Zindagi Ka Ek Roop / ज़िंदगी का एक रूप (Story on Life)
दिसंबर का महीना चल रहा था, अपने घर की बालकनी में बैठ, धूप का आनंद लेते हुए पढ़ी-लिखी, सभ्य दिखने वाली 60 वर्षीय केतकी सड़क पर आते-जाते लोगों को बेहद ही उत्सुकता से देख रही थी, वो कभी किसी के क्रियाकलाप को देख मुस्कुराने लगती तो किसी को देख सोच में पड़ जाती, इतने में, “नानी, आप मुस्कुरा क्यों रही हो, कोई joke याद आ गया क्या?” इतने में हाथ में स्कूल बैग थामे, 15 वर्षीय वान्या ने केतकी के पास बैठते हुए पूछा “नहीं बेटा, मैं तो आते-जाते लोगों को देख रही हूँ, सोच रही हूँ किस के मन में क्या चल रहा होगा, किसी के चेहरे पर मुस्कान है, तो कोई उदास, किसी को कही जाने की कोई जल्दी नहीं है, तो कोई भाग रहा है।” केतकी के कहते ही, “नानी आप भी ना गजब हो।” वान्या ने केतकी के गालों को प्यार से खींचते हुए कहा। “अच्छा बता स्कूल नहीं जाना है क्या आज?” केतकी ने बिना वान्या की बात सुने, उसके बैग पर नजर डालते हुए पूछा। “जाना है नानी, लेकिन अभी तक स्कूल बस ही नहीं आयी।” वान्या ने सड़क पर एक नजर दौड़ाते हुए कहा। ...