Vishwasghaat (Story On Life Lesson)


खुशियों की तलाश में भूल ना जाना

रहे गए जो रिश्ते पीछे , बाकी हैं उनको निभाना

 

"नीरज वक्त क्या हुआ है?" नीरज की पत्नी सोनल के पूछते ही,  

"9 बजे है"

"हे भगवान, आज फिर देर हो गई" सोनल ने घबराते हुए कहा,

"इसमें बेचारे भगवान की क्या गलती है, जिसकी गलती है उससे तो तुम कुछ कहती नहीं" "कुछ कहने के लिए उसे यहाँ होना भी तो चाहिए" सोनल ने झुनझुलाते हुए कहा,

"वैसे रमा को हुआ क्या हैं" नीरज ने पूछा,

"मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा, रमा पिछले एक हफ्ते से काम पर नहीं आ रही हैं और ना ही मेरा फोन उठा रही हैं उसके बारे में कुछ पता भी चलें तो कैसे?" सोनल ने चिंतित होते हुए कहा,

"इसका मतलब तुम आज भी काम पर नहीं जा रही हो" नीरज के कहते ही,

"हाँ, बच्चों को घर पर अकेला भी तो नहीं छोड़ सकते"

"चलो ठीक है, मैं चलता हूँ, शाम को मिलते हैं।" ऐसा कहते हुए नीरज घर से निकल गया, और सोनल घर के कामों में व्यस्त हो गई।

 

शाम के तकरीबन चार बजे होंगे, अचानक से घर की घंटी बजी सोनल ने दरवाजा खोला तो सामने रमा खडी थीं, और उसको देखते ही सोनल का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया "शर्म नहीं आती है तुम्हें बिना बताए एक हफ्ते से काम पर नहीं आ रही हो और मेरा फोन भी नहीं उठा रही हो, गलती मेरी ही हैं मैंने ही तुम्हें सिर पर चढ़ा रखा है, अब बुत बनकर खड़ी क्यों हो कुछ बोलतीं क्यों नहीं" सोनल ने गुस्से में कहा, और उसके ऐसा कहते ही रमा दहाड़े मार-मार कर रोने लगी,

"अरे, क्या हुआ तुम रोने क्यों लगीं" सोनल के पूछते ही,

"मेमसाब मेरा पति अब इस दुनिया में नहीं रहा" रमा ने रोते हुए कहा,

"हे भगवान!  यह सब क्या हो गया, तुम तो कह रही थी कि उसकी तबीयत अब ठीक है फिर अचानक से क्या हुआ" सोनल ने पूछा,

"मेमसाब वो पिछले हफ्ते उसकी तबीयत खराब होने लगी अस्पताल लेकर गए तो डाक्टर ने जवाब दें दिया, अब मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा" रमा रोए जा रही थी,

"रमा मुझे माफ़ करना मैंने ना जाने तुम्हें क्या-क्या सुना दिया" सोनल को अपने कहें का पछतावा हो रहा था"

"ऐसा मत बोलिए मेमसाब इसमें आपकी क्या गलती है।" रमा ने कहा,

"तुमने कुछ खाया, चाय पियोगी, अच्छा तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए कुछ लेकर आती हूँ।" ऐसा कहते हुए सोनल रसोई-घर की तरफ चली गई, और कुछ देर बाद रमा भी वहाँ आ गई, "मेमसाब मैं दो-तीन दिन में काम पर आने लगूँगी" रमा ने कहा,

"हाँ कोई बात नहीं आराम से आ जाना" ऐसा कहते हुए सोनल ने रमा को नाश्ता दिया और कुछ रूपये भी…."यह रख लो तुम्हारी कुछ मदद हो जाएगी"

"धन्यवाद मेमसाब आप बहुत अच्छी है।" ऐसा कहते ही रमा ने नाश्ता किया और वापिस चली गई ।

उसके बाद रमा कई हफ्तों तक रमा काम पर नहीं आई, सोनल भी उसका इंतजार कर-कर के परेशान हो गई और आखिर में उसने नई नौकरानी रख ली, अभी उसे आए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अचानक से घर की घंटी बजी "सरला देखना कौन है?" अन्दर से सोनल ने आवाज लगाई

