Zindagi Ka Ek Roop / ज़िंदगी का एक रूप (Story on Life)
दिसंबर का महीना चल रहा था, अपने घर
की बालकनी में बैठ, धूप का आनंद लेते हुए पढ़ी-लिखी, सभ्य दिखने वाली 60 वर्षीय केतकी
सड़क पर आते-जाते लोगों को बेहद ही उत्सुकता से देख रही थी, वो कभी किसी के क्रियाकलाप
को देख मुस्कुराने लगती तो किसी को देख सोच में पड़ जाती, इतने में, “नानी, आप
मुस्कुरा क्यों रही हो, कोई joke याद आ गया क्या?” इतने में हाथ में स्कूल बैग थामे, 15
वर्षीय वान्या ने केतकी के पास बैठते हुए पूछा
“नहीं बेटा, मैं तो आते-जाते लोगों को देख रही हूँ, सोच रही हूँ किस के मन
में क्या चल रहा होगा, किसी के चेहरे पर मुस्कान है, तो कोई उदास, किसी को कही
जाने की कोई जल्दी नहीं है, तो कोई भाग रहा है।” केतकी के कहते ही,
“नानी आप भी ना गजब हो।” वान्या ने केतकी के गालों को प्यार से खींचते हुए
कहा।
“अच्छा बता स्कूल नहीं जाना है क्या आज?” केतकी ने बिना वान्या की बात सुने,
उसके बैग पर नजर डालते हुए पूछा।
“जाना है नानी, लेकिन अभी तक स्कूल बस ही नहीं आयी।” वान्या ने सड़क पर एक
नजर दौड़ाते हुए कहा।
“अरे हाँ, आज तो तेरी बस ही नहीं आयी, फोन किया बस ड्राइवर को?’
“किया था, उठाया नहीं” वान्या के कहते ही,
“Drive कर रहा होगा।” केतकी ने संभावना
जताई।
“हम्म, लेकिन आज मेरा exam है नानी, और पापा-मम्मी भी आज सुबह जल्दी ही अस्पताल चले
गए।” वान्या के चेहरे पर बेबसी साफ नजर आने लगी थी।
“मैं छोड़ दूँ।” केतकी के कहते ही,
“आप ! कैसे?”
“गाड़ी से”
“गाड़ी ! आपका मतलब है कि आप ड्राइव करोगी।”
“हाँ, क्यों नहीं कर सकती?’ केतकी के पूछते ही,
“नानी मैंने कभी इस बारे में नहीं सुना।” केतकी द्वारा ड्राइविंग की बात
सुन वान्या के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही।
“तू, गाड़ी की चाभी लेकर चल, मैं लॉक लगाकर आती हूँ।” इतना कह केतकी उठ खड़ी
हुई।
कुछ देर बाद, “नानी, I am surprise” वान्या यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि उसकी नानी गाड़ी
ड्राइव कर रही है।
“वान्या जानती है, तेरी मम्मी, और मामा छोटे थे तो अक्सर मैं ही उन्हे गाड़ी
से स्कूल छोड़ने जाती थी।”
“Wow Nani, you’ re great”
“Thank you बेटा, चलो अब तुम्हारा स्कूल भी आ गया।” केतकी के कहते ही वान्या उसकी तरफ गर्व से देखते हुए स्कूल की ओर बढ़ गयी, और खुद को गाड़ी चलाता देख केतकी की कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गयी।
32 साल पहले की बात है, केतकी की उम्र उस समय 28 साल थी, वो अपने पति रोशन,
बेटा आलोक और बेटी अनुभा के साथ सुख से रहती, पति रोशन एक प्राइवेट कंपनी में
कार्यरत थे, बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे, सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था, छोटा-परिवार,
सुखी-परिवार वाला जुमला इस परिवार पर हर तरह से फिट बैठ रहा था। लेकिन इनकी ये
खुशियाँ ज्यादा समय तक नहीं चली, एक दिन कंपनी से लौटते वक्त रोशन का एक्सीडेंट हो
