Beti Ka Pyaar (Story On A Daughter)

 

कई बार हम जिनको अपना समझते हैं वो पराये हो जाते हैं ,

और जिनको पराया कर देते हैं वो हमें अपना मानते हैं

 

"सीमा इधर आना" कुमुद के आवाज लगाते ही,

"जी माँ, कहिये, कुछ काम हैं?" सीमा ने कुमुद से पूछा।

"बेटा मेरी दवाई नहीं मिल रही हैं" कुमुद ने अपने दाएँ-बाएँ देखते हुए कहा।

"कौनसी दवा माँ" सीमा के पूछते ही,

"अरे वही जो मैं रात को सोने से पहले लेती हूँ" कुमुद ने जवाब दिया।

"माँ तुम भी कमाल करती हो, अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैंने तुम्हें दवाई दी हैं, आज फिर भूल गयी ना, ये जो तुम्हारे भूलने की आदत हैं ना माँ, किसी दिन बहुत बड़ा बवाल खड़ा कर देगी" सीमा ने कुमुद को डाँटते हुए ये बात कही।

"अरे बेटा क्या बताऊँ, ये उम्र ही ऐसी हैं, तू नाराज़ मत हो, आ मेरे पास बैठ, बच्चे सो गए?" कुमुद ने सीमा से प्यार से पूछा।

"हाँ सो गए और अब आप भी सो जाइये" सीमा ने कहा।

"अरे बाबा सो जाऊँगी, वैसे भी पूरा दिन आराम ही तो करती हूँ, तू कुछ काम कहाँ करने देती हैं।" कुमुद के ऐसा कहते ही सीमा ने कुमुद की ओर गुस्से से देखा।

"हे भगवान, इतना गुस्सा, अच्छा बता नवीन जी से बात हुई कब वापिस आने का हैं, कुछ बताया उन्होंने ?" कुमुद ने बातों का रुख बदलते हुए पूछा।

"हाँ माँ आज ही बात हुई हैं, परसों तक आ जायेंगे" सीमा ने कुमुद की बात का जवाब दिया। "चलो अच्छी बात हैं, बहुत मेहनत करते हैं नवीन जी, ऐसा दामाद तो किस्मत वालों को ही मिलता हैं" कुमुद ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अच्छा माँ मैं सोने जा रही हूँ, बहुत नींद आ रही है, और अब तुम भी सो जाओ" सीमा ऐसा कहते हुए कमरे से बाहर निकलने लगी।

"हाँ बेटा तू जाकर सो जा और कल जल्दी उठने की ज़रूरत नहीं है, इतवार की छुट्टी है आराम से उठना" कुमुद ने कहा।

"क्या कहने माँ तुम्हारे भी, मैं देर से उठूँ जिससे की तुम सुबह जल्दी उठ कर नाश्ता तैयार कर लो" सीमा ने कुमुद की ओर घूरते हुए कहा।

 "हे भगवान, ये लड़की तो कुछ काम नहीं करने देती, अच्छा बाबा गलती हो गई, तू ही सुबह जल्दी उठ जाना, अब जाकर सो जा मेरी माँ" और दोनों ही एक दूसरे की तरफ देख हँसने लगे एवं सीमा अपने कमरे की ओर जाने लगी।

सीमा के जाने के बाद कुमुद भी सोने की तैयारी करने लगी लेकिन नींद आँखों से कोसो दूर थी और ना जाने क्यों आज कुमुद को बार-बार अपना अतीत याद आ रहा था।

