Vicharon Ka Takraav (Story On A Family)


"निशा, इस साल अक्टूबर में सोनल पूरे अठाईस साल की हो जाएगी, और तुमने अभी तक उसके लिए लड़का देखना भी शुरू नहीं किया, क्या बेटी को ज़िन्दगी भर कुँवारा रखने का इरादा हैं तुम्हारा" निशा की सास शारदा ने आज सुबह-सुबह ही उसे ताना मार दिया, लेकिन वो भी कहाँ चुप बैठने वाली थी। 

"माँजी सबसे पहली बात तो ये हैं कि सोनल मेरी अकेली की बेटी नहीं हैं, आपके बेटे की भी बेटी हैं, इसलिए आप जो ये बार-बार सोनल को लेकर मुझे ताने मारती हैं बंद कीजिए, और रही उसकी शादी की बात तो जब वो शादी के लिए तैयार होगी कर देंगे।" निशा के कहते ही

"अरे ये तो हद ही हो गयी, अगर लड़की पूरी ज़िन्दगी तैयार नहीं हुई तो, उसे हमेशा कुँवारा ही बैठाकर रखोगे क्या?" 

'दादी, अगर मैं कुँवारी बैठी भी रही तो क्या फ़र्क पड़ता हैं, अरे अच्छा ख़ासा कमाती हूँ, बोझ नहीं हूँ किसी के ऊपर" इतने में ही वहाँ सोनल आ गयी। 

"गज़ब जुबान चलती हैं दोनों ही माँ बेटियों की, मेरे तो बेटे की किस्मत ही फूटी निकली।" 

"माँजी, इसमें जुबान चलाने वाली क्या बात हैं, जो सच्चाई हैं वो ही तो कही हैं आपसे" 

'मुझे बहस ही नहीं करनी हैं तुम दोनों से, मैं तो राकेश से ही बात करुँगी, वो ज़रूर समझेगा मेरी बात" ऐसा कहते ही शारदा अपने कमरे में चली गयी।

"सोनल बेटा, देखा जाए तो माँजी कुछ गलत तो नहीं कह रहीं थी, अब तो मुझे भी लगता हैं की तुझे शादी के बारे में सोचना चाहिए।" निशा के कहते ही

"मम्मी प्लीज, कम से कम आप तो दादी की तरह से बात मत करो।" 

'लेकिन बेटा इसमें गलत क्या हैं।

"मुझे तो ये समझ में नहीं आता की शादी करनी ही क्यों हैं, और अगर करनी भी हैं तो इसकी एक उम्र क्यों तय हैं, अरे कर लेंगे जब मन होगा।" 

"और जब तेरा मन होगा उस वक़्त कोई लड़का भी तो मिलना चाहिए, मेरी गुड़िया ये सब इतना आसान नहीं हैं जितना की तू समझ रही हैं, अगर आज से हम लड़का देखना शुरू करते हैं तो ज़रूरी नहीं हैं की तू पहले ही लड़के को पसंद कर ले या फिर वो तुझे पसंद कर लेइस काम में तो सालों भी लग जाते हैं, अगर किस्मत अच्छी हुई तो लड़का जल्दी भी मिल सकता हैं।

"आप चाहती क्या हो मम्मी" 

"बेटा बुरा मत मानना, दरअसल मैं भी चाहती हूँ की अब तेरी जल्द से जल्द शादी हो जाए।"

"मम्मी! तुम तो मेरी साइड थी ना ?" 

'वो तो अब भी हूँ, लेकिन बेटा अगर उम्र निकल गयी तो शादी करना मुश्किल हो जाएगा, और अभी चाहे तुझे महसूस ना हो लेकिन एक उम्र के बाद साथी की ज़रुरत महसूस होती हैं।" निशा के कहते ही

'मम्मी लेकिन

'प्लीज बेटा" 

'ओके, तो कर दीजिए शुरू आप मेरे लिए लड़के देखना, लेकिन मैं जवाब तब ही दूँगी जब उसे अच्छे से जाँच-परख लूँगी।" 

'हाँ चलेगा, अरे कोई तो होगा इस दुनिया में जो मेरी बेटी के मन को भायेगा।" ऐसा कहते ही निशा ने प्यार से सोनल के माथे पर चूम लिया। 

 

उसी दिन शाम को, "राकेश, देखना शुरू कर दीजिए अपनी बेटी के लिए लड़के, मान गयी हैं वो अब शादी के लिए" जैसे ही निशा ने अपने पति राकेश से कहा।  

"क्या बात हैं, माँ भी आज इसी बारे में बात कर रही थी, वैसे वो तो इस बारे में बात करती रहती हैं, लेकिन आज तुम कैसे" 