जाने की वजह से वो इस दुनिया से चला गया, केतकी अपने दोनों बच्चों के साथ इस जालिम
दुनिया का सामना करने के लिए अकेली रह गयी, जिसका कि उसने पूरी हिम्मत रखते हुए
सामना किया भी, और बेचारी करती भी क्या, क्योंकि उस बुरे वक्त में सभी रिश्तेदार
उससे मुँह जो मोड़ चुके थे। इसी दौरान केतकी ने सबसे पहले आस-पास के कुछ स्कूलों
में जॉब के लिए apply कर दिया, और
कुछ ही दिनों में केतकी ने टीचिंग जॉब शुरू कर दी, और शाम को वक्त निकालकर ट्यूशन
पढ़ाती, एक समय में गाड़ी ड्राइव करने से डरने वाली केतकी अब ड्राइविंग स्कूल जॉइन कर सुबह जल्दी गाड़ी चलाना सीखने जाती,
जिसकी प्रैक्टिस वो रोशन की गाड़ी पर करती, जिससे कि जरूरत पड़ने पर कहीं आने-जाने
के लिए किसी पर निर्भर ना होना पड़े, रोशन के बिना अब ज़िंदगी की गाड़ी धीरे-धीरे
पटरी पर आने लगी थी।
केतकी और बच्चों की ज़िंदगी अब अच्छी चलने लगी थी, लेकिन रोशन की कमी उन्हे
हमेशा खलती, कुछ भी अच्छा होता रोशन को जरूर याद किया जाता, अगर कभी कुछ गलत होता
तो भी रोशन की याद सताती। इस परिवार की ज़िंदगी में रोशन ना होकर भी हर वक्त मौजूद
था।
“मम्मी, इस साल से कोचिंग क्लाससेस जॉइन करनी होंगी, 10th बोर्ड है, मुझे कोई रिस्क नहीं लेना
है।” एक दिन आलोक के कहते ही,
“अरे मेरा राजा, तुम ज़िंदगी मे कुछ बन जाओ, अपने सपने साकार कर लो इसलिए तो
दिन रात मेहनत करती हूँ, तुझे जो भी कोचिंग क्लास जॉइन करनी है कर ले, पैसों की
चिंता मत करना, तेरी माँ है ना सब संभाल लेगी।” केतकी ने आलोक को आश्वासन देते हुए
कहा।
केतकी के बच्चों आलोक और अनुभा के बहुत ऊँचे-ऊँचे सपने थे, आलोक चार्टर्ड
अकाउन्टन्ट, और अनुभा डॉक्टर बनना चाहती थी, और केतकी का सपना था अपने बच्चों के
सपनों को साकार करना।
वक्त गुजरता गया, इस दौरान कभी ढेरों खुशियाँ आयी, तो कभी ऐसे पल भी आए जो
रुला गए, ज़िंदगी के इसी उतार-चढ़ाव के साथ एक दिन आलोक चार्टर्ड अकाउन्टन्ट, और
अनुभा डॉक्टर बन गयी, अपने बच्चों की सफलता पर केतकी बहुत खुश हुई, क्योंकि उसकी
मेहनत रंग लाई थी, वो रोशन के जाने से टूटकर बिखरी नहीं थी, बल्कि उसने दुगनी हिम्मत
से काम लिया, और अपने बच्चों को समाज का एक काबिल इंसान बना दिया।
अब ज़िंदगी बहुत बदल चुकी थी, अनुभा, और आलोक की शादी उन्ही के पसंदीदा साथी से
हो चुकी थी, कुछ ही सालों में केतकी एक प्यारी-सी नातिन की नानी और दो पोतों की दादी
बन चुकी थी, सबकुछ एक सपने जैसा लग रहा था, आलोक की पत्नी जया एक बहुत ही अच्छी बहु
साबित हुई, वो केतकी का पूरा सम्मान करती, और केतकी भी उसे बहु नहीं, बल्कि बेटी बनाकर रखती, दूसरी ओर अनुभा भी अपने पति डॉ विक्रम के साथ अपने ज़िंदगी में बहुत खुश थी,
वो दोनों एक प्राइवेट अस्पताल चलाते थे, और केतकी के लिए सबसे ज्यादा सुकून की बात
ये थी कि अनुभा, और आलोक दोनों एक ही शहर में रहते थे, इसलिए सबका मिलना-जुलना लगा रहता
था, लेकिन केतकी की ये खुशियाँ ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी......
