Bin Kuch Kahe (Story On Friendship)


दिल का हर राज़ बताया हैं मैने तुझे ऐ मेरे दोस्त

लेकिन बिन कुछ कहे तुम क्यों हो गए ख़ामोश

 

आज पूरे पाँच साल बाद मैं डॉक्टर बनकर शहर से वापिस अपने गाँव लौट रहा हूँमन में ख़ुशी हैं कि मैने गाँव की भलाई के लिए कुछ किया हैं, क्यों कि अपने गाँव से मैं ही पहला डॉक्टर बना हूँ, पापा को तो आज मुझ पर गर्व होगा, वो तो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे होंगे, माँ ने भी तो मेरे स्वागत में तरह-तरह के पकवान बनाए होंगे आज घर पर, और मेरे दोस्त वो भी तो खुश होंगे मेरे आने की ख़ुशी में, वैसे तो इन पाँच सालों के दौरान ना जाने कितनी ही बार घर पर और दोस्तों से मेरी फ़ोन पर बात हुई, फिर भी आज सबसे मिलने की उत्सुकता शायद शब्दों में बयां ना कर पाऊँ।

यह सब सोचते-सोचते अचानक से रिक्शा राशि के घर के सामने से गुज़रा, तो एकाएक ही उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम गया, राशि मेरी बचपन की दोस्त हैं और मेरी राज़दार भी, राज़दार इसलिए क्यों कि मैं उसके साथ अपने मन की हर बात बाँटता था, बहुत बातें करते थे हम दोनों, शहर जाने के बाद एक वो ही तो थी जिसको मैने सबसे ज्यादा याद किया था, शुरुआती दिनों में तो हम दोनों तक़रीबन रोज़ाना ही फ़ोन पर बात करते, लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला कम होता गया, क्यों कि कुछ तो मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया और कुछ वो भी अपनी आगे की पढ़ाई में व्यस्त हो गई, फिर अचानक से ना जाने क्यों हमारी बात होनी बिल्कुल ही बंद हो गयी, उसके घर पर कई बार फ़ोन भी किया, लेकिन उससे कभी बात नहीं हो पाई। कही उसकी शादी तो नहीं हो गयी, अचानक से यह विचार मन में आया लेकिन ऐसा हुआ होता तो माँ ज़रुर बताती, और शादी भी हुई तो क्या बात तो की जा सकती हैं, आज ही मिलने जाऊँगा उससे और जमकर ख़बर लूँगा  उसकी, समझती क्या हैं वो अपनेआप को।

"भैया जी आपका घर आ गया" रिक्शावाले की आवाज़ सुन मैं चौंक गया।

"हाँ ठीक हैं कितने पैसे हुए?"

"चालीस रुपए" मैं रिक्शेवाले के हाथ में पैसे थमा घर की ओर दौड़ा तो देखा दरवाज़े पर माँ हाथ में पूजा का थाल लिए खड़ी हैं , मैं भागकर माँ से जा लिपटा, वहाँ खड़े हर सदस्य के चेहरे पर ख़ुशी हैं , पिताजी, दादी, मेरी बहन सभी तो हैं  वहाँ पर, यहाँ तक की माँ ने मेरे सभी दोस्तों को भी बुला लिया हैं, कई तो आस-पड़ोस की महिलाएँ  भी आयी हुई हैं। माँ भी बढ़-चढ़ कर सबसे मेरी तारीफ़ कर रही हैं, और पिताजी वो तो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे, आखिर सब ख़ुश क्यों ना हो मैं गाँव का पहला डॉक्टर जो बना हूँ, लेकिन यह सब कुछ भी मुझे अधूरा-अधूरा सा लग रहा हैं, क्यों कि वहाँ मेरी दोस्त राशि जो नहीं हैं।

"माँ राशि को नहीं बुलाया आपने?"

