Pakshpaat (Story On Family)


  शालिनी की शादी को अभी छ: महीनें ही गुज़रे थे कि उसके देवर का रिश्ता भी पक्का हो गयाघर के सभी लोग बहुत खुश थेअभी एक बहु आयी हैं कुछ महीनों में दूसरी बहु भी आ जाएगीयह सोच-सोचकर शालिनी की सास रुक्मणि ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। लेकिन वो खुश इस वजह से ज्यादा थी कि जो दूसरी बहु आने वाली हैं वो एक अमीर परिवार से हैंऔर रुक्मणि की उम्मीद के मुताबिक़ वो अपने साथ दहेज़ भी खूब लाएगी। लेकिन रुक्मणि ने अपने मन में आए इस कुटिल विचार को किसी के भी सामने उजागर नहीं होने दिया। 

   "सुनिए जीअब तो मैं ठाट से बैठकर हुकुम चलाऊँगीदो-दो बहुएँ जो आ जायेंगी घर में" रुक्मणि ने अपने पति अरुण से जब अपनी ख़ुशी बाँटी तो,

  "हाँ भईकिस्मत वाली होमुझे तो दुकान जाना ही पड़ेगाऔर वहाँ काम भी करना पड़ेगा।" 

  "तो मत करिए कामआप भी घर बैठकर अपनी बहुओं से सेवा करवाइएऔर दुकान अपने बेटों के हवाले कर दीजिए।"

   "हाँ विचार तो अच्छा हैं तुम्हारालेकिन घर बैठ गया तो कामचोर हो जाऊँगा।"

   "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी लेकिन मेरे तो अब ठाट ही ठाट हैं।" ऐसा कहते हुए रुक्मणि मुस्कुराने लगी।

   घर पर शालिनी के देवर अमर की शादी की तैयारियाँ बड़े ही ज़ोरो-शोरों से चल रहीं थीशालिनी अभी नयी थी इसलिए उसे अपने ससुराल की रस्मो-रिवाज़ के बारें में ज्यादा कुछ पता भी नहीं थाफिर भी जितना उससे हो पा रहा था वो हर काम में मदद कर रही थीफिर भी ना जाने क्यों रुक्मणि का व्यवहार उसके प्रति कुछ उखड़ा-उखड़ा सा थाअपनी सास का व्यवहार देख शालिनी ने सोचा ज्यादा काम की वजह से मम्मी जी थक जाती होंगीइसलिए चिड़चिड़ी हो रही होंगी। धीरे-धीरे वो वक़्त भी आ गया जब अरुण व रुक्मणि की दूसरी बहु का गृहप्रवेश होना थानयी बहु के आने की ख़ुशी रुक्मणि के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थीऔर उससे कई ज्यादा नई बहु द्वारा लाए गए उपहारों को देखकर रुक्मणि का चेहरा चमक रहा थालेकिन शालिनी यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मम्मी जी इतना खुश क्यों हैं।

   "जतिनमम्मी जी जितना खुश गरिमा (अमर की पत्नी) के आने पर हैंउतना खुश तो वो मेरे आने पर भी नहीं थीजानते हो ऐसा क्यों हैं।" शालिनी ने आश्चर्य से अपने पति जतिन से पूछा

  "तुम क्यों इतना सोचती होहोगी कोई वजह उनके खुश होने कीशायद इसलिए खुश हो कि अब दो-दो बहुएँ हो जायेंगी सेवा करने के लिए।"

 "हाँ शायद" शालिनी ने जतिन की बात पर सहमति जताते हुए कहा।

 गरिमा को बहु बनाकर लाने की ख़ुशी रुक्मणि के चेहरे पर साफ़ नज़र आतीऔर इसी वजह से वो अपनी दोनों बहुओं में भेदभाव करने लगी। और धीरे-धीरे शालिनी को अहसास होने लगा कि रुक्मणि अपनी बहुओं में भेदभाव करने लगी हैं। इसका क्या कारण हो सकता हैं यह उसकी समझ से बाहर थागुज़रते हुए समय के साथ रुक्मणि ने अपनी दोनों बहुओं के बीच भेदभाव करने की अति कर डालीऔर उसका यह व्यवहार शालिनी की बर्दाश्त के बाहर हो गया  और इस वजह से दोनों देवरानी-जेठानी में दूरियाँ बढ़ने लगी। एक दिन शालिनी ने हिम्मत करके अपनी सास से पूछ ही लिया,

  "मम्मी जीआप ऐसा क्यों करती हैंगरिमा को इतना प्यार और मुझसे इतनी नफरतकोई गलती हुई हैं क्या मुझसे?"