और एक दिन, “नमस्ते आंटी” एक सम्पन्न घर का रहने वाला एक व्यक्ति दरवाजे पर
खड़ा केतकी का अभिवादन कर रहा था।
“नमस्ते, मैंने आपको पहचाना नहीं” केतकी ने आश्चर्य से उस व्यक्ति की ओर
देखते हुए पूछा।
“मैं रोहित, जया का दोस्त”
“ओह, बैठो बेटा मैं जया को बुलाती हूँ।’ आगंतुक को बैठा केतकी अपनी बहु,
जया को आवाज लगाने लगी।
और कुछ ही देर में, “अरे रोहित तुम, यहाँ कैसे आना हुआ, और हाँ ये मेरी mother-in law है, और मॉम ये मेरा कॉलेज फ्रेंड
रोहित।” जया ने केतकी, और रोहित का परिचय करवाते हुए कहा, और फिर वहीं सोफ़े पर
रोहित के पास बैठ गयी।
“मैं चाय बना
देती हूँ, तब तक तुम दोनों बातें करो।’ इतना कह केतकी जैसे ही वहाँ से जाने लगी,
“Thank you
mom” जया ने
कहा, और फिर वो रोहित के साथ बातचीत में मशगूल हो गयी।
उस दिन के बाद से लगभग हफ्ते में दो दिन तो रोहित, जया से मिलने आने ही
लगा, और ये देख केतकी को कुछ ठीक नहीं लगता, वो सोचती जो व्यक्ति पहले कभी यहाँ
आया ही नहीं, वो अचानक से हफ्ते में दो-दो बार कैसे आने लगा, और पिछली बार तो हद
ही हो गयी, जो रोहित अभी तक केवल ड्रॉइंग-रूम तक ही सीमित था, वो अब जया के बेडरूम
तक पहुँच चुका था, और ये बात केतकी को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी, इसलिए उसने जया
को थोड़ा डाँट भी दिया, “जया बेटा, तुम्हार दोस्त आता है, मुझे कोई ऐतराज नहीं,
लेकिन बेटा बेडरूम में उसे लेकर जाना कितना उचित है।”
“मॉम, वो मेरा दोस्त है, मैं उसे कहीं भी लेकर जाऊँ, आपको क्या problem है।’ जया की हाज़िरजवाबी सुन केतकी उस
वक्त तो चुप हो गयी, लेकिन शाम को काम से लौटने पर उसने आलोक से इस बात को जिक्र
जरूर कर दिया, और उसके बाद घर में जो कलेश हुआ उसकी तो केतकी ने कभी कल्पना भी
नहीं की थी।
“आलोक, तुमने मॉम की बात तो सुन ली, अब मेरी भी सुनो, तुम अपनी जिस माँ की
तारीफ़ों के पुल बाँधते रहते हो उनका चाल-चलन भी कोई साफ नहीं है, अरे मैं तो सिर्फ
रोहित से बातें करती हूँ लेकिन ये तो......” इतना कह एकाएक जया रुक गयी।
“तुम कहना क्या चाहती हो जया बहु?’ जया के मुँह से अपने बारे में अनुचित
सुन केतकी के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही।
“मॉम, क्या रिश्ता है आपका, और शर्मा अंकल का?’ जया ने पूछा।
“शर्मा जी ! कुछ नहीं पड़ोसी है हमारे” केतकी ने कहा
“तो फिर आप रोजाना पार्क में उनके पास बैठ हँस-हँसकर क्या बातें करती हो?”
“बातें ! कैसी बातें, बेटा मैं कुछ समझी नहीं ?”
“आलोक मुझे लगता है मॉम का, और शर्मा अंकल का कोई चक्कर चल रहा है।”
“जया...जुबान संभालों अपनी” एकाएक आलोक का हाथ जया पर उठते-उठते रुक गया।
“हाँ जया बहु तुम गलत समझ रही हो, और जब हम पार्क में होते हैं तो हमारे
साथ बाकी लोग भी होते हैं, तो फिर तुम मेरे ऊपर इतना घिनौना इल्जाम कैसे लगा सकती
हो।”
“जैसे आप लगा सकती हो, क्योंकि आप भी तो जब रोहित आता है घर पर होती हो,
अगर मैं आपकी मौजूदगी में कुछ अनुचित कर सकती हूँ तो आप क्यों नहीं” जया ने बेहद
ही दबंगता के साथ जवाब दिया।
“Please
stopped, मुझे अपने
घर में ये बेहूदगी नहीं चाहिए, शर्म आनी चाहिए आप दोनों को, बच्चों पर इन बातों का
क्या असर पड़ेगा।’
“आलोक बेटा, बहु को कोई गलतफहमी हुई
है, मैं गलत नहीं हूँ।” केतकी ने अपने ऊपर लगे इल्जाम को खारिज करते हुए कहा।
“मुझे कोई गलतफहमी नहीं हुई है, जिस तरह से आप शर्मा अंकल से बात करती हो
मुझे तो क्या किसी को भी आप दोनों पर शक हो सकता है, और ये संभव भी है क्योंकि आप
भी अकेली है, और शर्मा अंकल भी”
“Jaya……mind
your language” केतकी ने
लगभग चिल्लाते हुए कहा।
“मैं तो अपनी जुबान संभाल लूँगी सासू जी, आप अपना चरित्र संभालों।” जया का
इतना कहना ही था कि आलोक जोर से चिल्लाया,
“Stopped, बस करो तुम दोनों, मुझे किसी भी
प्रकार कि गंदगी नहीं चाहिए अपने घर में”
“ठीक है तो फिर तुम इसी वक्त अपनी मॉम को कह दो कि वो घर से निकल जाए,
क्योंकि मुझे भी किसी भी प्रकार की बेहूदगी नहीं चाहिए अपने घर में, और बच्चों पर
भी तो गलत असर पड़ता है।”
“जया......ये......ये......तुम क्या कह रही हो, तुम मुझे मेरे ही घर से
कैसे निकाल सकती हो?” केतकी ने लगभग रोते हुए पूछा।
“बिल्कुल निकाल सकती हूँ मॉम, आप शायद भूल रहीं है ये घर मेरे, और आलोक के
नाम पर है, ना कि आपके, इसलिए आप इस घर में रहेंगी, या नहीं इस बात का फैसला मैं कर
सकती हूँ, और मेरा फैसला ये है कि अब आप हमारे साथ नहीं रहेंगी।” जया ने ये बात
जितनी सहजता से कही, उससे कई ज्यादा मुसीबतों का पहाड़ गिर पड़ा था केतकी के ऊपर.
