Ishq Mein Fanaa (A Heart Touching Love Story)
तेरे
प्यार में फ़ना होकर भी ज़िन्दा है हम
बनकर
तेरी आँखें ऐ सनम ज़िन्दा हैं हम
यश अपने घर
की बालकनी में बैठा था, उदास, गुमसुम-सा आखिर हो भी क्यों ना आज के ही दिन तो उसकी दुनिया उजड़ गयी थी,
बात पाँच साल पहले की हैं, उस वक़्त यश बी-कॉम
सेकंड ईयर में पढ़ने वाला छात्र था, उस वक़्त उसकी ज़िन्दगी भी
वैसी ही थी जैसी उस उम्र के हर लड़के की होती हैं, पढ़ाई के
साथ-साथ दोस्तों के साथ मस्ती करना घूमना-फिरना और अपनी ही दुनिया में मस्त रहना,
यश की एक दोस्त भी थी जिसका नाम नेहा था, यश
और नेहा एक-दूसरे को बचपन से जानते थे, बचपन की दोस्ती बड़े
होकर कब प्यार में बदल गयी पता ही नहीं चला लेकिन अब पूरा कॉलेज उन दोनों के बारे
में जानता था.
उस दिन 13 फरवरी थी और अगले दिन वैलेंटाइन-डे, आसान शब्दों
में कहा जाये तो प्यार करने वालों का दिन, यश और नेहा ने
अपने दोस्तों के साथ एक दिन के लिए मुम्बई से माथेरान जाने का प्रोग्राम बनाया,
सोचा आज माथेरान चलते हैं कल का दिन वैलेंटाइन-डे मनाएंगे, यही सोच यश और नेहा अपने दोस्तों की मंडली के साथ माथेरान के लिए रवाना हो
गए जिसमें उन दोनों के अलावा 6 दोस्त और भी थे, सभी दोस्त बाइक्स पर रवाना हुए, रास्ते में मस्ती
करना, मज़ाक करना यह सब चल रहा था, आठों
ही दोस्तों को दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं थी, सब अपनी ही
दुनिया में मस्त थे, माथेरान पहुचँकर इन सभी ने बहुत मस्ती
की कभी पहाड़ तो कभी झरने हर जगह घूमे, ऐसा लग लग रहा था जैसे
की सारे जहाँ की खुशियाँ इन्हें ही मिल गयी हो, पूरा दिन
कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला, "फ्रेंड्स वापिस नहीं
चलना हैं क्या, अब रात होने लगी हैं मुझे लगता हैं अब हमें
निकलना चाहिए" यश के कहने के बाद सभी दोस्त मुम्बई वापसी के लिए निकल गए ।
अभी कुछ ही
दूर निकले थे कि अचानक से यश के दोस्त
पंकज की बाइक पंचर हो गयी, "अरे दोस्तों
रुको, मेरी बाइक पंचर हो गयी हैं टायर बदलना पड़ेगा"
"खटारा,
तू नई बाइक क्यों नहीं ले लेता"
"वो भी
ले लूँगा कम से कम अभी तो मदद करवा" पंकज ने गौरव से कहा,
"तुम लोग समय क्यों बर्बाद कर रहे हो जो कुछ करना हैं जल्दी करो, सुनसान रास्ता हैं और रात भी काफी हो गयी हैं हमें जल्द मुम्बई पहुँचना
होगा" नेहा ने समझाया और पंकज और उसके दोस्त फटाफट टायर बदलकर वापसी के लिए
रवाना हो गए।
अभी आधी दूर
भी नहीं निकले होंगे अचानक से सामने कुछ गुंडे आ गए, गुंडों के पास हथियार थे, "चुपचाप तुम्हारे पास
जो भी सामान हो यहाँ रख दो, खबरदार जो किसी ने होशियारी करने
की कोशिश की" उनमें से एक गुंडे ने कहा,
"हमारे पास कुछ भी नहीं हैं, हम तो कॉलेज में पढ़ते
हैं भला हमारे पास आपको क्या मिलेगा" "बकवास मत करो जितने भी पैसे हैं
