Pakshpaat (Story On Family)
शालिनी की शादी को अभी छ: महीनें ही गुज़रे थे कि उसके देवर का रिश्ता भी पक्का हो गया , घर के सभी लोग बहुत खुश थे , अभी एक बहु आयी हैं कुछ महीनों में दूसरी बहु भी आ जाएगी , यह सोच-सोचकर शालिनी की सास रुक्मणि ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। लेकिन वो खुश इस वजह से ज्यादा थी कि जो दूसरी बहु आने वाली हैं वो एक अमीर परिवार से हैं , और रुक्मणि की उम्मीद के मुताबिक़ वो अपने साथ दहेज़ भी खूब लाएगी। लेकिन रुक्मणि ने अपने मन में आए इस कुटिल विचार को किसी के भी सामने उजागर नहीं होने दिया। " सुनिए जी , अब तो मैं ठाट से बैठकर हुकुम चलाऊँगी , दो-दो बहुएँ जो आ जायेंगी घर में" रुक्मणि ने अपने पति अरुण से जब अपनी ख़ुशी बाँटी तो , " हाँ भई , किस्मत वाली हो , मुझे तो दुकान जाना ही पड़ेगा , और वहाँ काम भी करना पड़ेगा।" " तो मत करिए काम , आप भी घर बैठकर अपनी बहुओं से सेवा करवाइए , और दुकान अपने बेटों के हवाले कर दीजिए।" " हाँ विचार तो अच्छा हैं तुम्हारा , लेकिन घर बैठ गया ...