Dusri Shaadi (Story On Marriage)
थामा
था हाथ जिसका बनकर हमसफ़र छोड़ा उसने तन्हा
माना
था जिनको ग़ैर बन गए वो हमसफ़र
सूरज की पहली किरण आज भी वैसे ही गुलाब के फूलों
पर गिरी जैसे हमेशा गिरती हैं, दिन की शुरुआत
में भी कोई परिवर्तन नहीं था, वही दूधवाले का आना, न्यूज़पेपर आना और कामवाली का बेवक़्त आना सबकुछ तो हमेशा जैसा ही था फिर
क्यों सबकुछ नया-नया सा लग रहा था, आज अनीता के चेहरे पर
मुस्कान थी जो शायद बरसों पहले कहीं खो गयी थी, बालकनी में
बैठी हुई अनीता चाय की चुस्कियाँ लेते हुए ना जाने कब अतीत की ओर चली गई पता ही
नहीं चला।
बात उस समय
की हैं जब अनीता और अशोक अपनी बेटी पलक के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर रहे थे,
पलक केवल तीन साल की थी, दीन-दुनिया की कोई
खबर नहीं बस अपने खेल-खिलौनों में ही मस्त रहना, माँ और पापा
की इकलौती होने के नाते लाड़-प्यार तो होना ही था, ऐसा लगता
था मानो दुनिया की सारी ख़ुशियाँ आकर एक ही आँगन में समां गयी हो, फिर ना जाने अचानक किसकी नज़र लग गयी, वैसे तो घर में
छोटे-मोटे झगड़े होते रहते थे लेकिन आज अशोक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, अनीता के सब्र का बाँध भी टूट गया वो भी अशोक से झगड़ने लगी, पलक अपने कमरे में खेल रही थी कि उसे अपनी माँ और पापा के ज़ोर-ज़ोर से लड़ने
की आवाज़े आने लगी, वो उनके कमरे के बाहर आकर खड़ी हो गई लेकिन
उसके लिए कुछ भी समझ पाना मुश्किल था, "अशोक तुम पलक के
बारे में तो सोचो जब उसको पता चलेगा तो क्या असर होगा उस पर" अनीता ने
चिल्लाकर कहा,
"चिल्लाओ मत, मुझे उसकी चिंता हैं इसलिए मैने फ़ैसला
किया हैं कि मैं पलक को भी अपने साथ लेकर जाऊँगा" अशोक के ऐसा कहते ही,
"तुम पागल हो गए हो वो छोटी-सी बच्ची अपनी माँ के बिना कैसे रहेंगी और मेरे
बारे में भी तो सोचो" अनीता की आँखों से आँसू बहने लगे थे,
"अब मुझे कुछ नहीं सोचना हमारे रास्ते अब अलग हैं, अगर
तुम्हे कुछ बात करनी हैं तो मेरे वक़ील से करना" ऐसा बोल अशोक ज़बरदस्ती पलक को
गोद में उठाए और सामान लेकर घर से निकल गया, और अनीता रोने
और चिल्लाने के अलावा कुछ नहीं कर पाई, लेकिन भगवान् भी इतना
निर्दयी नहीं था उसने अनीता की प्रार्थना को स्वीकार किया और फैसला जज ने अनीता के
पक्ष में सुनाया और पलक की ज़िम्मेदारी अनीता को दे दी।
"माँ वो
कौन थी जिसको पापा मेरी नई माँ कह रह थे, मेरी
तो आप ही माँ हो ना" पलक ने तोतली भाषा में अनीता की गोद में बैठते हुए
मासूमियत से पूछा,
"वो गंदी आंटी थी जिन्होंने तुम्हारे पापा को तुमसे छीन लिया, लेकिन कोई बात नहीं मैं तो हूँ ना, मैं अपनी रानी
बिटिया से बहुत प्यार करुँगी और कभी भी पापा की कमी महसूस नहीं होने दूँगी"
अनीता ने पलक से कहा, वक़्त गुज़र रहा था पलक भी धीरे-धीरे बड़ी
