Khata Parwarish Mein (Story On Family)
उसके सिवा ख़यालों में भी कुछ ओर सोचा नहीं
लेकिन उसके ख़्यालों में तो मैं शामिल ही नहीं
ऐसा क्या हुई खता परवरिश में मुझसे
उसकी फ़ितरत में तो वफ़ा भी नहीं
पैंसठ वर्षीय दयाशंकर जी अपने घर के
बरामदे में बैठे भजन गुनगुना रहे थे,"रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता-राम, सीता-राम,सीता राम भज प्यारे तू सीता-राम”
इतने में ही उनकी बहु मोहिनी चाय लेकर
वहाँ आ गई, "पापाजी, ये लीजिए आपकी चाय खास अदरक डालकर बनाई
हैं आपके लिए"
"जुक-जुक
जियो बेटा ईश्वर तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करें।"
"अच्छा
पापाजी आप चाय पीजिए मैं चलती हूँ।" मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,
"तुम भी मेरे पास
बैठकर चाय पीती तो अच्छा था।"
"ज़रूर
पीती पापाजी अगर मेरे पास टाईम होता तो, अब देखिए ना आप, अभी तो
ऑफ़िस से आई हूँ और अब बच्चों को डांस क्लास के लिए छोड़ने जाना हैं।"
"माफ
करना बेटा मैं तो भूल ही गया था, दरअसल बूढा होने लगा हूँ ना शायद अब इसलिए कुछ याद नहीं रहता।"
"ऐसा
कुछ नहीं हैं पापाजी, अच्छा अब मैं चलती
हूँ, कोई ज़रूरत हो तो आप शारदा को आवाज लगा लेना"
ऐसा कहते हुए मोहिनी चली गई ।
मोहिनी
दयाशंकर जी के इकलौते बेटे विनोद की पत्नी हैं। पन्द्रह साल पहले इन दोनो
की शादी हुई थी, अरेंज मेरिज थी दोनो की, दयाशंकर जी के ऑफ़िस में काम करने वाले एक कर्मचारी ने रिश्ता बताया था
मोहिनी का, मिलने पर विनोद और दयाशंकर जी दोनो को ही
मोहिनी पहली नज़र में ही भा गयी थी, अगर विनोद की माँ
रुक्मणी जिन्दा होती तो अपने बेटे की शादी धूम-धाम से करती, लेकिन उस बेचारी की किस्मत में ये सब सुख कहाँ, उसने तो अपने बेटे विनोद को भी जी भरकर नही देखा, तबियत ज्यादा बिगड़ जाने की वज़ह से विनोद को जन्म देते ही वो चल बसी, उसके बाद तो जैसे दयाशंकर जी ही विनोद की माँ थे और वही उसका बाप, उनकी दिनचर्या अब विनोद के हिसाब से चलने लगी थी, उसके खाने-पीने, सोने-जागने सबका बखूबी ख़्याल
रखते थे दयाशंकर जी, घरवालों ने तो कहा भी था दूसरी शादी के लिए, लेकिन वो ही अपने बेटे के
लिए सौतेली माँ नहीं लाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने
अपने इर्द-गिर्द ही अपनी छोटी-सी दुनिया बना ली थी।
वक़्त गुज़र
रहा था, और सब कुछ अच्छा ही
चल रहा था, शादी के दो साल बाद मोहिनी ने जुड़वाँ
बेटियों को जन्म दिया, घर में मानो दुनियाभर की खुशियाँ
आ गयी थी, दयाशंकर जी तो जैसे ही काम से लौटते अपनी
पोतियों के साथ खेलने लग जाते, उन्होंने ही तो अपनी पोतियों के नाम रखे थे, रिया
और सिया, सभी बहुत खुश थे, कभी-कभी
तो ड़र लगने लगता कि कहीं इन ख़ुशियों को किसी की नज़र ना
लग जाए, और हुआ भी कुछ ऐसा ही, अभी आठ साल पहले की ही तो बात हैं, उस दिन शाम को विनोद ऑफिस से बड़ा सा मिठाई का डिब्बा लेकर लौटा था,
"विनोद इतना बड़ा मिठाई का डिब्बा कोई ख़ुशख़बरी हैं क्या?"