यह बात उस वक़्त की है जब कुमुद के घर उसके बेटे नीरज की शादी की तैयारी चल रही थी, कुमुद की तो जैसे ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, "मौसी, मैं तो कहती हूँ मैंने ज़रूर पिछले जन्म में कोई अच्छे काम किये होंगे, जब ही तो मुझे बेटे का सुख मिला, अरे बेटियों का क्या है वो तो अपने माँ-बाप पर बोझ होती हैं, आखिरकार काम तो बेटा ही आता है, बेटी तो एक बार पराये घर गयी सारे सम्बन्ध खत्म, अब तो मेरी बहु भी आ रही है खूब सेवा करवाऊँगी और ठाट से बैठ कर हुकुम चलाउँगी, वैसे भी सीमा की शादी की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो चुकी हूँ, क्यों मौसी सही कह रही हूँ ना" ऐसा कह कुमुद ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी एवं वहाँ बैठी महिलाएँ भी कुमुद का साथ देने लगी। इसी हँसी-ठिठोली के माहौल में नीरज की शादी हो गयी और घर में नयी दुल्हन भी आ गयी। जब भी घर में कोई मेहमान आता, कुमुद गर्व के साथ अपनी बहु प्रीती को मिलवाती। धीरे-धीरे दोनों सास-बहु में अच्छी पटने लगी, जो भी देखता कहता यह तो सास-बहु नहीं, सहेलियाँ लगती हैं। वक़्त गुज़र रहा था और कुमुद की ज़िन्दगी में सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन कहते है ना अगर अच्छा वक़्त आता है तो बुरा वक़्त भी आता हैं, कुमुद के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

ट्रिन-ट्रिन, फ़ोन की घंटी बज रही थी, कुमुद ने आकर फ़ोन उठाया लेकिन फ़ोन पर सामने वाले व्यक्ति ने जो कुछ भी बोला उसे सुन कुमुद की आँखों के आगे अँधेरा आ गया वो अपना संतुलन खो बैठी एवं पास रखे सोफे पर लगभग गिर गई। "क्या हुआ माँ, किसका फ़ोन था, सब ठीक तो हैं ना" प्रीती ने घबराते हुए पूछा, लेकिन कुमुद की आँखों से निरन्तर आँसू बह रहे थे और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। प्रीति तुरन्त रसोई में जाकर गिलास में पानी ले आती हैं……"लीजिये माँ पानी पीजिये और जल्दी बताइये क्या हुआ है मुझे बहुत घबराहट हो रही हैं" प्रीती ने घबराते हुए पूछा।

"प्रीती, तुम्हारे ससुर जी की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी हैं।" कुमुद ने रोते हुए कहा।

"पापा तो ठीक हैं ना माँ, ज्यादा चोट तो नहीं लगी ना" प्रीति ने पूछा।

"किसी अजनबी व्यक्ति का फ़ोन था, कह रहा था खून बहुत बह रहा हैं सिटी अस्पताल लेकर जा रहे हैं" कुमुद धीरे-धीरे अपने होश खो रही थी।

"तो माँ आप बैठी क्यों हैं, जल्दी उठिए अस्पताल चलना हैं मैं नीरज को फ़ोन करती हूँ" प्रीती ने कुमुद को उठाते हुए कहा, और दोनों सास-बहु तुरन्त अस्पताल के लिए रवाना हो गयी। अस्पताल पहुँचने के बाद सामने नीरज को देख…..."नीरज पापा कैसे हैं ज्यादा चोट तो नहीं आई ना, और डॉक्टर ने क्या कहा" प्रीती के स्वर में उतावलापन था।

"प्रीती, सीमा को फ़ोन करके बुला लो, पापा अब नहीं रहे।" ऐसा कह नीरज फूट-फूटकर रोने लगा।

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, अरुण तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते" नीरज के मुँह से अपने पति के जाने की बात सुन कुमुद भी रोने लगी, और कुछ ही देर में अस्पताल का माहौल बेहद ग़मगीन हो गया, लेकिन अस्पताल की सारी कागज़ी कार्यवाही करनी भी ज़रूरी थी, नीरज अस्पताल की सारी कार्यवाही पूरी कर अरुण का पार्थिव शरीर लेकर कुमुद और प्रीती के साथ घर आ गया, सीमा और बाकी रिश्तेदार भी आ चुके थे, बहुत ही ग़मगीन माहौल में अंतिम संस्कार की विधि पूरी हुई, उसके बाद कुछ रिश्तेदार चले गए एवं कुछ वही रह गए। वक़्त अपनी ही गति से गुज़र रहा था, घर के सभी सदस्य सामान्य होने लगे थे।