यहाँ रखो, सभी लड़कियाँ अपने ज़ेवर उतार कर यहाँ रख दे और
तुम्हारे मोबाइल भी" गुंडे के कहते ही,
"आप हमारे मोबाइल का क्या करेंगे" यश के कहते ही,
"ऐ लड़के, ज्यादा जुबान मत चला, हमने
जो कहा हैं वही कर" इतने में किसी दूसरे गुंडे ने नेहा के सिर पर बंदूक तान
दी,
"तुममें से किसी ने भी होशियारी करने की कोशिश की तो यह लड़की अपनी जान से
हाथ धो बैठेंगी"
"ऐ
खबरदार जो तूने नेहा को हाथ भी लगाने की कोशिश की" ऐसा कह यश उस गुंडे को
मारने के लिए दौड़ा लेकिन पीछे से किसी दूसरे गुंडे ने उसके सिर पर डंडा दे मारा,
जिसकी वज़ह से यश बेहोश होकर गिर पड़ा,
"यश! " नेहा चिल्लाती हुई उसकी ओर दौड़ी, लेकिन
उनमें से एक गुंडे ने सामने से गोली चला दी जो की नेहा के पेट में जाकर लगी,
इतना सब होने के बाद गुंडे घबरा गए और सारा सामान और बाइक्स लेकर
वहाँ से भाग गए।
"प्लीज कोई हमारी मदद करो,
हमारे दोस्त ज़ख़्मी हो गए हैं, यहाँ तो दूर-दूर
तक कोई दिखाई नहीं दे रहा अब हमारी मदद कौन करेगा" पंकज ने घबराते हुए कहा,
"मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा" गुंजन ने रोते हुए कहा,
"दोनों का कितना सारा खून बह गया हैं इन्हें कुछ हो ना जाए"
"शुभ-शुभ
बोल अंकित कुछ नहीं होगा भगवान हमारे साथ इतना बुरा नहीं कर सकता" ऐसा बोल
गौरव इधर-उधर दौड़ कर मदद की गुहार करने लगा लेकिन बहुत देर तक मदद की कोई उम्मीद
नज़र नहीं आयी ।
फिर अचानक से
एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया, गौरव ने हाथ
देकर उसे रोका, ट्रक के रुकने पर, "हमारी मदद कीजिये हमारे दोस्त ज़ख़्मी हो गए हैं।"
"क्या
हुआ कोई एक्सीडेंट हुआ हैं?"
"नहीं
कुछ गुंडों ने हमें लूट लिया और हमारे दोस्तों को घायल कर दिया।"
"हे
भगवान! इनका तो बहुत सारा खून बह गया, लगता
हैं इस लड़की को तो गोली लगी हैं।" ट्रक ड्राइवर के कहते ही,
"हाँ, लेकिन आप वक़्त बर्बाद मत करिए जल्दी से लेकर
चलिए" अंकित ने यश को उठाने की कोशिश करते हुए कहा,
"हाँ-हाँ जल्दी चलो" ट्रक ड्राइवर के कहते ही सबकी मदद से उन दोनों को
ट्रक में डाला गया और ट्रक शहर की तरफ रवाना हो गया।
"जो अस्पताल सबसे पहले आएगा हम वहीं रुक जायेंगे वैसे भी बहुत देर हो गयी
हैं।" पंकज ने ट्रक ड्राइवर से कहा,
"आप लोग जहाँ कहेंगे वही रोक दूँगा" काफी दूर चलने के बाद एक अस्पताल
दिखाई दिया, ट्रक ड्राइवर ने ट्रक वहाँ रोक दिया और अस्पताल
के कर्मचारियों की मदद से उन दोनों को अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ प्राथमिक उपचार करने के बाद, डॉक्टर ने इस
अस्पताल में इलाज़ असंभव बताते हुए किसी बड़े अस्पताल में जाने की सलाह दी।
"लेकिन डॉक्टर साहब वैसे ही बहुत देर हो गयी हैं कहीं ओर लेकर जायेंगे तो
