Maa Ki Mamta (Story On Mother)


जिस औलाद की हर ख़्वाहिश के आगे झुक जाती हैं माँ

उसी औलाद के दीदार को तरस जाती हैं माँ

 

"जाड़े की गुनगुनी धूप में बैठने का अपना ही एक मज़ा हैं, और संग मिल जाए मूंगफली, रेवड़ी और गज़क तो क्या कहने ज़िन्दगी जीने का आनंद ही आ जाता हैं" अशोक ने कावेरी से कहा, लेकिन कावेरी चुप रही, यही चुप्पी अशोक को तक़लीफ़ देती थी, फिर भी वो कावेरी को खुश करने की हर कोशिश करता। आज कावेरी का जन्मदिन हैं, लेकिन चेहरे पर उदासी छायी हुई हैं...."कावेरी चलो आज कहीं घूमने चलते हैं, वापिस आते वक़्त किसी अच्छे से होटल में खाना खा कर आएंगे" अशोक ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अशोक मुझे कही नहीं जाना, अगर तुम जाना चाहो तो जा सकते हो" कावेरी ने उदास स्वर में कहा,

"अरे भई जन्मदिन तो तुम्हारा हैं, मैं अकेला जाकर क्या करूँगा, चलो अच्छा लगेगा, वैसे भी हम दोनों कई दिनों से कही बाहर घुमने नहीं गए।" अशोक ने आग्रह किया, लेकिन कावेरी बिना कोई जवाब दिए अपने कमरे में चली गयी। कावेरी का व्यवहार देख, ना चाहते हुए भी आज अशोक का मन अतीत की ओर चला गया।

 

"नितिन, बेटा क्यों परेशान कर रहा हैं खाना खा ले फिर खेल लेना" कावेरी ने अपने पाँच वर्षीय बेटे को आवाज़ लगाई।

"क्या बनाया हैं?" नितिन ने पूछा,

"तेरा मनपसंद आलू का परांठा" कावेरी ने अपने लाड़ले को प्यार करते हुए कहा,

"नहीं खाना, पिज़्ज़ा बनाओगी तो खाऊँगा" नितिन ने जिद की,

"अच्छा बाबा बनाती हूँ नाराज़ मत हो" ऐसा कह कावेरी रसोईघर की ओर चली गई, ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, यह तो जैसे रोज़ की ही दिनचर्या हो गयी थी, नितिन के नख़रे थे की खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे और कावेरी उसकी हर इच्छा हँसते-हँसते पूरी करती। "कावेरी तुम इसको इतना सिर पर मत चढ़ाओ ऐसा ना हो एक दिन पछताना पड़े" अशोक ने कहा,

"आप तो चुप ही रहिए मेरा इकलौता बेटा हैं, इसे सिर नहीं चढ़ाऊँगी तो किसे चढ़ाऊँगी" कावेरी ने पलट कर जवाब दिया, कावेरी का जवाब सुन अशोक बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया, नितिन को लेकर तकरार लगभग हर रोज़ ही होती, कावेरी का अपने बेटे की गलतियों पर पर्दा डालना और उसकी हर इच्छा को बिन सोचे-समझे पूरी करना कहीं ना कहीं उसे गलत राह की ओर धकेल रहा था, अशोक इन सभी बातों से वाकिफ़ थे फिर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे, शायद एक माँ के लाड़-प्यार के आगे हार मान गए थे।

 

वक़्त गुज़र रहा था, नितिन भी गुज़रते वक़्त के साथ बड़ा हो रहा था और साथ ही जिद्दी और बिगड़ैल भी, लेकिन कावेरी को तो उसकी बदतमीज़ी में भी बचपना नज़र आता, एक दिन अशोक ने ऑफिस से वापिस आते वक़्त नितिन को अपने दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हुए देखा, तो तुरन्त ही गाड़ी से उतरकर उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश की लेकिन नितिन के यह कहने पर कि आप कौन होते हैं मुझे कुछ कहने वाले, अशोक उदास मन से घर वापिस आ गया, यहाँ तक की कावेरी ने भी नितिन का ही पक्ष लिया जो अशोक को बिल्कुल भी ग्वारा नहीं था, हर दूसरे दिन नितिन की हरकतों को लेकर अशोक और कावेरी में झगड़े होते, लेकिन उस दिन तो हद ही हो गयी।

 

"कावेरी इतनी रात हो गयी नितिन अभी तक वापिस नहीं आया, एक बार फ़ोन करके पूछो कहाँ हैं।" अशोक ने कहा।

"अरे जवान लड़का हैं अपने दोस्तों के साथ कहीं घूम रहा होगा, आप सो जाइए" कावेरी ने लापरवाह होते हुए कहा,

