Ehsaas Ishq Ka (Story On Love}
हर
कदम तू चलना मेरे साथ ऐ मेरे हमसफ़र
ना
छोड़ना गमों के भवरं में तन्हा ऐ मेरे हमसफ़र
यह कहानी राहुल की हैं ,राहुल इंजीनियरिंग कॉलेज में सिविल ब्रांच के थर्ड ईयर में पढ़ने वाला
छात्र था। राहुल के तीन दोस्त भी थे जो हर पल उसके साथ ही रहते थे, यश, नमन और अंकित। जब यह चारों मिल जाते तब तो मानो
प्रलय ही आ जाता, पूरा कॉलेज ही इनकी शरारतों से परेशान रहता
था, कभी किसी लड़की को छेड़ना, कभी
जूनियर छात्रों को परेशान करना तो कभी क्लास में प्रोफेसर को पढ़ाने नहीं देना। कई
बार तो कॉलेज के प्रिंसिपल के द्वारा इन चारों के घरों से इनके माता-पिता को भी
बुलवाया गया और इनकी शिकायत की गई, लेकिन नतीजा कुछ नहीं
निकला, क्योंकि यह चारों ही बड़े बाप की बिगड़ी हुए औलादे थी, इनकी सबसे बड़ी ताक़त
इनके बाप का पैसा था। कॉलेज के प्रोफेसर और छात्र यह सोच कर अपने आप को तसल्ली
देते कि चलो कोई बात नहीं अब इन चारों का एक साल ही बचा हैं वो भी जैसे तैसे निकल
जायेगा।
एक दिन
प्रोफेसर शुक्ला की क्लास चल रही थी ,"सर क्या हम अंदर आ सकते हैं?" राहुल ने पूछा,
"हाँ आ सकते हो, लेकिन यह क्लास में आने का वक़्त हैं? तुम्हें पता होना चाहिए क्लास कितने बजे शुरू होती हैं।" प्रोफेसर
शुक्ला ने गुस्से में कहा,
"क्या हुआ सर इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो, अपनी बीवी
से लड़ कर आए हो क्या?" ऐसा कह राहुल ज़ोर-ज़ोर से हँसने
लगा और उसके बाकी दोस्त भी उसका साथ देने लगे ,यह बात वहाँ
बैठे किसी भी छात्र एवं छात्रा को अच्छी नहीं लगी एवं प्रोफेसर शुक्ला भी क्लास
बीच में ही छोड़कर चले गए।
"चल
राहुल कैंटीन में चलकर बैठते हैं।" यश ने कहा, लेकिन राहुल कुछ बोलता उससे पहले ही
"तुम
लोग खुद तो पढ़ते नहीं हो कम से कम हमें तो पढ़ने दिया करो" क्लास का एक छात्र
गुस्से से बोला,
"अरे, छोटे बच्चे को गुस्सा आ गया अब घर जाकर मम्मी
से शिकायत भी करेगा" राहुल के ऐसा कहते ही राहुल और उसके दोस्त ज़ोर -ज़ोर से
हँसने लगे और क्लास से बाहर निकल गए और कैंटीन में जाकर बैठ गए। कुछ ही देर में
वहाँ एक खूबसूरत लड़की ने प्रवेश किया जो दिखने में बहुत ही साधारण-सी थी लम्बे बाल, सलवार-सूट पहना हुआ और हाव-भाव से किसी साधारण परिवार की लग रही थी।
राहुल तो बस उसे देखता ही रह गया, "राहुल वो देख यार
लड़की, पहली बार देखा हैं इसको तो, लगता हैं लेट एडमिशन हैं।"
अंकित ने राहुल से नई लड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा............. "चलो दोस्तों जान-पहचान बनाते हैं।" अंकित के ऐसा कहते ही चारों दोस्त
उस लड़की की तरफ चल दिए, और उसके पास खड़े होकर
"तुम्हें
दिखाई नहीं देता हम आए हैं झुक कर नमस्ते करो " नमन ने उस लड़की को डराते हुए
कहा,
"जी, नमस्ते" लड़की के कहते ही,
"हाँ
ठीक हैं अब अपना नाम, क्लास, ब्रांच और अपने लेट एडमिशन का कारण बताओ" नमन ने पूछा,
"जी मेरा नाम नेहा हैं, क्लास फर्स्ट ईयर एवं
कंप्यूटर ब्रांच" नेहा ने जल्दी से सारे जवाब दे दिए।
"क्या बात हैं लड़की होशियार हैं, अब अपने लेट एडमिशन का कारण भी बताओ
देवी" यश ने कहा,
"जी, वो मेरे पापा बैंक में मैनेजर हैं, अभी कुछ दिन
पहले ही उनका ट्रांसफर नागपुर से यहाँ मुंबई में हुआ हैं, इसी वजह से मेरा एडमिशन
लेट हुआ हैं।" नेहा ने सबकुछ जल्दी से बता दिया,
"ओह... बहुत अच्छे, जानती हो हम कौन हैं?"
