Toh Fir Surakshit Kaun Hai ?/ तो फिर सुरक्षित कौन है ? (Story On Saxual Harassment)

    “मम्मी, मुझे घर पर अकेले नहीं रहना है, आप मुझे अपने साथ ऑफिस ले चलो ना” 10 वर्षीय अथर्व जो कि क्लास 4th में अध्यनरत है, ने अपनी मम्मी शुचि से कहा।

    लंबा कद, तीखे नैन-नक्श, कँधे तक कटे बाल, गोरे रंग की स्वामिनी शुचि, मुंबई स्थित एक आई. टी. कंपनी में कार्यरत है।

    “क्यों?”

    “मुझे अच्छा नहीं लगता।”

    “क्या अच्छा नहीं लगता बेटा, आप घर पर रहकर पढ़ाई कर लेना, थोड़ी देर भास्कर भैया के साथ खेल लेना, टी.वी. देख लेना, विडिओ गेम खेल लेना, आराम कर लेना, बेटा जी आपके पास तो पूरा दिन करने के लिए बहुत सारे विकल्प है, और अगर आप मम्मी के साथ चले तो पूरा वक्त एक ही जगह बैठे रहना पड़ेगा, बोलो क्या कहते हो?” शुचि के पूछते ही,

    “कोई बात नहीं, मुझे फिर भी आपके साथ जाना है।”

   “अथर्व, ये कैसी जिद हुई बेटा, ऐसे तो आपके स्कूल में हर शनिवार छुट्टी रहेगी, और मेरा ऑफिस, तो क्या आप हर शनिवार मेरे साथ ऑफिस चलोगे?” शुचि के पूछते ही,

     “हाँ चलूँगा, लेकिन घर पर नहीं रहूँगा।” और इतना कह अथर्व शुचि के गले जा लगा।

     “अथर्व, क्या हुआ बेटा, सब ठीक है ना, आजकल आप मम्मी से ही चिपके रहते हो।”

      “मम्मी मुझे घर पर अकेला मत छोड़ा करो, प्लीज”

    “ओके, ओके मेरा बच्चा, चल तू तैयार हो जा, ले चलती हूँ तुझे ऑफिस।” और फिर कुछ ही देर में शुचि, अथर्व को ले ऑफिस के लिए रवाना हो गयी।

 

    शाम को, “सौरभ, तुम तो पिछले दो दिनों से शहर से बाहर गए हुए थे, लेकिन जानते हो आज सुबह घर पर कुछ अजीब हुआ।” शुचि ने थोड़ा साँवला, लंबे कद, और पतले-दुबले शरीर वाले अपने पति सौरभ से कहा।

     “हुआ यूँ कि......” और फिर शुचि ने अथर्व वाली पूरी बात कह ड़ाली।

    “तुम्हें क्या लगता है?” सौरभ ने पूछा।

    “पता नहीं, अथर्व की टीचर भी कह रह रही थी, कि वो पिछले कुछ महीनों से चुप-चुप रहता है, बच्चों के साथ ज्यादा खेलता भी नहीं है।” शुचि द्वारा बताते ही,

    “कहीं, भास्कर तो परेशान नहीं करता उसे, मेरा मतलब है डाँटना या हाथ उठाना”

    “अरे नहीं, नहीं, वो बहुत अच्छा है, मुझे नहीं लगता कि भास्कर से अथर्व को कोई शिकायत होगी।”

    “ठीक है तो फिर कुछ दिन और देखते हैं, फिर बात करेंगे, हो सकता है हम कुछ ज्यादा ही सोच रहे हो।”

    सौरभ, और शुचि दोनों ने एक ही कॉलेज से बी-टेक किया था, और कॉलेज टाइम से ही दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे, इसलिए 12 वर्ष पूर्व पढ़ाई खत्म होने के बाद दोनों के ही परिवारवालों की रजामंदी से इनकी शादी करवा दी गयी, और फिर शादी के दो साल बाद अथर्व का जन्म हुआ. जहाँ सौरभ एक आई. टी. कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है, वही दूसरी ओर शुचि भी एक अन्य कंपनी में कार्यरत है,

 

    तकरीबन एक महीने बाद, सौरभ, तुम आज ऑफिस से छुट्टी ले सकते हो क्या, दरअसल, अथर्व के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर मीटिंग है।” आईने के सामने खड़ी हो ऑफिस के लिए तैयार होती शुचि ने कहा।