"जी, मेमसाब" ऐसा कहते हुए सरला ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने रमा खड़ी थी, इतने में सोनल भी बाहर आ गई और सामने लाल जोड़े में खड़ी रमा को अचरच से देखने लगी, "लीजिए मेमसाब मिठाई खाईए मैंने शादी कर ली है" रमा ने चहकते हुए कहा,

"शादी!  लेकिन अभी तो तुम्हारे पति को गुजरे हुए दो महीने भी नहीं हुए" सोनल ने हैरानी से पूछा,

"हाँ मेमसाब लेकिन मैं उसके लिए जिदंगी भर रोती तो नहीं रहूँगी ना, वैसे भी यह वाला ज्यादा अच्छा है, मेरा बहुत ख्याल रखता है, रोज गजरा भी लाकर देता है, लीजिए मेमसाब मिठाई" रमा के चेहरे पर मुस्कान थी,

"तुम खुश हो" सोनल ने मिठाई लेते हुए कहा,

"हाँ मेमसाब बहुत" रमा की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था,

"और तुम्हारे बच्चे खुश हैं?" सोनल ने पूछा,

"मेमसाब वो तो गाँव में हैं अपने दादा-दादी के साथ, वो क्या है ना उसने शादी इसी शर्त पर की हैं कि बच्चे हमारे साथ नहीं रहेगे, लेकिन मैंने सोचा है कुछ दिनों में उसको समझा-बुझाकर बच्चों को अपने पास बुला लूँगी, फिर हम सब आराम से रहेंगे।" रमा ने कहा

"तुम्हारा ये वाला पति काम क्या करता है?" सोनल ने पूछा,

"मेमसाब वो बाजार में सब्जी का ठेला लगाता है।"  

"चलों ठीक है तुम खुश हो यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं लेकिन कोशिश करना बच्चो को जल्द से जल्द वापिस ले आओ" सोनल के ऐसा कहते ही,

"अच्छा मेमसाब अब मैं चलती हूँ, आज वो घर जल्दी आएगा फिर हम फिल्म देखने जायेंगे।" रमा ने शरमाते हुए कहा,

"अच्छा ठीक है जाओ लेकिन मिलने के लिए आती रहना" सोनल ने मुस्कुराते हुए रमा को विदा किया और खुद घर के कामों में लग गई।

 

वक्त गुजर रहा था, लगभग छः महीने बाद एक दिन अचानक बाजार में सोनल को रमा दिखाई दी, बिघरे हुए बाल, फटी साड़ी, पागलों की तरह इधर-उधर घूम रही थी, "रमा" सोनल ने आवाज लगाई, रमा ने पीछे मुड़कर देखा लेकिन बिना रूके आगे बढ़ गई…."रमा रूको" सोनल ने पीछे से आकर रमा का हाथ पकड़ लिया...."रमा ये क्या हाल बना रखा है तुमने, चलों मेरे साथ घर बैठकर बात करेंगे।" रमा ने ना-नुकुर की लेकिन सोनल उसे जबरन घर पर ले गई.... "बैठो मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लाती हूँ" ऐसा कहते हुए सोनल रसोई-घर की तरफ जाने लगी, लेकिन रमा ने रोक लिया…."क्या हुआ रमा" सोनल के ऐसा बोलते ही रमा फूट-फूटकर रोने लगी, सोनल ने उसे सम्भाला, पानी पीने के लिए दिया, फिर पूछा...."अब बताओ रमा क्या हुआ है तुम्हारा ये हाल किसने बनाया" सोनल ने पूछा।

"मेमसाब मेरे पति ने, उसने मुझे धोखा दिया वो पहले से ही शादीशुदा था, उसकी बीवी गाँव में रहती है, तीन बच्चे भी हैं।" रमा ने रोते हुए बताया,

"लेकिन उसने ऐसा किया ही क्यों, जब पहले से ही शादीशुदा था तो तुमसे शादी क्यों की और तुमने उसकी शिकायत क्यों नही की!"  सोनल ने आश्चर्य से पूछा,