  "हाँ गलती तो हुई हैं।" 

  "वो क्या….!" शालिनी ने अचंभित होते हुए पूछा। 

   "तुम गरीब घर से होऔर गरिमा अमीर घर सेवो जब भी अपने मायके जाती हैं हमारे लिए तरह-तरह के तोहफ़े लाती हैंऔर तुमजब भी जाती हो खाली हाथ ही वापिस आती होकभी यह नहीं सोचा मायके से आ रही हूँ तो अपने ससुराल वालों के लिए कुछ ले चलूँयहाँ तक कि शादी में भी गरिमा कितना कुछ लाई थी और तुम्हारे घर से क्या आयाअरे तुम्हारे घरवालों को कुछ देना ही नहीं था तो क्यों अपनी बेटी ब्याही।" 

  "मम्मी जीये आप क्या कह रहीं हैं….!"

   "मैं कहना तो नहीं चाहती थीलेकिन तुमने पूछा इसलिए कह दिया।" 

  "मम्मी जी यह क्या बात हुईअगर गरीब बहु हैं तो आप उससे नफरत करोगेऔर अमीर हैं तो उसे प्यार दोगेआप जानती भी हैं आपके इस व्यवहार की वजह से गरिमा और मेरे बीच कितनी दूरियाँ आ गयी हैं।" शालिनी को अपनी सास की सोच पर बहुत दुःख हो रहा था। 

  "तुम्हे जो सोचना हैं सोचो लेकिन तुम गरिमा की बराबरी कभी नहीं कर सकती होबल्कि मैं तो कहूँगी तुम्हारी औकात उसके नौकर के बराबर भी नहीं।" रुक्मणि का इतना कहना था कि शालिनी रोती हुई वहाँ से चली गयी।

  शालिनी ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसका एक गरीब घर की बेटी होना उसके लिए इतना बड़ा श्राप हैंएक बार तो मन में आया कि यह बात वो जतिन को बता देलेकिन वो यह भी जानती थी कि कोई फायदा नहीं होगाक्यों कि जतिन तो पूरी तरह से मम्मास-बॉय हैंउसके लिए तो उसकी माँ ही हर वक़्त सही हैं।  शालिनी अपने माँ और पापा से यह बात कह नहीं सकती थीअगर कहती तो उन्हें दुःख होताजो कि वो नहीं चाहती थी। शायद मम्मी जी यूँ ही गुस्से में कह दिया होगा यह सोच शालिनीरुक्मणि की कही बात भूलने को कोशिश करने लगीलेकिन शायद वो गलत थीयह बात रुक्मणि ने उस वक़्त साबित कर दी जब शालिनी ने एक बेटी को जन्म दिया।

   "हे भगवान्ये क्या किया शालिनी तुमने कम से कम एक बेटा पैदा करके तो दे ही सकती थी तुम" 

  "मम्मी जी ये आप कैसी बात कर रहीं हैंभला ये सब क्या मेरे हाथ में हैं।" 

  "तुम्हारे हाथ में तो कुछ नहीं हैंना ही अपने बाप के घर से कुछ लाना और ना ही हमें एक वारिस देनातुम्हारी जैसी बहु लाने से तो अच्छा था कि मैं अपने बेटे को कुंवारा ही रख लेती।" रुक्मणि के व्यवहार की वजह से शालिनी इस ख़ुशी के मौके पर भी दुःखी हो गयी और वो अपना दुःख जतिन से भी नहीं छुपा पाई।  

"क्या हुआ शालिनीतुम इतना परेशान क्यों लग रही होअरे भई हमारे घर एक परी आई हैंमुस्कुराकर स्वागत करो उसका" 

"जतिन क्या लड़की पैदा करना गुनाह हैं?" 

