Mehak Rishton Ki (Story On Family)


रिश्तों में आ जाए दरार कितनी भीरहने लगें ख़फ़ा-ख़फ़ा से

फिर भी आते हैं काम ये ही एक दूसरे के हक़ीक़त हैं ये ज़िन्दगी की

 

    बच्चों की समर वेकेशन शुरू हुए तकरीबन एक हफ्ता हो चुका थाआफिस से छुट्टी नहीं मिल पाने की वजह से मै उनके साथ वक्त ही नहीं गुजार पा रही थीवैसे तो मेरे सास-ससुर भी साथ ही रहते हैंइसलिए मुझे बच्चों की ज्यादा फिक्र नहीं करनी पड़तीलेकिन पिछले चार महीनें से उनके मेरी नन्द के पास अमेरिका जाने की वजह से पूरी तरह से बच्चों की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ चुकी थीएक बार तो ख़्याल आया कि क्यों ना माँ के पास भेज दूँकुछ दिन बच्चें नाना-नानी के साथ रहेंगे तो उन्हें भी अच्छा लगेगाऔर बच्चे भी खुश हो जाऐंगे।

"ऐसा करतीं हूँ कल ही बच्चों को छोड़ आती हूँशनिवार हैं सो सबसे मिलना भी हो जाएगाऔर दो दिन रुककर बच्चों को छोड़कर इतवार शाम तक वापिस आ जाऊँगी,  वैसे भी दिल्ली से गाजियाबाद की दूरी ही कितनी हैं।" आने-जाने की सारी प्लानिंग कर मैंने शाम को जब यह बात अपने पति नीरज को बताई तो उन्हें भी मेरा आईडिया पसन्द आया।

"आप भी चलिए ना साथ हमारेआपसे मिलकर मम्मी-पापा बहुत ख़ुश हो जायेंगे।" जैसे ही मैंने नीरज से कहा।

"बात तो तुम्हारी सही हैं सुनीतालेकिन मुझे कल ऑफिस जाना पड़ेगाकोई ज़रूरी मीटिंग आ गयी हैंकोई बात नहीं तुम चली जाओ बच्चों को लेकरमैं कभी बाद में जाकर मिल लूँगा।" "ठीक हैं तो हम कल सुबह जल्दी ही निकल जायेंगेआपका खाना बनाकर फ्रिज में रख दूँगी गरम करके खा लीजिएगा।" मेरी बात सुनकर नीरज बिना कुछ कहे ही अपने कमरे में चले गएयह उनकी आदत हैंजिसके लिए पहले मुझे बहुत बुरा लगता थालेकिन अब मैं इसकी आदी हो गयी हूँमैं काम ख़त्म कर अगले दिन जाने की तैयारी करने लगी।

अगले दिन,

"नमस्ते मम्मी कैसे हो?" दरवाज़ा खुला देख मैंने घर के अन्दर जाते हुए पूछा,

"अरे सुनीता तू यहाँकैसे आना हुआ?"

"क्यों मम्मी अपने यहाँ आने की भी कोई वजह होती हैं क्या?"

"अरे नहीं बेटावो तो मैंने यूँ ही पूछ लिया था।"

"बच्चों के स्कूल की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैंतो सोचा क्यों ना इन्हे कुछ दिनों के लिए इनके ननिहाल में छोड़ दूँइनका भी तो नाना-नानी के प्यार पर हक़ हैं।"

"बिल्कुल हैंआओ बेटा नानी के पास" मम्मी ने रिंकू और सनी को अपने पास बुलाते हुए कहा, "पापा नहीं दिखाई दे रहे कहीं बाहर गए हैं क्या?" मेरे पूछते ही,

"हाँ वो पास ही सब्ज़ी लेने गए हैंअभी आ जाएंगे थोड़ी देर मेंआ तू बैठ मैं कुछ खाने को बना देती हूँ।" जैसे ही मम्मी रसोई में जाने के लिए उठी मैं भी उनके पीछे-पीछे हो ली।

"मम्मी घर इतना खाली-खाली सा क्यों लग रहा हैं भैया-भाभी भी घर पर नहीं हैं क्या?"

