Gunjan (Story On Domestic Violence)
मैं मासूम तरस रहीं हूँ अपनों के प्यार को
अपने तो मिलें मुझे लेकिन प्यार ना मिला
"गुंजन, अरे ओ गुंजन कहाँ चली गई" शालिनी गुंजन को ढूँढ़ते हुए इधर से उधर घूम
रही थी।
"जी माँ, आपने बुलाया?"
"हाँ बुलाया, रसोई में झूठे बर्तनों का ढ़ेर पड़ा हैं, वो कौन
साफ़ करेगा, और बाथरूम में धुलने के कपड़े भी हैं, वो भी धो देना।"
"लेकिन
माँ मैं अभी पढ़ रहीं हूँ, थोड़ी देर में सारे काम निबटा दूँगी।"
"बेशर्म
जुबान चलाती हैं मुझसे, कोई ज़रुरत नहीं हैं
पढ़ने की, वैसे भी कौनसा तुझे पढ़-लिखकर नौकरी करनी हैं, चल और काम कर, उसके बाद दोपहर के खाने की
तैयारी भी करनी हैं, और हाँ आज खाने में मटर-पनीर बनाना, मेरे रिशु को बहुत पसंद हैं, स्कूल से आते ही
उसे बहुत जोरो की भूख लगी होगी, इसलिए उसके आने से पहले
बना देना।"
"जी
माँ" और गुंजन शालिनी के कहे अनुसार काम करने चल दी।
बीस साल पहले शालिनी और निशांत की
शादी हुई थी, लेकिन बहुत कोशिशों के बावज़ूद भी शालिनी
माँ नहीं बन पाई, ना जाने कितने डॉक्टरों से इलाज़ भी
करवाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, हारकर दोनों पति-पत्नी ने बच्चा गोद लेने के बारें में विचार किया, लेकिन ये इतना आसान भी नहीं था, क्यों कि दोनों
के ही परिवारवालें इस बात के सख़्त ख़िलाफ़ थे कि किसी अंजान बच्चे को गोद लिया जाए, वो तो चाहते थे कि अपने ही परिवार में से किसी का बच्चा गोद लेकर निशांत
और शालिनी उसकी परवरिश करें, लेकिन किसी के भी द्वारा
अपना बच्चा किसी ओर को दे देना आसान नहीं, काफी
सोच-विचार के बाद शालिनी और निशांत इस निष्कर्ष पर पहुँचे की वो अनाथाश्रम से एक
बच्चा गोद लेंगे, और सारी कार्यवाही पूरी होनें के बाद
वो गुंजन को घर ले आए, जिस दिन गुंजन घर आई उसी दिन
शालिनी और निशांत की शादी की पाँचवी सालगिरह भी थी, गुंजन के आने की ख़ुशी और शादी की सालगिरह दो-दो ख़ुशी के मौके थे उस दिन, और इसी ख़ुशी को अपने दोस्तों व परिवारवालों के साथ बाँटने के लिए निशांत
और शालिनी ने एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया, और इसी
पार्टी के दौरान उन्होंने गुंजन का नाम भी रखा, गुंजन छ: महीनें की थी जब वो शालिनी और निशांत की ज़िन्दगी में आई, उसके आने से शालिनी व निशांत दोनों की ही ज़िन्दगी में जैसे बहार सी आ गयी, पिछले पाँच साल से दोनों की ज़िन्दगी में जो ख़ालीपन था वो अब भर चुका था, अब तो शालिनी का दिन कैसे गुंजन के काम करते
हुए पूरा हो जाता पता ही नहीं चलता।
गुंजन जब दो साल की
हुई तो एक दिन पता चला कि शालिनी माँ बनने वाली हैं, ये
ख़बर सुन शालिनी और
निशांत को जो ख़ुशी हुई उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, दोनों ही पति-पत्नी अपने आने वालें बच्चें की स्वागत की तैयारी में लग गए, लेकिन अब धीरे-धीरे दोनों का ही गुंजन से लगाव कम होने लगा, और छोटी-सी गुंजन इस बात को समझ ही नहीं पायी, शालिनी
के बेटा हुआ, जिसका नाम निशांत ने ऋषभ रखा, जिसे की प्यार से वो दोनों रिशु पुकारते, नन्ही
गुंजन तो जैसे उस छोटे से बच्चें को देखकर ख़ुशी
से फूली ही नहीं समा रही थी, उसके लिए तो जैसे कोई
खिलौना आ गया था, लेकिन शालिनी की पूरी कोशिश रहती की
वो जहाँ तक हो सके गुंजन को अपने बेटे से दूर रखे, अब
तो निशांत भी गुंजन को बेवजह डाँट देता, लेकिन वो मासूम
तो उस डाँट को भी नहीं समझ पाती, दोनों ही पति-पत्नी का
व्यवहार धीरे-धीरे गुंजन के प्रति बहुत ही कटु होता जा रहा था, बड़ी होती हुई गुंजन ये तो नहीं समझ पा रही थी
कि उसके साथ बुरा व्यवहार क्यों होता हैं, फिर भी वो
अपने इस परिवार से प्यार बहुत करती, और रिशु तो जैसे
उसकी जान था, दोनों बच्चें अब बड़े हो रहे थे, जहाँ रिशु को शालिनी व निशांत किसी राजकुमार की तरह से रखते, वहीं वो दोनों गुंजन के साथ नौकरों जैसे व्यवहार करते, शालिनी तो जितना हो सकता घर का काम गुंजन से ही करवाती, उसे पढ़ने के लिए स्कूल तो भेजती लेकिन घर पर पढ़ने का बिल्कुल भी वक़्त नहीं