"मैं गरीब कर भी क्या सकती हूँ मेमसाब और गलती मेरी भी तो है उसके प्यार में ऐसी पागल हुई कि कुछ पूछताछ ही नहीं की" रमा ने दुखी होते हुए कहा,

"लेकिन वो भी तो बता सकता था कि वो शादीशुदा है।" सोनल ने कहा,

"मेमसाब वो मेरा फायदा उठाना चाहता था अगर वो मुझे सच बता देता तो मैं उसके पास ही क्यों जाती" रमा ने कहा

"तुम्हारे बच्चे कहाँ है?" सोनल के पूछते ही रमा की आँखों से फिर से आँसू बहने लगे।  

"मेमसाब वो गाँव में ही है, मेरे पास आने से मना कर दिया, कहते हैं जब हमारी जरूरत नहीं थी तो गाँव में छोड़ दिया, अब जरूरत है तो पास बुला रही हैं, वो दोनों मुझसे नफरत करते है, मेमसाब मेरा इस दुनिया में कोई नहीं हैं, मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ।" ऐसा कहते ही रमा दहाड़े मार-मारकर रोने लगी, सोनल ने उसको सांत्वना दी और अपने कमरे में चली गई एवं कुछ देर बाद बाहर आकर,

"यह लो कुछ रूपये अपने लिए अच्छे से कपड़े बनवा लेना, इतवार को गाँव चलेंगे तुम्हारे बच्चों को वापिस लाने के लिए" सोनल के ऐसा कहते ही,

"लेकिन मेमसाब वो दोनों मुझसे बात भी नहीं करना चाहते" रमा ने रुआँसा होते हुए कहा,

"वो आयेंगे भी और तुमसे बात भी करेंगे, मैं भी देखती हूँ कब तक नाराज रहते हैं और हाँ आज के बाद कभी भी अपने-आप को अकेला मत कहना" सोनल ने मुस्कुराते हुए कहा, सोनल की ओर से सकारात्मक बाते सुन रमा में भी हिम्मत आ गयी और वो ख़ुशी-ख़ुशी वापिस चली गई।

 

"नीरज मुझे तुम्हारी मदद चाहिए" सोनल के कहते ही,

"मेरी मदद! धन्य भाग हमारे की सरकार को हमारी मदद चाहिए, वैसे क्या ये नाचीज़ जान सकता हैं कि हुज़ूर की क्या मदद करनी हैं।" नीरज ने मज़ाक करते हुए कहा,

"अब मज़ाक छोड़ो और मेरी बात सुनो, ऐसा कह सोनल ने रमा वाली सारी बात नीरज को बता दी।

"सोनल क्या तुम्हे सही में लगता हैं कि हमे इन सब बातों में पड़ना चाहिए, कल को कही लेने के देने पड़ गए तो" नीरज ने सोनल को समझाते हुए कहा,

"मैं नहीं जानती की जो मैं करने जा रही हूँ वो सही हैं या गलत, मुझे तो सिर्फ इतना पता हैं की इंसानियत के नाते हमें रमा की मदद करनी हैं, नीरज रमा से गलती हुई हैं, गलती उसने अपने लिए दूसरा जीवनसाथी ढूँढकर या अपने लिए खुशियाँ ढूँढकर नहीं की बल्कि पुराने रिश्तों को ठुकरा कर की हैं, वो प्यार में इस कदर पागल हो गयी थी कि उसने अपने बच्चो की भावनाओं की भी कदर नहीं की, लेकिन अब उसे अपनी गलती का अहसास हैं और यही बात हमे उसके बच्चो को समझानी हैं, हमे रमा को उसके बच्चो से वापिस मिलाना हैं, क्या तुम मेरे साथ हो?" सोनल ने नीरज की तरफ एक उम्मीद से देखा,

"हाँ मैं तुम्हारे साथ हूँ, तैयार रहना और रमा से भी कहना तैयार रहने के लिए, चलते हैं इतवार को मिशन बच्चो को वापिस लाने पर" नीरज के ऐसा कहते ही सोनल की आँखों में चमक आ गयी, चमक थी कुछ अच्छा करने की, बिछुड़े हुए परिवार को वापिस मिलाने की, इंसान होने के नाते इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने की ।

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