"हाँ बेटा वो लोग शिखा के मायके गए हैंआज सुबह ही निकले थेकल शाम तक वापिस आ जाएंगेछुट्टियाँ थी तो मैंने ही कहा की जाकर मिल आओ उन्हें भी अच्छा लगेंगा।"

"सो तो हैंमैंने भी नीरज से कहा था साथ चलने के लिए लेकिन उनकी एक ज़रूरी मीटिंग आ जाने की वजह से वो साथ नहीं आ पाए।"

"कोई बात नहींअब बच्चों को जब वापिस लेने आओ तब दोनों आ जाना।"

"हाँ ये ठीक रहेगालेकिन इस बार मेरा भाई- भाभी से मिलने का बहुत मन था।"

"कोई बात नहीं अगली बार मिल लेनाइस बार अपनी माँ से मिल ले जब से शादी करके गयी हैंतेरा तो यहाँ आना ही बंद हो गया हैं।"

"ऐसी बात नहीं हैं मम्मी बस टाइम ही नहीं मिलता।"

"चल बैठ गरमागरम पकौड़े बनाए हैं तेरे लिए खा लेऔर बच्चो को भी बुला ले।" मम्मी के व्यवहार से मातृत्व तो भरपूर महसूस हो रहा थालेकिन वो कुछ परेशान भी लग रहीं थीसोचा पूछ लूँ क्या परेशानी हैंलेकिन नहीं पूछ पायी।

"नाना जी आ गएनाना जी आ गए" अचानक से रिंकू की आवाज़ सुन मैं भी बाहर की ओर दौड़ीऔर पापा के गले से जा लगी।

"सुनीता, कैसी हैं बेटा?"

"मैं ठीक हूँ पापाआप कैसे हैं?"

"बहुत अच्छाक्यों देखने से लगता नहीं हूँ क्या?" पापा ने हँसते हुए कहावैसे भी पापा का स्वभाव हमेशा से मज़ाकिया ही रहा हैंलेकिन पापा की आज की हँसी में मुझे थोड़ा-सा दर्द भी महसूस हुआना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि मम्मी-पापा मुझसे कुछ छुपाने की कोशिश कर रहे हैंजानने की काफी कोशिश कीलेकिन किसी ने कुछ नहीं बतायाबातों ही बातों में पूरा दिन कैसे गुज़र गया कुछ पता ही नहीं चलाअब काफी रात हो चुकी थीऔर मैं भी सोने जाना चाहती थीसो बच्चों को साथ लेकर सोने चली गयीलेकिन आँखों में नींद दूर-दूर तक नहीं थीबस यही सोचती रही की ऐसी क्या बात हैं जिसे मम्मी-पापा मुझसे छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।

रात के लगभग एक बजे होंगे मुझे अचानक से पानी पीने की तलब लगीऔर मैं पानी लेने के लिए जाने लगी लेकिन फ्रिज तक जाने के लिए मम्मी-पापा के कमरे से होते हुए गुज़रना पड़ता हैंजैसे ही मैं उनके कमरे के आगे से निकली कुछ बातों की आवाज़े आने लगीपापा कह रहे थे कि, "तुमने कुछ सुनीता को बताया तो नहीं ना?"

"नहींलेकिन मुझे लगता हैं उसे हमारे परेशान चेहरे देखकर शक ज़रूर हुआ है।“

"कोई बात नहीं एक ही दिन की तो बात हैं सम्भाल लेंगेवैसे भी वो आज शाम तक वापिस जा ही रही हैं।" पापा ने कहा,

"लेकिन बच्चे वो तो यही रहेंगे ना कुछ दिन और" मम्मी की आवाज़ में चिंता झलक रही थी, "कोई बात नहीं बच्चे हैं नासमझ हैं।" मैं भी वहाँ से पानी लेने के लिए फ्रिज की ओर चल पड़ीलेकिन मन पूरी तरह से अशांत हो चुका थाज़रूर कोई बड़ी बात हैंनहीं तो पापा-मम्मी आधी रात को इस तरह से बात नहीं कर रहे होतेदूसरी ओर मैं उनसे ज़बरदस्ती कुछ पूछना भी नहीं चाहती थीदिमाग में अजीब सी कश्मकश चल रही थीऔर दिल ये सोचकर घबरा रहा था कि कहीं कोई बुरी ख़बर ना होफिर एकाएक ही भाभी का ख्याल आयासोचा भाभी को तो सबकुछ पता ही होगासुबह होते ही उनसे बात करती हूँ।

"मम्मी पानी" इतने में ही रिंकू उठकर बैठ गया और पानी माँगने लगा,

"हाँ बेटा देती हूँ अभी"

"मम्मी आप अभी सोये नहीं?"