"देख तेरे सारे दोस्त तेरा इंतज़ार कर रहे हैं, जा बात कर उनसे" ऐसा लगा जैसे कि माँ मुझे टालने की कोशिश कर रही हैं, मैने दोस्तों से भी राशि के बारे में पता करने की कोशिश की लेकिन कहीं से भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला, किसी ने कहा उसकी शादी हो गयी, तो किसी ने शहर छोड़ने की बात कही, एक ही तरह का जवाब किसी का नहीं हैं, जो कि मुझे चिंतित करने के लिए काफ़ी हैं।

रात को, "माँ सो गयी क्या?" मैने माँ को उनके कमरे के बाहर से पुकारा,

"नहीं गोपाल तू अन्दर आजा, क्या हुआ नींद नहीं आ रही हैं या फिर अपने कॉलेज के दोस्तों की याद सता रही हैं?" माँ ने मेरे बालों पर हाथ फेरते हुए पूछा,

"माँ मुझे आपसे कुछ बात करनी हैं।" पिताजी जाग ना जाए इस डर से माँ मुझे इशारा कर कमरे से बाहर ले गई,

"हाँ बोल, क्या कहना हैं?"

"माँ राशि कहाँ हैं?"

"तू यह पूछने आया हैं, बेटा तू थका हुआ हैं अभी जाकर सो जा कल बात करते हैं।"

"नहीं माँ मुझे अभी जानना हैं।" मैने जैसे ज़िद सी पकड़ ली थी,

"गोपाल राशि और उसका परिवार मुंबई में जाकर बस गए हैं।"

"मुंबई.....!, लेकिन वहाँ क्यों, और राशि ने तो इस बारे में कुछ बताया ही नहीं।"

"पता नहीं बेटा, उन्होंने हमे भी कुछ नहीं बताया सब कुछ अचानक ही हुआ, जाने से पहले किसी से मिलकर भी नहीं गए।"

"माँ ज़रुर कोई बहुत बड़ी बात हुई हैं, नहीं तो राशि और उसके परिवार वाले ऐसे नहीं हैं।" "बेटा तू क्यों अपना दिमाग ख़राब करता हैं, थका हुआ है जाकर आराम कर" ऐसा कह माँ अपने कमरे की ओर चली गयी, लेकिन मेरी आँखों में नींद नहीं थी, मैं रात भर राशि के बारे में ही सोचता रहा।

सुबह नाश्ते की टेबल पर, "गोपाल क्या सोचा हैं तुमने अब क्या करने का इरादा हैं?"

"पिताजी गाँव में ही एक अस्पताल खोलना चाहता हूँ, आप तो जानते ही हैं कि हमारे गाँव में कोई भी अस्पताल नहीं हैं।"

"लेकिन यह सब कुछ होगा कैसे और इसके लिए तो बहुत पैसा लगेगा।"

"हाँ इसके लिए मैं बैंक से क़र्ज़ लूँगा, लेकिन उससे भी पहले पास के गाँव में जो अस्पताल हैं वहाँ कुछ महीने काम सीखूँगा।"

"बहुत ही अच्छा विचार हैं मेरे पोते का, इतने सालों से शहर में था फिर भी वहाँ की हवा इसे छू नहीं पाई।"

"हाँ दादी आखिर पोता किसका हूँ।" मैने भी दादी की बात पर सहमति जताई।

"लेकिन इसके लिए तुम्हे आज ही दूसरे गाँव जाकर बात करनी होगी।"

"जी पिताजी, आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए" मैने उन्हें आश्वासन दिया।

अस्पताल पहुँचकर, "नमस्ते जी, मेरा नाम गोपाल हैं, डॉ-गोपाल, पास ही के गाँव से आया हूँ।"

"नमस्ते आइए बैठिए" वहाँ मौज़ूद एक महिला चिकित्सक ने मेरा स्वागत किया,

"जी मैं हाल ही में शहर से डॉक्टर की पढ़ाई पूरी करके आया हूँ और अपने गाँव में एक अस्पताल खोलना चाहता हूँ, यह है मेरी सारी डिग्रियाँ" मैने अपनी डिग्री की फाइल खोल कर रख दी।

"विचार तो आपका बहुत ही उम्दा हैं, लेकिन इसमें मैं क्या आपकी मदद कर सकती हूँ?"