"ये क्या बेवकूफी भरी बातें कर रही हो,  आजकल के ज़माने में लड़का हो या लड़की सब बराबर हैंऔर मैं तो अपनी परी को जी भरकर प्यार करूँगासारी खुशियाँ दूँगा इसेऔर शालिनी लड़का हो या लड़की बच्चा स्वस्थ होना चाहिएऔर हाँ हमारी बेटी का नाम परी होगाऐसा इसके पापा चाहते हैंक्यों परी बेटा नाम पसन्द आया ना।" ऐसा कहते ही जतिन ने परी को चूम लिया। और जतिन की बातें सुन शालिनी में हिम्मत आ गयीअब उसे ये तसल्ली थी थी कि चाहे कोई उसके साथ हो या ना हो लेकिन उसका पति उसके साथ हैंऔर यही उसके लिए काफी हैं। 

  शालिनी की बेटी होने के एक महीनें बाद ही गरिमा के लड़का हो गयाजिस वजह से अब घर में शालिनी का दर्ज़ा बहुत नीचा एवं गरिमा का बहुत ऊँचा हो गयाऔर यह बात गरिमा भी समझती थीऔर उसने इस मौके का पूरा-पूरा फायदा भी उठायावो भी अपनी जेठानी को नीचा दिखाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती।  बार-बार अपने मायके से आए सामान की शालिनी के सामने नुमाइश करतीऔर बेटा होने का घमंड तो उसमे इतना था की जैसे पूरी दुनिया में वो ही एक हैं जिसने बेटे को जन्म दिया हैंयह सब बातें कभी-कभी तो शालिनी के बर्दाश्त के बाहर हो जातीफिर भी वो चुप ही रहती। और यही चुप्पी उसके लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हुईरुक्मणि व गरिमा उसे कमज़ोर समझने लगीऔर उनकी इसी सोच ने शालिनी को तोड़ दियावो खुद को असाहय महसूस करने लगीखासकर वो उस वक़्त ज्यादा दुःखी हो जाती जब उसकी बेटी को रुक्मणि व गरिमा हिक़ारत भरी नजरों से देखतीलेकिन कहीं ना कहीं जतिन का साथ ही उसे ये सब सहन करने की हिम्मत दे रहा था।  हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे थेजिसका असर अब बच्चों पर भी पड़ने लगा थाबच्चों के बीच में भी अब एक अदृश्य दीवार बनने लगी थीजो कि उनके बीच दूरी ला रही थीऔर ये सब देखकर शालिनी का मन दुःखी हो जाता क्यों कि वो बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि घर में जो भी कुछ हो रहा हैं उसका असर बच्चों के रिश्ते ओर पड़े लेकिन वो मज़बूर थी। 

  एक दिन रुक्मणि के द्वारा किया गया भेदभाव उस समय बहुत ही भयंकर रूप में पूरे परिवार के सामने आया जब गरिमा ने अपने ससुर की सारी प्रॉपर्टी अपने पति अमर के नाम करने की माँग की।

  "ये तुम क्या कह रही हो गरिमाअभी तुम्हारे ससुर जिन्दा हैं और उनके जीते जी ये सब कैसे हो सकता है।" 

  "मम्मी जी अभी करें या पापा जी के जाने के बाद क्या फ़र्क पड़ता हैंमिलना तो सबकुछ हमें ही हैंजतिन भैया और शालिनी भाभी तो उस वक़्त ही इन सब चीजों से अपना हक़ गवां बैठे थे जब उन्होंने आपके खानदान को बेटा देने की बजाय बेटी दी थी।" गरिमा की बात सुन वहाँ खड़ा घर का प्रत्येक सदस्य हक्का-बक्का रह गयालेकिन शालिनी को कोई आश्चर्य नहीं हुआक्यों कि उसे गरिमा से यही उम्मीद थी। 

