Article - Achha Waktaa Ewn Achha shroata / अच्छा वक्ता एवं अच्छा श्रोता

       अक्सर ऐसी परिस्थित होती है कि दो लोग आपस में बात कर रहे होते हैं, एक होता है वक्ता, और दूसरा श्रोता, जितना किसी वक्ता को वाकपटुता में निपुण होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर एक श्रोता को सुनने की कला में माहिर होना चाहिए, जिसमे एक श्रोता का धैर्यवान होना अतिआवश्यक है, क्योंकि सामने वाला क्या कह रहा है, उसकी पूरी बात सुनने का धैर्य होना बहुत जरूरी है, बीच में ही आपा खो वक्ता की बात को बीच में काट देना, या फिर वहाँ से उठकर चले जाना शालीनता की निशानी नहीं मानी जा सकती।

     उसी प्रकार दूसरी ओर वक्ता का भी कर्तव्य होता है, समय की कीमत को समझते हुए जितनी जरूरी हो उतनी ही बात श्रोता से कहे, साथ ही बात को इस प्रकार से रखे कि आवश्यक बात ही श्रोता के समक्ष आए, एवं ये ध्यान रखना भी जरूरी है कि वो किससे अपनी बात कह रहा है, सामने कौन व्यक्ति है इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि आपको कौनसी बात कितनी कहनी है, और कितनी नहीं, क्योंकि हर किसी को आपकी ज़िंदगी में घट रही, या घट चुकी घटनाओं को सुनने में रुचि नहीं होती    

       अच्छा श्रोता, एवं अच्छा वक्ता विषय पर आर्टिकल लिखने का ख्याल मुझे मेरे जीवन में पिछले कुछ महीनों से घट रही एक घटना से आया, तीन साल पहले मेरे पति का तबादला मुंबई शहर हुआ था, नवी मुंबई में ही ऑफिस होने की वजह से हमने वाशी इलाके में स्थित, एक अपार्टमेंट में, किराए पर फ्लैट लेना तय किया। फ्लैट में शिफ्ट होने के बाद, मैंने आस-पास के फ्लैट्स में रहने वाले लोगों से मेलजोल बढ़ाने के बारे में सोचा, लेकिन यहाँ के लोगों की दिनचर्या इस हद तक व्यस्त है कि, किसी के भी पास एक-दूसरे के घर जाने का वक्त ही नहीं। लेकिन यहाँ प्रतिदिन सुबह, एवं शाम को फ्लैट्स में  रहने वाले लोग सोसाइटी कम्पाउन्ड में वॉक करते हैं, और वही एक-दूसरे से बात कर लेते हैं।

      इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं भी रोजाना शाम को वॉक के लिए नीचे उतरने लगी, शुरुआती कुछ दिनों तक तो मैं अकेली ही वॉक करती रही, लेकिन फिर धीरे-धीरे मेरी पहचान उन महिलाओं से होने लगी, जो कि शाम को वॉक करती हैं, उनमे से एक महिला अरुंधती (काल्पनिक नाम) से  मेरी कुछ अच्छी दोस्ती हो गयी, अब हम दोनों साथ ही वॉक करते, हमारे वॉक की अवधि तकरीबन 40 से 45 मिनिट की होती, पहले तो मैनें इस बारे में सोचा नहीं कि इतनी सारी महिलाओं में से हम दोनों की ही अच्छी क्यों पटती है, फिर धीरे-धीरे एहसास हुआ कि वो एक अच्छी वक्ता है, एवं मैं श्रोता, यही एकमात्र कारण है हमारी दोस्ती का।

          यूँ तो पिछले दो सालों से हम दोनों साथ वॉक कर रहे हैं, लेकिन एक अच्छे श्रोता, एवं वक्ता वाली बात मेरे ज़ेहन में पिछले कुछ दिनों में ही आयी, या फिर ये कह लीजिए कि इस ओर मैंने कुछ ज्यादा ही गंभीरता से सोचा। किस्सा कुछ यूँ है कि जब भी हम वॉक करते  तो उस दौरान ढेरों बातें होती, लेकिन बोलती केवल अरुंधती है,  मैं तो केवल सुनती हूँ, जी हाँ, अरुंधती ना ही एक अच्छी वक्ता है, और ना ही एक अच्छी श्रोता, वक्ता इसलिए अच्छी नहीं है, क्योंकि जैसे ही वॉक शुरू होती है अरुंधती बिना किसी माप-तोल के अपना कोई किस्सा सुनाने लगती है, कभी परिवार से संबंधित, कभी पिछले ज़िंदगी से, कभी बच्चों से, तो कभी-कभी वो अपनी सास, एवं पति की इतनी बुराई करती कि 45 मिनिट भी कम पड़ जाते, लेकिन इस दौरान मेरा केवल एक ही रोल होता है कि, कुछ-कुछ देर में हम्म, सही बात है, अरे ये तो गलत बात है, ओह, अच्छा आदि कहना, जिससे कि उसको ये लगे कि मैं उसकी बातें बड़ी ही तन्मयता से सुन रही हूँ, और वाकई में उसका कहा एक-एक वाक्य मेरे मानस पटल में अंकित हो जाता है, ये अलग बात है कि मेरा उन बातों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता। 

        लेकिन इसके विपरीत वो एक बुरी श्रोता है, इस बात का एहसास मुझे उस वक्त हुआ, जब मैं अपनी कोई बात अरुंधती के सामने रखना चाहती तो वो, मेरी बात बीच में काट मेरी ही बात से संबंधित अपना कोई किस्सा सुनाने लगती, और मुझे मजबूरन अपनी बात भूल उसकी बात सुननी पड़ती, या फिर ये कहती कि हाँ-हाँ मैं समझ गयी, कि ये हुआ होगा, या फिर वो हुआ होगा, वो खुद के ही मन से अटकले लगा मेरी बात को पूरा करने की कोशिश करती, पता नहीं क्यों वो जब तक अपनी बात कहती तो सामान्य रहती, और जैसे ही मैं कुछ कहने लगती तो बैचेन हो जाती। यूँ तो मुझे उससे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं थी, फिर भी इस दौरान मुझे ये एहसास हुआ कि व्यक्ति का एक अच्छा वक्ता होने के साथ-साथ एक अच्छा श्रोता होना भी जरूरी है।

        निष्कर्ष- जिस प्रकार से कोई भी बात एक सीमा में ही अच्छी लगती है, चाहे वो खानपान हो, घूमना-फिरना हो, या फिर कुछ और हो, उसी प्रकार बोलना, एवं सुनना भी एक सीमा में ही अच्छा लगता है, नहीं तो सामने वाले व्यक्ति के ज़ेहन में आपकी छवि कुछ ज्यादा अच्छी नहीं बनेगी, और साथ ही अगर आप एक अच्छे वक्ता हैं, तो जरूरी है कि आप एक श्रोता भी बने, इसके लिए ये सोचे कि अगर कोई आपकी कही बात सुनने में आनाकानी करे तो आपको कैसा लगेगा।    

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