हो रही थी। इस बीच कई बार अनीता के माँ और पापा ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर दिया
"अनीता ज़िंदगी का सफर काटना आसान नहीं होता हैं हमारी मानो तुम दूसरी शादी कर
लो, पलक को भी पिता का प्यार मिल जायेगा" अनीता की माँ
ने समझाते हुए कहा,
"नहीं माँ, मुझे अब शादी नहीं करनी मैं फैसला कर चुकी
हूँ, अब पलक की परवरिश ही मेरी ज़िन्दगी का मक़सद हैं, मैं उसे पढ़ा-लिखा कर ज़िन्दगी में कुछ बनाना चाहती हूँ, जिससे की उसे कभी किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहना पड़े, इसलिए मैने अपने लिए नौकरी भी ढूँढ ली हैं।" अनीता ने कहा,
"ठीक हैं जैसी तेरी मर्ज़ी लेकिन कभी अपने आप को अकेला मत समझना हम हमेशा
तेरे साथ हैं" अनीता की माँ ने कहा।
अनीता और
अशोक को बिछड़े हुए तीन साल हो चुके थे और अब अनीता ने अपने आप को पूरी तरीके से
संभाल लिया था, एक दिन अनीता के ऑफिस में
"कैसी हो अनीता और पलक कैसी हैं?" अनीता के ऑफिस
में काम करने वाले सहकर्मी अखिल ने पूछा,
"सब ठीक हैं तुम बताओ, किसी दिन घर पर क्यों नहीं आते
चाय पर पलक को भी तुमसे मिलकर अच्छा लगेगा" अनीता ने कहा,
"ज़रूर आऊँगा तुम बुलाओ और मैं मना करूँ ऐसा हो सकता हैं क्या" अखिल ने
मुस्कुराते हुए कहा।
"ठीक हैं इस इतवार को मेरे यहाँ तुम्हारा लंच अब मना मत करना" अनीता
ने धमकी देते हुए कहा,
"अरे बाबा, चाय से सीधा खाने पर बुला रही हो वो भी
धमकी के साथ, इरादे क्या हैं जनाब के" अखिल ने मज़ाक
करते हुए कहा,
"कुछ नहीं अखिल एक तुम ही तो हो जो मुझसे अच्छे से बात करते हो और पलक की
भी फ़िक्र करते हो नहीं तो आजकल के ज़माने में किसी के पास वक़्त ही कहाँ हैं"
अनीता के कहते ही, "अरे मैडम अपनी भावनाओं पर काबू रखो
नहीं तो यहाँ आँसुओ की बाढ़ आ जाएगी" अखिल ने मज़ाक करते हुए कहा,
"ठीक है तो इस इतवार पक्का आओगे ना?" अनीता ने
पूछा,
"वादा करता हूँ ज़रूर आऊँगा" ऐसा बोल अखिल अपने काम में लग गया और
अनीता अपने काम में।
इतवार का दिन
था और दोपहर का वक़्त, दरवाज़े की घंटी बजी "शारदा, देखना दरवाज़े
पर कौन हैं।" अनीता ने अपनी बाई को आवाज़ लगाकर कहा,
शारदा ने
दरवाज़ा खोला तो सामने अखिल खड़ा था, "किससे मिलना हैं आपको?" शारदा ने पूछा,
"अनीता हैं?" अखिल के कहते ही,
"मेमसाब कोई आपसे मिलना चाहता हैं" शारदा ने बताया, इतने में अनीता भी दरवाज़े पर आ गई,
"अरे अखिल तुम आ गए, चलो फटाफट बैठो, खाने में गर्मागर्म सरसों का साग और मक्के की रोटी हैं।" अनीता ने
मुस्कुराते हुए कहा,
"अरे वाह फिर तो मज़ा आ गया लेकिन इससे पहले तुम मुझे पलक से तो मिलवाओ"
अखिल ने कहा,
"ओहो, मैं तो भूल ही गई" ऐसा कह अनीता ने पलक को
आवाज़ लगाई, पलक के आने पर, "पलक
इनसे मिलो यह अखिल अंकल है, हैलो बोलो अंकल को" अनीता
ने पलक से कहा, और अखिल ने अपनी जेब से चॉकलेट निकाल कर पलक
को दी, पलक शर्माकर अनीता के पीछे छुप गई, "पलक बेटा अंकल को थैंक्यू तो बोलो" अनीता ने कहा,
