Tu Sirf Meri Hai / तू सिर्फ़ मेरी है ( A story On Sad Love)
पुणे में स्थित एक इंजीनियरिंग कॉलेज के पार्किंग एरिया में तकरीबन 5’ 11’’ लंबा, गोरे रंग का 19 वर्षीय रक्षित अपने कुछ दोस्तों के साथ में बैठा था कि अचानक से एक गाड़ी आयी और उसमे से एक बेहद ही सुंदर लड़की उतरी, जिसके कमर तक लंबे बाल, बड़ी-बड़ी आँखे, गोरा रंग, पतला शरीर और गाल के बाई और तिल देखते ही रक्षित के मुँह से एकाएक निकल गया wow, what a beauty”
“exuse me” उस लड़की ने पलटकर कहा।
“नहीं
कुछ भी तो नहीं” रक्षित सकपका गया।
“आपने
मुझसे कुछ कहा?” उसके पूछते ही,
“नहीं,
बिल्कुल नहीं, शायद आपको कोई गलतगहमी हुई है।” रक्षित ने साफ झूठ बोल दिया।
“बेहतर
होगा ये मेरी गलतफहमी ही हो, नहीं तो तुम्हारा क्या हाल करूँगी, तुम सोच भी नहीं
सकते।” इतने कहते ही उस लड़की ने अपने बाल पीछे झटके और कमर मटकाती हुई चली गयी।
“क्या
चीज है यार ये, इतनी सुंदर लड़की मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखी है।” उस लड़की के
जाते ही रक्षित उसकी सुंदरता के गुणगान करने लगा।
“ओ
रक्षित भाईसाहब, कंट्रोल रखो खुद पर हम यहाँ engineering
करने आए है, लड़कियों पर लाइन मारने नहीं।” इतने में पास ही खड़े एक
लड़के वैभव ने कहा।
“ओ
भाई वैभव, हम engineering करके कौनसा तीर मार लेंगे, ये तो हमारे पिताजी चाहते है कि हम इंजीनियर
बने इसलिए यहाँ बैठे हैं।” इतने में पास बैठे रक्षित से कद में थोड़े कम, साँवले
रंग एवं कर्ली बालों वाले जतिन के कहते ही,
“वरना?”
रक्षित ने पूछा।
“वरना......पता
नहीं, कुछ सोचा नहीं था, शायद मुंबई जाकर फिल्मों में ट्राई करता।” इतना कहते ही
जतिन आसमान की ओर देख सपनों कि दुनिया में खो गया।
“हाँ-हाँ
क्यों नहीं बॉलीवुड वाले तो तेरे ही इंतजार में बैठे हैं।” इतने में रक्षित ने
जतिन के सिर पर एक चपत लगाते हुए कहा।
“Guys, क्लास शुरू होने वाली है,
चलो जल्दी” इतने में वैभव अपनी wrist watch की ओर देख
चिल्लाया।
“Ohh no, lets go guys, अब क्लास तो अटेन्ड करनी ही पड़ेगी, नहीं तो वैभव भाईसाहब का बहुत नुकसान
हो जाएगा।” इतना कहते ही जतिन वहाँ से भाग खड़ा हुआ, और वैभव उसे मारने के इरादे से
उसके पीछे भागने लगा।
रक्षित,
वैभव और जतिन ये तीनों स्कूल समय से ही जिगरी दोस्त हैं, इसलिए इनमे इस तरह का
हँसी-मज़ाक आम बात है, और अब तीनों engineering collage में भी साथ हैं, और इतना ही नहीं, बल्कि तीनों
एक ही क्लास में हैं।
कुछ
देर बाद क्लास में, “ये तो वो ही लड़की है, जो अभी थोड़ी देर पहले पार्किंग में मिली
थी।” एकाएक क्लास में उसी लड़की पर नज़र पड़ते ही रक्षित बोला।
“वाउ,
क्या बात है, तब ही मैं सोचूँ आज क्लास की हवा इतनी बदली-बदली-सी क्यों लग रही
है।” जवाब में जतिन ने मज़ाकिया लहजें में कहा।
“ओह
शट-अप जतिन......लेकिन अब ये तो पता चल ही गया है कि ये भी हमारे ही साथ computer engineering के 1st year में है, और थोड़ी देर में
नाम भी पता चल जाएगा। रक्षित ने अभी अपनी बात पूरी की ही थी कि,
“अदिति” क्लास के दरवाजे से चपरासी ने आवाज