अंकित ने पूछा"
"जी
नहीं" नेहा ने जवाब दिया,
"कोई बात नहीं लेकिन इतना जान लो जब हमारे सामने आओ सिर झुकाकर नमस्ते करना
और हमारी हर आज्ञा का पालन करना समझी।" अंकित के ऐसा कहते ही
"रहने
दे ना अंकित परेशान मत कर" ऐसा कह राहुल अपने बाकी दोस्तों को लेकर कैंटीन से
बाहर निकल गया।
"क्या
हुआ राहुल तुझे इतनी दया क्यों आ रही हैं उस लड़की पर" अंकित ने पूछा,
"कुछ नहीं यार वो बहुत डरी हुई लग रही थी" राहुल ने कहा,
"डरी हुई थी तो इससे हमें क्या, कहीं तू उससे प्यार
तो नहीं कर बैठा" अंकित के कहते ही,
"प्यार और मैं! वो भी उस सलवार-सूट पहनने वाली लड़की से अरे यारों राहुल का
प्यार तो जीन्स और मिनी स्कर्ट वाला होगा।" राहुल के कहते ही चारों दोस्त
ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
हक़ीक़त तो यह
थी कि राहुल को नेहा से पहली ही नजर में प्यार हो गया था, लेकिन वो यह बात मानने
के लिए तैयार नहीं था, उसे लग रहा था कि वो
इतनी साधारण-सी दिखने वाली लड़की से कैसे प्यार कर सकता हैं, दूसरी
और देर से एडमिशन होने की वजह से नेहा को पुराने नोट्स पर भी काम करना पड़ता था,
इस वजह से उसे अक्सर कॉलेज से निकलने में देर हो जाया करती थी। आज
भी नेहा को घर पहुँचने में शाम के सात बज गए,
"नेहा,
आज तो तुम ज्यादा ही लेट हो गई हो, आखिर ऐसा
कब तक चलेगा?" नेहा की माँ वंदना ने पूछा,
"मम्मी तुम भी ना बेकार में ही चिंता करती हो, बस कुछ
दिनों की ही बात हैं जैसे ही मेरा काम पूरा हो जायेगा मैं वक़्त पर घर आ जाया करूँगी।"
नेहा ने वंदना को तसल्ली देते हुए कहा।
"अच्छा ठीक हैं अब खाना खाकर आराम कर ले थक गई होगी" ऐसा कह वंदना,
नेहा के लिए खाना लगाने लगी।
कुछ दिनों बाद,
रोज़ाना की
तरह आज भी नेहा को कॉलेज से निकलने में देर हो गई, "हे भगवान! आज भी देर हो गई, मम्मी चिंता कर रही होगी,
मैं फ़ोन कर देती हूँ" नेहा खुद से ही बड़बड़ाते हुए अपनी मम्मी को
फोन लगाने लगी, "मम्मी मैं कॉलेज से निकल गई हूँ,
बस कुछ ही देर में घर पहुँच जाऊँगी, आप चिंता
मत करना।" नेहा ने कहा,
"बेटा तू कहे तो तेरे पापा को भेज दूँ लेने के लिए अभी-अभी बैंक से वापिस
आए हैं।" वंदना ने घबराते हुए पूछा,
"नहीं मम्मी मैं आ जाऊँगी" एवं नेहा ने फ़ोन रख दिया और ऑटो वाले को
बुलाने लगी "ऑटो, मीरा रोड चलोगे भैया" नेहा ने
ऑटो वाले से पूछा,
"हाँ चलेंगे मैडम, बैठिये" ऑटो वाले के कहते ही
नेहा ऑटो में बैठ गई और ऑटो रवाना हो गया, लेकिन कुछ ही दूर
जाने के बाद ऑटो बंद हो गया,
"क्या हुआ भैया?" नेहा ने पूछा,
"लगता हैं मैडम जी गैस खत्म हो गई, आप को दूसरा ऑटो
करना पड़ेगा" ऑटो वाले को थोड़ा अफ़सोस हुआ कि नेहा को उसकी वजह से परेशानी हुई,
"कोई बात नहीं" और नेहा दूसरे ऑटो की तलाश में आगे निकल गई, कुछ ही
दूर चली होगी, राहुल के बाकी तीनों दोस्त उसे रास्ते में मिल
गए और उसका पीछा करने लगे, नेहा उनको नजरंदाज करते हुए आगे
बढ़ गई, लेकिन उनमें से नमन अचानक से नेहा के सामने आ गया और उसे परेशान करने लगा,
"प्लीज, मुझे जाने दीजिये" नेहा ने
विनती की, लेकिन उसने नेहा की एक ना सुनी, उसी समय वहाँ एक गाड़ी आकर रुकी और उसमें से राहुल उतरा
"क्या बात हैं भाइयों लड़की को परेशान किया
जा रहा हैं?" राहुल ने पूछा,
"अरे, राहुल तू, आजा भाई थोड़ी
मस्ती करेंगे" यश ने हँसते हुए कहा,
"नहीं यार बहुत देर हो गई हैं, इसे घर जाने दो इसके घरवाले परेशान हो रहे
होंगे।" राहुल को अपने दोस्तों का नेहा को यूँ परेशान करना अच्छा नहीं लगा,
"क्या यार राहुल थोड़ी तो मस्ती करने देता" अंकित ने उदास होते हुए कहा,
"उदास क्यों होता हैं यार चल कोई दूसरी लड़की छेड़ेंगे, आखिरकार लड़की छेड़ने लायक भी तो होनी चाहिए।" राहुल ने अंकित को मनाते