'क्योंकि सोनल ने सच में लड़के देखने के लिए हामी भर दी हैं, मैं बहुत खुश हूँ, कह नहीं पाती थी लेकिन चिंतित थी बहुत उसकी शादी को लेकर" 

"जानता हूँ, सोनल और माँ विचारों के बीच पिस रहीं थी तुम, लेकिन अब सब ठीक हो जायेगा, मैं कल से ही इस शुभ काम की शुरुआत करता हूँ, तुम भी अपने रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से कह दो की कोई अच्छा सा लड़का हो तो बताए।" राकेश के कहते ही

'हाँ, बल्कि मैंने तो आज अपने मायके फोन करके कह भी दिया हैं।" 

"ये तुमने अच्छा किया, मैं भी अपने जानकारों से कह देता हूँ, लेकिन उससे पहले माँ को ये ख़ुशख़बरी दे दो।" 

"जी' ऐसा कह निशा शारदा के कमरें की ओर चल पड़ी।  

 

करीब-करीब दो हफ़्ते बाद, "राकेश आज दोपहर माँ का फोन आया था, एक लड़का बताया हैं उन्होंने" 

'हाँ तो उसका फोटो और बायोडेटा मँगवा लो।" 

'मँगवा लिया और मुझे तो सब सही लगा, एक बार आप भी देख लीजिए।" और ऐसा कहते ही निशा ने अपना व्हाट्सप्प खोल राकेश की ओर बढ़ा दिया। 

"हम्म, लड़का तो सही हैं, शक्ल-सूरत भी ठीक हैं, मानव नाम हैं लड़के काअरे इसके पिताजी का तो अपना व्यवसाय हैं, महेंद्र नाम हैं इनकाऐसा करो सोनल को दिखा लो अगर उसकी मंज़ूरी हुई तो उन्हें भी उसका बायोडेटा भेज देंगे।" 

'दिखा दिया आज दोपहर ही, मंज़ूरी हैं उसकी, और उसका बायोडेटा भी भेज चुकी हूँ।" 

'कमाल हैं, तो फिर मुझसे क्या चाहती हो।" 

"आपकी मंज़ूरी" 

'मंज़ूरी तुम्हारी बेटी की महत्वपूर्ण हैं बीवी, मेरी नहीं" 

'राकेश, पता नहीं क्यों ऐसा लगता हैं ये रिश्ता पक्का हो ही जायेगा।" 

'अगर हो जाए तो अच्छा हैं, मैं कल ही लड़के के पिताजी से बात कर लेता हूँ, अगर उनकी तरफ से भी हाँ हो तो मिलने का समय और जगह तय कर लेता हूँ।

 

अगले दिन राकेश ने लड़के के पिताजी से बात कर चार दिन बाद का समय मिलने के लिए तय कर लिया।

 

चार दिन बाद, इधर से राकेश का परिवार दूसरी ओर से महेंद्र जी का परिवार एक होटल में मिले।

'नमस्ते मैं राकेश सोनल का फ़ादर, और ये रही सोनल 

'नमस्ते जी, मैं महेंद्र, मानव का फ़ादर, और ये मेरा बेटा मानव" मानव और सोनल को मिलवाने के पश्चात् दोनों ही परिवारों के लोग बातों में मशगूल हो गए और एक दूसरे के बारें में जितनी जानकारी निकाल सकते थे निकालने की कोशिश की, मानव व सोनल से भी सवाल किये गए, दोनों को अकेले में बात करने का मौक़ा भी मिला और फिर दोनों ने अपने मोबाइल नंबर एक्सचेंज कर लिए, कुल मिलाकर ये मुलाक़ात अच्छी रही, और साथ ही उम्मीद भी बँधी की शायद यहाँ सोनल का रिश्ता पक्का हो जाए लेकिन

"दादी आप भी कमाल करते हो, अरे इतनी जल्दी जवाब कैसे दे दूँ, मेरी पूरी ज़िन्दगी का सवाल हैं, मुझे अभी मानव से और मिलना हैं उसे जानना हैं, समझना हैं, और मैं उसके साथ कम्फर्टेबल फील करुँगी तब ही हाँ बोलूँगी।" 

'ये क्या बोली तू अंग्रेजी में...... देख री छोरी तेरे से कोई नहीं पूछ रहा हैं तेरी मर्ज़ी, अगर लड़के की हामी आ गयी तो शादी करनी ही पड़ेगी।

'मम्मी, क्या हैं ये, ऐसे मुझे नहीं करनी शादी" सोनल चिड़चिड़ाकर पास बैठी निशा से बोली।  

'माँजी आप शांत हो जाइए मैं बात करती हूँ सोनल से" निशा के कहते ही

'हाँ समझा ले अपनी बेटी को, अरे इसके तो नख़रे ही खत्म नहीं होते, अब बुढ़ापे में जाकर शादी करेगी क्या" शारदा गुस्से से बोली, और फिर उठकर चली गयी। 

'सोनल......."