एक दिन, "माँ तुम मेरे साथ चलो हवा-पानी बदलेगा तो अच्छा लगेगा" सीमा ने कहा।

"नहीं बेटा मैं यही ठीक हूँ, तू जा, बस फ़ोन करके मेरी खैर-ख़बर लेती रहा करना" कुमुद ने सीमा को अपने पास बैठाते हुए कहा।

"ठीक है माँ, अगर तुम्हारा मन नहीं है तो रहने दो, लेकिन तुम कभी भी मेरे घर आ सकती हो" सीमा ने रुआंसे होते हुए कहा और कुमुद के गले लग गयी।

 "अब तू जा ट्रेन का वक़्त हो रहा हैं" कुमुद ने भारी मन से कहा, और सीमा अपने घर के लिए रवाना हो गयी, बाकी के मेहमान तो पहले जा ही चुके थे, अब घर में केवल कुमुद, नीरज और प्रीती ही रह गए थे।

पहले-पहले तो सबकुछ ठीक ही चल रहा था, लेकिन धीरे-धीरे प्रीती के व्यवहार में बदलाव आने लगा। उसका व्यवहार कुमुद के साथ खराब होता जा रहा था, और कुमुद बिना कुछ कहे सबकुछ सहन कर रही थी। उसने कभी नीरज से भी कुछ नहीं कहा क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि घर में कोई क्लेश हो। वक़्त गुज़र रहा था, इसी प्रकार अरुण को गए एक साल बीत गया। आज अरुण की पहली बरसी थी, सीमा भी आई हुई थी। "माँ, क्या हुआ बहुत कमज़ोर लग रही हो, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना" सीमा ने पूछा।

"हाँ बेटा, मैं बिलकुल ठीक हूँ, तू बेकार में ही चिंता कर रही हैं, तेरी भाभी हैं ना मेरा पूरा ख्याल रखती है" लेकिन ये सबकुछ कुमुद सीमा से नज़रे मिलाकर नहीं बोल पायी और सीमा को उसी दिन से कुछ शक होने लगा, लेकिन वो कुछ कह भी नहीं सकती थी इसलिए चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी क्योंकि लड़के और लड़की के बारे में कुमुद की क्या सोच हैं वो अच्छे से जानती थी।  

एक दिन सुबह, "माँ मैं सोच रही थी बच्चों को कहीं बाहर घुमाने ले जाऊँ, जब से आए हैं घर में ही रहते हैं" सीमा ने कुमुद से पूछा।

"हाँ बेटी जा ना इसमें पूछने वाली कौनसी बात हैं, और तेरा भी मन बहल जायेगा" कुमुद ने मुस्कुराते हुए कहा।

"ठीक हैं तो माँ हम निकलते हैं, शाम तक वापिस आ जायेंगे" सीमा ने कुमुद से कहा।

"ठीक हैं बेटा अपना ध्यान रखना" कुमुद ने समझाया, और सीमा बच्चो को लेकर निकल गयी। "मम्मी चलो ना कोई फिल्म देखने चलते हैं। ये स्वर सीमा के बेटे यश के थे,

"हाँ बेटा चलते हैं लेकिन टिकट भी तो मिलने चाहिए" सीमा ने कहा।

"नहीं मम्मी शॉपिंग करेंगे" सीमा की बेटी ख़ुशी ने मचलते हुए कहा,

"अरे बच्चो दोनों काम करेंगे और एक अच्छे से होटल में खाना भी खाएँगे।

 "हुर्रे, आज तो मज़ा आ जाएगा" दोनों बच्चे उछलने लगे, लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था, कुछ ही देर में तेज हवाएँ चलने लगी और बारिश शुरू हो गयी।