"जी मैं अस्पताल खोलने से पहले कुछ महीने आपके साथ काम कर कुछ सीखना चाहता हूँ, अगर आपकी इज़ाज़त हो तो"

"जी बिल्कुल इज़ाज़त हैं, मुझे ख़ुशी हैं कि इस दुनिया में आप जैसे लोग भी हैं जो शहर जाने के बाद अपने गाँव को भूले नहीं हैं, बल्कि उसके लिए कुछ करना चाहते हैं, मेरे से जितना हो सकेगा काम सिखने में आपकी मदद करुँगी।" डॉक्टर साहिबा की बात सुन मुझे तसल्ली हुई और अगले दिन आने का बोल मैं वापिस चला आया।

सब कुछ अच्छा ही हो रहा हैं, फिर भी ना जाने क्यों मन के एक कोने में बेचैनी सी हैं , बार-बार राशि का चेहरा सामने आ जाता, मन मानने को तैयार ही नहीं हैं उसे जो कुछ भी माँ ने उस रात को कहा, लेकिन वो ज़वाब तो किसी से भी नहीं मिल पा रहा हैं जिसे सुन कर मुझे संतुष्टि हो पाती, ना चाहते हुए भी मैं सब कुछ भूला एक नई ज़िन्दगी की शुरुआत करना चाहता हूँ, इसी सोच के साथ मैं सभी बड़ो का आर्शीवाद ले अगले दिन अस्पताल काम सिखने के लिए निकल पड़ा।

अस्पताल में सब कुछ अच्छा ही हैं, डॉक्टर साहिबा भी मेरे काम से संतुष्ट हैं, "गोपाल मुझे तो अब तुमसे डर लगने लगा हैं, कही ऐसा न हो तुम्हारा अस्पताल खुलने के बाद मेरा काम बंद हो जाए।"

"ऐसा कुछ नहीं होगा क्यों कि तज़ुर्बा तो आप ही के पास ज्यादा हैं ना"

"हाँ भई मेरे तज़ुर्बे के सहारे ही मेरा अस्पताल चल जाए तो ठीक हैं नहीं तो तुम्हारी क़ाबलियत इसे चलने नहीं देगी।" और हम दोनों ही ठहाका लगा कर हँस पड़े, इसी प्रकार काम सीखते हुए अब मुझे पूरे छ; महीने हो चुके हैं, अब तो मैने अस्पताल के क़र्ज़ के लिए भी बैंक में अर्ज़ी दे दी हैं, उम्मीद हैं जल्द ही काम शुरु हो जाएगा

एक दिन किसी काम से डॉक्टर साहिबा को बाहर जाना पड़ा और उस दिन उनके कैबिन में कुछ पुरानी फाइल देखते हुए एक फाइल मेरे हाथ लगी जिस पर लिखा हुआ था राशि जिसे पढ़कर मैं चौंक गया, "कही यह वो ही राशि तो नहीं" मैने बड़बड़या, मन में उस फाइल को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ने लगी जिसे की मैं नहीं रोक पाया, लेकिन यह क्या इसमें तो लिखा हैं कि इस राशि का बलात्कार हुआ हैं, नहीं तो यह फिर कोई ओर हैं और मैने फाइल वापिस रख दी।

"क्या हुआ गोपाल क्या देख रहे हो?" अचानक से डॉक्टर साहिबा की आवाज़ सुन मैं चौंक गया।

"नहीं कुछ नहीं, लेकिन आप इतनी जल्दी वापिस आ गयी?"

"हाँ काम जल्दी ख़त्म हो गया इसलिए"

"डॉक्टर साहिबा एक बात पूछनी हैं?"

"हाँ बोलो"

"अभी मैने एक फाइल देखी किसी राशि की हैं, उसमे जो कुछ भी लिखा हैं उसके मुताबिक उस लड़की का बलात्कार हुआ था, क्या आप मुझे उसके बारे में कुछ बता सकती हैं।"

"नहीं, गोपाल क्या तुम नहीं जानते की हमें अपने मरीज़ो के बारे में किसी से भी कुछ बात नहीं करनी चाहिए।"

"जानता हूँ, लेकिन मेरे लिए यह जानना ज़रुरी हैं कि यह राशि कौन हैं।" कुछ देर तक तो कमरे में शान्ति छाई रही फिर ना जाने क्या सोच डॉक्टर साहिबा ने मुझे राशि के बारे में बताना शुरु किया।