"मम्मी प्लीज, अब ये मत कहना की दादी सही कह रही हैं।" 

"अरे नहीं बेटा बल्कि मैं तो ये कह रही थी की तुम मानव से फोन पर बात करके मिलने की जगह क्यों नहीं तय कर लेते, अरे एक दूसरे से मिलोगे, बातें करोगे तब ही तो एक दूसरे को जानोगे।" निशा ने बात को सभांलने की कोशिश की। 

"हम्म बात तो हैं आपकी, मैं आज ही मानव को कॉल करती हूँ।" उसके बाद लगभग एक महीनें तक मानव और सोनल के बीच बात होती रही और दोनों ही तरफ के घरवालें उनके जवाब का इंतज़ार करते रहे। 

 तक़रीबन डेढ़ महीनें बाद, "अरे ये भी कोई बात हुई, कम से कम पिछले एक डेढ़ महीनें से उस लड़के से बात कर रही हैं, होटलों में खाना भी खा रही हैं उसके साथ, अरे एक-दो बार तो दोनों फिल्म भी देख आये, और अब महारानी जी कह रही हैं की मुझे लड़का पसंद नहीं........निशा मैं सही कह रही हूँ सिर पर चढ़ा रखा हैं तूने अपनी बेटी को" शारदा आज बहुत गुस्से में हैं, और उसका सारा गुस्सा बेचारी निशा पर ही उतर रहा हैं, लेकिन अब तो उसके भी बर्दाश्त करने की सीमा ख़त्म हो चुकी हैं। 

"माँजी, आप हर गलती के लिए मुझे ही ज़िम्मेदार क्यों ठहराती हो, आपको अंदाज़ा भी हैं आज की पीढ़ी के विचारों के साथ तालमेल बैठना कितना मुश्किल होता हैं।" 

'अरे सारी मुश्किलें तुम्हारे साथ ही तो होती हैं, हमनें तो जैसे बच्चें पाले ही नहीं।" 

'अरे ये क्या शोर मचा रखा हैं, कुछ देर तो घर में शांति रहने दिया करो।" इतने में ही राकेश के चिड़चिड़ाते हुए कहा, और फिर अगले ही पल शारदा और निशा बिना कुछ बोले अपने-अपने काम पर लग गयी, इसके बाद अगले दो-तीन महीनें तक सोनल के रिश्तें के संदर्भ में घर पर कोई बात नहीं हुई।

 

तीन महीनें बाद, "निशा, एक रिश्ता आया हैं सोनल के लिए, मैंने तुम्हे लड़के का बायोडेटा व्हाट्सप्प  कर दिया हैं देख लेना।" राकेश ने ऑफिस से फ़ोन कर निशा से कहा। 

"जी देखती हूँ, लेकिन आपके क्या विचार हैं।" 

'मुझे तो ठीक लगा, तुम्हे भी ठीक लगे तो सोनल को दिखा लेना।" 

"जी" और फिर निशा फोन रख अपना व्हाट्सप्प देखने लगी, लड़का निशा को भी ठीक लगा, इसलिए उसने इसका ज़िक्र सोनल से भी कर दिया, लेकिन सोनल ने तो बायोडेटा देखे बिना ही मना कर दिया। 

"लेकिन कमी क्या हैं लड़के में" निशा की आवाज़ में हल्का सा गुस्सा झलक रहा था। 

"मम्मी इसकी शक्ल तो देखो, बंदर लग रहा हैं बिल्कुल, इससे शादी करुँगी मैं, नेवर, कभी नहीं" और कहते ही सोनल उठकर चली गयी। 

'हे प्रभु, तू ही बता क्या करूँ मैं, किसे समझाऊँ और कैसे समझाऊँ।" मन ही मन बड़बड़ाते हुए निशा अपना सिर पकड़कर बैठ गयी। .......इसके बाद सोनल के लिए कई रिश्तें आये, तो कई जगह राकेश और निशा ने सोनल का रिश्ता भेजा, लेकिन बात कहीं नहीं बनी, कभी सोनल मना कर देती तो कभी  सामने से ना हो जाती, कुल मिलाकर अब सोनल बत्तीस साल की होने को आई थी लेकिन उसकी शादी ही तय नहीं हो पा रही थी, और इसी बात ने घर का माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण पर दिया, निशा व शारदा के बीच तो बातचीत लगभग बंद ही हो चुकी थी, क्योंकि इन सब बातों के लिए कहीं ना कहीं शारदा निशा को ही ज़िम्मेदार ठहरा रही थी। 

 