और देर ना हो जाए" गौरव ने चिंतित होते हुए कहा,
"मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन हमारी एम्बुलेंस आपको
दूसरे अस्पताल तक पहुँचाने में मदद कर सकती हैं" किसी के पास भी कोई और दूसरा
रास्ता नहीं था, यश और नेहा को लेकर सभी दोस्त एम्बुलेंस में
दूसरे अस्पताल की ओर चल दिए।
"वो देखो अस्पताल, लगता हैं यहाँ पर इन दोनों का इलाज़
संभव हैं।" पंकज के कहते ही ड्राइवर ने एम्बुलेंस रोक दी ।
सभी की मदद
से यश और नेहा को अस्पताल के अंदर ले जाया गया, जहाँ
पहुँचकर सबसे पहले गुंजन ने दोनों के घरवालों को फ़ोन किया और कुछ ही देर में दोनों
के ही माता-पिता अस्पताल पहुँच गए, साथ ही बाकी सभी
लड़के-लड़कियों के घरवाले भी पहुँच गए, "क्या हुआ हैं यश
को" अस्पताल में पहुँचते ही यश की माँ ने घबराते हुए पूछा,
"आप बैठिये आंटी डॉक्टर जाँच कर रहे हैं" गौरव ने यश की माँ को समझाया,
"कितनी बार मना किया हैं तुम लोगो को मस्ती थोड़ी कम किया करो लेकिन तुम
सबने तो बात ना मानने की कसम खा रखी हैं" यश के पिता बहुत ही गुस्से में थे,
"हमें माफ़ कर दीजिये अंकल, आगे से ऐसी गलती नहीं
होगी"
"गौरव
बेटा आगे की किसने देखी हैं, अभी जो नुकसान
हुआ हैं उसका क्या?" यश की माँ का गुस्सा भी अपनी
चरम-सीमा पर था, इतने में ही डॉक्टर साहब आते हुए दिखाई दिए।
"डॉक्टर साहब यश कैसा हैं?"
"आप कौन?"
"जी मैं उसका पिता नरेश और यह मेरी पत्नी शालिनी"
"आप लोग
मेरे साथ आए, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी हैं।"
नरेश और शालिनी डॉक्टर के साथ चले गए "आप बैठिए"
"डॉक्टर
साहब सब ठीक तो हैं ना, यश कैसा हैं, वो ठीक तो हो जाएगा ना"
"नरेश
जी आप हौसला रखिए, दरअसल मैं आपसे कुछ
भी नहीं छुपाना चाहता"
"मतलब !
कहना क्या चाहते हैं आप"
"देखिए
शालिनी जी, नरेश जी, बात ये हैं कि सिर पर
चोट लगने वजह से यश के आँखों की रोशनी चली गयी हैं, वो अब
कभी देख नहीं पायेगा"
"जुबान
संभालकर बात कर डॉक्टर, इलाज़ करना नहीं आता
तो मत कर, कम से कम गलत बात मत बोल" नरेश ने गुस्से में
डॉक्टर का कॉलर पकड़ लिया,
"देखिए मैं आप दोनों की तक़लीफ़ को समझ सकता हूँ, लेकिन
क्या करूँ मज़बूर हूँ, अब हम कुछ नहीं कर सकते।"
"ऐसा मत
बोलिए डॉक्टर साहब कुछ तो इलाज़ होगा आप पैसो की चिंता मत करिए आप जितना कहेंगे हम
खर्चा करेंगे।"
"शालिनी
जी,
बात पैसो की नहीं हैं लेकिन हाँ अगर किसी की आँखे यश को लगाई जाए तो
शायद वो देख पाए।"
"ऐसा
कौन होगा जो अपनी आँखे हमारे बेटे को देगा" ऐसा बोल नरेश और शालिनी उदास मन
से यश के कमरे की ओर जाने लगे ।
दूसरी ओर
नेहा का ऑपरेशन चल रहा था, ऑपरेशन थिएटर के बाहर
नेहा के माता-पिता उदास बैठे थे , कुछ ही देर में थिएटर का
दरवाज़ा खुला, "डॉक्टर साहब मैं शेखर, नेहा का पिता, अब नेहा कैसी हैं?"