    “शुचि, पॉसिबल नहीं है, आज ऑफिस मैं एक जरूरी मीटिंग है।”

    “ओह गॉड, कोई बात नहीं, मैं ही कुछ करती हूँ।"

    “स्कूल प्रिन्सपल से बात करके देखो, जरूरी ना हो तो मत जाओ मीटिंग में” सौरभ ने सुझाव दिया।

    “ऐसा नहीं होता, सौरभ, जाना जरूरी है, और वैसे भी आज मिड टर्म्स के रिजल्ट्स आने वाले हैं।”

    “तो फिर तुम्हें ही जाना पड़ेगा, क्योंकि आज की मीटिंग इतनी इम्पॉर्टन्ट है कि मैं बॉस से छुट्टी के लिए भी नहीं पूछ सकता।”

    “ओके, कोई बात नहीं, मैं कुछ मैनेज करती हूँ।”

    “ठीक है, तो फिर मैं निकलता हूँ ऑफिस के लिए।” इतना कह सौरभ ऑफिस के लिए निकल गया, और फिर कुछ देर बाद ऑफिस में फोन कर ये कह कि घर पर कोई जरूरी काम है, शुचि भी अपने बेटे अथर्व को साथ ले उसके स्कूल की ओर पेरेंट्स-टीचर मीटिंग के लिए निकल गयी।

 

    शाम को डिनर पर, “क्या हुआ आज पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में?” सौरभ ने शुचि से पूछा।

    “कुछ नहीं, हमेशा की तरह हमारे बेटे की तारीफ़ों के पुल बाँधे टीचर ने, शांत स्वभाव है, पढ़ाई में होशियार है, पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता है, पूरी क्लास के लिए एक मिसाल है, वगैराह-वगैराह।” शुचि के कहते ही,

    “मेरा अच्छा बेटा है ये, अच्छा लगता है जब दूसरे इसकी तारीफ करते हैं......।” इतना कह सौरभ ने पास बैठे अथर्व को उसकी ओर झुक प्यार से चूम लिया।

 

    खाना खाने के कुछ देर बाद,  “सौरभ, तुमसे एक बात करनी है।” शुचि ने चिंतित स्वर में कहा।

    “क्या हुआ कोई टेंशन है?” सौरभ ने पूछा

    “हाँ भी, और नहीं भी”

    “मैं कुछ समझा नहीं”

    “मुझे अथर्व की चिंता रहती है।” शुचि के कहते ही,

    “मतलब?”

    “सौरभ, तुम तो जानते हो, अपना अथर्व अंतर्मुखी है, वो खुद की समस्या किसी को भी नहीं बताता, हमें भी नहीं, अक्सर चुप-चुप रहता है, मुझे डर है कि उसके जीवन में कोई बड़ी समस्या आयी है, और वो उसके साथ स्ट्रगल कर रहा है, और हमें कुछ नहीं बता रहा।” शुचि द्वारा बात पूरी करते ही,

    “हे भगवान, कितना सोचती हो तुम, गजब हो यार, चिंता मत करो, ऐसा कुछ नहीं है, सकारात्मक रहो, सब अच्छा ही है।”

    “नहीं वो आज अथर्व की टीचर भी मुझे इसको प्रति थोड़ी चिंतित लगी,......वो ये सब मैंने तुम्हें अथर्व के सामने बताना उचित नहीं समझा।”

    “शुचि, आजकल की पढ़ाई भी देखो कितनी मुश्किल हो गयी है, आए दिन के प्रोजेक्ट, और ना जाने क्या-क्या, हो सकता है इन्ही सब बातों का टेंशन हो, और अपनी समस्यायें हमें नहीं बता कर खुद ही उनसे जूझता रहता हो, और ये सब उसके व्यवहार से झलकता हो, इसलिए बिल्कुल चिंता मत करो, उसे अपनी परेशानियों के साथ जूझने दो, तभी ज़िंदगी में आगे जाकर एक सफ़ल इंसान बनेगा, हर कदम पर हम उसकी मुश्किलें आसान करते रहे तो, कभी भी एक काबिल इंसान नहीं बन पाएगा।” सौरभ ने शुचि को समझाते हुए कहा।  

    “बात तो तुम्हारी सही है, दरअसल गलती हम पेरेंट्स की है, बच्चों के चेहरे पर जरा-सी परेशानी देखी नहीं, घबरा जाते हैं, वाकई में उन्हे ज़िंदगी में स्ट्रगल करना भी आना चाहिए, लेकिन, क्या करूँ माँ हूँ ना, इसलिए चिंता रहती है।”


    लेकिन दो दिन बाद, “मम्मी...मम्मी...” शुचि जैसे ही ऑफिस से लौटी, अथर्व उसकी ओर रोता हुआ आया, और उससे लिपट गया।

     "क्या हुआ अथर्व, बेटा आप रो क्यों रहे हो?" 