आज सोनल का पैंतीसवां जन्मदिन हैं, लेकिन अभी तक उसकी शादी का संजोग कहीं नहीं बैठा हैं, अब तो वो भी लड़कों से मिल-मिलकर दुःखी हो चुकी हैं, और इसी संदर्भ में आज वो सबसे एक बात कहना चाहती हैं। "पापा, मम्मी, दादी मैं जानती हूँ की आप लोगों को मेरी शादी का बहुत टेंशन हैं, लेकिन क्या करूँ मुझे मेरी टक्कर का कोई लड़का मिलता ही नहीं हैं, इसलिए मैंने फ़ैसला किया हैं की मैं शादी ही नहीं करुँगी। सोनल के कहते ही

"ये क्या कह दिया गुड़िया, सब्र रख कोई ना कोई ज़रूर मिलेगा जो तेरी नज़रों में ख़रा उतरेगा।" निशा के कहते ही

'हद हो गयी ये तो, अरे ये होती कौन हैं जो किसी को इसकी नज़रों में ख़रा उतरना होगा, बल्कि ख़रा तो इसे उतरना होगा सामने वाले की नज़र में" आज शारदा कई दिनों बाद निशा पर फिर से चिल्लाई। 

"माँजी प्लीज, चुप हो जाइए.........आप चुप क्यों हैं, कुछ कहते क्यों नहीं" निशा ने राकेश की ओर देखते हुए कहा। 

"क्या कहूँ, हार चुका हूँ मैं, अपनी बेटी के लिए एक ऐसा रिश्ता तक नहीं ढूँढ पाया जो उसे पसंद आ जाए।"

"पसंद लड़के करते हैं लड़कियों को, ना कि लड़कियाँ करती हैं, तुम दोनों ने तो एक अलग ही रिवाज़ चला दी हैं।' शारदा ज़ोर से चिल्लाई। 

'बस करो माँ, ज़माना बदल गया हैं, तुम्हारे ज़माने में जो होता था वो अब नहीं होता, पसंद या नापसंद करने का हक़ लड़की का भी बराबर का होता हैं।" आज पहली बार राकेश ने शारदा से ऊँची आवाज़ में बात की, जो की उसे भी अच्छी नहीं लगी।  लेकिन ऐसा करने के अलावा कोई ओर रास्ता भी नहीं था। घर में हुए इस कलेश के बाद माहौल बेहद ही तनावपूर्ण रहने लगा। कोई किसी से बात ही नहीं करता, यहाँ तक की निशा व राकेश के बीच भी बातचीत लगभग बंद ही हो चुकी थी, बस जितनी ज़रुरत होती उतनी ही बातचीत होती, और इस बात का अहसास सोनल को भी भली-भाँति हो रहा था लेकिन वो कुछ कर नहीं पा रही थी। 

 

तक़रीबन एक साल बाद, "मम्मी, इनसे मिलों ये हैं मुकुल जी मेरे साथ मेरी ही ऑफिस में काम करते हैं।" एक दिन ऑफिस से वापिस आकर सोनल ने निशा से कहा।  

 "नमस्ते, आईए बैठिए, क्या लेंगे ठंडा या गरम" 

"जी कुछ नहीं, मैं तो बस आपसे आपकी बेटी माँगने आया हूँ।" 

"मतलब! मैं कुछ समझी नहीं" 

"अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूँ, लेकिन मैं डिवोर्सी हूँ।" मुकुल के कहते ही

"मम्मी मुझे भी मुकुल जी पसंद हैं, इनके डिवोर्सी होने से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।" सोनल एकाएक बीच में बोल पड़ी। 

"मैं सोनल के पापा से भी बात कर लेती हूँ।" और ऐसा कहते ही निशा राकेश को फोन लगाने लगी जो की अब रिटायरमेंट के बाद एक समाजसेवी संस्था के साथ जुड़ गए थे 

"हाँजी बोलिए निशा जी"दूसरी ओर से राकेश के कहते ही निशा ने उसे पूरी बात से अवगत करवा दिया।  

"उन्हें बैठाकर रखिए मैं बस थोड़ी ही देर में घर पहुँचता हूँ।" और कुछ ही देर बाद राकेश घर आ गया, और फिर कुछ फॉर्मल बातचीत के बाद ये रिश्ता तय हो गया और कुछ ही दिनों में बड़ी ही सादगी से शादी भी हो गयी। 

 

"निशा जी, यहाँ लिखी थी हमारी बेटी की शादी, लेकिन माँ की किस्मत में नहीं थी देखनी जब ही तो शादी से चार महीनें पहले ही चल बसी।" बस इतना कहते ही राकेश ने अपनी आँखों से अपने गालों पे लुढ़क आये आँसुओं को पोंछ ड़ाला, और फिर दोनों की पति-पत्नी एक गहरी सोच में चले गए। 

 

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