Mehak Rishton Ki (Story On Family)
रिश्तों में आ जाए दरार कितनी भी, रहने लगें ख़फ़ा-ख़फ़ा से
फिर भी आते हैं काम ये ही
एक दूसरे के हक़ीक़त हैं ये ज़िन्दगी की
बच्चों
की समर वेकेशन शुरू हुए तकरीबन एक हफ्ता हो चुका था, आफिस
से छुट्टी नहीं मिल पाने की वजह से मै उनके साथ वक्त ही नहीं गुजार पा रही थी, वैसे तो मेरे सास-ससुर भी साथ ही रहते हैं, इसलिए मुझे बच्चों की ज्यादा फिक्र नहीं करनी पड़ती, लेकिन पिछले चार महीनें से उनके मेरी नन्द के
पास अमेरिका जाने की वजह से पूरी तरह से बच्चों की
जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ चुकी थी, एक बार तो ख़्याल आया कि
क्यों ना माँ के पास भेज दूँ, कुछ दिन बच्चें नाना-नानी
के साथ रहेंगे तो उन्हें भी अच्छा लगेगा, और बच्चे भी
खुश हो जाऐंगे।
"ऐसा करतीं हूँ कल ही
बच्चों को छोड़ आती हूँ, शनिवार हैं सो सबसे मिलना भी हो
जाएगा, और दो दिन रुककर बच्चों को छोड़कर इतवार शाम तक
वापिस आ जाऊँगी, वैसे भी दिल्ली से गाजियाबाद की
दूरी ही कितनी हैं।" आने-जाने की सारी प्लानिंग कर मैंने शाम को जब यह बात
अपने पति नीरज को बताई तो उन्हें भी मेरा आईडिया पसन्द आया।
"आप भी चलिए ना साथ
हमारे, आपसे मिलकर मम्मी-पापा बहुत ख़ुश हो जायेंगे।"
जैसे ही मैंने नीरज से कहा।
"बात तो तुम्हारी सही
हैं सुनीता, लेकिन मुझे कल ऑफिस जाना पड़ेगा, कोई ज़रूरी मीटिंग आ गयी हैं, कोई बात नहीं तुम
चली जाओ बच्चों को लेकर, मैं कभी बाद में जाकर मिल
लूँगा।" "ठीक हैं तो हम कल सुबह जल्दी ही निकल जायेंगे, आपका खाना बनाकर फ्रिज में रख दूँगी गरम करके खा लीजिएगा।" मेरी बात
सुनकर नीरज बिना कुछ कहे ही अपने कमरे में चले गए, यह
उनकी आदत हैं, जिसके लिए पहले मुझे बहुत बुरा लगता था, लेकिन अब मैं इसकी आदी हो गयी हूँ, मैं काम
ख़त्म कर अगले दिन जाने की तैयारी करने लगी।
अगले दिन,
"नमस्ते मम्मी कैसे
हो?" दरवाज़ा खुला देख मैंने घर के अन्दर जाते हुए पूछा,
"अरे सुनीता तू यहाँ, कैसे आना हुआ?"
"क्यों मम्मी अपने
यहाँ आने की भी कोई वजह होती हैं क्या?"
"अरे नहीं बेटा, वो तो मैंने यूँ ही पूछ लिया था।"
"बच्चों
के स्कूल की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं, तो सोचा क्यों ना इन्हे कुछ दिनों के लिए इनके ननिहाल में छोड़ दूँ, इनका भी तो नाना-नानी के प्यार पर हक़ हैं।"
"बिल्कुल
हैं, आओ बेटा नानी के
पास" मम्मी ने रिंकू और सनी को अपने पास बुलाते हुए कहा, "पापा नहीं दिखाई दे रहे कहीं बाहर गए हैं क्या?"
मेरे पूछते ही,
"हाँ वो पास ही सब्ज़ी
लेने गए हैं, अभी आ जाएंगे थोड़ी देर में, आ तू बैठ मैं कुछ खाने को बना देती हूँ।" जैसे ही मम्मी रसोई में
जाने के लिए उठी मैं भी उनके पीछे-पीछे हो ली।
"मम्मी घर इतना
खाली-खाली सा क्यों लग रहा हैं भैया-भाभी भी घर पर नहीं हैं क्या?"