"हाँ मोहिनी, मेरा प्रमोशन हो गया हैं।"
"अरे
वाह, क्या बात हैं, जाओ जाकर यह खुशखबरी पापाजी को भी सुनाओ" विनोद ने जब ये खुशख़बरी
दयाशंकर जी को सुनाई तो वो अपने बेटे की तरक्की पर फूले नहीं समाए।
"और जानती हो मोहिनी
मुझे कम्पनी की तरफ से दो साल के लिए कनाड़ा भेजा जा रहा
हैं पूरे परिवार के साथ"
"क्या
कहा तुमने पूरे परिवार के साथ….! विनोद बचपन से मेरी बहुत इच्छा थी विदेश घूमने
की अब पूरी हो जाएगी।"
"हाँ
अगले ही महीनें निकलना होगा हमें"
"लेकिन
विनोद हम सब चले जायेंगे तो दो साल के लिए घर की देखभाल कौन करेगा, ज़माना कितना ख़राब हैं, मुझे नहीं लगता कि इतने लम्बे वक़्त के लिए हमें घर में ताला लगाना चाहिए, ऐसा करते हैं ऊपर
वाले हिस्से में एक किराएदार रख लेते हैं, घर की देखभाल
भी हो जाएगी और हमारे लौटने के बाद घर खाली करवाने की जल्दी भी नहीं रहेगी।"
"यह
क्या बोले जा रही हो तुम, घर पर ताला, किराएदार, क्या ज़रुरत हैं इन सब बातों की, घर पर पापाजी तो होंगे ही ना, वो देखभाल करेंगे
ना घर की"
"विनोद
पापाजी तो हमारे साथ चलेंगे ना....!"
"नहीं
मोहिनी मैं अपने परिवार को साथ लेकर जा सकता हूँ पापाजी को नहीं।"
"क्यों, पापाजी हमारा परिवार नहीं हैं
क्या, और वो यहाँ अकेले रहेंगे कैसे?"
"इसकी चिंता तुम मत
करो मैंने सब सोच लिया हैं हमारे वापिस आने तक पापाजी
के साथ एक नौकर रहेगा, क्यों पापाजी आपको कोई ऐतराज़ तो
नहीं हैं ना?"
"नहीं बेटा मुझे
ऐतराज़ कैसा, तुम लोग आराम से जाओ मेरी चिन्ता मत करो।"
"हाँ
तो फिर ठीक हैं, वैसे भी दो साल की
ही तो बात हैं वो तो यूँ ही गुज़र जायेंगे चुटकियों में"
"तुम
मे कुछ शर्म हैं या नहीं?" मोहिनी ने विनोद पर लगभग चिल्लाते
हुए कहा,
"अरे इसमें गलत ही
क्या हैं?"
"क्यों भूल गए वो समय जब पापाजी ने मम्मी जी के जाने के बाद अपनी ज़िन्दगी तुम्हारे हिसाब से जीनी शुरु कर दी, तुम्हे माँ-बाप दोनों का प्यार दिया, एक दिन के लिए भी तुम्हे अकेला नहीं छोड़ा, और अब तुम उन्हें अकेला छोड़ने के बारे में सोच भी कैसे सकते हो।"
"मोहिनी तुम कहीं की बात कहीं लेकर जा रही हो, और
वैसे भी पापाजी ने जो कुछ भी मेरे लिए किया कोई अहसान नहीं किया यह तो फ़र्ज़ था
उनका"
"तो
तुम अपना फ़र्ज़ क्यों नहीं निभा पा रहे हो।" मोहिनी की आवाज़ में गुस्सा साफ़
झलक रहा था।
"भगवान के लिए चुप हो
जाओ तुम दोनों, मत लड़ो मेरे लिए, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं हैं अकेले रहने में, जाओ तुम लोग और जीओ अपनी ज़िन्दगी" कहते-कहते दयाशंकर जी की आँखों से
आँसू बहने लगे।
"पापाजी"
"बस
मोहिनी बेटा, अकेला छोड़ दो मुझे, बहुत दुःख की बात हैं ये मेरे लिए कि मेरे
बेटे-बहु मेरी वजह से झगड़ रहे हैं।" ऐसा कहते हुए दयाशंकर जी अपने कमरे में
चले गए, विनोद के द्वारा इतनी ख़ुशी की ख़बर सुनाने के
बाद भी घर में जैसे मातम-सा छा गया।
"मोहिनी मैं आखिरी
बार पूछ रहा हूँ, क्या तुम मेरे साथ कनाड़ा चल रहीं हो या नहीं?"