"नहीं नींद नहीं आयीतुम सो जाओ" रिंकू बिना कोई सवाल-जवाब किए तुरन्त दुबारा सो गयाऔर मैं बेसब्री से सुबह होने का इंतज़ार करने लगी।

अगले दिन सुबह,

"हैलो भाभी"

"हैलो  सुनीताकैसी हो?"

"भाभी मैं ठीक हूँअभी गाज़ियाबाद आई हुई हूँ।"

"अरे हम लोग तो मेरठ आए हुए हैंतुम अपने आने के बारे में अगर पहले बता देती तो हम कभी बाद में यहाँ आ जाते।"

"नहीं भाभी कोई बात नहींवैसे भाभी मुझे आपसे कुछ पूछना था।"

"हाँ पूछो ना"

"भाभी घर पर कोई प्रॉब्लम चल रही हैं क्या?"

"प्रॉब्लमनहीं तोलेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?"

 "मुझे पापा-मम्मी कुछ परेशान से लगेऐसा लगा जैसे कि वो कुछ छुपाने की कोशिश कर रहे हैंमुझे लगा शायद आपको कुछ पता होगा।"

"नहीं सुनीता तुम्हे शायद कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं।"

"नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं हैं।" और मैंने भाभी को रात को जो पापा-मम्मी की बीच बातचीत हुई थी वो सब बता दी।

"सुनीता अब तो मुझे भी फिक्र होने लगी हैंसुनो ऐसा करते हैं हम अभी वापिस आते हैंफिर पता करते हैं कि ऐसी क्या बात हैं जिसे पापा-मम्मी हमें बताना नहीं चाहतेलेकिन तुम घर पर किसी को भी हमारें आने की ख़बर मत देना।"

"जी भाभी"

"सुनीता बेटा अभी उठी नहीं क्या?"

"आई मम्मीभाभी मम्मी आवाज़ लगा रही हैंमैं अब फ़ोन रखती हूँ।" ऐसा कह मैं तुरन्त ही मम्मी की ओर दौड़ी की कहीं उन्हें शक ना हो जाएनाश्ते के टाइम मम्मी-पापा का व्यवहार सही लग रहा था रहा थाऔर पापा तो बच्चों के साथ भी पहले जैसा ही लाड लड़ा रहे थेमैं सोच में पड़ गयी कि यह सब क्या हैंकल जो इतने परेशान नज़र आ रहे थे वो अचानक आज इतने सहज कैसे हो गएया शायद कोई नाटक कर रहे हैंयूँ तो शादी के बाद से मेरा गाज़ियाबाद आना बहुत कम हो गया हैंलेकिन फ़ोन के द्वारा मैं हमेशा सम्पर्क में बनी रहती हूँयहाँ की हर छोटी सी छोटी बात की मुझे जानकारी होती हैंलेकिन इन दो दिनों में मैंने घर का जो माहौल देखा वो इससे पहले ना तो कभी देखा और ना ही कभी सुना।

"सुनीता क्या हुआ बेटाक्या सोच रही हैं?"

"नहींकुछ नहीं मम्मी"

"तो फिर तेरे पापा कितनी देर से ब्रेड माँग रहे हैं देती क्यों नहीं"

"ओह सॉरी पापा मैंने सुना नहीं" मैंने पापा को ब्रेड पकड़ाते हुए कहाऔर खुद फिर से एक गहरी सोच में चली गयी।

"सुनीताबेटा आज ही जाना ज़रूरी हैं क्या? कुछ दिन और  रुक जाती तो हमें भी अच्छा लगता।"

"नहीं मम्मी आप तो जानती ही हैं ना कि ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलतीवैसे भी बच्चो को छोड़कर जा रही हूँ ना आपके पासमेरी कमी पूरी कर देंगे।" मैंने हँसते हुए कहा,

"हाँ सो तो हैंघर में बच्चों से रौनक रहती हैं।" मम्मी ने भी मेरी बात पर सहमति जताते हुए कहा,

"मम्मी आपसे एक बात पूछनी थी।"

"हाँ पूछ" मम्मी ने मेरी ओर सवालिया नज़रों से देखते हुए कहा,

"मम्मी घर में कोई परेशानी हैं क्या?"