"भैया सिटी मॉल चलोगे" सीमा ने टैक्सी वाले से पूछा।

"नहीं मेमसाब इतनी बारिश में तो कोई भी नहीं जाएगा।"

"भैया थोड़े ज्यादा पैसे ले लेना" सीमा ने टैक्सी वाले को जाने के लिए मनाते हुए कहा। "मेमसाब जी, बात पैसों की नहीं हैं, इतनी बारिश में टैक्सी चलाने में तकलीफ होती हैं।" टैक्सी वाले ने अपनी मज़बूरी बतायी।

"ठीक है भैया" सीमा ने उदास होते हुए कहा।

"चलो बच्चो घर चलते हैं किसी ओर दिन आएँगे" ऐसा कहकर सीमा बारिश में ही बच्चो को लेकर घर की तरफ वापिस जाने लगी। दोनों ही बच्चे बहुत उदास लग रहे थे……"कोई बात नहीं इसमें इतना उदास होने की क्या ज़रुरत हैं, किसी ओर दिन आ जायेंगे" सीमा ने दोनों बच्चो को समझाते हुए कहा।

"लेकिन माँ हमारा घूमने का बहुत मन था" यश ने कहा।

"अच्छा घर चलो मैं तुम्हारे लिए आज तुम्हारी पसंद के इडली-सांभर बनाती हूँ, मन बिल्कुल खुश हो जाएगा" सीमा बच्चों को बहलाने की कोशिश कर रही थी।

"मम्मी हम दोनों कुछ समय के लिए पिंकी और बबलू के साथ खेल ले, पड़ोस में ही तो रहते हैं, आपको चिंता भी नहीं होगी, हम जल्दी ही घर वापिस आ जायेंगे" ख़ुशी ने ज़िद की।

"हाँ बेटा रहते तो पड़ोस में ही हैं लेकिन इससे पहले आप वहाँ गए भी तो नहीं, वो लोग क्या सोचेंगे" सीमा को बच्चों का पड़ोसियों के यहाँ जाना कुछ अजीब लग रहा था।

"अरे मम्मी जायेंगे जब ही तो एक दूसरे को जानेंगे ना" यश ने भी ज़िद की।

"अच्छा बाबा जाओ लेकिन घर जल्दी वापिस आना" सीमा ने दोनों बच्चों को समझाते हुए कहा और स्वयं वापिस घर आ गई, लेकिन घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही,

"ऐ बुढ़िया, तेरी बेटी आई हुई हैं इस बात का ज्यादा फ़ायदा मत उठा वो तो दो-तीन दिन में चली जाएँगी, फिर देखती हूँ तू कैसे कामचोरी करती हैं, चल उठ इतने सारे झूठे बर्तन पड़े हैं साफ़ कर" प्रीती का ऐसा व्यवहार देख सीमा के तो मानो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी। सीमा ने किसी प्रकार अपने आप को सँभालते हुए घर में प्रवेश किया,

"भाभी ये तुम माँ से कैसे बात कर रही हो, थोड़ी तो शर्म करो माँ तुमसे इतना प्यार करती हैं और तुमने उनको नौकर बना कर रखा हुआ हैं" सीमा ने प्रीती से शिकायती लहज़े में कहा।

 "दीदी आप तो चुप ही रहिए, वैसे भी हमारे घर के मामलों में आपका बोलने का हक़ नहीं बनता है।" प्रीती गुस्से में थी।

"हाँ भाभी मैं जानती हूँ घर आपका हैं लेकिन माँ तो मेरी भी हैं ना, और मैं अपनी माँ के ऊपर जुल्म होते हुए कैसे देख सकती हूँ" सीमा अपना आपा खो चुकी थी।

"दीदी अगर आपसे नहीं देखा जा रहा हैं तो आप यहाँ से चली क्यों नहीं जाती हो" प्रीती ने बहुत ही बेरुखी से यह बात कही।