  "गरिमातुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ये सब बोलने कीमेरे लिए मेरा पोता व पोती दोनों समान हैंखबरदार जो तुमने दोनों के बीच भेदभाव की दीवार खड़ी करने की कोशिश की।" अपने ससुर अरुण को क्रोधित देखते ही गरिमा कापँने लगीलेकिन अपनी सास को अपने पक्ष में देख उसके अन्दर फिर से हिम्मत आ गयी। 

  "क्या गलत कह रही हैं हैं गरिमासच ही तो हैं हमारे खानदान को बेटी देने की वजह से अब इन दोनों का क्या हक़ हैं इस घर पर" 

  "रुक्मणिये क्या बोल रही हो तुमशालिनी हमारें घर की बहु हैंऔर उसने हमारें ख़ानदान को बेटा नहीं दिया इसमें उसकी क्या ग़लती हैं।" अरुण को अपनी पत्नी रुक्मणि के दकियानूसी विचारों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। और वहाँ हो रहे झगड़े को सुन जतिन भी सकते में थाआज उसे पहली बार पता चला था कि इस घर में उसकी पत्नी शालिनी की क्या अहमियत हैं। और उससे ये बात बर्दाश्त ही नहीं हुईऔर जतिन ने तुरन्त ही एक फ़ैसला कर ड़ाला। 

  "मैं कुछ कहना चाहता हूँ।" जतिन के चेहरे पर आए भावों को पढ़ना वहाँ बैठे परिवार के हर सदस्य के लिए मुश्किल हो रहा था।" 

  "अब आप क्या कहना चाहते हैंक्या अब भी कुछ सुंनना बाकी रह गया हैं।" जतिन के कहते ही अरुण ने गुस्से से उसकी ओर देखते हुए कहा। 

  "मैं शालिनी और परी को लेकर कहीं ओर जाना चाहता हूँजहाँ हम शान्ति से रह सकेऔर इज़्ज़त के साथ भी" 

  "लेकिन जतिनशालिनी के कर्मो की सज़ा तू क्यों भुगत रहा हैं बेटा।" 

  "करमकैसे करम मम्मीअगर उसने बेटी पैदा की हैं तो अकेले ने की हैं क्यामैं भी बराबर का भागीदार हूँफिर तो मेरे करम भी बुरे हुएइस नाते मुझे भी मेरे कर्मो की सज़ा मिलनी चाहिएऔर आपकी प्रॉपर्टी में हमें कोई हिस्सा नहीं चाहिए आप सबकुछ अमर को दे दो।

 "लेकिन बेटा" 

 बस मम्मी अब और कुछ नहींअगर मुझे पहले पता होता कि आप लोग शालिनी और परी को इतना नापसन्द करते हो तो पहले ही इन्हे लेकर यहाँ से चला जातालेकिन कोई बात नहीं जो काम अब तक नहीं हुआ वो अब हो जाएगाशालिनी अपना सामान पैक करना शुरू करोहम अभी ये घर छोड़कर जा रहें हैं।" 

शालिनी ने आज पहली बार अपने पति का ये रूप देखाउसने सोचा भी नहीं था कि ये मम्मास बॉय  अपनी पत्नी के पक्ष में भी खड़ा हो सकता हैंजतिन को इस रूप में देखकर शालिनी में आज हिम्मत आ गयी और वो भी अपने पति के साथ परिवार के द्वारा किए जाने वाले अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी हो गयी। 

  उस दिन अरुण के परिवार में बहुत कहासुनी हुईऔर रुक्मणि व अरुण के लाख मिन्नतें करने के बावजूद भी जतिन अपने परिवार को लेकर घर से चला गया। 