"लगभग तीन साल पुरानी बात हैं, तुम्हारे ही गाँव की एक लड़की जिसका नाम राशि था रोज़ाना शाम को पढ़ने के लिए इवनिंग क्लासेज में जाया करती थी, लेकिन एक दिन वापिस आते हुए कुछ गुंडे उसके पीछे पड़ गए, जिनसे बचने के लिए वो पास के खेतों में घुस गई, लेकिन उन दरिंदो ने उसका पीछा नहीं छोड़ा, और उसकी इज़्ज़त लूट ली, गोपाल जानते हो अगले तीन दिनों तक वो लड़की खेत में बेहोश पड़ी रही, गाँव वालों ने उसे ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन कोई भी नतीज़ा नहीं निकला, फिर एक दिन उस खेत के किसान ने जब राशि को देखा तो उसने उसके घरवालों को इत्तला की, तुरन्त ही उसे मेरे पास लाया गया, जाँच करने पर पता चला कि उसके साथ बलात्कार हुआ हैं, उस बेचारी की हालत बहुत खराब थी, और हमारे पास इतनी सुविधाये नहीं थी कि उसका इलाज़ कर पाते इसलिए मैने बिना वक़्त गवाएं उसे एम्बुलेंस से शहर के बड़े डॉक्टर के पास भेज दिया, लेकिन किस्मत को तो कुछ ओर ही मंज़ूर था, उसने रास्ते में ही अपने प्राण त्याग दिए, हम चाहकर भी उसे नहीं बचा पाए।"

"अभी आपने क्या कहा कि वो मेरे ही गाँव की थी"

"हाँ"

"और क्या बता सकती हैं आप मुझे उसके बारे में, मेरा मतलब हैं उसका परिवार, माँ-बाप वगैरह"

"गोपाल वैसे तो यह सब कुछ याद रखना मुश्किल हैं, लेकिन यह हादसा दिल दहला देने वाला था, इसलिए इसको कभी भूला नहीं जा सकता, राशि अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी, उसके पापा गाँव में कपड़े की दुकान चलाते थे, और हाँ जहाँ तक मैने सुना हैं राशि की मौत के बाद ही उसके घरवाले सबकुछ छोड़छाड़ कर मुंबई चले गए।" यह सब कुछ सुन मैं सदमें में आ गया, ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरी ही राशि के बारे में बात हो रही हैं, मैने कुछ सोचते हुए तुरन्त ही अपने मोबाइल से राशि की फोटो डॉक्टर साहिबा को दिखाई,

"क्या यही वो लड़की हैं?" मैने काँपते हुए पूछा,

"हाँ, हाँ लेकिन इसकी फोटो तुम्हारे पास कैसे..." डॉक्टर साहिबा की हाँ ने मुझे अन्दर तक तोड़ कर रख दिया, ना चाहते हुए भी मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

"वो मेरी बचपन की दोस्त थी, मैने इसके बारे में बहुत जानने की कोशिश की, लेकिन पता नहीं क्यों किसी ने भी मुझे इसके बारे में कुछ नहीं बताया"

"शायद वो तुम्हे दुःखी नहीं देख सकते।" डॉक्टर साहिबा ने मेरी ओर पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा,

"शायद आप सही कह रही हैं, लेकिन वो दरिंदे उनका क्या हुआ?"

"कुछ नहीं, कही ना कही वो आज भी खुले घूम रहे होंगे और गुनाह पर गुनाह कर रहे होंगे।" "लेकिन किसी ने उन्हें पुलिस के हवाले क्यों नहीं करवाया?"

"कैसे करवाते गोपाल, राशि तो बेहोशी की हालत में ही चल बसी, और उसके सिवा उन लोगो को देखा ही किसने था, बेवज़ह तो किसी पर शक नहीं किया जा सकता ना"

"तो क्या उन दरिंदो को कभी सज़ा नहीं मिल पाएगी?" मैं डॉक्टर साहिबा के जवाब का इन्तज़ार किए बगैर ही उनके कैबिन से बाहर निकल गया, और उन्होंने भी मुझे रोकने की कोशिश नहीं की शायद वो मेरी मनोदशा से वाकिफ़ हो चुकी थी ।

 


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