"हाँ बेटा वो लोग
शिखा के मायके गए हैं, आज सुबह ही निकले थे, कल शाम तक वापिस आ जाएंगे, छुट्टियाँ थी तो
मैंने ही कहा की जाकर मिल आओ उन्हें भी अच्छा लगेंगा।"
"सो
तो हैं, मैंने भी नीरज से
कहा था साथ चलने के लिए लेकिन उनकी एक ज़रूरी मीटिंग आ जाने की वजह से वो साथ नहीं
आ पाए।"
"कोई
बात नहीं, अब बच्चों को जब
वापिस लेने आओ तब दोनों आ जाना।"
"हाँ
ये ठीक रहेगा, लेकिन इस बार मेरा
भाई- भाभी से मिलने का बहुत मन था।"
"कोई
बात नहीं अगली बार मिल लेना, इस बार अपनी माँ से मिल ले जब से शादी करके गयी हैं, तेरा तो यहाँ आना ही बंद हो गया हैं।"
"ऐसी
बात नहीं हैं मम्मी बस टाइम ही नहीं मिलता।"
"चल
बैठ गरमागरम पकौड़े बनाए हैं तेरे लिए खा ले, और बच्चो को भी बुला ले।" मम्मी के व्यवहार से
मातृत्व तो भरपूर महसूस हो रहा था, लेकिन वो कुछ परेशान
भी लग रहीं थी, सोचा पूछ लूँ क्या परेशानी हैं, लेकिन नहीं पूछ पायी।
"नाना जी आ गए, नाना जी आ गए" अचानक से रिंकू की आवाज़ सुन मैं भी बाहर की ओर दौड़ी, और पापा के गले से जा लगी।
"सुनीता, कैसी हैं बेटा?"
"मैं ठीक हूँ पापा, आप कैसे हैं?"
"बहुत अच्छा, क्यों देखने से लगता नहीं हूँ क्या?" पापा
ने हँसते हुए कहा, वैसे भी पापा का स्वभाव हमेशा से
मज़ाकिया ही रहा हैं, लेकिन पापा की आज की हँसी में मुझे
थोड़ा-सा दर्द भी महसूस हुआ, ना जाने क्यों ऐसा लग रहा
था कि मम्मी-पापा मुझसे कुछ छुपाने की कोशिश कर रहे हैं, जानने की काफी कोशिश की, लेकिन किसी ने कुछ
नहीं बताया, बातों ही बातों में पूरा दिन कैसे गुज़र गया
कुछ पता ही नहीं चला, अब काफी
रात हो चुकी थी, और मैं भी
सोने जाना चाहती थी, सो बच्चों को साथ लेकर सोने चली गयी, लेकिन आँखों में नींद दूर-दूर तक
नहीं थी, बस यही सोचती रही की ऐसी क्या बात हैं जिसे
मम्मी-पापा मुझसे छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।
रात के
लगभग एक बजे होंगे मुझे अचानक से पानी पीने की तलब लगी, और मैं
पानी लेने के लिए जाने लगी लेकिन फ्रिज तक जाने के लिए
मम्मी-पापा के कमरे से होते हुए गुज़रना पड़ता हैं, जैसे
ही मैं उनके कमरे के आगे से निकली कुछ बातों की आवाज़े आने लगी, पापा कह रहे थे कि, "तुमने कुछ सुनीता को बताया
तो नहीं ना?"
"नहीं, लेकिन मुझे लगता हैं उसे हमारे परेशान चेहरे देखकर शक ज़रूर हुआ है।“
"कोई
बात नहीं एक ही दिन की तो बात हैं सम्भाल लेंगे, वैसे भी वो आज शाम तक वापिस जा ही रही हैं।"
पापा ने कहा,
"लेकिन बच्चे वो तो
यही रहेंगे ना कुछ दिन और" मम्मी की आवाज़ में चिंता झलक रही थी,
"कोई बात नहीं बच्चे हैं नासमझ हैं।" मैं भी वहाँ से पानी
लेने के लिए फ्रिज की ओर चल पड़ी, लेकिन मन पूरी तरह से
अशांत हो चुका था, ज़रूर कोई बड़ी बात हैं, नहीं तो पापा-मम्मी आधी रात को इस तरह से बात नहीं कर रहे होते, दूसरी ओर मैं उनसे ज़बरदस्ती कुछ पूछना भी नहीं चाहती थी, दिमाग में अजीब सी कश्मकश चल रही थी, और दिल ये
सोचकर घबरा रहा था कि कहीं कोई बुरी ख़बर ना हो, फिर
एकाएक ही भाभी का ख्याल आया, सोचा भाभी को तो सबकुछ पता
ही होगा, सुबह होते ही उनसे बात करती हूँ।
"मम्मी पानी"
इतने में ही रिंकू उठकर बैठ गया और पानी माँगने लगा,
"हाँ बेटा देती हूँ
अभी"
"मम्मी
आप अभी सोये नहीं?"