“आलोक, तू भी कुछ बोल बेटा” केतकी बस इतना ही कह पाई, और फूट-फूटकर रोने
लगी।
“मॉम, मेरे हिसाब से भी अब आपको कहीं ओर अपने रहने का ठिकाना ढूँढ लेना
चाहिए।” आलोक के कहते ही,
“आलोक......!” केतकी बस इतना कह पाई।
“हाँ मॉम, मैं किसी old age home में आपके रहने का इंतजाम करवा देता हूँ।”
“Old age home ! कौन जा रहा है वहाँ?” इतने में ही वहाँ केतकी की बेटी डॉ अनुभा और दामाद डॉ विक्रम आ गए।
“अनुभा, बेटा देख क्या हो रहा है यहाँ, तेरी माँ कि इज्जत की धज्जियां उड़ाई
जा रहीं है, उसे घर से बेघर करने की बात हो रही है।”
‘भाई ये कह रही है मॉम ?” अनुभा के पूछते ही,
“ये क्या बोलेंगे दीदी, मैं बताती हूँ आपको सबकुछ” और फिर जया ने अनुभा को
सारी कहानी कह सुनाई।
“भाभी, आप चिंता मत करो, मैं ले जाऊँगी मॉम को अपने साथ, लेकिन इन्हे घर से
निकालने के लिए इतना घिनौना इल्जाम लगाने की क्या जरूरत थी, बस मुझे एक बार बोल
दिया होता, क्योंकि आप भी जानती है मॉम कभी कुछ गलत नहीं कर सकती, और भाई आप तो
मॉम को अच्छे से जानते है ना, अगर इन्हे कुछ गलत करना होता, या किसी के साथ अपना
चक्कर चलाना होता तो सालों पहले ही चला चुकी होती, क्योंकि पापा तो ये दुनिया
छोड़कर उसी वक्त चले गए थे जब मॉम की उम्र मात्र 28 साल थी।”
“अनुभा बेटा ले चल तू मुझे अपने साथ, अब दम घुट रहा है मेरा यहाँ” केतकी के
कहते ही,
“हाँ मॉम, मैं सामान पैक कर लेती हूँ आपका” और इतना कह अनुभा केतकी के कमरे
की ओर बढ़ गयी।
केतकी अब अनुभा के घर आकर रहने लगी, आलोक, और जया से मिलना-जुलना अब कभी-कभार सामाजिक कार्यकर्मों में ही हो पाता था, जिसमे जया से तो कोई बातचीत नहीं होती, लेकिन आलोक से औपचारिक बातें हो जाती, ज़िंदगी की गाड़ी अपनी गति से चल रही थी, केतकी ने जगह परिवर्तन के रूप में उसकी ज़िंदगी में आए बदलाव को पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया था।
और फिर कुछ महीनों बाद पता चला कि जया और आलोक का डिवोर्स केस अदालत में चल रहा है, और अब जया, रोहित के साथ रहती है, बच्चों की जिम्मेदारी आलोक संभाल रहा है।
“ट्रिन-------ट्रिन--------गाड़ी चलाते हुए अचानक से केतकी के मोबाईल की
घंटी बज उठी, जिसे सुन वो एकाएक वर्तमान में आ गयी, फोन अनुभा का था,
“मॉम कहाँ हो, अस्पताल से घर आई तो आप कहीं नहीं दिखी।”
“बस पाँच मिनिट में घर पहुँच रही हूँ बेटा” इतना कह केतकी ने फोन काट दिया,
और कुछ सोचते हुए मुस्कुराने लगी।
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