Ishq Mein khoon (Story On A Murder mystery)
"मैं एक बार फिर से पूछ रहा हूँ, क्या किसी ने मिसेज़ दीक्षित के यहाँ किसी को आते हुए देखा।"
"नहीं इंस्पेक्टर साहब, अगर
देखा होता तो आपसे क्यों छुपाते।"
"तुम्हारी तारीफ़?"
"साहब जी मैं पिछले दो साल से मिसेज़ दीक्षित के घर के बाहर अपने फलों का ठेला लगा रहा हूँ, कैलाश नाम हैं मेरा।"
"ऐसा कैसे हो सकता हैं, कि
मिसेज़ दीक्षित के यहाँ कोई आया ही नहीं फिर भी उनका क़त्ल हो गया, मुझे तो लगता हैं तुम हमसे कुछ छुपा रहे हो" इंस्पेक्टर साहब ने जैसे
ही कैलाश की ओर मुख़ातिब होते हुए कहा।
"नहीं साहब, ऐसा मत बोलिए, माँ जी तो मेरी माँ जैसी थी, मुझे उनके जाने का
बहुत दुःख हैं, और मैं तो उनका बुरा सोच ही नहीं सकता, उन्होंने मेरे बुरे वक़्त में बहुत सहायता की हैं।"
"सहायता? कैसी सहायता"
"साहब, पिछले साल मेरी बीवी
कैंसर की वजह से अस्पताल में भर्ती हुई थी, पैसे की कमी
की वजह से मेरे लिए उसका इलाज करवाना मुश्किल हो रहा था, जब मैंने एक दिन अपनी मज़बूरी माँ जी को बताई तो उन्होंने मेरी बीवी के
इलाज़ का सारा ख़र्चा अपने ऊपर ले लिया, अगर आपको मेरी
बात का विश्वास ना हो तो आप रुक्मणि से पूछ सकते हैं, इसे
सारी सच्चाई पता हैं।"
"रुक्मणि? अब ये रुक्मणि कौन
हैं?"
"साहब मैं, मैं हूँ रुक्मणि, पिछले दस सालों से माँजी के यहाँ घर का काम कर रही हूँ।"
"तुम कहाँ थी मिसेज़ दीक्षित के क़त्ल के वक़्त?"
"साहब मैं अपने बच्चे को लेकर अस्पताल गयी हुई थी, पिछले तीन-चार दिन से उसे तेज़ बुखार था, साहब जी अगर मुझे पता होता
कि मेरे जाते ही ये सब कुछ हो जाएगा तो मैं कभी नहीं जाती" ऐसा कहते ही रुक्मणि फूट-फूटकर रोने लगी।
"बंद करो ये रोना-धोना, मैं अच्छे से जानता हूँ, या तो क़त्ल तुम दोनों में से किसी ने किया हैं, या फिर तुम क़ातिल से मिले हुए
हो।"
"साहब आप भला ऐसा क्यों बोल रहे हैं, हम ऐसा क्यों करेंगे।"
"शायद मिसेज़ दीक्षित के पैसों के लिए" इंस्पेक्टर
साहब के कहते ही,
"आपने सही कहा साहब, घर में
क़त्ल के साथ-साथ चोरी भी हुई हैं।" इतने में ही वहाँ हवलदार गायकवाड़ भी आ
गया।
"ओह तो चोर लूट के इरादे से आया था, उसकी मिसेज़ दीक्षित से कोई दुश्मनी नहीं थी।"
"जी सर"
"गायकवाड़, फिलहाल घर सील कर
दो जब तक पुलिस कार्यवाही चलेगी यहाँ कोई भी नहीं
आ सकता, और इन दोनों को गिरफ्तार कर लो।"
इंस्पेक्टर साहब ने जैसे ही कैलाश और रुक्मणि की ओर
इशारा करते हुए कहा।"
"साहब ऐसा मत कीजिए, हम
दोनों बेगुनाह हैं, हमारा विश्वास कीजिए।"
"गायकवाड़, इन दोनों के घर की
तलाशी भी लेनी होगी, मुझे इन दोनों पर शक हैं।"
इंस्पेक्टर साहब पर रुक्मणि की गुहार का कोई असर नहीं
हुआ।
"सर जी वैसे मिसेज़ दीक्षित के परिवार के बारें में कुछ
पता नहीं चला हैं।"
"बाई, क्या नाम हैं तुम्हारा?"
"रुक्मणि साहब जी"
"मिसेज़ दीक्षित के परिवार के बारें में क्या जानती हो?"
"माँजी का एक बेटा व एक बेटी हैं, वो दोनों ही दस साल पहले अपने-अपने परिवार के साथ लंदन चले गए, तब से माँजी यहाँ अकेली रहती हैं, और तब ही से
मैं इनके यहाँ काम कर रही हूँ।"
"और इनके पति?"