"चिंता मत करो भाभी चली जाऊँगी वैसे भी मुझे अब तो आपकी शक्ल से भी नफरत हो गयी हैं, लेकिन इस बार माँ को साथ लेकर जाऊँगी" सीमा के स्वर में प्रीती के ऊपर गुस्सा था।

"बंद करो ये लड़ाई, मुझे घबराहट हो रही हैं, और मुझे कही नहीं जाना हैं जैसी भी हूँ यही पर अच्छी हूँ" कुमुद ने लड़ाई रोकने की कोशिश की।

"माँ तुम्हारे ऊपर जुल्म हो रहे हैं और तुम उनको क्यों सहन कर रही हो?" सीमा ने आश्चर्य से पूछा।

"तू नहीं समझेगी बेटी, अगर मैं तेरे साथ तेरे घर चली तो समाज क्या कहेगा और अगर प्रीती ने दो बातें सुना भी दी तो क्या हो गया थोड़ी बहुत कहा-सुनी तो हर घर में होती हैं" कुमुद ने बात को खत्म करने के इरादे से कहा।

"माँ तुम ऐसा क्यों कर रही हो, क्यों इतने जुल्म सह रही हो, अगर तुम्हे समाज का डर है तो यह बहुत गलत हैं माँ" सीमा ने कुमुद को समझाने की कोशिश की, लेकिन कुमुद ने सीमा से चुप रहने का इशारा किया। सीमा उस वक़्त तो चुप हो गयी लेकिन थोड़ी देर बाद……"माँ मैं आज रात की ट्रेन से ही वापिस जा रही हूँ" सीमा ने कुमुद के कमरे में आकर कहा।

"सीमा बेटा तू मेरे पास आकर बैठ" कुमुद ने सीमा को अपने पास बुलाया, कुछ सोचते हुए सीमा कुमुद के पास आकर बैठ गयी,

"बोलो माँ क्या कहना चाहती हो" सीमा ने रूखेपन से पूछा।

"सीमा लड़ाई किस घर में नहीं होती, अरे जहाँ चार बर्तन होंगे टकराएंगे तो सही ना, छोटी-सी बात को इतना बढ़ा देना ये कहाँ की समझदारी हैं और वैसे भी सीमा बुढ़ापे में बेटियाँ नहीं बेटे ही काम आते हैं और अगर प्रीती ने चार बातें सुना भी दी तो क्या फर्क पड़ता है, अब अपना दिमाग हल्का कर और आराम से रहे, तेरे तीन दिन बाद के टिकट है तो तीन दिन बाद ही जाना" कुमुद ने सीमा को समझाने की कोशिश की।

"मैं नहीं जानती माँ तुम्हारी क्या मज़बूरी हैं जो तुम इतने जुल्म सह रही हो लेकिन यह बात हमेशा याद रखना तुम्हारी बेटी हमेशा तुम्हारे साथ है।" सीमा ने कहा।

"जानती हूँ लेकिन जब तक मेरे बेटा-बहु है मुझे किसी की ज़रुरत नहीं है, और अगर बेटी से मदद माँगूगी तो समाज क्या कहेगा" कुमुद ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, लेकिन सीमा ने इसके जवाब में कुछ नहीं कहा और चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई। कुमुद अपने कमरे में बड़बड़ाते हुए……"हे भगवान जब तक सीमा यहाँ हैं सबकुछ अच्छा ही रखना अब कुछ और बवाल मत होने देना।"

शाम का वक़्त था, कुमुद रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थी और प्रीती अपने कमरे में सो रही थी इतने में सीमा आती हैं, "क्या कर रही हो माँ और भाभी कहाँ हैं" सीमा ने इधर-उधर देखते हुए पूछा।