"नहीं नींद नहीं आयी, तुम सो जाओ" रिंकू बिना कोई सवाल-जवाब किए तुरन्त दुबारा सो गया, और मैं बेसब्री से सुबह होने का इंतज़ार करने लगी।
अगले दिन सुबह,
"हैलो भाभी"
"हैलो सुनीता, कैसी हो?"
"भाभी मैं ठीक हूँ, अभी गाज़ियाबाद आई हुई हूँ।"
"अरे
हम लोग तो मेरठ आए हुए हैं, तुम अपने आने के
बारे में अगर पहले बता देती तो हम कभी बाद में यहाँ आ जाते।"
"नहीं
भाभी कोई बात नहीं, वैसे भाभी मुझे आपसे
कुछ पूछना था।"
"हाँ
पूछो ना"
"भाभी
घर पर कोई प्रॉब्लम चल रही हैं क्या?"
"प्रॉब्लम? नहीं तो, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?"
"मुझे पापा-मम्मी कुछ परेशान
से लगे, ऐसा लगा जैसे कि वो कुछ छुपाने की कोशिश कर रहे
हैं, मुझे लगा शायद आपको कुछ पता होगा।"
"नहीं
सुनीता तुम्हे शायद कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं।"
"नहीं
भाभी ऐसी कोई बात नहीं हैं।" और मैंने भाभी को रात को जो पापा-मम्मी की बीच
बातचीत हुई थी वो सब बता दी।
"सुनीता अब तो मुझे
भी फिक्र होने लगी हैं, सुनो ऐसा करते हैं हम अभी वापिस
आते हैं, फिर पता करते हैं कि ऐसी क्या बात हैं जिसे
पापा-मम्मी हमें बताना नहीं चाहते, लेकिन तुम घर पर
किसी को भी हमारें आने की ख़बर मत देना।"
"जी
भाभी"
"सुनीता
बेटा अभी उठी नहीं क्या?"
"आई मम्मी, भाभी मम्मी आवाज़ लगा रही हैं, मैं अब फ़ोन रखती
हूँ।" ऐसा कह मैं तुरन्त ही मम्मी की ओर दौड़ी की कहीं उन्हें शक ना हो जाए, नाश्ते के टाइम मम्मी-पापा का व्यवहार सही लग रहा था रहा था, और पापा तो बच्चों के साथ भी पहले जैसा ही लाड लड़ा रहे थे, मैं सोच में पड़ गयी कि यह सब क्या हैं, कल जो इतने परेशान नज़र आ रहे थे वो अचानक आज इतने सहज कैसे हो गए, या शायद कोई नाटक कर रहे हैं, यूँ तो शादी के
बाद से मेरा गाज़ियाबाद आना बहुत कम हो गया हैं, लेकिन
फ़ोन के द्वारा मैं हमेशा सम्पर्क में बनी रहती हूँ, यहाँ
की हर छोटी सी छोटी बात की मुझे जानकारी होती हैं, लेकिन
इन दो दिनों में मैंने घर का जो माहौल देखा वो इससे पहले ना तो कभी देखा और ना ही
कभी सुना।
"सुनीता क्या हुआ
बेटा, क्या सोच रही हैं?"