हुए कहा और चारों दोस्त वहाँ से चले गए, लेकिन इस घटना के बाद से नेहा को राहुल और
उसके बाकी दोस्तों से नफरत हो गई।
नेहा के घर
पहुँचने के बाद, "नेहा बेटा इतनी देर कहाँ
लगा दी, फ़ोन भी नहीं उठा रही थी, तुझे
अंदाजा भी हैं हम कितना परेशान हो रहे थे" वंदना ने शिकायती लहज़े में कहा और
नेहा ने रास्ते में हुई सारी घटना विस्तार से सुना दी।
"हे भगवान, कैसा ज़माना आ गया है लड़कियाँ अकेली घर से
बाहर जाए, ऐसा तो सोचना भी पाप हो गया हैं।" वंदना ने
चिंतित होते हुए कहा,
"नेहा कल से तुम जल्दी घर आया करोगी, और तुम्हें कॉलेज छोड़ने एवं कॉलेज से
लाने के लिए मैं आऊँगा" नेहा के पिता अरुण ने कहा,
"पापा आप चिंता मत करिए अब में बड़ी हो गयी हूँ सब संभाल लूँगी।" नेहा
ने कहा,
"बहस मत करो खाना खा कर सो जाओ बहुत देर हो गई हैं। " अरुण ने नेहा को
डाँटते हुए कहा,
"जी पापा" नेहा बिना कोई बहस किये खाना खाकर अपने कमरे में सोने चली
गई।"
"क्यों
ना हम नेहा को एक स्कूटी दिलवा दे उससे उसको भी आराम हो जाएगा और हमारी फ़िक्र भी
कम हो जाएँगी।" वंदना ने नेहा के जाने के बाद अरुण से कहा।
"हाँ शायद तुम सही कह रही हो मैं कल ही नयी स्कूटी खरीद देता हूँ।"
अरुण ने अपनी सहमति देते हुए कहा।
अगले दिन
कॉलेज की कैंटीन में, "नेहा तेरे
नोट्स पूरे हो गए क्या?" नेहा की दोस्त राशि ने पूछा,
"अरे नहीं यार अभी बच रहे हैं दो, तीन दिन और लगेंगे
काम पूरा होने में" नेहा ने कहा,
"चल कोई बात नहीं जब तेरा काम पूरा हो जाए तब बताना हम सभी फ्रेंड्स मिलकर
कोई अच्छी सी मूवी देखने चलेंगे।" राशि ने खुश होते हुए कहा,
"हाँ हाँ ज़रूर चलेंगे और ढेर सारी मस्ती भी करेंगे।" नेहा की दोस्त
प्रिया ने चहकते हुए कहा, इतने में ही कैंटीन में राहुल और
उसके दोस्तों ने प्रवेश किया,
"चलो अब यहाँ से चलते हैं" नेहा ने कहा,
"क्या हुआ अभी तो आए हैं थोड़ी देर में चलते हैं।" राशि ने कहा,
"तुम लोग बैठों, मैं जा रही हूँ।" नेहा उठने लगी,
लेकिन राशि ने उसे रोक लिया,
"क्या
हुआ कोई परेशानी हैं क्या? " राशि ने पूछा,
और नेहा ने अपने दोस्तों को पिछली रात वाली सारी बात बता दी,
"मुझे इन लड़कों से नफरत हो गई हैं मेरा बस चले तो इनका चेहरा भी ना
देखूँ" नेहा ने गुस्से में कहा,
"अब अपना दिमाग ख़राब मत कर, ये लोग तो ऐसे ही हैं,
इनसे तू ही नहीं बल्कि पूरा कॉलेज परेशान हैं।" प्रिया ने कहा,
दूसरी ओर जब से राहुल और उसके दोस्तों ने कैंटीन में प्रवेश किया
राहुल की नज़रे बार-बार नेहा को देखने के लिए व्याकुल हो रही थी,
"क्या बात हैं यार लड़कियों को निहार रहा हैं, कोई पसंद आ गई क्या?
" अंकित ने राहुल को छेड़ते हुए कहा,
"चुप कर इनमें से कोई भी लड़की राहुल के लिए नहीं बनी हैं, राहुल के लिए तो लड़की परीलोक से आएगी" राहुल ने कहा,
"चलो दोस्तों शुक्ला की क्लास का वक़्त हो रहा हैं, अगर
देर से पहुँचे तो आज फिर चिक-चिक करेगा" अंकित ने सबको प्रोफेसर शुक्ला के
बारे में याद दिलाते हुए कहा, और चारों दोस्त कैंटीन से
निकलकर क्लास की ओर चल दिए।
एक हफ्ते बाद
,
ट्रिन-ट्रिन, नेहा के फ़ोन की घंटी बजती हैं,
"हैलो" नेहा के कहते ही,
"नेहा में प्रिया बोल रही हूँ, हम सोच रहे थे कि अगर
तू आज फ्री हो तो कॉलेज के बाद मूवी देखने चले"
"हाँ, मैं चल तो सकती हूँ, लेकिन
एक बार मम्मी से पूछना पड़ेगा।" नेहा ने प्रिया से कहा,
"हाँ पूछ ले फिर कॉलेज में आकर बता देना की आंटी ने क्या कहा" प्रिया
ने कहा और दोनों ने ही फ़ोन रख दिया।
कॉलेज पहुँचकर
"हाय फ्रेंड्स, मेरी मम्मी ने तो
मूवी जाने की इज़ाज़त दे दी हैं, तुम बताओ तुम्हारी मम्मी ने
क्या कहा" नेहा ने चहकते हुए कहा,
"हम सब की मम्मी ने भी इज़ाज़त दे दी हैं, हुर्र आज
बहुत सारी मस्ती करेंगे, और हाँ सब अपनी-अपनी स्कूटी से ही
