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Zid / जिद (Story on Conflict Of Ideas)

  “भाभी ये लीजिए मुँह मीठा कीजिए, गुँजन का ब्याह तय हो गया है।“ Doorbell बजते ही जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, सामने खड़ी मेरी मैड अरुणा ने चहकते हुए कहा। “अरे वाह अरुणा, बहुत-बहुत बधाई हो, क्या करता है लड़का” “भाभी, वो एक सरकारी दफ्तर में चपरासी है, सच बताऊँ तो बहुत खुश हूँ मैं, क्योंकि उसकी पक्की नौकरी है, और कोई बुरी लत भी नहीं है, मेरी बेटी कभी भूखी नहीं मरेगी वहाँ पर” “ये तो तूने सही कहा अरुणा, अच्छा चल अब फटाफट मेरे लिए एक कप चाय बना दे, तेरे हाथ की चाय पिए बिना मेरी सुबह ही नहीं होती।“ मेरे कहते ही, “हाँ भाभी अभी बनाती हूँ, और साथ में कुछ नाश्ता भी बना देती हूँ, तब तक आप बालकनी में बैठ आज की ताज़ा खबरों पर नजर ड़ालों।“ ये मेरे रोजाना का रूटीन था अरुणा के आने के बाद उसके हाथ की एक कप चाय पीते हुए मैं अखबार पढ़ती थी। लेकिन आज जैसे ही मैं अखबार लेकर बैठी, ना जाने क्यों उसे पढ़ने में मेरा मन ही नहीं लगा और विचारों का कारवाँ दो साल पीछे ढेरा ड़ाल बैठ गया।   “ Mom , I am in love ” मुझे अच्छे से याद है जब आरुषि ने दो साल पहले मुझसे ये शब्द कहे थे, होंठों पर मुस्कान आ गयी थी ...