"नहीं, कुछ नहीं मम्मी"
"तो
फिर तेरे पापा कितनी देर से ब्रेड माँग रहे हैं देती क्यों नहीं"
"ओह
सॉरी पापा मैंने सुना नहीं" मैंने पापा को ब्रेड पकड़ाते हुए कहा, और खुद फिर से एक गहरी सोच में
चली गयी।
"सुनीता, बेटा आज ही जाना ज़रूरी हैं क्या? कुछ दिन और रुक जाती तो हमें भी अच्छा लगता।"
"नहीं
मम्मी आप तो जानती ही हैं ना कि ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलती, वैसे भी बच्चो को छोड़कर जा रही
हूँ ना आपके पास, मेरी कमी
पूरी कर देंगे।" मैंने हँसते हुए कहा,
"हाँ सो तो हैं, घर में बच्चों से रौनक रहती हैं।" मम्मी ने भी मेरी बात पर सहमति
जताते हुए कहा,
"मम्मी आपसे एक बात
पूछनी थी।"
"हाँ
पूछ" मम्मी ने मेरी ओर सवालिया नज़रों से देखते हुए कहा,
"मम्मी घर में कोई
परेशानी हैं क्या?"
"परेशानी, कैसी परेशानी, यह क्या कह रही हैं तू.....!"
मम्मी मेरी ओर आश्चर्य से देखने लगी, "मुझे ऐसा लग रहा
हैं की पापा और आप किसी बात को लेकर परेशान हो।"
"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं हैं, ज़रूर तुझे कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं।मम्मी ने मुझसे अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, लेकिन मैं इतना तो समझ ही गयी थी कि ज़रूर कोई बड़ी बात हैं, और परेशानी वाली भी, कोई बात नहीं भाई- भाभी आ
रहे हैं ना अब सब पता चल जाएगा, मैं फिर से सोच में डूब
गयी।
"अब क्या सोचने लगी?"
"नहीं कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं"
"तो
फिर मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देती।"
"क्या, कुछ पूछा आपने?"
"हाँ पूछा लेकिन इससे
पहले तू मुझे यह बता कि तू ये बार-बार कहाँ खो जाती हैं, कल से देख रही हूँ बेटा, कुछ बात हैं तो बताती क्यों नहीं।"
"नहीं
मम्मी ऐसी कोई बात नहीं हैं।" अब मम्मी को क्या बताऊँ कि मैं उनको लेकर ही
परेशान हो रही हूँ। “पापा, पापा कहाँ चले गये अचानक से?” मैंने अपने चारों ओर नज़रें
दौडाते हुए पूछा।
“ये ले अभी
तो तेरे सामने बच्चों के लिए मिठाई लेने गए थे, ध्यान कहाँ हैं तेरा बेटा?
“ओह माफ करना
मम्मी मैंने देखा नही, अच्छा मम्मी आपको याद
हैं बचपन में मैं और भैया कितनी बदमाशियाँ किया करते थे और आप हमसे परेशान हो जाया
करती थी।" मैंने बातों का रुख मोड़ते हुए कहा,
"हाँ सब याद हैं मुझे, अरे कैसे भूल सकती हूँ तुम्हारी शैतानियों को, यही
तो वो आँगन था जिसमे तुम दोनों बड़े हुए, लेकिन तुम्हारे
बच्चे वो तो अभी छोटे ही हैं।" कहते-कहते मम्मी भावुक हो गयी,
"हाँ तो क्या हुआ यह
भी इसी आँगन में खेलते-खेलते बड़े हो जायेंगे।" मेरे कहते ही मम्मी फूट-फूटकर
रोने लगी और उन्हें रोता हुआ देख मैं घबरा गयी।
"क्या हुआ मम्मी आप
रोने क्यों लगी, क्या हुआ बोलिए ना प्लीज, आप मुझसे अब कुछ भी मत छुपाइए।"
मैंने मम्मी को संभालते हुए कहा।
"सुनीता बेटा मुझे
माफ़ कर दे, मैंने बहुत कोशिश की कि यह बात तुम बच्चों
को नहीं बताऊँ लेकिन...." कहते-कहते मम्मी अचानक से चुप हो गयी।
"कौनसी बात?"
"वो तेरे चाचा"
"चाचा? क्या किया मम्मी चाचा ने, और आप लोग कब मिले चाचा से, उन लोगों द्वारा
आपके साथ इतना बुरा व्यवहार करने के बाद भी आप लोग उनसे मिले, क्यों मम्मी….!"