"रहने दो अनीता अभी तो हम मिले हैं धीरे-धीरे दोस्ती भी हो जाएगी, क्यों पलक मैं सही कह रहा हूँ ना" अखिल ने पलक की ओर देखते हुए कहा,
"अच्छा बताओ खाना अभी खाओगे या थोड़ी देर में" अनीता ने पूछा,
"तुम तो बस फटाफट पलक का और मेरा खाना लगा दो बहुत भूख लगी हैं" अखिल
ने कहा, अनीता ने खाना लगाया और रोटी बनाने का काम शारदा को
कह ख़ुद भी खाने बैठ गई,
"कैसा बना हैं खाना?" अनीता ने अखिल से पूछा,
"स्वादिष्ट, खाकर घर की याद आ गयी" अखिल ने अपनी
उँगलियाँ चाटते हुए कहा,
"तुमने कभी बताया नहीं अपने परिवार के बारे में" अनीता ने पूछा,
"दरअसल मेरे परिवार के बारे में बताने लायक कुछ हैं ही नहीं, पाँच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मेरे माँ-बाप का देहांत हो गया था,
दो बहने हैं मुझसे बड़ी, दोनों की ही शादी हो
गयी हैं और अपने-अपने परिवार के साथ खुश हैं, कभी-कभी फ़ोन पर
बात हो जाया करती हैं।" अखिल ने गहरी सांस ली,
"तुम शादी क्यों नहीं कर लेते, इससे तुम्हारा अकेलापन
भी दूर हो जायेगा और तुम्हारी बहनों को भी तो तुम्हारी चिंता रहती होगी"
अनीता के कहते ही,
"मेरी बहनों की तो बात ही मत करो, उनका बस चले तो
मेरी अभी शादी करवा दे, लेकिन मैं अभी नहीं करना चाहता"
अखिल ने नज़रे चुराते हुए कहा,
"यह तुम्हारा निज़ी मामला हैं इसलिए कुछ नहीं पूछूँगी, अच्छा बताओ गाजर का हलवा खाओगे" अनीता समझ गयी थी कि अखिल शादी वाली
बात से बचना चाहता हैं इसलिए उसने बातों का रुख ही बदल दिया।
"ज़रूर खाऊँगा गाजर का हलवा तो मेरा मनपसंद हैं" अखिल ने मुस्कुराते
हुए कहा और सभी चाव से गाजर का हलवा खाने लगें।
खाना खाने के
बाद,
"एक-एक कप चाय हो जाये?" अनीता ने
पूछा,
"नेकी और पूछ-पूछ बिल्कुल हो जाये, अरे भई हम तो चाय
के दीवाने हैं" अखिल ने हँसते हुए कहा, अनीता ने शारदा
से चाय बनाने के लिए कहा और खुद अखिल के पास आकर बालकनी में बैठ गई,
"तुम्हे कभी अकेलापन महसूस नहीं होता?" अखिल ने
पूछा,
"नहीं, और अकेलापन क्यों महसूस होगा पलक हैं ना मेरे
साथ, वैसे भी पूरा दिन तो ऑफिस में गुज़र जाता हैं, बाकी जो वक़्त बचता हैं वो सिर्फ पलक के लिए होता हैं" अनीता ने
मुस्कुरा कर जवाब दिया,
"क्या
तुम्हे कभी यह नहीं लगा कि पलक की ज़िन्दगी में एक पिता की कमी हैं और तुम्हारी
ज़िन्दगी में एक जीवनसाथी की" अखिल के पूछते ही,
"नहीं कभी नहीं वैसे भी जब से अशोक ने धोखा दिया हैं मेरा मर्दो के ऊपर से
विश्वास ही उठ गया हैं" अनीता के स्वर में गुस्सा था,
"ऐसा मत बोलो सब एक जैसे नहीं होते हैं, अच्छे लोग भी
होते हैं, मैं तो कहता हूँ तुम एक बार शादी पर विचार करो,
अभी पलक छोटी हैं नासमझ हैं जब बड़ी होगी उसे अपने पिता की कमी खलने
लगेगी" अखिल ने अनीता को समझाते हुए कहा,
"अखिल मैं तलाकशुदा हूँ ऊपर से एक बच्ची की माँ कौन करना चाहेगा मुझसे शादी?"