"साहब जी, इनके पति तो
बच्चें छोटे थे तब ही चल बसे, माँजी ने अकेले ही अपने
बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया हैं, साहब जी इन दस सालों
में मैंने कभी भी माँजी को अपने बच्चों से बात करते हुए नहीं देखा।"
"हम्म, नालायक औलाद, ख़ैर हमें अपना फ़र्ज़ निभाना हैं, गायकवाड़,
नम्बर पता करके मिसेज़ दीक्षित के बच्चों
को फोन कर उनके क़त्ल की इत्तला दे दो।"
इंस्पेक्टर साहब के कहते ही हवलदार गायकवाड़ मिसेज़ दीक्षित के
बच्चों को फ़ोन लगाने लगा, लेकिन फोन बंद आ रहा था, उसने ना जाने कितनी ही बार फोन करने कोशिश की
लेकिन हर बार फोन बंद ही आता।
दूसरी ओर मिसेज़ दीक्षित के कातिल की तालाश ज़ारी थी, लेकिन कुछ पता ही नहीं चल पा रहा था, कैलाश व रुक्मणि के घर की तालाशी लेने के बावजूद भी पुलिस को कोई सफलता हाथ नहीं
लगी, और बेगुनाह होने की वजह से उन दोनों को रिहा कर दिया गया।
इधर मिसेज़ दीक्षित के क़त्ल को हुए तक़रीबन पन्द्रह दिन हो
चुके थे, लेकिन अभी तक उनके बच्चों से कोई सम्पर्क नहीं
हो पा रहा था, फिर एक दिन अचानक ,
"गायकवाड़ मुझे लगता हैं मिसेज़ दीक्षित के घर की
हमें एक बार फिर से तलाशी लेनी होगी, शायद इस बार सबूत हाथ लग जाए" इंस्पेक्टर
साहब के कहते ही,
"यस सर" हवलदार गायकवाड़ ने इंस्पेक्टर साहब
की कही बात पर अपनी सहमति जताई।
अगले दिन इंस्पेक्टर साहब, हवलदार
गायकवाड़ व दो और पुलिसवालें मिसेज़ दीक्षित के घर की तलाशी लेने पहुँच गए।
"इस बार हमसे कोई गलती नहीं होनी चाहिए, ढूँढो सबूत यहीं मिलेगा।" इंस्पेक्टर साहब की कड़क आवाज़ सुन सभी
पुलिसकर्मी तन्मयता से अपना काम करने लगे।
काफी देर की मेहनत के बाद अचानक से एक पुलिसकर्मी की आवाज़ आई,
"सर, ये देखिए मुझे
क्या मिला।" वो पुलिसकर्मी उत्साहित होते हुए इंस्पेक्टर साहब की ओर दौड़ा।
"क्या मिला हैं?"
"सर ये मोबाइल, पलंग के पीछे
गिरा हुआ था, पता नहीं पहले ध्यान क्यों नहीं
गया।"
"लेकिन मिसेज़ दीक्षित का फोन तो हमें पहले ही मिल गया
था, तो फिर ये किसका फोन हैं, इसे चार्ज करो.....!" इंस्पेक्टर साहब ने फोन की और आश्चर्यजनक नज़रों
से देखते हुए कहा।
फ़ोन चार्ज करने के कुछ देर बाद जब उस फोन की जाँच पड़ताल की
गयी तो पता चला कि उसकी सेटिंग के हिसाब से उसकी कॉल रिकॉर्डिंग चालू हैं, यानि उस फोन के द्वारा किया गया हर फोन या उस पर आया प्रत्येक फोन रिकॉर्ड
होता हैं। जब इंस्पेक्टर साहब ने कॉल रिकॉर्डिंग्स सुनी तो अचंभित रह गए. ये फोन
मिसेज़ दीक्षित के घर के सामने बैठने वालें कैलाश फलवालें का था।
"गायकवाड़, उस फलवालें को बुलाओ।"
कुछ ही देर बाद कैलाश पुलिस स्टेशन
में हाज़िर हो गया, उसके आते
ही इंस्पेक्टर साहब ने वो फोन उसके आगे रख दिया।
"क्या हैं ये?" इंस्पेक्टर
साहब के पूछते ही फलवाला काँपने लगा।
"अब जो भी सच्चाई हैं साफ़-साफ़ बताओ, नहीं तो मैं तुम्हारा क्या हाल करूँगा तुम सोच भी नहीं सकते हो।"
"साहब जी गुनाहगार मैं अकेला नहीं रुक्मणि भी
हैं।"
"गायकवाड़
रुक्मणि को लेकर आओ।" इंस्पेक्टर साहब ने कैलाश की
ओर आँख निकालते हुए कहा।
कुछ ही देर में पुलिस वहाँ रुक्मणि को भी गिरफ्तार करके ले
आई।
"अब बताओ तुम दोनों सच्चाई क्या हैं।"
इंस्पेक्टर साहब ने अपना डंडा ज़ोर से टेबल पर मारते हुए जैसे ही कहा रुक्मणि
काँपने लगी।
"साहब जी, हमें माफ़ कर दीजिए, हमारा इरादा माँजी को मारने का नहीं था।"
"अब जो भी बात हैं विस्तार से बताओ, और हाँ कुछ भी छुपाने की कोशिश की मुझसे बुरा
कोई नहीं होगा।"
इंस्पेक्टर साहब के कहने के बावजूद भी वहाँ कुछ देर तक