"परेशानीकैसी परेशानीयह क्या कह रही हैं तू.....!" मम्मी मेरी ओर आश्चर्य से देखने लगी, "मुझे ऐसा लग रहा हैं की पापा और आप किसी बात को लेकर परेशान हो।"

"नहींऐसी तो कोई बात नहीं हैंज़रूर तुझे कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं।मम्मी ने मुझसे अपनी नज़रें चुराते हुए कहालेकिन मैं इतना तो समझ ही गयी थी कि ज़रूर कोई बड़ी बात हैंऔर परेशानी वाली भीकोई बात नहीं भाई- भाभी आ रहे हैं ना अब सब पता चल जाएगामैं फिर से सोच में डूब गयी।

"अब क्या सोचने लगी?"

"नहीं कुछ नहींकुछ भी तो नहीं"

"तो फिर मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देती।"

"क्याकुछ पूछा आपने?"

"हाँ पूछा लेकिन इससे पहले तू मुझे यह बता कि तू ये बार-बार कहाँ खो जाती हैंकल से देख रही हूँ बेटाकुछ बात हैं तो बताती क्यों नहीं।"

"नहीं मम्मी ऐसी कोई बात नहीं हैं।" अब मम्मी को क्या बताऊँ कि मैं उनको लेकर ही परेशान हो रही हूँ। पापा, पापा कहाँ चले गये अचानक से?” मैंने अपने चारों ओर नज़रें दौडाते हुए पूछा।

“ये ले अभी तो तेरे सामने बच्चों के लिए मिठाई लेने गए थे, ध्यान कहाँ हैं तेरा बेटा?

“ओह माफ करना मम्मी मैंने देखा नही, अच्छा मम्मी आपको याद हैं बचपन में मैं और भैया कितनी बदमाशियाँ किया करते थे और आप हमसे परेशान हो जाया करती थी।" मैंने बातों का रुख मोड़ते हुए कहा

"हाँ सब याद हैं मुझेअरे कैसे भूल सकती हूँ तुम्हारी शैतानियों कोयही तो वो आँगन था जिसमे तुम दोनों बड़े हुएलेकिन तुम्हारे बच्चे वो तो अभी छोटे ही हैं।" कहते-कहते मम्मी भावुक हो गयी,

"हाँ तो क्या हुआ यह भी इसी आँगन में खेलते-खेलते बड़े हो जायेंगे।" मेरे कहते ही मम्मी फूट-फूटकर रोने लगी और उन्हें रोता हुआ देख मैं घबरा गयी।

"क्या हुआ मम्मी आप रोने क्यों लगीक्या हुआ बोलिए ना प्लीजआप मुझसे अब कुछ भी मत छुपाइए।" मैंने मम्मी को संभालते हुए कहा।

"सुनीता बेटा मुझे माफ़ कर देमैंने बहुत कोशिश की कि यह बात तुम बच्चों को नहीं बताऊँ लेकिन...." कहते-कहते मम्मी अचानक से चुप हो गयी।

"कौनसी बात?"

"वो तेरे चाचा"

"चाचाक्या किया मम्मी चाचा नेऔर आप लोग कब मिले चाचा सेउन लोगों द्वारा आपके साथ इतना बुरा व्यवहार करने के बाद भी आप लोग उनसे मिलेक्यों मम्मी….!"