चलेंगे।" राशि ने खुश होते हुए कहा,
दूसरी और इन
तीनों की यह बातें यश सुन रहा था, "क्या बात
हैं, एक छोटा-सा मज़ाक तो बनता हैं।" यश ने मन ही मन कहा
और एक ऐसी शरारत कर दी जो उसे नहीं करनी चाहिए थी।
"चलो
फ्रेंड्स मुझे मूवी की शुरुआत मिस नहीं करनी हैं।" नेहा ने कहा
"हाँ-हाँ
जल्दी चलो मुझे भी फिल्म शुरूआत से ही देखनी हैं।" राशि ने कहा एवं तीनों ही
सहेलियाँ फिल्म देखने के लिए अपनी-अपनी स्कूटी से निकल गई,
कुछ ही दूर
चली होंगी कि नेहा को एकदम से झटका लगा ,"हे भगवान, मेरी स्कूटी के तो ब्रेक ही काम नही कर
रहे, ऐसा करती हूँ पहले स्कूटी की गति धीमी करती हूँ फिर रोक
दूँगी।" नेहा बड़बड़ाने लगी लेकिन सामने से एक गाड़ी आती हुई दिखाई दी, नेहा उससे बचने के लिए कुछ कर पाती इससे पहले ही बहुत तेज आवाज़ हुई और सब
कुछ बिखर गया, सड़क के बीचों-बीच नेहा खून से लथपथ पड़ी थी
दूसरी ओर उसकी स्कूटी पड़ी हुई थी, भीड़ एकत्रित हो चुकी थी।
"कहाँ
गया वो गाड़ी वाला, लगता है भीड़ का फायदा उठा कर भाग गया।" भीड़ में से किसी की
आवाज़ आई,
तुरंत ही किसी भले इंसान ने एम्बुलेंस बुलवा ली।
लेकिन दूसरी
ओर राशि ने पीछे मुड़ कर देखा "अरे, नेहा
नहीं दिखाई दे रही।"
कुछ ही देर
में प्रिया भी राशि के पास पहुँच गई,
"प्रिया तूने नेहा को देखा पता नहीं कहाँ रह गई,
दूर-दूर तक कहीं भी नहीं दिखाई दे रही हैं।" राशि ने चिंतित
स्वर में कहा,
"उसके मोबाइल पर फ़ोन कर लेते हैं पता चल जायेगा क्या हुआ हैं।" प्रिया
ने चिंतित स्वर में कहा और नेहा को फ़ोन करने लगी,
ट्रिन-ट्रिन,
"हैलो" सामने से किसी अनजान व्यक्ति की आवाज़ आई,
"आप कौन
बोल रहे है, यह फ़ोन तो नेहा का हैं ,आपके पास कैसे आया" प्रिया के स्वर में घबराहट थी,
"जी यह जिनका फ़ोन हैं उनका यहाँ मोक्ष प्लाजा, बोरीवली
के सामने एक्सीडेंट हो गया हैं उन्हें सिटी अस्पताल ले जाया जा रहा हैं।" उस
अनजान व्यक्ति ने प्रिया से कहा,
"क्या हुआ?" राशि ने पूछा,
"फ़ोन पर कोई अनजान व्यक्ति था, कह रहा था नेहा का
एक्सीडेंट हो गया हैं।" प्रिया ने घबराते हुए कहा
"चलकर
देखते हैं क्या हुआ हैं।" ऐसा कह दोनों ही अपनी-अपनी स्कूटी ले मोक्ष प्लाजा
की ओर चल दी, वहाँ पहुँचकर भीड़ देख दोनों ही
घबरा गई , और राशि ने तुरंत अपने फ़ोन से नेहा के घर फ़ोन कर
दिया।
ट्रिन-ट्रिन "हैलो" दूसरी ओर से आवाज़ आयी,
"हैलो आंटी, मैं नेहा की दोस्त राशि बोल रही हूँ, आप
तुरंत सिटी अस्पताल पहुँच जाइए।"
"क्यों क्या हुआ सब ठीक तो हैं ना, नेहा तो ठीक हैं
ना" वंदना ने घबराते हुए पूछा,
"जी आंटी वो नेहा का एक्सीडेंट हो गया हैं" राशि के स्वर में हकलाहट
थी,
"हे भगवान! ये क्या हो गया, हम अभी पहुँचते हैं बेटा"
ऐसा कह वंदना ने तुरंत फ़ोन रख दिया।
सिटी अस्पताल
में,
"डॉ. साहब मेरा नाम अरुण हैं, मैं नेहा
का पिता हूँ, मेरी बेटी कैसी हैं, जल्द
ठीक तो हो जाएगी ना आप कुछ बोलते क्यों नहीं" अरुण के स्वर में उत्सुकता थी,
"शांत हो जाइए अरुण जी हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं, बस आप लोग ऊपर वाले से दुआ कीजिये" डॉ. निशांत ने अरुण को ढाँढ़स
बंधाते हुए कहा, अस्पताल में उदासी फैली हुई थी, चाहे नेहा के माता-पिता हो या दोस्त सब ही भगवान से नेहा के ठीक होने की
दुआ माँग रहे थे।
कुछ ही देर
बाद डॉ. निशांत आते हैं, "क्या हुआ डॉ.
साहब, नेहा अब कैसी हैं?"अरुण एवं
वंदना ने एक साथ डॉ. निशांत से पूछा,
"शांत रहिये, अब आप दोनों को हिम्मत से काम लेना
होगा" डॉ. निशांत के ऐसा कहते ही अरुण एवं वंदना घबरा गए,
"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, नेहा ठीक तो हैं ना " वंदना ने पूछा,
"नहीं, नेहा ठीक नहीं हैं उसके शरीर का निचला हिस्सा
लकवाग्रस्त हो गया हैं, शायद वो अब कभी चल ना पाए" डॉ.