देती, ऐसा लगता जैसे की वो गुंजन को स्कूल भेजने का दिखावा कर रही हो, आठ साल की
गुंजन से घर की साफ़-सफाई, बर्तन कपड़े सब ही तो तो करवाना शुरू कर दिया था शालिनी ने, लेकिन गुंजन बेचारी बिना किसी शिकायत के सारे काम करती, अब
गुंजन पूरे पंद्रह साल की हो चुकी हैं और काफी समझदार भी, ये तो वो कई साल पहले ही जान चुकी थी की वो शालिनी व निशांत की अपनी औलाद
नहीं हैं, फिर भी उसका उस परिवार से बेहद ही लगाव था, शालिनी उसके ऊपर कितने भी जुल्म कर ले वो सब बर्दाश्त कर लेती, बस एक रिशु ही था जो गुंजन को अपना मानता उसके साथ वैसा ही व्यवहार करता जैसे की एक बहन के साथ किया जाता हैं।
लेकिन एक
दिन तो हद ही हो गयी, शालिनी अपनी सोने
की चैन कही रख कर भूल गयी और उसकी चोरी का इल्ज़ाम उसने गुंजन पर लगा दिया, बहुत रोई और गिड़गिड़ाई थी उस दिन गुंजन, हर तरह
से उसने अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश की, लेकिन
शालिनी ने उसकी एक ना सुनी यहाँ तक की ऋषभ ने भी
समझाया फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा, बल्कि ऋषभ को तो
शालिनी ने ये कह कर एक तरफ बैठा दिया कि वो अभी छोटा हैं और इन सब मामलों में उसे
पड़ने की कोई ज़रुरत नहीं हैं, शाम को जब निशांत काम पर
से वापिस आया और जब शालिनी ने उसे अपनी चैन चोरी होने के बारें में बताया तो उसने
भी शालिनी का ही पक्ष लिया,
"शालिनी मैं तो कहता
हूँ हमें गुंजन को वापिस अनाथाश्रम भेज देना चाहिए, अरे
वैसे भी हमें अब इसकी जरूरत ही क्या हैं, पहले तो हम
बेऔलाद थे इसलिए गुंजन को ले आये, लेकिन अब तो हमारा
अपना एक बेटा हैं, फिर किसी गैर को हम अपनी औलाद का
दर्ज़ा क्यों दे।"
"तुम
सही कह रहें हो निशांत, हमें कल ही
अनाथाश्रम चलना चाहिए, जिससे की इस मुसीबत से जल्द से
जल्द छुटकारा मिल सके।" शालिनी और निशांत का ये
फ़ैसला सुन गुंजन के पैरों तले तो जैसे ज़मीन ही खिसक गयी।
"माँ-पापा, ये क्या बोल रहें हैं आप लोग, कैसे रहूँगी मैं
वहाँ आप दोनों के बिना, आप माने या ना माने लेकिन मेरे
लिए तो आप ही मेरे माँ-बाप हो, मैं नहीं रह सकती आप दोनों के
बिना"
"हाँ
माँ मत भेजों ना कहीं भी दीदी को, मुझे दीदी के साथ ही रहना हैं।" जो बात
ऋषभ से इतने सालों से छुपी हुई थी वो आज इस तरह से उसके सामने आएगी शायद किसी ने
सोचा नहीं था।
"ऋषभ तुम इन सब बातों
में मत पड़ो, तुम अभी छोटे हो।" ऐसा कहकर शालिनी ने
ऋषभ को चुप तो करवा दिया, लेकिन ऋषभ के मन में अपने माँ-बाप प्रति जो नफरत आ गयी थी उसे कम कर पाना शायद अब मुश्किल था।
उस पूरी रात गुंजन
और ऋषभ एक पल के लिए भी नहीं सो पाए, अपने परिवार से
अलग होना पड़ेगा यही सोच-सोचकर गुंजन पूरी रात रोती रही,
"दीदी, आप मत रो मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा हैं, चलो ऐसा करते हैं हम दोनों कहीं भाग जाते हैं, दोनों
भाई-बहन साथ मिलकर रहेंगे।"
"पागल
हो गया हैं क्या तू, ऐसा कभी सपनें में
भी मत सोचना, जानता हैं तू कहीं चला गया तो माँ-पापा तो
मर ही जायेंगे, कम से कम उनके बारें में तो सोच"
"क्या
सोचूँ दीदी उन्होंने कौनसा आपके बारे में सोच लिया।"
"मेरी बात छोड़ दे रिशु और वादा कर की कभी भी माँ-पापा को छोड़कर नहीं जाएगा।"
"वादा दीदी मैं कभी भी माँ-पापा को छोड़कर नहीं जाऊँगा।" ऋषभ ने पक्का वादा किया उस रात गुंजन से।
"और अब जाकर सो जा
सुबह स्कूल भी तो जाना हैं ना तुझे" ऋषभ गुंजन की सारी बात मानता था, इसी वजह से उसके कहते ही वो सोने चला, दूसरी
दिन सुबह जब सब उठे तो गुंजन घर पर नहीं थी, बस थी तो
उसकी द्वारा लिखी हुई एक चिठ्ठी जिसमे सबके लिए बहुत सारा प्यार था, नफरत हो गयी थी उस दिन ऋषभ को अपने ही माँ-बाप से, बस बार-बार एक ही ख्याल उसके दिल में आ रहा था की वो भी भाग जाये इस घर से,
लेकिन अपनी दीदी को दिया वादा भी तो निभाना था।
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