लगायी।
“हाँ”
इतने में उसी लड़की ने जवाब दिया।
“बाहर
तुम्हारे पापा आए है, जाकर मिल लो उनसे” इतना कह चपरासी चला गया, और उसके
पीछे-पीछे वो लड़की अदिति भी चल पड़ी।
“अदिति......अतिसुन्दर
नाम” रक्षित बुदबुदाया।
“सर्दी-खांसी
ना मलेरिया हुआ, ये गया यारों इसको लव, लव, लव लवेरिया हुआ” इतने में रक्षित की ओर
देख जतिन गुनगुनाने लगा।
“Stopped Jatin, ऐसा कुछ नहीं है जैसा तू समझ रहा है, मैं तो बस यूँ ही” इतना कह रक्षित
किताब खोल अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।
“Okay, मुझे तो लगा कि तू अपना दिल दे बैठा है उस अदिति को” जतिन के कहते ही,
“नहीं,
ऐसा कुछ नहीं है, तूने देखा नहीं कितनी बड़ी गाड़ी में आयी थी, वो भी ड्राइवर के
साथ, देखकर ही लगता है बहुत अमीर परिवार से है, और कहाँ मैं एक बैंक में काम करने
वाले क्लर्क का लड़का, लेकिन तू तो अमीर घर से है, तेरा चांस है रे जतिन।” रक्षित के
कहते ही,
“लेकिन
मेरे पास शक्ल-सूरत नहीं है।” रक्षित और जतिन अभी बात कर ही रहे थे कि......
“Class, please keep silent” क्लास में एकाएक प्रोफेसर रस्तोगी ने प्रवेश करते ही कहा, और पूरी क्लास
शांति से पढ़ने लगी, कारण था प्रोफेसर रस्तोगी के गुस्से का खौफ़, जिसके लिए वो पूरे
कॉलेज में प्रसिद्ध थे।
“क्या
मैं अंदर आ सकती हूँ सर” इतने में कुछ देर पहले क्लास से बाहर गयी अदिति ने वापिस
आकर पूछा।
“ये
समय है क्लास में आने का, अब अंदर आने की कोई जरूरत नहीं है, बाहर ही खड़ी रहो।”
अदिति से इतना कह जैसे ही प्रोफेसर रस्तोगी क्लास को दुबारा पढ़ाना शुरू करने लगे,
“माफ
कीजिएगा सर, ये पहले क्लास में आ चुकी थी, दरअसल आज इनका कॉलेज में पहला दिन है,
तो इनके पापा इनसे मिलने आए थे, तो उनसे ही मिलने गयी थी।” और इसी बीच रक्षित बोल
पड़ा।
“आप
जानते है इन्हे, आपकी रिश्तेदार है?” प्रोफेसर रस्तोगी के पूछते ही,
“नहीं,
नहीं, वो तो मैं इंसानियत के नाते जानकारी दे रहा हूँ।” रक्षित सकपका गया।
“हम्म,
ऐसी इंसानियत किसी और ने तो नहीं दिखाई, और स्वयं उस लड़की ने भी अपनी सफाई में कुछ
नहीं कहा, तो फिर आप क्यों?” प्रोफेसर रस्तोगी के कहते ही,
“माफ
कीजिएगा सर” इतना कहते ही रक्षित चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया।
“अपनी
भावनाओ को काबू में रखो रक्षित बाबू, छलक-छलक जा रहा है आपके प्यार का कलश” इतने
में नज़दीक ही बैठा जतिन बुदबुदाया, लेकिन रक्षित ने उसको सुनकर भी अनसुना कर दिया।
क्लास
खत्म होने के बाद, “थैंक्स, आपने सर से मेरी तरफ से बोला, और सॉरी” कॉलेज कैन्टीन
में दोस्तों संग चाय पी रहे रक्षित से जैसे ही पीछे से आकर अदिति ने कहा,
“ओह
आप, अरे इसमे थैंक्स की क्या बात है, वैसे उसका कोई फायदा तो नहीं हुआ, वैसे ये सब
तो आपको खुद कहना चाहिए था, लेकिन ये सॉरी क्यों?” रक्षित के पूछते ही,
“हम्म,
बात तो सही है आपकी, लेकिन आज पहला दिन है ना तो थोड़ा डर गयी थी, और सॉरी बाहर
पार्किंग में आपसे बेरुखी से बात करने के लिए।” अदिति के कहते ही,
“ओह,