निशांत ने निराशाजनक स्वर में कहा,
"मैं नेहा से बात करना चाहती हूँ।" वंदना ने रोते हुए कहा,
"देखिए वंदना जी नेहा अभी बेहोश हैं, आप उससे बात
नहीं कर सकती, होश में आते ही हम उससे आपकी बात करवा देंगे,
आप सब लोग घर जाये यहाँ सिर्फ एक ही जना रुक सकता हैं।" ऐसा कह
डॉ. निशांत अपने केबिन की तरफ चले गए,
"बेटा
बहुत देर हो गई हैं अब तुम दोनों भी घर जाओ" अरुण ने राशि और प्रिया से कहा,
"जी अंकल, अब हम चलते हैं, अगर
आपको हमसे कुछ काम हो तो बता दीजियेगा हम आ जायेंगे।" प्रिया ने कहा,
"धन्यवाद बेटा " अरुण ने कहा और उदास होते हुए वंदना के पास जाकर बैठ
गया।
कॉलेज में
लगभग सभी को नेहा के एक्सीडेंट के बारे में पता चल चुका था,
वहाँ का माहौल बहुत ही उदासीन था, हर तरफ एक
ही चर्चा थी नेहा अब कब ठीक हो पायेगी,
उसी वक़्त
राहुल अपने दोस्तों के साथ कॉलेज में प्रवेश करता हैं "अरे यारों, आज कॉलेज में इतना सन्नाटा
क्यों हैं, कोई मर गया हैं क्या" राहुल ने अपने दोस्तों से पूछा,
"पता नहीं, चलो किसी से पूछते हैं " नमन ने कहा,
"यहाँ पर कुछ हुआ हैं क्या?" नमन ने एक लड़के से
पूछा, और फिर उस लड़के ने नेहा के एक्सीडेंट वाली सारी बात
विस्तार से बता दी, जिसे सुन राहुल के तो जैसे पैरों तले
ज़मीन ही खिसक गई,
"अरे यह कैसे हो गया मैनें तो छोटा-सा मज़ाक ही किया था " यश के ऐसा
कहते ही,
"मज़ाक, कैसा मज़ाक, मैं कुछ समझा
नहीं" राहुल ने यश से पूछा, और उसने नेहा की स्कूटी के
ब्रेक-फेल करने वाली बात बता दी, "तड़ाक" आज पहली
बार राहुल ने अपने किसी दोस्त पर हाथ उठाया था।
"यार
राहुल मैनें जानबूझकर कुछ नहीं किया मैनें
तो बस एक छोटा-सा मज़ाक किया था।" यश ने कहा, लेकिन राहुल कुछ भी सुने बिना कॉलेज से निकल गया और अस्पताल पहुँचकर,
"नमस्ते अंकल, मैं राहुल, नेहा के
कॉलेज में पढ़ता हूँ , नेहा अब कैसी हैं।" राहुल के
पूछते ही "राहुल, तुम वो ही होना जो अपने दोस्तों के
साथ मिलकर बाकी बच्चों को परेशान करता रहता हैं " वंदना ने गुस्से से पूछा,
"जी, आंटी" राहुल ने धीमी आवाज़ में कहा,
"इसी वक़्त चले जाओ यहाँ से हमें तुमसे कोई बात नहीं करनी हैं।" वंदना
का चेहरा गुस्से से लाल था , अरुण ने वंदना को शांत होकर
बैठने का इशारा किया और राहुल से जाने के लिए कहा , लेकिन
राहुल जाने के बजाए वही अस्पताल के बाहर बैठा रहा , आज राहुल
को अहसास हो रहा था कि वो नेहा से प्यार करने लगा हैं , वो
एक बार नेहा को देखना चाहता था, उससे बातें करना चाहता था।
लेकिन यह सब करना उसके लिए आसान नहीं था क्योंकि उसकी हरकतों की वजह से उसकी छवि
सभी लोगों के सामने ख़राब हो चुकी थी, और कहीं ना कहीं नेहा की इस हालत का
ज़िम्मेदार वो अपने-आप को मान रहा था। क्योंकि एक्सीडेंट उसके दोस्त यश की वजह से
ही हुआ था।
ट्रिन ट्रिन ,
''हैलो , कौन बोल रहा हैं? " राशि ने
पूछा,
"हैलो राशि में राहुल, तुमसे एक मदद चाहिए, प्लीज मना मत करना" राहुल के स्वर में आग्रह था,
"लेकिन मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूँ?" राशि ने पूछा,
"मुझे एक बार नेहा से मिलना हैं, मैं उसे देखना चाहता
हूँ और मैं जानता हूँ तुम मेरी मदद कर सकती हो" राहुल के ऐसा कहते ही,
"मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं कि अचानक से तुम्हारे दिल में नेहा के लिए
इतनी सहानुभूति क्यों " राशि ने पूछा,
"क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूँ लेकिन अभी तक समझ नहीं पा रहा था और अब
मैं समझ गया हूँ तो नेहा मेरे साथ नहीं हैं " राहुल ने लगभग रोते हुए यह बात
कही,
"मैं कोशिश करती हूँ लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा क्योंकि नेहा की मम्मी
तुमसे बहुत नफरत करती हैं" राशि ने अपनी मज़बूरी बताई,
"मैं जानता हूँ लेकिन प्लीज कोशिश करो मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारा अहसानमंद
रहूँगा" राहुल ने कहा,
"ठीक हैं, मैं कोशिश करती हूँ" राशि के ऐसा कहते
ही दोनों ने ही फ़ोन रख दिया। दूसरी ओर राशि ने तुरंत प्रिया को फ़ोन किया एवं राहुल
से हुई सारी बात बताई और दोनों ने फैसला किया की वो राहुल की मदद करेंगी एवं दोनों