"मैं, हाँ अनीता मैं करूँगा तुमसे शादी अगर तुम्हे
कोई ऐतराज़ ना हो तो" अखिल ने हिम्मत करके अपने दिल की बात कह दी।
"ओ हो क्या बात हैं ऐसा लग रहा हैं जैसे मेरे ऊपर तरस खा कर एहसान कर रहे
हो" अनीता ने व्यंग्य किया,
"नहीं अनीता ऐसी बात नहीं हैं मैं तुमसे प्यार करता हूँ जब से तुम ऑफिस में
आयी हो, बस कभी कह नहीं पाया" अखिल के कहते ही,
"मैने तुम्हे अपना दोस्त समझा था और तुम मुझसे शादी के सपने देख रहे हो,
निकल जाओ तुम मेरे घर से इसी वक़्त और अपनी शक्ल भी मत दिखाना
कभी" अखिल को घर से निकलने के लिए कह अनीता अपने कमरे में आकर फूट-फूट कर
रोने लगी।
लेकिन वक़्त
हमेशा एक-सा नहीं चलता, जैसे-जैसे पलक बड़ी
होती जा रही थी उसे अपने पिता की कमी महसूस हो रही थी, अब
पलक 12 साल की हो गई थी और वो अशोक के बारे में सबकुछ जानना चाहती थी,
"माँ, पापा हमें छोड़ कर कहाँ चले गए वो
अब वापिस कब आयेंगे, मेरी सभी सहेलियों के पापा उन्हें स्कूल
लेने और छोड़ने आते हैं बस मेरे ही नहीं आते, उनके पापा तो
उनके साथ ही रहते हैं, मेरे पापा हमारे साथ क्यों नहीं
रहते" पलक ने सवाल किया,
"पलक बेटा यहाँ बैठो अब तुम इतनी बड़ी हो गई हो कि मैं तुम्हे तुम्हारे पापा
के बारे में सबकुछ बता सकती हूँ" ऐसा कह अनीता ने अशोक के बारे में पलक को
सबकुछ बता दिया। "माँ, क्या आपको
पापा की कमी महसूस नहीं होती, आपको नहीं लगता उन्हें हमारे
साथ होना चाहिए था" पलक ने अनीता की ओर देखते हुए पूछा,
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं वैसे भी मेरी पलक बिटिया मेरे साथ हैं तो मुझे
और किसी की क्या ज़रुरत" अनीता ने मुस्कुराते हुए कहा,
"वो सब तो ठीक हैं माँ लेकिन आपको नहीं लगता हमारा परिवार अधूरा हैं,
माँ मैं चाहती हूँ आप शादी कर लीजिये" पलक के ऐसा कहते ही,
"तुम पागल हो गई हो शादी और मैं! कभी
नहीं मैं खुश हूँ और वादा करती हूँ तुम्हे भी हमेशा खुश रखूँगी।" अनीता ने
पलक को समझाया,
"माँ, पापा ने कभी आपके बारे में नहीं सोचा फिर आप
किसका इंतज़ार कर रही हैं, ज़िन्दगी में आगे क्यों नहीं बढ़ना
चाहती आप, जानती हैं आपके शादी करने से मुझे पिता का प्यार मिलेगा, और आपको एक
जीवनसाथी, ज़रूरी तो नहीं हैं ना हर इंसान मेरे पापा जैसा ही
हो दुनिया में अच्छे लोग भी होते हैं, जैसे की अखिल
अंकल" पलक के मुँह से अखिल का नाम सुन, "अखिल,
वो कब तुमसे मिला और तुम कैसे जानती हो अखिल को?" अनीता ने आश्चर्य से पूछा,
"वो तो मुझसे रोज़ मिलते हैं, उन्होंने मुझे पापा के बारे में पहले ही सबकुछ
बता दिया था, माँ वो आपसे बहुत प्यार करते हैं, आप जानती हैं माँ उन्होंने कहा हैं वो आपके अलावा किसी और से शादी नहीं
करेंगे, माँ मुझे उनके साथ अच्छा लगता हैं, ऐसा लगता हैं मानो एक पिता की कमी पूरी हो गयी हो, हमारा परिवार पूरा हो
जायेगा बस आप हाँ कर दीजिए" पलक ने अनीता से आग्रह करते हुए कहा।
"ओहो तो जनाब ने तुम्हे भेजा हैं अपनी पैरवी करने के लिए, जब मैंने घर से
निकाल दिया तो उसने तुम्हारा सहारा लिया, और जब तुम सबकुछ जानती थी तो यह नासमझ
बनने का नाटक क्यों, और अखिल, मुझे नहीं पता था कि तुम उसके
साथ मिली हुई हो।" अनीता ने गुस्से में कहा,
"नहीं माँ आप गलत समझ रही हैं, अखिल अंकल बुरे नहीं
हैं, बस एक बार आप उनके बारे में सोच कर देखिए" पलक ने
आग्रह किया,
"नहीं पलक मुझे कुछ नहीं सोचना हैं, मैं अपनी ज़िन्दगी
में खुश हूँ, जानती हो तुम्हारे पापा के बारे में भी मुझे
ऐसा ही लगता था की वो ज़िंदगी भर मेरा साथ निभायेंगे लेकिन देखा ना तुमने क्या किया