"पिछले हफ्ते की ही
बात हैं, तेरे पापा के पास तेरे चाचा का फ़ोन आया था, वो तेरे पापा से मिलना चाहते थे, उन्हें अपनी
गलतियों का अहसास था, माफ़ी माँगना चाहते थे, तू तो जानती हैं ना तेरे पापा कितनी जल्दी भावुक हो जाते हैं, इसलिए वो तेरे चाचा की बातों में आ गए, और मुझे
भी बिना बताये उनसे मिलने चले गए।" मम्मी की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
"फिर, फिर क्या हुआ, बताओ मम्मी?"
"तेरे
चाचा ने कागज़ो पर तेरे पापा के साइन करवा लिए"
"कैसे
कागज़ मम्मी, क्या लिखा था उन कागज़ों पर" मैं मम्मी के ऊपर बुरी तरह से चिल्लाने
लगी।
"उन पर लिखा था कि
तेरे पापा अपनी मर्ज़ी से अपनी सारी ज़मीन-जायदाद तेरे चाचा के नाम कर रहे हैं।"
"लेकिन
पापा ने उन कागज़ों पर साइन किए ही क्यों?" मेरा गुस्सा अब सातवें आसमान पर था।
"किये नहीं बल्कि
तेरे चाचा ने उनके सिर पर बंदूक रखकर ज़बरदस्ती करवाए।" इतना सुनते ही मानो
मेरे पैरों तले ज़मीन ख़िसक गयी,
"हे भगवान, और कितना गिरेगा यह आदमी" मेरे मुँह से मेरे ही चाचा के लिए गालियाँ
निकल रही थी। "लेकिन मम्मी इसमें गलती पापा की भी हैं, उन्होंने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि चाचा बदल सकते हैं, अरे जो आदमी कभी अपने माँ-बाप का सगा नहीं हो पाया वो अपने भाई का सगा
कैसे हो सकता हैं।"
"वो
सब तो ठीक हैं सुनीता, और तेरे पापा को
अपनी गलती का अहसास भी हैं, लेकिन अब आगे क्या, हमने तो यह बात अभी तक घर पर किसी को भी नहीं बताई हैं, और जब तेरे भाई को पता चलेगा तो वो क्या कहेगा, मुझे तो यह सोच-सोचकर घबराहट हो रही हैं।"
"मम्मी भाई और भाभी
अभी थोड़ी ही देर में आने वाले हैं।"
"क्या, लेकिन वो तो रात तक आने वाले थे
ना फिर जल्दी क्यों?"
"वो बात यूँ थी कि
मैंने ही भाभी को फ़ोन किया था" और मैंने मम्मी को भाभी से हुई सारी बात बता
दी।
"सत्यनाश, अब तो तेरे पापा मुझे जान से ही मार डालेंगे, उन्होंने
कहा था कि यह बात मैं तुममे से किसी को भी ना बताऊँ।"
"नहीं
बताने का क्या मतलब था, इतनी बड़ी बात आप
लोग हमसे क्योंछुपाना चाहते थे?" मैंने गुस्से में कहा,
"अरे नहीं बेटा वो
बात नहीं हैं, दरअसल तेरे पापा अपने किए पर बहुत ही
शर्मिंदा हैं, उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा हैं कि वो
तेरे चाचा की चिकनी-चुपड़ी बातों में कैसे आ गए, इसलिए
वो चाहते हैं कि बिना तुम लोगो को यह बात पता चले ही ख़त्म हो जाए, इसलिए वो पिछले दो दिनों से वकीलों के चक्कर काट रहे हैं।"
"यह मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं हैं मम्मी, प्रॉपर्टी के पेपर्स पर पापा के साइन हैं, चाचा के पास सबूत हैं कि पापा ने अपनी मर्ज़ी से अपनी सारी प्रॉपर्टी उनके नाम की हैं।"
"तो फिर अब क्या होगा बेटा?"
