Mera Ghar Konsa Hain (Story On Social Problem)
" वैशाली , अरे भई आज दोपहर की चाय मिलेगी या नहीं" वैशाली की सास शुगना ने जैसे ही आवाज़ लगाई , वैशाली अपने सारे काम छोड़ दौड़ी चली आई। " जी माँजी बस बनाने ही जा रही थी , साथ में गरमागरम पकोड़े भी तल लूँ क्या" " नहीं रहने दे , तू तो बस एक कप चाय ही पिला दे" और फिर शुगना भी वैशाली के पीछे-पीछे रसोई की ओर चल पड़ी और वहीं रसोई के बाहर कुर्सी लगाकर बैठ गयी , ये उसकी लगभग रोज़ की दिनचर्या थी , अन्दर रसोई में वैशाली शाम की चाय बनाते हुए खाने की तैयारी करती रहती , और रसोई के बाहर कुर्सी पर बैठी उसकी सास उससे दुनियादारी की बातें , " अरी वैशाली , अपनी निधि भी अब पच्चीस की होने को आई , तू विक्रम से कह उसके लिए लड़के देखना शुरू करे" " कहा था माँजी , और इन्होने अपने कुछ जान-पहचान वालों से इस बात का ज़िक्र भी किया हैं , मैंने भी अपने मायके वालों को कह दिया हैं कि निधि के लायक कोई लड़का हो तो बताये , अब देखते हैं कहाँ बात बनती हैं।" " हम्म , बात तो तेरी सही हैं , आने दे तेरे ससुर जी को अपनी मित्र-मण्डली से मिलकर , उन्हें भी लगाती हूँ इस काम पर ...