"तेरी भाभी के सिर में दर्द था, तो मैंने ही उससे कहा, आराम कर ले, खाना मैं बना लूँगी" कुमुद ने सब्जी काटते हुए कहा, लेकिन सीमा को इस बात में ज़रा सी भी सच्चाई नज़र नहीं आई और उसने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी......"क्या सोच रही हैं, चाय पियेगी, बनाऊँ" कुमुद ने पूछा।

"नहीं माँ, तुम बैठो, मैं बनाती हूँ और खाना भी मैं ही बनाऊँगी" सीमा ने कुमुद को रसोई से बाहर निकालते हुए कहा। कुमुद की लाख कोशिशों के बाद भी उसकी एक ना चली और रसोई का मोर्चा सीमा ने संभाल लिया।

कुछ देर बाद नीरज के ऑफिस से आते ही, "क्या हो रहा हैं नारियों सबकुछ ठीक तो हैं ना" नीरज ने मज़ाक करते हुए कहा।

"हाँ बेटा सब ठीक हैं, तू बैठ मैं तेरे लिए चाय-नाश्ता लाती हूँ"  कुमुद ने नीरज से लाड लड़ाते हुए कहा।

"माँ प्रीती कहाँ हैं" नीरज ने प्रीती को ढूँढते हुए पूछा।

"बेटा वो आराम कर रही हैं, उसके सिर में दर्द था, बेचारी पूरा दिन काम करती-करती थक जाती हैं " कुमुद ने प्रीती की तारीफ़ करते हुए कहा, लेकिन सीमा के लिए यह सब-कुछ समझ पाना बहुत मुश्किल था, उसने इन सब बातों को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर समझा, उसने सोचा मैं तो दो दिन बाद चली जाऊँगी, ऐसा न हो मेरे कुछ बोलने से भाभी माँ को ज्यादा परेशान करने लगे और सीमा चुपचाप रोटी बनाने लगी।

"माँ बच्चों को बुला लो, खाना खा लेंगे" सीमा ने कुमुद को आवाज़ लगाते हुए कहा, कुमुद के कहने पर बच्चे आ गए और खाना खा कर सोने भी चले गए।

"सीमा, अब तू भी जाकर आराम कर ले, थक गई होगी, नीरज और प्रीती का खाना मैं लगा दूँगी, सीमा बिना कुछ बोले वहाँ से चली गयी।

अगले दिन सुबह, "माँजी आज दोपहर में मेरी कुछ सहेलियाँ आने वाली हैं, किटी-पार्टी रखी हैं" प्रीती ने कहा।

"हाँ बहु ठीक हैं, मेरे लायक कुछ भी काम हो तो बता देना" कुमुद ने कहा लेकिन प्रीती बिना कुछ बोले वहाँ से चली गयी, सीमा ने सबकुछ सुना लेकिन बोली कुछ नहीं।

घर का काम करते हुए कब दोपहर हो गई पता ही नहीं चला। "थोड़ी देर आराम कर लेती हूँ, फिर बहु की सहेलियाँ आ जाएँगी" कुमुद ने मन ही मन में कहा और बिस्तर पर जाकर लेट गयी और कब झपकी लग गयी पता ही नहीं चला।

"माँजी, माँजी उठिए" अचानक से प्रीती की आवाज़ सुन कुमुद की नींद खुल गई।

"क्या हुआ बहु क्यों परेशान हो" कुमुद ने नींद में से उठते हुए पूछा।

"आप भी कमाल करती हैं, मैंने पहले ही कहा था मेरी सहेलियाँ आने वाली हैं और आप सो गई, चलिए उठिए रसोई में जाकर कुछ चाय-नाश्ता बनाइए" ऐसा कह प्रीती अपनी सहेलियों के पास जाकर बैठ गयी। कुमुद उठी और रसोई की तरफ चल दी, सीमा पास वाले कमरे में ही थी, उसने भी सारी बातें सुनी लेकिन मन-मारकर रह गयी एवं अपनी माँ के पीछे-पीछे रसोई की तरफ चल दी।

