोनी ने सामने बैठे तकरीबन एक 30 वर्षीय युवक से कहा,

     “क्यों क्या हुआ?” देव ने पूछा।

     “आज टपरी पर पुलिस आयी थी, आयशा को ढूँढते हुए।”

     “मैंने तो सोचा था कि इस बड़े से शहर की भीड़भाड़ में कहीं छुप जायेंगे, लेकिन वाकई में कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं।” देव के कहते ही,

     “कितने ही लंबे हो, तुम तो फिर भी बच जाओगे, क्योंकि तुम्हारे बारे में कोई नहीं जानता है।” सलोनी के कहते ही,

     “अरे, लेकिन उस वैभव को मारा तो मैंने ही था ना, तो जब पुलिस तुम तक पहुँच सकती है तो वैभव के कातिल तक क्यों नहीं।” अभी देव अपनी बात कह ही रहा था कि इतने में दरवाजा खटखटाने की आवाज आयी, और जैसे ही सलोनी ने दरवाजा खोला,

    “लो पहुँच गए, वैभव के कातिल तक।” कांस्टेबल वीर सिंह ने कहा, और फिर सलोनी, और देव को गिरफ्तार कर लिया गया।

 

    अगले दिन गुरुग्राम पुलिस स्टेशन में, “अब ये बताओ कि पूरी कहानी खुद सुनाओगे, या फिर........” इन्स्पेक्टर गौतम ने गिरिराज जी, तारा, और पल्लवी की मौजूदगी में सामने बैठे सलोनी, और देव के आगे अपना डंडा घुमाते हुए पूछा।

    “इन्स्पेक्टर साहब, पहली बात तो ये है कि मेरा असली नाम आयशा है, सलोनी नहीं”

    “अरे, बड़ी जल्दी अपना असली नाम बता दिया, अब बताओ क्यों मारा वैभव को........” इन्स्पेक्टर गौतम ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा।

    “साहब, छ: महीनें पहले मेरे लाख मना करने के बावजूद, मेरे घरवालों ने, मेरी मर्जी के खिलाफ जाकर, मेरी शादी वैभव से कर दी, लेकिन मैं प्यार देव से करती थी, इसलिए शादी के बाद जब भी मौका मिलता, उससे मिलती, सब कुछ सही चल रहा था, मैंने सोचा हुआ था कि अपने व्यवहार से अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में ऐसे हालात पैदा कर दूँगी कि वैभव मुझे तलाक देने पर मजबूर हो जाए, और फिर मैं देव से शादी कर लूँगी।” कहते-कहते जैसे ही आयशा सांस लेने के लिए रुकी,

    “तो फिर वैभव को क्यों मारा” तारा ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा।

    “प्लीज आप शांत हो जाइए, पुलिस पूछताछ चल रही है।” इतने में कांस्टेबल वीर सिंह ने कहा।

    “हाँ तो बताइए आयशा, क्यों मारा वैभव को?” इन्स्पेक्टर गौतम ने पूछा।

    “उसे मेरे, और देव के बारे में पता चल गया था, उसने एक दिन हम दोनों को साथ में देख लिया था, उस दिन मेरे, और वैभव के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हुआ, उसने धमकी दी कि वो मेरे, और देव के बारे में सबको बता देगा, तो फिर घबराकर मैंने, और देव ने उसे मारने का प्लान बना लिया।” आयशा के बताते ही,

    “और इस प्लान को कैसे अंजाम दिया, क्या ये भी बताने का कष्ट करेंगी आप” इन्स्पेक्टर गौतम ने पूछा।

    “उस रात जब सब सो गए तो, मैंने देव को सेक्टर 23 में, फ्लैट पर बुला लिया, और चुपके से घर का मैन गेट खोल अपने कमरे में ले गयी, जहाँ वैभव सोया हुआ था, क्योंकि मैंने उसे नींद की गोली दे रखी थी, एक बार तो सोचा कि मैं चुपचाप देव के साथ भाग जाती हूँ, फिर लगा अगर वैभव ने हमारे बारे में पुलिस को बता दिया तो पुलिस हमारे पीछे पड़ जाएगी, इसलिए देव ने उसे मार डाला, और हम भाग गए।” आयशा के कहते ही,

    “तुम्हें ये नहीं लगा कि तुम कत्ल करके भागोगे तब भी पुलिस तुम्हारे पीछे पड़ सकती है?”

    “मैं देव के प्यार में इस कदर पागल थी कि, मेरी बुद्दि भ्रष्ट हो गयी थी, कुछ भी सही-गलत नहीं सोच पा रही थी। आयशा के कहते ही,

    “इन्स्पेक्टर साहब, छोड़ना नहीं इसे, एक माँ की बददुआ लगेगी इसे” तारा ने कहा, और फूट-फूटकर रोने लगी।”

    “आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए, इन्हे इनके किए की सजा जरूर मिलेगी।” इन्स्पेक्टर गौतम ने तारा को भरोसा दिलाते हुए कहा।

 

    उसके बाद ये केस कोर्ट में गया, आयशा, और देव के द्वारा अपना गुनाह कबूल कर लेने पश्चात भी, कई महीनों तक सुनवाई चलती रही, क्योंकि आयशा, एवं देव के पिता उन्हे हर हाल में रिहा करवाने पर आमादा थे, फिर भी वो दोनों अपने कोशिशों में कामयाब नहीं हो पाए, और देव को उम्रकैद, एवं आयशा को 10 साल की जेल, एवं जुर्माना हुआ।


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