  अब एक परिवार दो भागों में बँट चुका थाऔर इन दोनों ही परिवारों के बच्चों की परवरिश भी अलग-अलग तरीके से हुईजहां एक तरफ जतिन व शालिनी ने अपनी बेटी परी की परवरिश उसे अच्छे संस्कार देते हुए  की तो वहीं दूसरी ओर गरिमा व अमर ने अपने बेटे नकुल को सिर पर चढ़ाकर रखाउसे उन्होंने बार-बार इसी बात का अहसास करवाया कि लड़का होने की वजह से इस घर में उसकी ख़ास अहमियत हैंऔर इस पूरे घर पर उसी का हक़ हैंबस यही सब बातें नकुल की परवरिश पर बुरा असर ड़ालने लगीवो बिगड़ने लगालड़कियों की इज़्ज़त करना तो जैसे वो जानता ही नहीं था,अपने से बड़ो का बिना वजह अपमान करना उसकी फ़ितरत बन चुका थाऔर इसकी इस आदत का शिकार अरुण व रुक्मणि ना जाने कितनी बार हुएजहां रुक्मणि नकुल की बद्तमीज़ियों को हँसकर टाल देती वहीं दूसरी और अरुण उसकी इस आदत के सख्त ख़िलाफ़ रहतेलेकिन उनके ख़िलाफ़ होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता था क्यों कि अरुण के अलावा वहाँ रहने वाले हर एक सदस्य को इस बात का गुमान था कि नकुल एक लड़का हैं। 

  वहीं दूसरी ओर जतिन व शालिनी ने बहुत ही धैर्य से अपनी बेटी परी की परवरिश की उसे अच्छे संस्कार दिएयहाँ तक की पढ़ाई में भी परी नकुल से अच्छी थी। वक़्त गुजरता गयाऔर बच्चें बड़े हो गएजहां एक तरफ परी पढ़-लिखकर एक डॉक्टर बनी वहीं दूसरी ओर नकुल एक बिगड़ैल आवारा बेरोज़गार बनाकहीं नौकरी करना तो दूर की बात थी उसने तो अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं की। 

  "नकुल बेटातुम पूरा दिन आवाराओं की तरह से इधर-उधर घूमते रहते होक्यों अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं देतेबेटा कहीं अच्छी जगह नौकरी लग जाएगी तो अच्छा रहेगा।" एक दिन मौका देखकर अरुण ने कह ही डाला। 

 "लेकिन मुझे नौकरी करने की क्या ज़रुरत हैं दादूआपकी सारी दौलत मेरी ही तो हैंआख़िरकार मैं आपके खानदान का इकलौला वारिस जो हूँ।" 

 "नकुलतमीज़ से बात करोक्या यही संस्कार मिले हैं तुम्हे.......!" ऐसा कहते-कहते अरुण अचानक से रुक गएऔर सोचने लगे कि हाँ यही तो संस्कार मिले हैं इसेऔर इसको दिए गए बुरे संस्कारों का भुगतान करने का अब वक़्त आ चुका हैंक्यों कि बुरे कर्मों की सजा तो निश्चित ही मिलती हैं। 

 इस घटना के बाद कुछ महीनें और यूँ ही गुज़र गएफिर एक दिन,  "दादूदादीपापामम्मी मुझे आप सब से कुछ कहना हैं।" 

 "हाँ बोल बेटा" गरिमा के कहते ही

 "मैं अब पच्चीस साल का हो चुका हूँ और मैं चाहता हूँ कि दादू अपनी सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम कर देऔर आप सभी जितना जल्दी हो सके कहीं ओर अपने रहने का ठिकाना देख लो।" 