कोई बात नहीं, अगर आप चाहे तो हमें जॉइन कर सकती है।” रक्षित ने जैसे ही कहा,
“हाँ-हाँ
क्यों नहीं, अगर आपको लड़कों के साथ बैठने में कोई ऐतराज ना हो तो......” इतने में
वैभव बोला
“हाँ
एक कप चाय तो पी ही सकती हूँ आप लोगों के साथ, लेकिन बिल मैं पे करूँगी।” अदिति ने
जिद करने के अंदाज में जैसे ही कहा,
“अरे,
नेकी और पूछ-पूछ, अगर आप चाहे तो आज ही क्यों प्रतिदिन हमारा बिल पे कर सकती है,
हमे तो ऐसे लोगों की तलाश ही रहती है।” इतने में वैभव मज़ाकिया लहजें में बोला
“माफ
करना बहुत मज़ाक करता है ये, क्या लोगी तुम, चाय, कॉफी?” इतने में रक्षित ने वैभव
की ओर आँख निकालते हुए अदिति से पूछा,
“चाय”
मुस्कुराते हुए अदिति ने जवाब दिया, और फिर रोजाना इसी समय रक्षित और उसके दोस्तों
के साथ चाय पीने का जैसे सिलसिला ही बन गया, चाय पीते-पीते बातों ही बातों में
अदिति, रक्षित और उसके दोस्तों की कब एक पक्की दोस्त बन गयी पता ही नहीं चला, ऐसी
दोस्ती जिसको कोई भी नहीं तोड़ पाया, लेकिन इस दौरान रक्षित के दिल में अदिति के
लिए प्यार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था, और कहीं ना कहीं अदिति के दिल में भी
प्यार अंकुरित हो चुका था लेकिन,
“अदिति,
क्या तुम जानती हो रक्षित तुमसे प्यार करता है?” एक दिन जतिन ने कॉलेज गार्डन में
अदिति को अकेला देखकर पूछ लिया।
“हम्म,
जानती हूँ, लेकिन मुझसे ज्यादा नहीं” अदिति के कहते ही,
“क्या...?
तुम्हारा मतलब है कि तुम भी......” जतिन ने आश्चर्यचकित होते हुए जैसे ही पूछा,
“हम्म,
हाँ मैं भी प्यार करती हूँ लेकिन तुमसे, आई. लव. यू. जतिन” अदिति के कहते ही,
“अदिति,
मैं जानता हूँ, लेकिन ये गलत है, रक्षित मेरा दोस्त है, और मैं उसे धोखा नहीं दे
सकता।” जतिन असमंजस की स्थिति में था।
“इसमे
धोखा कैसा जतिन, अच्छा बताओ क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?” अदिति ने पूछते ही
अपनी सवालिया नजरें जतिन के चेहरे पर टिका दी।
“हाँ”
“हम
दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो फिर प्रॉब्लम क्या है?”
“रक्षित
के दिल में तुम्हारे लिए प्यार देखकर डर लगता है कि सच्चाई जानकर उसे दुख होगा”
जतिन के कहते ही,
“लेकिन फिर धीरे-धीरे वो सब समझ जाएगा, मुझे यकीन है कि वो हमारे रास्ते से
हट जाएगा जतिन, लेकिन उसे खुश करने के लिए हम अपनी ज़िंदगी तो बर्बाद नहीं कर सकते
ना, और यहाँ तो तीन-तीन ज़िंदगियाँ बर्बाद होंगी।” अदिति ने जतिन को समझाने के
इरादे से जैसे ही कहा।
“मैं
असमंजसस की स्थिति में हूँ अदिति, रक्षित मेरे बचपन का दोस्त है, मैं उसका दिल
नहीं तोड़ सकता।” जतिन ने अपनी दुविधा बताई।
“और
मेरा क्या, मैं क्या चाहती हूँ इस बात कि कोई वैल्यू है, या नहीं, अरे मैं रक्षित
को नहीं चाहती, हाँ वो मेरा एक अच्छा दोस्त है, लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं, प्यार
मैं सिर्फ तुमसे करती हूँ जतिन, सिर्फ तुमसे” इतना कहते ही अदिति एकाएक भावुक हो
गयी।
“शांत
हो जाओ अदिति, हम मौका देखकर रक्षित से बात करते हैं, मैं समझता हूँ कि किसी एक की