"नहीं"
"मोहिनी
तुम समझती क्यों नहीं हो कम्पनी केवल हमारा ही खर्चा उठाएगी, पापाजी का नहीं।"
"हाँ
तो ठीक हैं ना, हमारा खर्चा कम्पनी
उठाएगी, और पापाजी का खर्चा
हम उठायेगे, वैसे भी कमी क्या हैं हमारे पास पैसे
की" मोहिनी जैसे ज़िद पर ही अड़ चुकी थी, और विनोद
ने तो जैसे फैसला ही कर लिया था, दयाशंकर जी को साथ
नहीं ले जाने का, कुछ दिनों तक इस मुद्दे पर बहस हुई, घर में झगड़े भी हुए, लेकिन दोनों पति-पत्नी
अपनी-अपनी ज़िद पर अड़े रहे। दयाशंकर
जी ने भी बहुत समझाने की कोशिश की मोहिनी को, लेकिन वो
जैसे कुछ समझने को ही तैयार नहीं थी, आखिरकार एक महीनें
बाद विनोद अकेला ही कनाड़ा के लिए रवाना हो गया, और इधर
घर पर दयाशंकर जी अपनी बहु व पोतियों को अपने बेटे के साथ नहीं भेज पाने की वजह से
खुद को अपराधी महसूस करने लगे।
"मोहिनी बेटा, इतनी ज़िद भी अच्छी नहीं हैं, तुम्हे विनोद के
साथ जाना चाहिए था, उसको भी अच्छा लगता।"
"और
पापाजी आपका क्या?"
"मेरा क्या हैं बेटा, दो साल की ही तो बात थी गुज़र जाते जैसे-तैसे"
"नहीं
पापाजी, बहुत कष्ट उठाए हैं
आपने ज़िन्दगी में अब ओर नहीं, विनोद यह बात समझे या ना
समझे लेकिन मैं समझती हूँ।" दयाशंकर जी समझ ही नहीं पा रहे थे कि इतनी अच्छी
बहु पाने की ख़ुशी मनाए या स्वार्थी बेटा पैदा करने का
दुःख, धीरे-धीरे समय बीतता गया, और दो साल भी गुज़र गए, कोई नहीं भूल सकता वो
दिन विनोद कनाड़ा से वापिस आने वाला था, सब बहुत खुश थे
बीती बातें भूलाकर उसका स्वागत करना चाहते थे।
उस दिन घर
में सुबह से ही त्यौहार
का माहौल था, विनोद के स्वागत की तैयारियाँ चल रहीं थी, मोहिनी अपनी दोनों बेटियों के साथ मिलकर घर की सजावट कर रही थी, दयाशंकर जी भी तो अपनी दोनों पोतियों के नन्हे-नन्हे हाथों से घर को सजता
हुआ देख ख़ुश थे, उससे ज्यादा ख़ुशी उन्हें इस बात की थी
कि उनकी वजह से अलग हुए उनके बेटे-बहु अब एक हो जायेंगे।
"पापा आ गए, पापा आ गए" इतने में ही सिया चिल्लाई, घर
के सभी सदस्य बाहर की ओर दौड़े, गाडी से विनोद उतर रहा
था और साथ में एक महिला भी थी।
"यह कौन हैं?" दयाशंकर जी धीमे से बड़बड़ाए जो कि मोहिनी ने सुन लिया,
"पापाजी शायद विनोद
के ऑफिस की कोई कर्मचारी होगी, एक ही टैक्सी में आ गए
होंगे दोनों"
"हाँ
यही होगा" ससुर-बहु दोनों बात कर ही रहे थे इतने में ही विनोद व वो महिला
उनके सामने आकर खड़े हो गए।
"प्रणाम पापाजी"
विनोद ने जैसे ही दयाशंकर जी के पैर छुए,
"ख़ुश रहो बेटा"
"भीतर
चलिए, बाहर बहुत गर्मी हैं।" मोहिनी अपनी ख़ुशी छुपा ही नहीं पा रही थी, सभी
अब घर के अन्दर आ चुके थे।
"आपने इनका परिचय तो
हमसे करवाया ही नहीं" मोहिनी ने विनोद से कहा, दरअसल
वो उस महिला के बारे में जानने के लिए बहुत ही उत्सुक थी।
"ये, ये इसका नाम रूचि हैं, भारत की ही रहने वाली
हैं, पिछले कुछ सालों से कनाड़ा में नौकरी कर रही थी, हमारी मुलाकात कम्पनी में ही हुई थी।"
"ओह तो ये इंडिया अपने परिवार के पास आयी हैं, कहाँ हैं आपका घर?"