चुप्पी छाई रही, फिर अचानक,
"सुना नहीं तुमने मैंने क्या कहा, बको जो भी सच्चाई हैं।" इंस्पेक्टर साहब का गुस्सा आसमान छूने लगा।
"मैं बताती हूँ साहब आपको सारी सच्चाई, मैं माँजी के यहाँ पिछले दस सालों से काम कर रहीं हूँ।"
"वैसे तुम उनके यहाँ काम पर लगी कैसे थी?" इंस्पेक्टर ने जैसे ही बीच में टोका,
"उस वक़्त उन्हें मेरी ज़रूरत थी, और मुझे काम की, दस साल पहले माँजी के बच्चें
ये देश छोड़कर विदेश जाकर बस गए, ज़ालिमों ने अपनी माँ के
बारें में एक बार भी नहीं सोचा कि बेचारी बूढ़ी औरत की देखभाल कौन करेगा, क्यों कि जो घर का काम करने एक बाई आती थी वो तो कुछ ही देर में वापिस भी
चली जाती, ऐसे में पूरा दिन देखभाल के लिए माँजी ने एक
बाई की तलाश शुरू की, और उनकी मुलाक़ात मुझसे हुई, मुझे भी काम की तलाश थी, क्यों कि मेरा और दो छोटे बच्चों का खर्चा मेरा पति अकेला नहीं उठा सकता
था, इसी वजह से मैं उनके घर काम पर लग गयी, पूरा दिन माँजी के साथ ही रहती, घर के सारे काम
और माँजी की सेवा करना यही मेरा काम था, मेरे आने के
बाद माँजी ने मेरे काम से खुश होकर पहले वाली बाई भी हटा दी, सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, फिर अचानक से दो
साल पहले ये कैलाश फलवाला माँजी के घर के सामने अपना ठेला लगाने लगा, जब भी फल लाने होते मैं ही जाकर लाती, पता नहीं
साहब जी कैसे हम दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया, ये
ख्याल भी नहीं आया कि हमारा खुद का भी परिवार हैं, प्यार
में हम दोनों कुछ ऐसे डूबे कि हमने भागकर शादी करने की योजना तक बना डाली, लेकिन पैसे नहीं थे हमारे पास एक नई गृहस्थी बसाने के लिए, कहते हैं साहब जी कि प्यार में इंसान की बुद्धि खराब हो जाती हैं, हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, हमारे कुटिल
दिमाग में माँजी के घर चोरी करने का विचार आया, और इस
वजह से एक दिन जब दोपहर को माँजी खाना खाकर अपने कमरें
में सोनें चली गयी तो मैंने हमारी योजना के अनुसार कैलाश को घर में बुला लिया, मैं माँजी की ओर नज़र रखे हुए थी और कैलाश अलमारी से पैसे निकालने लगा, लेकिन हमारी बदकिस्स्मती थी कि माँजी जल्दी ही उठ गयी, और उन्होंने कैलाश को अलमारी से पैसे निकालते हुए देख लिया, फिर क्या था वो उसे मारने के लिए दौड़ी, और मैं
माँजी को रोकने के लिए, वो समझ चुकी थी कि मैं भी कैलाश
के साथ मिली हुई हूँ, इसी वजह से उन्होंने मुझे पीछे
धकेल दिया, उनका इतना रौद्र
रूप इससे पहले मैंने कभी उनका नहीं देखा था, अपने बचाव
के लिए मैं तुरन्त रसोई से चाकू ले आई, जिसका सहारा लेकर मैं और कैलाश वहाँ से भाग सके, लेकिन बदकिस्स्मती से माँजी बिना चाकू से भयभीत हुए मुझ पर झपट पड़ी और इसी
हाथापाई के दौरान चाक़ू माँजी को लग गया, और कैलाश का फोन भी
ना जाने कैसे पलंग के पीछे गिर गया, और हड़बड़ाहट में वो उसे
उठा भी नहीं सका, सोचा था मौका देखकर बाद में उठा लेगा,
लेकिन मौका ही नहीं मिला।"
"और वो फोन
हमें मिल गया, और तुम दोनों का गुनाह पकड़ा गया।"
"मैं सच कह
रही हूँ साहब हमारा इरादा माँजी को मारने का बिल्कुल भी नहीं था, हमें माफ़ कर दीजिए हमारे छोटे-छोटे बच्चें हैं।"
"जब प्यार में पड़कर घर से भागने की योजना बनाई थी
तब तो तुम्हे ये छोटे बच्चें याद नहीं आए, गायकवाड़
डालों दोनों को जेल में" गायकवाड़ और एक अन्य पुलिसकर्मी रुक्मणि व कैलाश को
ले जाना लगे और वो दोनों अपने बचाव की गुहार लगाते रहे।
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