खुशी के लिए तीन-तीन ज़िंदगियाँ बर्बाद करना निहायती बेवकूफ़ी है, लेकिन स्थिति बेहद
ही नाजुक है, सबकुछ सोच-समझकर रक्षित से इस संदर्भ में बात करनी होगी, फिलहाल हमारे फोर्थ सेमिस्टर के एग्जाम
नज़दीक है, तो पढ़ाई पर ध्यान देते हैं।” जतिन के कहते ही,
“हम्म”
इतना कह अदिति ने अपना सिर जतिन के कँधे पर टिका दिया।
तकरीबन
एक हफ्ते बाद, “अदिति तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है।” एक दिन अदिति और उसकी कुछ
सहेलियों को लाइब्रेरी से निकलते हुए देख रक्षित ने पूछा।
“रक्षित
तुम ! हम्म सही चल रही है, कुछ काम था क्या?” दरअसल अदिति पिछले कुछ दिनों से
रक्षित को नजरंदाज कर रही थी।
“नहीं,
वो तुम आजकल बात नहीं करती हो मुझसे, तो सोचा पूछ लूँ कुछ गलती तो नहीं हो गयी
मुझसे” रक्षित ने सहमते हुए पूछा।
“अरे
नहीं, वो तो एग्जाम नज़दीक है ना तो पढ़ाई में थोड़ा व्यस्त थी, मेरे ख्याल से
तुम्हें भी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।” अदिति ने जबरन मुस्कुराने की कोशिश करते
हुए कहा।
“हाँ
ठीक है, एग्जाम के बाद मिलते है, तुमसे कुछ जरूरी बात भी करनी है।” रक्षित बोला।
“हम्म, मिलते हैं।” इतना कह अदिति ने गर्दन हिला सहमति जताई और चली गयी।
फिर
एग्जाम पूरे होने के बाद अगले कुछ दिनों तक इस संदर्भ में कोई भी बात नहीं हुई,
लेकिन एक दिन, “अदिति, मैं जानता हूँ कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो, लेकिन इजहार
करने से डरती हो, लेकिन कोई बात नहीं मैं पहले इजहार कर देता हूँ, आई. लव. यू.
अदिति” रक्षित ने एकाएक बातों ही बातों में अदिति के सामने अपने प्यार का इजहार करते
हुए उसका हाथ थाम लिया।
“What rubbish Rakshit” जवाब में
अदिति चिल्लाई।
“क्या
हुआ?” रक्षित घबरा गया।
“मैं
तुमसे प्यार नहीं करती रक्षित, बल्कि जतिन से प्यार करती हूँ, इतना ही नहीं वो भी
मुझसे प्यार करता है, तुम्हारा, मेरे लिए एक दीवानगी की हद तक प्यार देखकर हम
दोनों ही ये नहीं समझ पा रहे थे कि हमारे बारे में वैभव को, और तुम्हें कैसे
बताए।” एकाएक अदिति एक ही साँस में सारी सच्चाई कह गयी, जिसकी रक्षित ने उम्मीद भी
नहीं की थी।
“No......कह दो कि तुम मज़ाक कर रही
हो......हाँ तुम मज़ाक ही कर रही हो, और इसमे जतिन और वैभव दोनों मिले हुए
हैं......am I right?” रक्षित ने जबरन मुस्कुराते हुए पूछा।
“नहीं
रक्षित, ये सब सच है, और तुम इसे जितना जल्दी स्वीकार कर लो तुम्हारे लिए अच्छा
है।” कहते-कहते अदिति ने अपना सिर पकड़ लिया।
“Okay, okay,
क्या जतिन भी तुमसे वाकई में प्यार करता है?” कहीं ना कहीं रक्षित, जतिन के बारे
में जानकर पूर्ण संतुष्टि कर लेना चाहता था।
“हाँ,
लेकिन ये सब जानकर तुम्हारा दिल टूट जाएगा, इसलिए कभी बताने की हिम्मत ही नहीं
हुई, आई. एम. सॉरी. रक्षित” अदिति के स्वर में ग्लानि के भाव साफ झलक रहे थे।
“Ohh, it’s
okay Aditi, बल्कि मैं तो बहुत खुश हूँ, लेकिन थोड़ा गुस्सा भी हूँ
कि तुमने, और जतिन ने मुझ पर जरा भी विश्वास नहीं किया, अरे मैं कोई पागल हूँ जो