 "ये क्या बकवास कर रहे हो तुम!" अमर ने आश्चर्य से कहा। 

"क्यों पापामैं ग़लत क्या कह रहा हूँमैंने तो बचपन से यही सुना हैं कि ये सबकुछ मेरा हैंमेरे लड़का होने पर आप सभी को बहुत गर्व हैंमम्मी तो यहाँ तक कहती हैं कि उन्होंने पिछले जन्म में ज़रूर कोई अच्छे कर्म किए होंगे जो उन्होंने एक लड़के को जन्म दियाऔर मैं जानता हूँ दादी भी मम्मी को सिर्फ मेरी वजह से ही पसंद करती हैं।" नकुल के द्वारा कहे गए इन शब्दों ने आज रुक्मणि को इस बात का अहसास करवा दिया कि उसने क्या गलती की हैंलेकिन अब कुछ नहीं हो सकता थापानी सिर के ऊपर जा चुका था। नकुल की ज़िद के आगे किसी की भी नहीं चलीऔर आखिरकार अरुण को अपनी सारी प्रॉपर्टी उसके नाम कर देनी पड़ीऔर जैसे ही अरुण ने प्रॉपर्टी के कागज़ातों पर अपने साईन किए नकुल ने सभी को घर से बाहर का रास्ता दिखा दियासभी उसके आगे बहुत गिड़गिड़ाएमिन्नतें की लेकिन नकुल को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। और इसी वजह से अरुण की तबियत इतनी बिगड़ गयी कि उन्हें अस्पताल लेकर जाना पड़ाऔर किस्मत से उनका इलाज़ करने वाला कोई ओर नहीं बल्कि उनकी पोती परी ही थी। 

 अरुण के अस्पताल के आउटडोर में प्रवेश करते ही

 "दादू आप यहाँ….!" परी ने जैसे ही आश्चर्य से पूछा। 

 "कौन?" 

 "दादू मैं परीआपकी पोतीआपके जतिन की बेटी" 

 "परीबेटा तू यहाँअस्पताल मेंवो भी एक डॉक्टर के भेष मेंइसका मतलब तू डॉक्टर बन गयी बिटिया। " 

 "हाँ दादू आपके आशीर्वाद से मैं डॉक्टर बन गयीलेकिन आपने ये क्या हाल बना रखा हैं और दादी कहाँ हैं?"

 "बहुत लम्बी कहानी हैं बिटियाफिलहाल तो मेरे साथ तेरे चाचा आए हैं।"

"ठीक हैं दादू पहले मैं आपका चेक-अप कर लेती हूँफिर बाकी मरीज़ देखने के बाद चाचू से भी मिल लूँगीजब तक आप दोनों यहाँ पास ही हमारा घर हैं वहाँ आराम कीजिएमैं पापा को फोन कर देती हूँ वो आप दोनों को आकर ले जाएंगे।" 

 "इसका मतलब तू और तेरे मम्मी-पापा यहाँ पास ही रहते हैं?" 

 "हाँ दादूऔर पापा भी आपको देखकर खुश हो जायेंगेजानते हैं दादू पापा आप सबको बहुत याद करते हैंहर वक़्त आप लोगों की ही बातें करते रहते हैं।" जहां परी एक तरफ अपने दादू से बात करती हुई उनका चेक-अप करती जा रही थीवहीं दूसरी ओर उसने इस दौरान जतिन को भी फोन करके बुलवा लिया। 

 कुछ ही देर में वहाँ जतिन के आते ही

 "लीजिए दादू पापा आ गएअब आप और चाचू इनके साथ घर चले जाईयेऔर ढ़ेर सारी बातें कीजिए।" जतिन को अपने सामने देख अचानक से अरुण की आँखे भर आई और अपने व्यवहार की वजह से अमर की आँखें शर्म से झुक गयीलेकिन जतिन सबकुछ भूल तहे दिल से इनका स्वागत करना चाहता था इसलिए उसने बिना समय गवायें तुरन्त अपने भाई को अपने गले से लगा लिया। 

 "कैसा हैं मेरे भाईबहुत कमज़ोर लग रहा हैंऔर पापा आप यहाँ अस्पताल में कैसेसब ठीक तो हैं ना?" 