     “भास्कर भैया...”

     "क्या हुआ भास्कर को?" शुचि के स्वर में घबराहट झलक रही थी. 

     “मैंने उन्हे मारा” अथर्व के कहते ही,

     “मारा ! मतलब”

    “मम्मी, आज मैंने भास्कर भैया के पेट में कैंची घुसा दी, खून भी निकल रहा है।” अथर्व का इतना कहना था कि शुचि भास्कर के कमरे की ओर दौड़ी, जहाँ भास्कर बेसुध पड़ा कराह रहा था।

    “भास्कर, भास्कर, हे भगवान ये क्या हुआ।“ और फिर शुचि तुरंत एम्बुलेंस बुलाने के लिए कॉल करने लगी।

     थोड़ी देर बाद भास्कर अस्पताल के ईमर्जन्सी वार्ड में था, जहाँ उसका इलाज चल रहा था, चोट ज्यादा गहरी नहीं होने की वजह से डॉक्टर ने शीघ्र ठीक होने का आश्वासन दिया। 

 

    दूसरी ओर पुलिस स्टेशन में, “मि. सौरभ, क्या रिश्ता है आप लोगों का भास्कर के साथ?”

    “जी वो हमारे घर का नौकर है, दरअसल दो साल पहले वो गाँव से काम की तलाश में आया था, तो हमने उसे अथर्व की देखभाल के लिए रख लिया।”

   “हम्म, जिसकी देखभाल के लिए रखा उसने ही कांड कर दिया.........अथर्व बेटा, आपने भास्कर भैया को कैंची से क्यों मारा?” इन्स्पेक्टर शिंदे द्वारा अथर्व से पूछते ही,

    “क्योंकि वो मुझे परेशान करते थे।”

    “क्या करते थे?”

    “वो मेरी निकर में हाथ डालते थे, जिससे मुझे असहज महसूस होता था, अगर नहीं डलवाता था, तो मारते थे, तो कल मैंने भी उनको मारा।” अथर्व का इतना ही कहना था कि वहाँ बैठे शुचि, और सौरभ के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।

    “अथर्व, बेटा ये बात आपने हमें पहले क्यों नहीं बताई” इतना पूछते ही शुचि रोने लगी।

    “क्योंकि आप दोनों को भास्कर भैया बहुत अच्छे लगते है, मुझे लगा कि अगर मैंने उनकी शिकायत की तो शायद आप लोग मेरा विश्वास ना करो, और कभी बताने की कोशिश की भी तो आपने सुना नहीं, क्योंकि आप दोनों के पास टाइम नहीं था, ये कहकर वापिस भेज दिया कि जो कहना है भास्कर भैया से जाकर कहो, और मैं उनकी शिकायत उनसे ही कैसे कहता?” अपनी बात पूरी कर अथर्व गर्दन नीची कर अपने जूते घूरने लगा, और शुचि, एवं सौरभ निरुतर बैठे पश्चताप की आग में जल रहे थे, शायद पहली बार पुलिस-स्टेशन में इतना सन्नाटा छाया था।

    कुछ हफ्तों बाद भास्कर के अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही पुलिस द्वारा उसे गिरफ्तार कर लिया गया, दूसरी ओर अब शुचि ने कंपनी में रीक्वेस्ट कर वर्क फ्रॉम होम की सुविधा ले ली है, जिससे कि वो घर पर रहकर अथर्व की बेहतर देखभाल कर सके, और उसके साथ वक्त गुजार सके।

    लेकिन इस घटना के बाद से सौरभ, और शुचि दोनों के ही ज़ेहन में एक सवाल निरतनर आता है, कि हमारा समाज, देश-दुनिया, हमेशा लड़कियों की सुरक्षा की बात करता है, अरे यहाँ तो लड़के भी सुरक्षित नहीं है, तो फिर सुरक्षित कौन है ?

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