तुम दोनों के बीच आता, चलो कोई बात नहीं बहुत-बहुत बधाई” रक्षित ने बनावटी खुशी
जताते हुए कहा।
“ओह,
मैं तो डर रही थी कि तुम बुरा मान जाओगे, गुस्सा करोगे हमारी दोस्ती में दरार आ
जायेगी वगैराह, वगैराह।” कहते-कहते अदिति खुशी से चहकने लगी।
“अरे
नहीं, नहीं, हाँ ये सच है कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और शायद हमेशा करता
रहूँगा, लेकिन इस शर्त पर नहीं कि तुम भी मुझसे प्यार करो।” रक्षित के कहते ही,
“रक्षित,
तुम समझ भी नहीं सकते कि तुम्हारे ये सब कहने से मुझे कितना सुकून मिल रहा है, और
जब जतिन ये सब सुनेगा तो खुशी से पागल हो जाएगा, जानते हो वो कितना डरा हुआ था।”
अदिति उत्साह में कुछ ना कुछ बोले जा रही थी।
“अदिति,
लंच टाइम हो गया है, क्या तुम हमारे साथ कैन्टीन चलोगी।” इतने में अदिति के पीछे
से आवाज़ आयी।
“हाँ
आयी......माफ करना रक्षित, वो मेरी फ़्रेंड्स मुझे लंच के लिए बुला रही है, बाद में
मिलते है, और तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरे, और जतिन के प्यार को स्वीकार करने
के लिए।” इतना कह खुशी में मदहोश अदिति चली गयी।
लगभग
एक हफ़्ते बाद, “वैभव, तुमने जतिन को कहीं देखा है क्या?”
“नहीं, क्यों, क्या हुआ?”
“कल
से कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा, फोन भी नहीं उठा रहा।” अदिति ने चिंता जताते हुए
कहा।
“कल
से ! और तुम अब बता रही हो।”
“हाँ
मुझे लगा, प्रोजेक्ट बनाने में बिजी होगा, लेकिन बार-बार फोन करने पर भी नहीं उठाया
तो चिंता होने लगी।”
“हम्म, कोई बात नहीं, मैं रक्षित से पूछता हूँ, शायद उसे कुछ मालूम
हो।” लेकिन जब रक्षित से कॉल कर पूछा तो
पता चला कि रक्षित को भी कुछ नहीं पता।
“कहाँ
चला गया होगा?” अदिति मन ही मन बुदबुदाने लगी।
“उसके
घर पर कॉल किया, क्या पता कोई emergency आ गयी हो, और अचानक से अपने घर जाना पड़ा हो।” वैभव ने संभावना जताई।
“अरे
हाँ, मैं उसके घर पर कॉल करती हूँ।” ऐसा कह जैसे ही अदिति ने जतिन के घर पर कॉल
लगाया, तो पता चला कि वो तो वहाँ पर भी नहीं है, और कल शाम से वो अपनी मम्मी का
कॉल भी नहीं उठा रहा है।
“हे
भगवान, क्या हुआ होगा, जतिन किसी मुसीबत में तो नहीं।” कहते-कहते अदिति की आँखें
भर आयी।
“तुम
चिंता मत करो, मैं क्लास के बाकी के स्टूडेंट्स से पूछता हूँ, क्या पता किसी को
कुछ पता हो, और प्रिन्सपल सर से कहकर कॉलेज में भी ढुँढवाता हूँ।” और फिर वैभव
चेहरे पर चिंताजनक भाव लिए जतिन की तलाश में निकल गया।
तकरीबन चार घंटे बाद, “लाश, लाश” कॉलेज परिसर में आवाज गूँजी, जो कि कॉलेज
के चौकीदार रामसिंह की थी।
“क्या
हुआ, किसकी लाश, ये क्या बकवास कर रहे हो।” कॉलेज की प्रबंधन कमेटी के एक सदस्य
अरुण बाबू द्वारा पूछते ही,
“साहब, मैं सच कह रहा हूँ, कॉलेज के पीछे झाड़ियों में एक लड़का औंधे मुँह
पड़ा है, शायद मर गया।”
“शायद ! अरे जब खुद कन्फॉर्म नहीं हो तो शोर
क्यों मचा रहे हो, कहाँ है, पहले मुझे लेकर चलो, वहाँ पर” और फिर वो दोनों झाड़ियों
के उस हिस्से की ओर चल पड़े जहाँ राम सिंह ने किसी को औंधे मुँह पड़े हुए देखा था।
“खून !