  "हाँ बेटाअब सब ठीक हैं।" 

 "कुछ नहीं पापादादू अपने खाने-पीने का ध्यान नहीं रखतेइसलिए थोड़ी-सी कमज़ोरी थीमैंने दवाई दे दी हैं सब ठीक हो जाएगा।" 

 "हाँ ठीक तो हो जाएगाआखिरकार मेरे पापा बहुत स्ट्रॉन्ग हैं।" लेकिन जतिन को शक हो चुका था कि ज़रूर कुछ गड़बड़ हैंये दोनों अवश्य ही कुछ छुपाने की कोशिश कर रहे हैंलेकिन वो इस वक़्त उन दोनों को अपने घर ले जाना चाहता थाचाहे कुछ देर के लिए ही सही उन्हें चिंतामुक्त करना चाहता था और इसलिए बिना वक़्त बर्बाद किए जतिन अरुण व अमर को अपने घर ले गयाजहां उनका स्वागत शालिनी ने तहे दिल से कियाआज जतिन की आँखों की चमक देखते ही बनती थीना जाने कितने सालों बाद आज शालिनी ने जतिन को खुश देखा था।

 कुछ देर तक यूँ ही बातों का सिलसिला चलता रहाइस दौरान शालिनी ने अपने ससुर व देवर को उनका मनपसंद नाश्ता भी करवायारुक्मणि व गरिमा का ज़िक्र भी आया लेकिन सब ठीक हैं यह कहकर अमर ने बातों  सिलसिला दूसरी ओर मोड़ दियादरअसल जतिन व शालिनी के सुखी संसार को देखकर अमर व अरुण अपना दुःख उनके साथ नहीं बाँटना चाहते थेलेकिन उनके लिए अपने हालात जतिन से ज्यादा देर तक छुपाना संभव भी नहीं थाऔर इसी वजह से कुछ ही देर बाद जतिन के आग्रह करने पर अरुण को उसे सबकुछ सच-सच बताना पड़ादुर्भाग्य से ये सारी वार्तालाप परी के सामने हुई जिसे सुन वो सकते में आ गई। 

 "मुझे तो बिल्कुल भी याद नहीं कि दादी व चाची मुझसे इतनी नफरत करती थीख़ैर कोई बात नहीं वो जैसी भी हैं मेरी अपनी हैंअब चाहे कुछ भी हो जाए आप सब हमारे साथ रहोगेक्यों पापा मैंने सही कहा ना?" परी जतिन की ओर देखने लगी जैसे उसकी सहमति माँग रही हो। 

 "हाँ बिल्कुल अब हम सब साथ मिलकर रहेंगेइतने सालों तक बहुत तरसे हैं हम तीनों अपने परिवार के लिएअब हमारा परिवार पूरा हो जाएगाशालिनी तुम भी तो कुछ बोलो।" जतिन शालिनी की सहमति लेने के लिए उसकी ओर देखने लगा। 

 "इसमें मेरी सहमति की क्या जरूरत हैं जतिनसबके एक साथ रहने से मुझसे ज्यादा ख़ुशी और किसे होगीमैं तो चाहती हो हम सब साथ मिलकर रहे और मुझे तो ये भी यकीन हैं कि नकुल के दोस्तों ने ही उसे भड़काया होगा हम सब मिलककर उसे समझायेंगे तो वो समझ जाएगा।" 

 "नहीं भाभी हमें अब उस लड़के से कोई संबन्ध नहीं रखनाये समझ लीजिए उसका जन्म ही नहीं हुआ थाकाश मेरे भी परी जैसी बेटी हो जाती।" ये कहते ही अमर फूट-फूटकर रोनें लगाऔर उसे देख शालिनी भी ना जाने क्यों दुखी हो गयीक्यों कि उसने तो कभी ये चाहा ही नहीं था कि उसके ससुरालवालों को इस क़दर अपने कर्मों की सजा मिलेउन्होंने उसके साथ कितना हो बुरा किया हो लेकिन शालिनी ने तो हमेशा उनके सुख की कामना की हैंऔर इसी बात का फल हैं कि आज परी  डॉक्टर बन चुकी हैं और शालिनी व जतिन सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 

 कुछ ही दिनों बाद अरुणरुक्मणिअमर व गरिमा जतिन के घर रहने आ गएलेकिन हर वक़्त गरिमा व रुक्मणि के चेहरे पर अपने किए का पछतावा रहता और शायद यही उनकी सजा थी। 


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