"पापाजी, मोहिनी, दरअसल मुझे आप लोगों से कुछ बात करनी
हैं, मैं रूचि से प्यार करने लगा हूँ, और इससे शादी करना चाहता हूँ, लेकिन जब तक मोहिनी से तलाक नहीं हो जाता मैं रूचि से शादी नहीं कर सकता, आप लोग समझ रहे हैं ना मेरी बात?"
"हाँ बेटा बहुत अच्छी
तरह से समझ रहे हैं, और तुम, शर्म नहीं आती तुम्हे
एक बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ते हुए" दयाशंकर जी अब अपना आपा खो चुके थे।
"ख़बरदार पापाजी, जो आपने रूचि से कुछ कहा मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
“बस....
इससे आगे एक शब्द नहीं, मैं कुछ भी
बर्दाश्त कर सकती हूँ, लेकिन पापाजी का अपमान नहीं, आपको तलाक चाहिए ना मुझसे, मिल जायेगा लेकिन
अभी इसी वक़्त इस औरत को लेकर घर से निकल जाइये।" मोहिनी ने गुस्से में
चिल्लाते हुए कहा।
"तुम होती कौन हो
मुझे घर से निकालने वाली, मेरे बाप का घर हैं ये, निकलना हैं तो तुम निकलो यहाँ से"
"पापाजी, पापाजी क्या हो गया आपको....!"
इतने में ही गिरते हुए दयाशंकर जी को सँभालने के लिए मोहिनी दौड़ी।
"जल्दी से कोई डॉक्टर
को बुलाओ, लगता है पापाजी को
हार्ट-अटैक आया हैं।" मोहिनी चिल्लाई।
"मैं गाड़ी निकालता
हूँ इन्हे हॉस्पिटल ले जाना होगा।" कुछ देर पहले वहाँ क्या चल रहा था यह बात सब भूल चुके थे, और सभी
दयाशंकर की सेवा में लग गए, डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें
माइनर हार्ट-अटैक आया था, कुछ ही दिनों में दयाशंकर जी
ठीक होकर घर वापिस आ गए, उनकी हालत सुधरते देख विनोद ने
फिर से वही बात छेड़ दी।
"पापाजी क्या सोचा
हैं आपने, क्या आपको रूचि अपनी बहु के रूप में मंज़ूर
हैं।"
"मोहिनी, बेटा इससे कह दो कि इसी वक़्त इस
औरत को लेकर घर से निकल जाए, और हाँ मेरी बेटी तुम्हे
तलाक देने के लिए तैयार हैं, मोहिनी सही कहा ना बेटा मैंने?" दयाशंकर
जी मोहिनी की ओर ऐसे देखने लगे जैसे जो भी उन्होंने कहा
उस पर मोहिनी की स्वीकृति की मोहर चाहते हो।
"हाँ पापा आपने
बिल्कुल सही कहा, निकल जाइये आप दोनों इसी वक़्त मेरे घर
से, वैसे भी आप जैसी अहसानफ़रामोश औलाद की किस माँ-बाप को ज़रूरत होगी।" इतना अपमान होने के बाद विनोद
अब कुछ भी कहने की हालत में नहीं था, वो चुपचाप कुछ ही
देर में रूचि को लेकर घर से निकल गया, तलाक का केस कुछ सालों तक कोर्ट में चला, लेकिन
इस दौरान मोहिनी और विनोद के बीच कोई बातचीत नहीं थी, अब
मोहिनी अपने ससुर और दोनों बेटियों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी
रहती हैं, घर के किसी भी सदस्य का विनोद से अब कोई
लेना-देना नहीं हैं, लेकिन दयाशंकर जी को आज भी यह लगता
हैं कि उनकी बहु उनसे अपना दुःख छुपाने का असफल प्रयास करती हैं।
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