ही अस्पताल के लिए रवाना हो गई।
"अरे! तुम दोनों यहाँ, बेटा तुमनें क्यों तकलीफ की
नेहा तो अभी किसी से बात ही नहीं कर सकती" वंदना ने राशि और प्रिया को देखते
हुए कहा।
"हम जानते हैं आंटी, हम तो आपसे मिलने आ गए"
राशि ने कहा,
"अच्छा, आओ बैठो" वंदना ने कहा, और दोनों ही वंदना के पास बैठ गई लेकिन राशि के मन में कशमकश चल रही थी कि
राहुल को अस्पताल कैसे बुलाए फिर भी उसने कोशिश की
"आंटी ,
क्यों ना आप और अंकल थोड़ी देर के लिए घर चले जाते, यहाँ तो हम दोनों
हैं वैसे भी कोई काम होगा तो हम आपको बुला लेंगे" राशि ने कहा।
"धन्यवाद बेटा, लेकिन इसकी जरुरत नहीं हैं, बल्कि तुम दोनों घर जाओ, अगर देर हो गई तो तुम्हारे घर वाले परेशान हो
जायेंगे।" अरुण ने दोनों को ही समझाते हुए कहा,
"वो तो ठीक हैं अंकल लेकिन अगर हम आपके ही बच्चे होते तो क्या फिर भी आप हमारे
भरोसे नेहा को छोड़कर घर नहीं जाते" राशि ने भावुक होते हुए कहा,
"अच्छा ठीक हैं, मैं और तुम्हारी आंटी थोड़ी देर के
लिए घर हो आते हैं, जब तक तुम दोनों यहाँ बैठो लेकिन कोई भी जरुरत हो तो मुझे फ़ोन
करना।" अरुण ने कहा, और अरुण और वंदना घर जाने के लिए निकल गए। उन दोनों के
जाते ही राशि ने राहुल को फ़ोन किया और अस्पताल आने के लिए कहा, राहुल अस्पताल के नज़दीक ही था वो तुरंत आ गया।
"धन्यवाद राशि मैं तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूँगा" राहुल ने भावुक
होते हुए कहा,
"बेकार की बातों में वक़्त बर्बाद मत करो जल्दी से नेहा से मिल लो, कोई आ गया तो हम पर आफत आ जाएगी" प्रिया ने कहा और राहुल को लगभग
नेहा के कमरे की तरफ धकेल दिया। कमरे में जाते ही राहुल के कदम थम गए, वहाँ का दृश्य देख उसकी आँखों में आँसू आ गए नेहा कोमा में थी, उसकी स्थिति बहुत खराब थी, राहुल उसके पास जाकर बैठ
गया और एकटक होकर उसे देखता रहा, राहुल की आँखों से लगातार
आँसू बह रहे थे, वो बार-बार नेहा से माफ़ी माँग रहा था,
इस वक़्त नेहा के कमरे का माहौल बहुत ही ग़मगीन था,
इतने में ही
राशि आती हैं "राहुल अब तुम जाओ,
अगर अंकल, आंटी आ गए तो मेरी शामत आ जाएगी
" राशि ने राहुल से विनती करते हुए कहा और राहुल वहाँ से चुपचाप बाहर निकल
गया उसका ये व्यवहार प्रिया और राशि को कुछ अजीब लगा लेकिन उन्होंने इस तरफ ज्यादा
ध्यान नहीं दिया और चैन की सांस ली की किसी के भी आने से पहले उन्होंने अपना वादा
पूरा कर दिया।
राहुल कॉलेज की कैंटीन में उदास बैठा हुआ था,
उसकी परेशानी का कारण नेहा की हालत थी और उसके लिए कुछ भी नहीं कर
पाने का दुःख, इतने में ही कैंटीन में यश आ गया, जिसे देख राहुल वहाँ से उठकर जाने लगा "राहुल मुझे माफ़ कर दो,
मुझे नहीं पता था मेरा मज़ाक इतना खतरनाक मोड़ ले लेगा" यश राहुल
के सामने हाथ जोड़े खड़ा था ,लेकिन राहुल उसको पूरी तरह से
नज़रअंदाज़ कर कैंटीन से बाहर निकल गया , अब चारो दोस्तों में
पहली वाली दोस्ती नहीं रह गई थी, राहुल पूरा दिन नेहा के
ख्यालों में खोया रहता था, वो नेहा की देखभाल करना चाहता था,
किसी अच्छे से अच्छे डॉक्टर से उसका इलाज़ करवाना चाहता था एवं उसको
फिर से पहले जैसे स्वस्थ देखना चाहता था, लेकिन कुछ कर पाना
उसके वश में नहीं था बल्कि उसके लिए तो यह भी संभव नहीं था कि प्रतिदिन अस्पताल
में जाकर नेहा से मिले फिर भी उसने अपनी कोशिश जारी रखी।
"राशि अब नेहा की तबीयत कैसी हैं?" राहुल ने पूछा,
"अरे राहुल तुम! क्या तुम्हें पता नहीं नेहा अब घर आ गई हैं।" राशि ने
कहा,
"इसका मतलब अब वो बिलकुल ठीक हैं लेकिन यह बात तुमने मुझे पहले क्यों नहीं
बताई" राहुल के स्वर में उत्सुकता थी,
"नहीं राहुल, वो ठीक नहीं हैं, बल्कि
पहले जैसी ही हालत हैं, डॉक्टर ने तो उम्मीद ही छोड़ दी हैं, अंकल, आंटी ने सोचा अब घर पर ही देखभाल की जाए,
इसलिए उसे घर ले आये" राशि ने बताया। राशि की बात सुन राहुल
उदास हो गया वो सोचने लगा ऐसा क्या करे जिससे की नेहा बिल्कुल ठीक हो जाये,
सबसे बड़ा दुःख तो राहुल के लिए यह था कि वो नेहा से मिल भी नहीं
पाता था, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और एक दिन नेहा के घर
पहुँच गया।
अचानक से दरवाज़े की घंटी बजी "अरुण देखना दरवाज़े पर कौन है,