"हटिए माँ, मैं चाय-नाश्ता तैयार करती हूँ।" सीमा ने कुमुद को हटाते हुए कहा।

"अरे नहीं बेटा मैं कर लूँगी" कुमुद के कहते ही,

"माँ तुम आराम करो" सीमा ने ज़िद की।

"अच्छा ठीक हैं, मैं चाय बनाती हूँ तू नाश्ते की प्लेट तैयार कर", ऐसा कह कुमुद चाय में शक़्क़र डालने लगी और सीमा नाश्ते की प्लेट तैयार करने लगी।

कुछ समय बाद, "माँ मैं नाश्ता लेकर चलती हूँ" सीमा ने कहा ,

"हाँ मैं भी चाय लेकर आती हूँ" कुमुद ने जवाब दिया।

सीमा के द्वारा नाश्ता टेबल पर रखते ही,  "प्रीती यह कौन है?" प्रीती की सहेली अनु ने पूछा। "मेरी ननद, मुंबई से आई है, परसों वापिस चली जाएगी" प्रीती ने सीमा का परिचय करवाते हुए कहा, इतने में ही कुमुद भी चाय लेकर आ गयी, "और प्रीती ये कौन हैं, तेरी नौकरानी हैं क्या" अनु ने हँसते हुए पूछा,

"अरे नहीं बाबा, यह तो मेरी सास है, लेकिन ज्यादा फर्क नहीं हैं" प्रीती के ऐसा कहते ही सारी सहेलियाँ ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी, 'चटाक', कमरे में सन्नाटा छा गया एवं सीमा के सब्र का बाँध टूट चूका था।

"भाभी इसी वक़्त अपनी सहेलियों को यहाँ से निकलने के लिए कहिए" सीमा गुस्से से लाल-पीली हो रही थी, प्रीती की सभी सहेलियाँ जा चुकी थी। प्रीती तो जैसे विश्वास ही नहीं कर पा रही थी कि सीमा ने उसे थप्पड़ मारा हैं......"माँ इसी वक़्त अपना सामान बाँधो हम आज रात की ही ट्रेन से मुंबई जायेंगे"

"लेकिन सीमा" कुमुद ने जैसे ही कुछ बोलने के लिए अपना मुँह खोला,

"बस अब एक शब्द नहीं, बहुत बर्दाश्त कर लिया तुमने, अब मैं तुम्हें एक दिन के लिए भी यहाँ नहीं छोड़ सकती" सीमा का गुस्सा देख कुमुद कुछ नहीं बोल पायी एवं दूसरी ओर प्रीती ने रोते हुए नीरज को फ़ोन कर सीमा की शिकायत कर दी, जिससे की नीरज तुरन्त घर आ जाये।

कुछ देर बाद, "सीमा, ओ सीमा, इधर आओ" नीरज बहुत गुस्से में था।

"बोलिए भैया, क्या कहना चाहते हैं " सीमा भी आवेश में थी।

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी पत्नी पर हाथ उठाने की?" नीरज ने पूछा।

"वाह भैया, आपकी पत्नी ने जो कहा वो तो सुन लिया अब मैं जो कहती हूँ वो भी सुन लो" सीमा ने ताना मारा।

"जबान लड़ाएगी मुझसे" नीरज और सीमा में बहस शुरू हो चुकी थी।

"नहीं भैया जबान नहीं लड़ा रही हूँ, बल्कि तुम्हें  सच से रूबरू करवा रही हूँ उस सच से जिसको की तुम इस घर में रह कर नहीं समझ पाये" सीमा ने जैसे फैसला कर लिया था, आज तो अपनी माँ को इंसाफ दिलवा कर ही रहेगी और सीमा ने सारी बातें नीरज को बता दी लेकिन हद तो तब हो गयी जब नीरज ने सारी सच्चाई जानने के बाद भी प्रीती का ही पक्ष लिया,

"मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं कि अगर प्रीती ने कुछ कह भी दिया तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ा" नीरज ने कहा।

"भैया तुम्हें ये क्यों नहीं समझ आ रहा भाभी ने माँ से बदतमीज़ी से बात की" सीमा को नीरज का यह व्यवहार बहुत बुरा लगा।

 "प्रीती माँ का ध्यान रखती हैं, उनकी वजह से हमारी कोई अपनी ज़िन्दगी नहीं हैं ,कहीं भी बाहर जाने से पहले माँ के बारे में सोचना पड़ता हैं, यह सब बातें तो किसी को दिखाई नहीं देती, दो शब्द प्रीती ने क्या बोल दिए तुमने तो उसके खिलाफ मोर्चा ही निकल दिया" नीरज भी पूरे आवेश में था।

"भैया मुझे लगा था सारी बातें सुनने के बाद तुम्हें माँ की तक़लीफ़ समझ में आएगी, लेकिन तुम तो पूरी तरह से बीवी के ग़ुलाम बन चुके हो।" सीमा ने कहा।

"अगर तुझे इतनी ही चिंता हैं माँ की, तो अपने साथ क्यों नहीं लेकर जाती, जिससे की हमें भी ज़िम्मेदारियों से मुक्ति मिले" ऐसा लग रहा था जैसे नीरज ने अपने दिल की भड़ास निकाल दी हो।

"बस भैया इसके आगे एक शब्द भी मत बोलना, अब माँ मेरे साथ ही  रहेगी।"सीमा दनदनाती हुई कमरे से बाहर निकल गयी। कुमुद वही दरवाज़े के पास खड़ी सबकुछ देख-सुन रही थी लेकिन अब उसकी कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं रही थी, दूसरी ओर प्रीती, नीरज की सहानुभूति पाने के लिए लगातार अपने कमरे में रोए जा रही थी एवं बच्चे भी बहुत ही डरे हुए थे......"माँ……मैंने तुम्हारा सामान बाँध लिया हैं, हम आज रात की ही ट्रेन से जा रहे हैं।" सीमा ने कुमुद से कहा।

"लेकिन बेटा" कुमुद कुछ बोलती उससे पहले ही,

"बस माँ अब तुम कुछ नहीं बोलोगी, फैसला हो चुका हैं, तुम मेरे साथ ही रहोगी" सीमा ने कुमुद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

"बेटा बच्चों को भूख लग रही होगी, कुछ खाना तो खिला देती" कुमुद ने सीमा से आग्रह किया।

"माँ स्टेशन पर कुछ खिला दूँगी, अभी टिकट भी तो लेने हैं, इस घर का तो हमे पानी भी नहीं पीना चाहिए, माँ मैं ऑटो लेकर आती हूँ, तुम बच्चों के साथ बाहर आओ" ऐसा कह सीमा ऑटो लेने चली गयी।

स्टेशन पर टिकट लेने की कार्यवाही पूरी कर सीमा सभी के लिए खाने का सामान ले आई।  "चलो माँ कुछ खा लेते हैं बहुत भूख लग रही हैं" सीमा ने कहा।

"हाँ बेटा" कुमुद ने भी सीमा की बात का समर्थन किया। कुमुद सीमा को खाना खाते हुए देख रही थी और सोच रही थी आज मैंने पहली बार अपनी बेटी का यह रूप देखा हैं, कितनी गलत थी मैं, उम्मीदें तो बेटे से थी लेकिन उनको पूरा किया बेटी ने, आज से मुझे अपने बेटे पर नहीं बल्कि बेटी पर गर्व हैं।

 अचानक से चिड़ियों की आवाज़ सुन कुमुद वर्तमान में आ गयी। "अरे सुबह हो गई, पता ही नहीं चला" कुमुद अपने आप से ही बात करने लगी और सीमा के डर से आँख मूंद कर ऐसे लेट गई, जैसे बहुत ही गहरी नींद में सो रही हो।                                  

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