......अरे, ये तो जतिन ही है, इसका तो खून हुआ है।” अरुण बाबू, जतिन को पलटते ही
चिल्लाए।
“साहब,
इसे तो किसी ने चाकू मारा है, किसने मारा होगा, और क्यों?” राम सिंह ने जतिन के
पेट में लगे हुए चाकू की देखते हुए काँपती हुई आवाज में पूछा।
“पता
नहीं, लेकिन दूर हो जाओ यहाँ से, कुछ भी छूना मत, सबसे पहले हमें पुलिस में इत्तला
करनी होगी।” इतना कह अरुण बाबू पुलिस स्टेशन फोन लगाने लगे, और राम सिंह प्रिन्सपल
साहब को इत्तला देने लगा।
कुछ
देर बाद, “सुना तुमने अपने कॉलेज के जतिन का मर्डर हो गया है।”
“हाँ
झाड़ियों के पीछे लाश मिली है।”
“मुझे
तो समझ नहीं आ रहा कि ये किसका काम हो सकता है।”
“आखिरकार कौन दुश्मन होगा जतिन का”
“पता
नहीं, लेकिन अब तो डर लगने लगा है, हम कॉलेज में भी सुरक्षित नहीं हैं।”
“सही
बात है, मुझे तो बहुत डर लग रहा है।” कॉलेज में हर तरह जतिन की हत्या के संदर्भ
में कुछ ना कुछ बात हो रही थी, पुलिस भी आ चुकी थी, सभी से पूछताछ जारी थी, लेकिन
इस हत्या में किसका हाथ है, कुछ पता नहीं चल पा रहा था, क्योंकि कातिल ने कोई सबूत
नहीं छोड़ा था, और जतिन के पेट में लगे चाकू पर भी किसी प्रकार के कोई फिंगर
प्रिंटस नहीं थे।
“इन्स्पेक्टर साहब, उसका तो कोई दुश्मन भी नहीं था।” पूछताछ के दौरान अदिति
के कहते ही,
“क्या
वो आपका अच्छा दोस्त था।”
“बॉयफ्रेंड था, हम शादी करना चाहते थे।” अदिति के कहते ही
“ओह,
आपको किसी पर शक है।” इन्स्पेक्टर करण सिंह के द्वारा पूछते ही,
“नहीं, बिल्कुल नहीं, बल्कि मेरे सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं, यहाँ तक कि जब
मैंने रक्षित को जतिन, और मेरे बारे में बताया तो उसकी भी सकरात्मक प्रक्रिया थी।”
“मैं
कुछ समझा नहीं” इन्स्पेक्टर साहब द्वारा कहते ही,
“दरअसल सर, पिछले दो साल से रक्षित मुझसे प्यार करता है, लेकिन मैं जतिन से,
और जतिन भी मुझसे प्यार करता था, लेकिन ये बात रक्षित को नहीं पता थी, और हमारे
अंदर बताने की हिम्मत भी नहीं थी, क्योंकि हमें डर था कि वो पता नहीं कैसी
प्रतिक्रिया देगा, लेकिन पिछले हफ्ते जब मैंने उसे मेरे, और जतिन के बारे में
बताया तो वो खुश था हमारे लिए।” अदिति द्वारा अपनी बात खत्म करते ही,
“बेहद
अजीब है ये, हवलदार निहाल सिंह, पता करो रक्षित का रूम कौनसा है, तलाशी लो उसकी,
मुझे लगता है वहाँ कुछ ना कुछ जरूर मिलेगा, और रक्षित को भी बुलवाओ पूछताछ के लिए।”
इन्स्पेक्टर करण सिंह ने हवलदार निहाल सिंह को निर्देश देते हुए कहा।
रक्षित के कमरे की तलाशी के दौरान कुछ ऐसे सबूत मिले जिससे कि साबित हो गया
कि खून रक्षित ने ही किया है, और पूछताछ के दौरान उसने ये स्वीकार भी कर लिया कि
उसने ही जतिन का खून किया है। कारण पूछने पर बताया कि उसके अलावा जो भी अदिति से
प्यार करेगा, वो उसे इसी प्रकार मौत के घाट उतार देगा, और उसे इसे बात का कोई अफसोस
नहीं है।
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