kaashi (Story On A Girl)
" काशी बेटा मैं मंदिर जा रहा हूँ , बाज़ार से कुछ मँगवाना हो तो बता दो।" दामोदर जी ने रसोई में खाना पका रही अपनी बेटी से पूछा। " नहीं बाबा कुछ नहीं लाना , लेकिन आप थोड़ा जल्दी आ जाइएगा , अपने दोस्तों के साथ गप्पें लड़ाने मत बैठ जाना।" काशी के कहते ही , " अरे पगली वो तो मेरे दोस्त मुझे ज़बरदस्ती रोक लेते हैं , वरना मैं तो सीधा घर ही आऊँ।" ' अब रहने भी दो बाबा , सच से आप भी अच्छी तरह से वाकिफ़ हो और मैं भी" काशी ने दाल में तड़का लगाते हुए कहा। " हाँ अब रहने भी दे , बाप हूँ तेरा और बाप की जासूसी करती हैं , चल अब आकर दरवाज़ा बंद कर ले , नहीं तो राधा की बिल्ली आ जायेगी।" और फिर काशी दरवाज़ा बन्द कर फिर से खाना बनाने बैठ गयी। काशी , दामोदर जी की इकलौती बेटी हैं , उसकी माँ का देहांत उसके बचपन में ही हो गया था , जब से घर में केवल वो और उसके बाबा ही रहते हैं , पहले उसके बाबा उसके प्रति माँ का फ़र्ज़ निभाते थे और अब वो निभाती हैं। यूँ तो काशी अब बीस साल की होने को आई , और ज़ाहिर सी बात हैं दामोदर जी को उसके विवाह की च...