"देखिए
हमने ऑपरेशन करके गोली तो निकाल दी हैं लेकिन नेहा की हालत अभी भी नाज़ुक बनी हुई
हैं कुछ भी नहीं कहा जा सकता" ऐसा
बोल डॉक्टर वहाँ से चला गया लेकिन शेखर और उनकी पत्नी उमा की बैचेनी बढ़ गयी।
"हे
भगवान,
हमारी बेटी की रक्षा करना, बस वो एक बार ठीक
हो कर घर आ जाए, 101 गरीबों को खाना खिलाऊँगी"
"हिम्मत
से काम लो उमा सब अच्छा ही होगा, चलो नेहा को
वार्ड में लेकर जा रहे हैं हम भी चलते हैं।" शेखर और उमा भी स्ट्रेचर के
पीछे-पीछे चल दिए,
"नर्स बहुत देर हो गयी, नेहा को होश कब आएगा?"
"थोड़ी
देर में आ जाएगा" नर्स कहकर चली गई लेकिन नेहा को होश ना आने की वजह से शेखर
और उमा की परेशानी बढ़ती ही जा रही थी।
लेकिन कुछ
देर बाद "यश-यश" नेहा कराहने लगी,
"नेहा बेटा मैं तुम्हारी माँ हूँ, कैसा लग रहा हैं अब,
शेखर आप खड़े क्या हैं जल्दी से जाकर डॉक्टर को बुलाइये"
"माँ यश
कैसा हैं?
मुझे उससे मिलना हैं।"
"नेहा
ज़िद मत करो अभी तुम्हारा ऑपरेशन हुआ हैं, जब
ठीक हो जाओ तब मिल लेना" इतने में ही डॉक्टर साहब भी वहाँ आ गए,
"आप लोग बाहर जाइये मुझे नेहा का चैकअप करना हैं।"
"डॉक्टर
साहब मेरे साथ मेरा एक दोस्त भी ज़ख़्मी हालत में आया था,
अब वो कैसा हैं?"
"देखिए आपकी तबीयत ठीक नहीं हैं आप आराम कीजिये, आपके दोस्त का इलाज़ दूसरे डॉक्टर कर रहे हैं जैसे ही हमें उनके बारे में
कुछ पता चलेगा आपको बता दिया जायेगा" ऐसा कहकर डॉक्टर वार्ड से बाहर चले गए।
"डॉक्टर
साहब नेहा कैसी हैं?"
"देखिए
नेहा की तबीयत अभी भी नाज़ुक बनी हुई हैं बचने की बहुत ही कम उम्मीद हैं,
आप दोनों को हिम्मत से काम लेना होगा" डॉक्टर के ऐसा कहते ही
शेखर और उमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी, दोनों ने किसी तरह
अपने आप को संभाला और नेहा के पास जाकर बैठ गए ।
कुछ देर बाद जैसे
ही नेहा ने अपनी आँखे खोली "माँ तुमने बताया नहीं यश की तबीयत कैसी हैं?"