"पिछले हफ्ते की ही बात हैंतेरे पापा के पास तेरे चाचा का फ़ोन आया थावो तेरे पापा से मिलना चाहते थेउन्हें अपनी गलतियों का अहसास थामाफ़ी माँगना चाहते थेतू तो जानती हैं ना तेरे पापा कितनी जल्दी भावुक हो जाते हैंइसलिए वो तेरे चाचा की बातों में आ गएऔर मुझे भी बिना बताये उनसे मिलने चले गए।" मम्मी की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

"फिरफिर क्या हुआबताओ मम्मी?"

"तेरे चाचा ने कागज़ो पर तेरे पापा के साइन करवा लिए"

"कैसे कागज़  मम्मीक्या लिखा था उन कागज़ों पर" मैं मम्मी के ऊपर बुरी तरह से चिल्लाने लगी।

"उन पर लिखा था कि तेरे पापा अपनी मर्ज़ी से अपनी सारी ज़मीन-जायदाद तेरे चाचा के नाम कर रहे हैं।"

"लेकिन पापा ने उन कागज़ों पर साइन किए ही क्यों?" मेरा गुस्सा अब सातवें आसमान पर था।

"किये नहीं बल्कि तेरे चाचा ने उनके सिर पर बंदूक रखकर ज़बरदस्ती करवाए।" इतना सुनते ही मानो मेरे पैरों तले ज़मीन ख़िसक गयी,

"हे भगवानऔर कितना गिरेगा यह आदमी" मेरे मुँह से मेरे ही चाचा के लिए गालियाँ निकल रही थी। "लेकिन मम्मी इसमें गलती पापा की भी हैंउन्होंने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि चाचा बदल सकते हैंअरे जो आदमी कभी अपने माँ-बाप का सगा नहीं हो पाया वो अपने भाई का सगा कैसे हो सकता हैं।"

"वो सब तो ठीक हैं सुनीताऔर तेरे पापा को अपनी गलती का अहसास भी हैंलेकिन अब आगे क्याहमने तो यह बात अभी तक घर पर किसी को भी नहीं बताई हैंऔर जब तेरे भाई को पता चलेगा तो वो क्या कहेगामुझे तो यह सोच-सोचकर घबराहट हो रही हैं।"

"मम्मी भाई और भाभी अभी थोड़ी ही देर में आने वाले हैं।"

"क्यालेकिन वो तो रात तक आने वाले थे ना फिर जल्दी क्यों?"

"वो बात यूँ थी कि मैंने ही भाभी को फ़ोन किया था" और मैंने मम्मी को भाभी से हुई सारी बात बता दी।

"सत्यनाशअब तो तेरे पापा मुझे जान से ही मार डालेंगेउन्होंने कहा था कि यह बात मैं तुममे से किसी को भी ना बताऊँ।"

"नहीं बताने का क्या मतलब थाइतनी बड़ी बात आप लोग हमसे क्योंछुपाना चाहते थे?" मैंने गुस्से में कहा,

"अरे नहीं बेटा वो बात नहीं हैंदरअसल तेरे पापा अपने किए पर बहुत ही शर्मिंदा हैंउन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा हैं कि वो तेरे चाचा की चिकनी-चुपड़ी बातों में कैसे आ गएइसलिए वो चाहते हैं कि बिना तुम लोगो को यह बात पता चले ही ख़त्म हो जाएइसलिए वो पिछले दो दिनों से वकीलों के चक्कर काट रहे हैं।"

"यह मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं हैं मम्मीप्रॉपर्टी के पेपर्स पर पापा के साइन हैंचाचा के पास सबूत हैं कि पापा ने अपनी मर्ज़ी से अपनी सारी प्रॉपर्टी उनके नाम की हैं।" 

"तो फिर अब क्या होगा बेटा?"

"पता नहींमेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा हैंसच मम्मी चाचा ने बहुत गन्दी चाल चली हैं हमारे साथभगवान उनको इसकी सज़ा ज़रूर देगा।" कहते-कहते मैं भावुक हो गयी, "ऐसा बोलकर तू क्यों अपनी ज़ुबान ख़राब करती हैंजिसकी जैसी करनी वैसी भरनी"

"मामा आ गएमामा आ गए" अचानक से रिंकू और सनी की आवाज़ सुन मम्मी और मैंने खुद को संभाला।