"पता नहीं, मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा हैं, सच
मम्मी चाचा ने बहुत गन्दी चाल चली हैं हमारे साथ, भगवान
उनको इसकी सज़ा ज़रूर देगा।" कहते-कहते मैं भावुक हो गयी, "ऐसा बोलकर तू क्यों अपनी ज़ुबान ख़राब करती हैं, जिसकी
जैसी करनी वैसी भरनी"
"मामा आ गए, मामा आ गए" अचानक से रिंकू और सनी की आवाज़
सुन मम्मी और मैंने खुद को संभाला।
"क्या हुआ सब ठीक तो
हैं ना मम्मी जी, मुझे
सुनीता ने बताया कि" कहते-कहते भाभी अचानक से रुक गयी,
"मेरी बात हो गयी हैं
भाभी, मम्मी से, और मैंने जो
आपको फ़ोन किया था उसके बारे में भी इनको पता हैं।"
"लेकिन
हुआ क्या हैं, कोई मुझे भी बताएगा, पूरे रास्ते शिखा से पूछता रहा, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया।"
"भैया
दरअसल बात यह हैं कि..... " और
मैंने उन्हें सारी बात विस्तारपूर्वक बता दी।“
"हे भगवान, इतना सबकुछ हो गया और मम्मी जी आपने हमें कुछ पता नहीं लगने दिया, यह तो सुनीता आ गयी नहीं तो हमें कुछ पता ही नहीं चलता।"
"नहीं
शिखा ऐसी कोई बात नहीं हैं, यह बात तुम लोगो को
कभी ना कभी तो बतानी ही थी बस हिम्मत ही नहीं हो रही थी, वैसे भी एक बात और हैं जो मैंने अभी तक तुम लोगों को नहीं बताई हैं।"
"अब
क्या बात हैं मम्मी, अब क्या कर दिया
चाचा ने" मेरे पूछते ही,
"सुनीता, समर, शिखा बेटा हमें माफ़ कर देना हमें एक महीनें के अन्दर-अन्दर यह घर खाली
करना होगा।"
"क्या, यह.... यह क्या बोल रहीं हैं मम्मी जी आप.....!" भाभी ने जैसे ही रुआँसे होते
हुए कहा, "कहीं भी नहीं जाना हैं किसी को, अब यह घर हमें नहीं छोड़ना पड़ेगा।" यह आवाज़ पापा की थी, उन्हें देख मैं और भाई पापा की ओर दौडे।
"क्या हुआ पापा तैयार हुआ कोई वकील हमारा केस लड़ने के लिए?" भाई के पूछते ही,
"नहीं, बल्कि केशव ने सारी
प्रॉपर्टी मेरे नाम वापिस कर दी हैं।"
"यह
क्या कह रहे हैं आप, अभी कुछ दिन पहले
ही तो, और आज अचानक, कुछ
साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताते आप" मम्मी के कहते ही,
"हाँ पापा जल्दी
बताइए हुआ क्या हैं।" अब भाई के भी सब्र बाँध टूटने लगा था,
"बधाई हो सुजाता जी, आपकी बद्दुआ रंग लायी"
"यह
कैसी बातें कर रहें हैं आप, मैं कुछ समझी नहीं"
"केशव
को ब्रेन-टूमर हुआ हैं, लास्ट स्टेज, उसे लगता हैं कि यह उसके बुरे
कर्मो की सजा हैं, इसलिए उसने बुलाकर......" और
कहते-कहते पापा अचानक से चुप हो गए, घर में एक अजीब सी
चुप्पी छा गयी थी, लेकिन बच्चों के खेलने का शोर बरकरार
था।
"चलिए, हमें अभी नीता के पास चलना चाहिए, मैं जानती हूँ उसे, उस बेचारी का तो रो-रोकर
बुरा हाल हो रहा होगा।" मम्मी के कहते ही,
"दिमाग ख़राब हो गया
हैं क्या आप दोनों का, क्या ज़रुरत है वहाँ जाने की, अरे सही तो हैं अपनी कर्मो की सजा भुगत रहें हैं वो, तो भुगतने दीजिए ना"
"चुपकर, ख़बरदार सुनीता जो अब एक भी शब्द
अपने मुँह से निकाला, देवर जी मेरे बेटे जैसे हैं, और मैं उन्हें इस हाल में
नहीं छोड़ सकती, चलिए जी जल्दी चलिए" मम्मी ने मुझे
बुरी तरह से डाँटते हुए कहा, और पापा को लेकर वहाँ से
रवाना हो गयी, और हम तीनों उन्हें जाते हुए देखते ही
रहे, लेकिन अब मुझे यकीन हो चुका था कि रिश्तों के बीच कितनी ही दरार क्यों ना आ जाए, उनके बीच
कितनी ही कहा-सुनी क्यों ना हो जाए, काम वो ही आते हैं एक-दूसरे के, और ना ही कभी
ख़त्म होती हैं महक रिश्तों की।
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