"नेहा सब ठीक हैं, तुम्हें आराम करना चाहिए, जब तुम ठीक हो जाओ तब यश से मिल लेना" "नहीं माँ मुझे अभी यश के
बारे में जानना हैं, उससे मिलना हैं"
"जिद मत
करो वो बिल्कुल ठीक हैं डॉक्टर ने कहा हैं एक दो दिन में उसको अस्पताल से छुट्टी
मिल जाएगी और तब तक तुम भी ठीक हो जाओगी फिर मिल लेना"
"माँ आप
किसे बेवकूफ बना रही हैं मैं जानती हूँ अब मैं नहीं बचूँगी इसलिए कह रही हूँ मुझे
यश के बारे में सबकुछ बता दीजिए इतना तो हक़ हैं ना मेरा" नेहा की बातें सुन
शेखर और उमा की आँखों से आँसू बहने लगे
"नेहा
ऐसी बाते मत करो"
"पापा-माँ
आपको मेरी कसम हैं आप मुझे सबकुछ बताइये प्लीज" कसम देते ही उमा अपने आप पर
काबू खो बैठी और फूट-फूट कर रोने लगी,
"मुझे ऐसा क्यों लग रहा हैं की आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं"
"नेहा
बेटा जब तुम बेहोश थी तब तुम्हारे पापा यश से मिलने गए थे,
वहाँ जाकर पता चला की सिर पर चोट लगने की वजह से वो अब कभी देख नहीं
पाएगा, लेकिन तुम बिल्कुल चिंता मत करना डॉक्टर ने ये भी कहा
हैं की अगर कोई अपनी आँखे यश को दान देता हैं तो वो देख पायेगा" उमा की बातें
सुन नेहा बिल्कुल शान्त हो गई उसने अपनी आँखे बंद कर ली लेकिन उसकी आँखों से
लगातार आँसू बह रहे थे और उसकी यह हालत शेखर और उमा से नहीं देखी जा रही थी।
कुछ देर बाद
नेहा ने अपनी आँखे खोली "माँ पापा मुझे आप दोनों से कुछ माँगना हैं देंगे ना
मना तो नहीं कर देंगे"
"तुम माँगों
तो सही हम ज़रूर देंगे"
"ऐसे
नहीं वादा कीजिए"
"वादा"
शेखर और उमा ने नेहा के हाथ पर अपना हाथ रख वादा किया।
"मैं
चाहती हूँ मेरे जाने के बाद मेरी आँखे यश को लगा दी जाये।"
"तुम
पागल हो गई हो कुछ नहीं होगा तुम्हें, मेरा
दिल कहता हैं मेरी बेटी बिल्कुल ठीक हो जायेगी।"
"माँ
क्या आप नहीं चाहती की यश देख सके"
"अरे,
मैं क्यों नहीं चाहूँगी कि यश देख पाए आखिरकार वो भी तो मेरे बेटे
जैसा ही हैं।"
"तो फिर
आप क्यों मना कर रही हैं क्योंकि मैं आपकी बेटी हूँ और वो आपका बेटा नहीं बल्कि
बेटे जैसा हैं।"
"फालतू
की बातें सोचने से अच्छा हैं की तुम आराम करो जिससे की जल्द से जल्द ठीक हो
पाओ"
"माँ-पापा
मेरे पास ज्यादा वक़्त नहीं हैं बोलिए ना आप दोनों मेरे साथ किया गया वादा पूरा
करेंगें" नेहा की बातें सुन शेखर और उमा की हालत ख़राब हो रही थी,
वो उसे बार-बार समझाने की कोशिश करते लेकिन जैसे नेहा ने तो ज़िद ही
पकड़ ली थी, बहुत समझाने के बाद भी जब नेहा नहीं मानी तो,
"ठीक हैं तुम जैसा कहोगी वैसा होगा लेकिन तुम्हें भी हमारी बात माननी होगी
अब आराम करो जिससे की ठीक होकर घर चल सको" शेखर ने बेटी की ज़िद आगे अपने
घुटने टेक दिये, "थैंक्यू माँ, थैंक्यू
पापा मेरे जाने के बाद आपको हमेशा यश की आँखों में अपनी बेटी दिखाई देगी और यश से
कहना ये आँखें मेरी तरफ़ से उसके लिए वैलेंटाइन गिफ्ट है।" ऐसा कह नेहा ने
अपनी आँखे मूँद ली।
"नेहा, नेहा उमा और शेखर ने ऐसी कई आवाज़े लगाई लेकिन