"क्या हुआ सब ठीक तो हैं ना मम्मी जीमुझे सुनीता ने बताया कि" कहते-कहते भाभी अचानक से रुक गयी,

"मेरी बात हो गयी हैं भाभीमम्मी सेऔर मैंने जो आपको फ़ोन किया था उसके बारे में भी इनको पता हैं।"

"लेकिन हुआ क्या हैंकोई मुझे भी बताएगापूरे रास्ते शिखा से पूछता रहालेकिन उसने कुछ नहीं बताया।"

"भैया दरअसल बात यह हैं कि..... " और मैंने उन्हें सारी बात विस्तारपूर्वक बता दी।“

"हे भगवानइतना सबकुछ हो गया और मम्मी जी आपने हमें कुछ पता नहीं लगने दियायह तो सुनीता आ गयी नहीं तो हमें कुछ पता ही नहीं चलता।"

"नहीं शिखा ऐसी कोई बात नहीं हैंयह बात तुम लोगो को कभी ना कभी तो बतानी ही थी बस हिम्मत ही नहीं हो रही थीवैसे भी एक बात और हैं जो मैंने अभी तक तुम लोगों को नहीं बताई हैं।"

"अब क्या बात हैं मम्मीअब क्या कर दिया चाचा ने" मेरे पूछते ही,

"सुनीतासमरशिखा बेटा हमें माफ़ कर देना हमें एक महीनें के अन्दर-अन्दर यह घर खाली करना होगा।"

"क्यायह.... यह क्या बोल रहीं हैं मम्मी जी आप.....!" भाभी ने जैसे ही रुआँसे होते हुए कहा, "कहीं भी नहीं जाना हैं किसी कोअब यह घर हमें नहीं छोड़ना पड़ेगा।" यह आवाज़ पापा की थीउन्हें देख मैं और भाई पापा की ओर दौडे।

"क्या हुआ पापा तैयार हुआ कोई वकील हमारा केस लड़ने के लिए?" भाई के पूछते ही

"नहींबल्कि केशव ने सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम वापिस कर दी हैं।"

"यह क्या कह रहे हैं आपअभी कुछ दिन पहले ही तोऔर आज अचानककुछ साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताते आप" मम्मी के कहते ही,

"हाँ पापा जल्दी बताइए हुआ क्या हैं।" अब भाई के भी सब्र बाँध टूटने लगा था,

"बधाई हो सुजाता जीआपकी बद्दुआ रंग लायी"

"यह कैसी बातें कर रहें हैं आप, मैं कुछ समझी नहीं"

"केशव को ब्रेन-टूमर  हुआ हैंलास्ट स्टेजउसे लगता हैं कि यह उसके बुरे कर्मो की सजा हैंइसलिए उसने बुलाकर......" और कहते-कहते पापा अचानक से चुप हो गएघर में एक अजीब सी चुप्पी छा गयी थीलेकिन बच्चों के खेलने का शोर बरकरार था। 

"चलिएहमें अभी नीता के पास चलना चाहिएमैं जानती हूँ उसेउस बेचारी का तो रो-रोकर बुरा हाल हो रहा होगा।" मम्मी के कहते ही,

"दिमाग ख़राब हो गया हैं क्या आप दोनों काक्या ज़रुरत है वहाँ जाने कीअरे सही तो हैं अपनी कर्मो की सजा भुगत रहें हैं वोतो भुगतने दीजिए ना"

"चुपकरख़बरदार सुनीता जो अब एक भी शब्द अपने मुँह से निकालादेवर जी मेरे बेटे जैसे हैंऔर मैं उन्हें इस हाल में नहीं छोड़ सकतीचलिए जी जल्दी चलिए" मम्मी ने मुझे बुरी तरह से डाँटते हुए कहाऔर पापा को लेकर वहाँ से रवाना हो गयीऔर हम तीनों उन्हें जाते हुए देखते ही रहेलेकिन अब मुझे यकीन हो चुका था कि रिश्तों  के बीच कितनी ही दरार क्यों ना आ जाएउनके बीच कितनी ही कहा-सुनी क्यों ना हो जाएकाम वो ही आते हैं एक-दूसरे केऔर ना ही कभी ख़त्म होती हैं महक रिश्तों की। 

 

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