मैं नेहा के कमरे में हूँ।" वंदना ने कहा,
"हाँ देखता हूँ, ऐसा कहते हुए अरुण ने दरवाज़ा खोला,
अरे तुम यहाँ, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ
आने की तुम्हें मना किया था फिर भी यहाँ मुँह उठाकर चले आए" अरुण ने गुस्से
में कहा, "प्लीज अंकल मेरी बात सुनिए" राहुल अरुण
के सामने गिड़गिड़ाने लगा,
''अब
सुनने के लिए बचा ही क्या हैं, नेहा की हालत इतनी ख़राब हो गई
फिर भी तुम्हें सुकून नहीं मिला" अरुण ने लगभग चिल्लाते हुए कहा,
"प्लीज अंकल ऐसा मत कहिए मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ" राहुल अरुण के आगे
हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, लेकिन अरुण उसकी एक भी सुनने को
तैयार नहीं था......"अंकल मुझे एक बार नेहा से मिलने
दीजिये प्लीज" राहुल की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे, राहुल की ओर देख अरुण का दिल भी पिघल गया और उसने उसे नेहा से मिलने की
इज़ाज़त दे दी। "वंदना यह राहुल हैं नेहा से मिलना चाहता हैं।" अरुण ने
अपनी पत्नी से कहा,
"मैं जानती हूँ यह राहुल हैं लेकिन आप इसकी करतूतों को कैसे भूल सकते
हैं" वंदना ने अरुण की ओर गुस्से से देखा,
"इसे अपने किये का पछतावा हैं, माफ़ी भी माँग रहा हैं,
मुझे लगता हैं इसे माफ़ कर देना चाहिए और नेहा से एक बार मिलने देना
चाहिए" अरुण ने वंदना को समझाने की कोशिश की,
कुछ सोचकर,
"ठीक हैं , मिल लो नेहा से लेकिन ध्यान
रहे उसे कोई परेशानी ना हो" वंदना ने लगभग राहुल को धमकाते हुए कहा,
"धन्यवाद अंकल, आंटी, मैं आप
दोनों का यह अहसान कभी नहीं भूलूँगा ऐसा कह राहुल नेहा के कमरे की ओर चला गया,
लेकिन वो ज्यादा देर नेहा को नहीं देख पाया और अरुण व वंदना से
इज़ाज़त ले वापिस चला गया।
पहले दिन तो
राहुल का मन नेहा को देख भर आया था , लेकिन
उसने फैसला किया कि वो यह मौका हाथ से नहीं जाने देगा और पूरे मन से नेहा की सेवा
करेगा और उसे पहले जैसा अच्छा कर देगा। यही सोच वो अब रोज ही नेहा के यहाँ जाने
लगा , धीरे-धीरे उसने नेहा के माता-पिता का दिल भी जीत लिया ,
ऐसा लगने लगा था जैसे की राहुल उसी घर का सदस्य हैं, नेहा की देखभाल करन , उसे खाना खिलाना, बातें करना, वक़्त पर दवाई देना एवं वंदना की भी काम
में मदद करवाना यही राहुल की दिनचर्या बन गई थी, अब
धीरे-धीरे नेहा की तबीयत में सुधार भी होने लगा था, लेकिन वो
किसी भी कीमत पर राहुल को माफ़ करने को तैयार नहीं थी, एक दिन
"नेहा, राहुल अब बहुत बदल गया हैं उसे अपने किए का
पछतावा भी हैं, अब तुझे उसे माफ़ कर देना
चाहिए, बेचारा दिन-रात तेरी सेवा कर प्रयाश्चित कर रहा हैं।"
वंदना ने नेहा को समझाने की कोशिश की, लेकिन नेहा राहुल को
माफ़ करने को तैयार नहीं थी, और राहुल ने भी हिम्मत नहीं हारी
इसमें वंदना एवं अरुण ने भी राहुल का साथ दिया और एक दिन राहुल की मेहनत रंग लायी,
"मम्मी, आज राहुल नज़र नहीं आ रहा, वो अभी आया नहीं
क्या" नेहा ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, नेहा की बैचेनी
देख वंदना को अच्छा लगा, अब उसे उम्मीद थी नेहा ज़रूर राहुल
को माफ़ कर देगी और ऐसा ही हुआ, राहुल के व्यवहार ने नेहा को
उसे माफ़ करने पर मज़बूर कर दिया, माफ़ ही नहीं बल्कि अब तो वो
दोनों अच्छे दोस्त भी बन गए थे।
"गुड मॉर्निंग, देखिए मैं आप सब के लिए नाश्ते में
गरमागरम समोसे लाया हूँ।" राहुल ने चहकते हुए नेहा के घर में प्रवेश किया,
"अरे बेट , तुम यह सब क्यों ले आये, मैं नाश्ता तो बना रही थी ना" वंदना ने उदास होते हुए कहा,
"अरे आंटी उदास क्यों होती हो आपका बनाया नाश्ता भी खायेंगे और यह गरमागरम
समोसे भी, वैसे भी मेरी आंटी के बनाये नाश्ते का यह समोसे
कभी मुक़ाबला नहीं कर सकते" राहुल की बात सुन सभी ठहाका लगा कर हँस पड़े,
"अच्छा सब टेबल पर आओ मैं नाश्ता लगा देती हूँ और राहुल बेटा तुम नेहा को
ले आओ" वंदना ने कहा,
"जी आंटी " ऐसा कह राहुल
नेहा के कमरे की तरफ चला गया, और कुछ ही देर में नेहा को
लेकर आ गया,
"चलो भई सब मिलकर नाश्ता करेंगे आंटी आज तो आप भी हमारे साथ ही नाश्ता
करिए" राहुल ने कहा,
"नहीं बेटा आप लोग करिए, मैं बाद में कर लूँगी "