उन्होंने, अरे मेरी तो छोड़ो उन्होंने तो तुम्हारे बारे में
भी नहीं सोचा" अनीता के स्वर में गुस्सा था,
"माँ क्या आप पापा की गलती की सजा सबको देंगी, मैं
मानती हूँ उन्होंने अच्छा नहीं किया उन्होंने किसी के बारे में भी नहीं सोचा लेकिन
इसमें अखिल अंकल की क्या गलती हैं बस मेरे लिए आप एक बार उनके बारे में
सोचिए" पलक अनीता के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी।
"ठीक हैं मुझे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए" अनीता के कहते ही,
"लेकिन जवाब मुझे हाँ में ही चाहिए" पलक ने शरारत की।
वैसे तो अब
अनीता को भी लगने लगा था कि अखिल का इस परिवार से जुड़ना सही होगा,
लेकिन सालों पहले जो अनीता ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया था उसके
लिए शर्मिंदा थी, उस वक़्त अनीता ने अखिल को इतना सुना दिया
था कि अब तो उसका सामना करने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी उसने
पलक से इस बारे में बात की, "पलक मुझे तुमसे कुछ बात
करनी हैं।" अनीता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा,
"जी माँ कहिये, मैं तो कितने दिनों से इंतज़ार कर रही
हूँ कि आप कुछ कहे" पलक ने अपनी बाहें अनीता के गले में डालते हुए कहा,
"पलक वो मैं अखिल से शादी करने के लिए तैयार हूँ लेकिन तुम्हे पता नही है
सालों पहले मैने उसके साथ दुर्व्यवहार किया था, पता नहीं
उसके लिए उसने मुझे माफ़ किया या नहीं" अनीता ने उदास होते हुए कहा,
"माँ मुझे पता हैं आप किस बारे में बात कर रही हो लेकिन मुझे नही लगता उनके
मन में इस वक़्त कोई भी बात होगी" पलक ने कहा,
"लेकिन उससे इस बारे में बात कौन करेगा" अनीता ने थोड़ा शर्माते हुए
कहा,
"मैं करुँगी अखिल अंकल से बात, आज एक बेटी अपनी माँ
का रिश्ता लेकर जाएगी" ऐसा बोल पलक ने अनीता को अपने गले से लगा लिया,
"क्या वो तैयार होगा?" अनीता असमंजस की स्थिति
में थी,
"माँ वो तो तैयार ही हैं बस इंतज़ार है तो केवल आपकी हाँ का, माँ अंकल आपसे सच्चा प्यार करते हैं, इसलिए ही तो इतने सालों से आपका
इंतज़ार कर रहे हैं" पलक के कहते अनीता ने शर्म से अपनी आँखे झुका ली,
"ओ हो! मेरी शर्मीली माँ, चलो अखिल अंकल को फ़ोन करके
यह खुशखबरी दे दूँ", अखिल से बात करने के बाद पलक,
अनीता से….."आज एक बेटी अपनी माँ की शादी
की तैयारियाँ शुरू करेंगी" इसके बाद तो जैसे पलक की खुशियों का कोई ठिकाना ही
नहीं था, भाग-भागकर बड़ी ही उत्सुकता से ऐसे शादी की
तैयारियाँ कर रही थी जैसे कोई माँ अपनी बेटी की करती हैं, और
जल्द ही यह शादी संपन्न हो गयी, और आज शादी के बाद अनीता
फुर्सत में बालकनी में बैठी चाय पी रही थी और मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी,
"क्या बात हैं अनीता बहुत खुश नज़र आ रही हो" अखिल ने
बालकनी में आकर पूछा, और अखिल की आवाज़ सुन अनीता अतीत से
वर्तमान में आ गई,
"हाँ आज मैं बहुत खुश हूँ, आज परिवार पूरा हो गया,
सालो बाद मैने पलक की आँखों में ख़ुशी देखी हैं, उसने कभी मुझे महसूस नहीं होने दिया लेकिन उसके जीवन का खालीपन मुझे नज़र
आता था।" अनीता ने कहा,
"वैसे भी ज़रूरी तो नहीं हैं ना कि माँ-बाप ही अपने बच्चो की खुशियो के बारे
में सोचे, बच्चे भी तो सोच सकते हैं ना" पलक ने पीछे से आकर अपनी बात कही,
"हाँ ज़रूर सोच सकते हैं और मैं तो कहता हूँ हर घर में तुम्हारी जैसी एक
बेटी होनी ही चाहिए" अखिल के कहते ही,
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