नेहा का कोई जवाब नहीं आया क्योंकि अब वो हमेशा के लिए चिरनिंद्रा में सो चुकी थी।
दूसरी ओर यश
के कमरे में "मुझे कुछ दिखाई क्यों नहीं दे रहा हैं।"
"यश
बेटा तुम आराम करो फिर सब ठीक हो जाएगा।"
"माँ
बताओ ना क्या हुआ हैं मुझे, और नेहा कैसी हैं उसे
तो गोली लगी थी।"
"उसका
ऑपरेशन हुआ हैं अभी बेहोश हैं तुम उसकी चिंता मत करो वो ठीक हैं।" शालिनी ने
झूठ बोलते हुए कहा,
"माँ मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ हैं कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा एक
बार डॉक्टर से पूछिए ना क्या हुआ हैं मुझे, वैसे भी मुझे
जल्द से जल्द नेहा को देखने जाना हैं।" यश नेहा से मिलने की बात कर रहा था कि
डॉक्टर साहब भी वहाँ आ गए,
"यश कैसे हो"
"डॉक्टर
साहब मुझे कुछ नहीं दिखाई दे रहा, माँ भी कुछ नहीं
बता रही आप ही बताईये मुझे क्या हुआ हैं।"
"यश सिर
पर चोट लगने की वजह से तुम्हारी आँखों की रौशनी चली गयी हैं।"
"नहीं
ऐसा नहीं हो सकता अब मैं कैसे देख पाऊँगा"
"लेकिन
अब तुम्हें घबराने की कोई ज़रुरत नहीं हैं, अभी-अभी
अस्पताल में एक मृत्यु हुई हैं जिसकी आँखे हम उसके घरवालों के कहने पर आपको लगा
रहे हैं।"
"ऐसा
भला इंसान कौन हैं डॉक्टर साहब"
"माफ़
कीजिए शालिनी जी हम आपको दान देने वाले का नाम नहीं बता सकते उसे गुप्त रखा जाता
हैं….आप तैयार हैं ना यश अपनी आँखों के ऑपेरशन के लिए"
"जी
डॉक्टर मुझे जल्दी ठीक होकर नेहा से मिलना हैं और आज तो वेलेंटाइन डे भी है
ना" और फिर यश को ऑपरेशन के लिए ले जाया जाता हैं।
कुछ दिनों
बाद "यश हम आपकी आँखों की पट्टी खोलेंगें आप धीरे-धीरे आँखे खोलना" यश
अपनी आँखे खोलता हैं और अपने सामने सभी परिवार वालों को देखता हैं लेकिन नेहा के
परिवार में से किसी को ना देख बेचैन हो जाता हैं।
"माँ
नेहा के माँ और पापा नहीं आए, नेहा की तबीयत ठीक हैं ना अब?"
"यश अब
तुम्हें कैसा लग रहा हैं?"
"माँ
आपने बताया नहीं अब नेहा कैसी हैं?"
"तुम घर चलो उसके बाद हम इत्मीनान से बात करेंगे"
"आप
मुझसे कुछ छुपा रही हैं"
"नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं हैं।" इतने में ही नेहा के माँ और पापा
भी वहाँ आ गए।
"नमस्ते
अंकल,
नमस्ते आंटी, अब आप लोग बताइये नेहा कैसी हैं
यहाँ तो कोई भी नहीं बता रहा"
"यश
तुम्हें नेहा का वैलेंटाइन गिफ्ट कैसा लगा?"
"कहाँ हैं गिफ्ट मुझे तो कुछ नहीं दिखाई दे रहा नेहा भी अजीब हैं, उसकी
सरप्राइज देने की आदत नहीं जाएगी"
"ये जो
तुम्हारी आँखें हैं ना वही गिफ्ट हैं।"
"मतलब !
मैं कुछ समझा नहीं"
"यश बेटा नेहा अब इस दुनिया में नहीं रही वो अपनी आँखें तुम्हें तोहफ़े में देकर गई हैं, बस तुमसे एक विनती हैं हमारी नेहा की इन आँखों का ख्याल रखना" ऐसा बोल नेहा के माँ और पापा वहाँ से चले गए और यश तो जैसे मूर्ति ही बन गया था लेकिन उसकी आँखों से निरन्तर आँसू बह रहे थे।
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