वंदना ने कहा,
"बाद में क्यों आंटी, आप बैठिए, मुझे आप लोगों से कुछ
बात भी करनी हैं।" राहुल ने थोड़ा शरमाते हुए कहा,
"क्या बात करनी है और तुम इतना शरमा क्यों रहे हो" नेहा ने पूछा,
"दरअसल मैं अंकल और आंटी से इजाज़त लेना चाहता था" राहुल के कहते ही,
"हमसे किस बात की इजाज़त चाहते हो बेटा" अरुण ने आश्चर्य से पूछा,
"अंकल, आंटी, अगर आप दोनों को
और नेहा को कोई ऐतराज़ ना हो तो मैं नेहा से शादी करना चाहता हूँ।" राहुल पूरी
बात एक ही सांस में कह गया, और उसके कहते ही वातावरण में
चुप्पी छा गई।
"क्या हुआ आप लोग कुछ तो बोलिये, ऐसे चुप मत रहिए,
मुझे घबराहट हो रही हैं।" राहुल ने हकलाते हुए कहा,
"कोई कुछ भी बोले इसे पहले मैं कुछ कहना चाहती हूँ, मम्मी-पापा
का क्या जवाब हैं मैं नहीं जानती लेकिन मैं यह शादी नहीं कर सकती" ऐसा कह
नेहा अपने कमरे की ओर वापिस चली गई, नेहा की बेरुखी देख
राहुल उदास हो गया,
"अंकल, मैं आपसे पूछता हूँ, क्या
मैं इतना बुरा हूँ कि आप भी अपनी बेटी की शादी मुझसे नहीं करना चाहते या फिर आप
लोग ने अभी तक मुझे माफ़ ही नहीं किया हैं" राहुल के स्वर में उदासी थी,
"नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं हैं, दरअसल हम तो इस बात
को करने के लिए तैयार ही नहीं थे, राहुल हमारा जवाब कुछ भी
हो, ज़िन्दगी नेहा की हैं और जो उसका जवाब होगा वो ही हमारा
जवाब होगा" अरुण ने कहा,
"अंकल मैं एक बार नेहा से बात करना चाहता हूँ, क्या
आपकी इजाज़त हैं" राहुल ने औपचारिता से पूछा,
"हाँ बेटा ज़रूर बात करो वैसे भी नेहा पहले तुम्हारी दोस्त हैं।" अरुण
ने कहा, और राहुल तुरंत ही नेहा के कमरे की ओर चला गया।
"क्या मैं अंदर आ सकता हूँ" राहुल ने दरवाज़े पर दस्तक देते हुए नेहा
से पूछा,
"हाँ आ सकते हो लेकिन मुझसे शादी के अलावा जिस बारे में बात करनी हैं कर
सकते हो" नेहा ने बेरुखी से कहा,
"लेकिन क्यों, मेरी गलती तो बताओ, क्या मैं यह समझूँ की तुमने अभी तक मुझे मेरी पिछली गलतियों के लिए माफ़
नहीं किया" राहुल ने उदास होते हुए पूछा,
"नहीं राहुल, ऐसी बात नहीं हैं तुम तो अब बहुत अच्छे
हो बल्कि मैं ही तुम्हारे लायक नहीं रही" नेहा ने अपने आँसू रोकते हुए कहा,
"तुम ऐसा क्यों कह रही हो" राहुल अब नेहा की व्हील-चेयर के सामने बैठा
था,
"राहुल तुम मेरी हालत जानते हो, मैं अपने पैरों पर
कभी खड़ी भी हो पाऊँगी इस बात की भी कोई उम्मीद नहीं हैं, तुम
क्यों मेरे लिए अपनी ज़िन्दगी ख़राब करना चाहते हो, तुम्हें तो
मुझसे भी अच्छी लड़की मिल जाएगी, जाओ यहाँ से और मेरे लिए
अपना वक़्त ख़राब मत करो" नेहा ने राहुल से विनती की,
"ठीक हैं तुम कहती हो तो चला जाऊँगा लेकिन बस मेरी एक बात का जवाब दे दो,
मान लो अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो क्या तुम मुझे छोड़ कर चली जाती?
" राहुल नेहा के जवाब का इंतज़ार करने लगा, लेकिन नेहा चुपचाप बैठी रही……"बोलो नेहा,
कुछ तो बोलो, मैं तुम्हारा जवाब सुनना चाहता
हूँ, नेहा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, अगर तुम मेरे साथ ज़िन्दगी गुज़ारना नहीं चाहती तो कोई बात नहीं बस एक बार
मेरी बात का जवाब दे दो" राहुल नेहा के सामने उदास बैठा था,
"प्यार तो मैं भी तुमसे बहुत करती हूँ राहुल, परन्तु डर लगता हैं मेरी वजह
से तुम्हारी ज़िन्दगी ख़राब हो जाएँगी" नेहा ने कहा,
"नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा मैं तुम्हारा बहुत ध्यान
रखूँगा और मुझे पूरी उम्मीद हैं की एक दिन तुम ज़रूर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी,
वैसे भी अब तो मेरी ज़िन्दगी तुम्हारे संग हैं तुम्हारे बिना तो मैं
अधूरा हूँ, तुम नहीं मिली तो ज़िन्दगी ख़राब हो जाएँगी और अगर
तुम मिल गई तो सारी खुशियाँ मिल जाएँगी" अब राहुल नेहा के सामने हाथ जोड़कर
खड़ा था, "यहाँ पर ऐसे ही खड़े रहने का इरादा हैं या
पापा-मम्मी से अपनी शादी की बात भी करोंगे" नेहा का जवाब सुन राहुल अपने आप
को नहीं रोक पाया और नेहा के गले लग गया, ऐसा लग लग रहा था
मानो ज़माने की सारी खुशियाँ अरुण और वंदना के आँगन को महका रही हो।
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