"पता नहीं कब अक्ल आएगी इन दोनों माँ-बेटे को" अशोक बड़बड़ाने लगा, इतने में ही दरवाज़े की घंटी बजती हैं, जैसे ही अशोक दरवाज़ा खोलता हैं देखता हैं कि नितिन नशे की हालत में खड़ा हैं, नितिन को ऐसा देख अशोक आपे से बाहर हो जाता हैं और नितिन को एक ज़ोरदार थप्पड़ लगा देता हैं।

"अशोक तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर हाथ उठाने की" कावेरी ने पीछे से आकर अशोक को लताड़ा, लेकिन अब अशोक के सब्र का बाँध टूट चुका था।

"तुम बहुत बड़ी गलती कर रही हो कावेरी एक दिन तुम्हें पछताना पड़ेगा" अशोक ने गुस्से में चीखते हुए कहा, कावेरी ने पहली बार अशोक को इतने गुस्से में देखा था, वो बिना कुछ कहे नितिन को लेकर अंदर चली गई, उसके बाद कई दिनों तक घर में चुप्पी छायी रही, नितिन भी शांत था ऐसा लग रहा था जैसे तूफ़ान के पहले की शान्ति हो, और हुआ भी ऐसा ही।

 

''माँ" नितिन ने पुकारा,

"हाँ बेटा, आ गया और यह कौन हैं तेरे साथ तेरी दोस्त क्या नाम हैं बेटी तुम्हारा?" कावेरी ने पूछा।

"माँ यह सुरभि हैं मेरी पत्नी हमने आज ही कोर्ट में शादी की हैं।" नितिन ने सुरभि का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा,

"लेकिन बेटा अचानक, पहले कुछ बताया भी नहीं हम मना तो नहीं करते ना" कावेरी की आँखों से आँसू छलक गए,

"जानता हूँ लेकिन मैं किसी का भी दखल नहीं चाहता था" नितिन के स्वर में कड़कपन था। "लेकिन बेटा हम कोई ओर नहीं तेरे माँ-बाप हैं तेरे पापा को पता चलेगा तो उनका दिल ही टूट जाएगा" कावेरी के स्वर में उदासी थी,

"अब मुझे किसी से कोई लेना-देना नहीं हैं, मैं तो आपको शादी की इत्तला देने आया था, हमने फैसला किया हैं कि अब हम अलग मकान लेकर रहेंगे" नितिन के ऐसा कहते ही कावेरी चक्कर खा कर सोफे पर गिर गई।

"क्या हुआ माँ तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं हैं क्या" नितिन ने बेमन से पूछा,

"बेटा ऐसी क्या गलती हो गयी जिसकी तू हमें सज़ा दे रहा हैं, बल्कि मैंने तो हमेशा तेरा ही पक्ष लिया हैं, हर कदम पर दुनिया से लड़ी हूँ तेरे लिए, तूने शादी करली कोई बात नहीं बल्कि मैं तो तेरी ख़ुशी में खुश हूँ लेकिन यहाँ से जाने की बात तो मत कर, तेरी माँ तेरे बिना कैसे जी पायेंगी" कावेरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

"कावेरी अब बस भी करो, बहुत हाथ-पैर जोड़ लिए तुमने इसके आगे, अब कुछ कहने की ज़रुरत नहीं हैं, जाना हैं तो जाने दो हमें इसकी कोई ज़रुरत नहीं हैं।" अशोक ने गुस्से में कहा, "आप ऐसा मत कहिए मैं कैसे रहूँगी इसके बिना" कावेरी गिड़गिड़ा रही थी लेकिन किसी का भी दिल नहीं पिघला नितिन अपना सामान लेकर निकल गया और अशोक ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।

 

इस घटना के बाद कावेरी बीमार हो गई, किसी से बात भी नहीं करती बस उदास-सी बैठी रहती, अशोक भी बहुत कोशिश करता समझाने की लेकिन कोई फायदा नहीं होता, सबसे बड़ी बात तो यह थी कि  जिस बेटे के लिए कावेरी ने अपनी ज़िन्दगी जी उसने तो कभी पलट कर फ़ोन भी नहीं किया लेकिन कावेरी थी कि उसके वापिस आने की आस लगाए हुए थी, दिन गुज़र रहे थे और कावेरी के चेहरे की उदासी भी बढ़ती जा रही थी वो हर पल बस यही सोचती की आज मेरा बेटा ज़रूर आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, लेकिन एक दिन नितिन वापिस आया।

 

"माँ" नितिन ने आवाज़ लगाई,

"मेरा बेटा वापिस आ गया, अशोक देखा तुमने नितिन वापिस आ गया मैंने कहा था ना यह वापिस ज़रूर आएगा" कावेरी नितिन को प्यार करने लगी,

"माँ-पापा, मुझे आप दोनों से कुछ बात करनी हैं।" नितिन ने कहा,

"हाँ बोल बेटा" कावेरी के बोलते ही,

"मैं और मेरी पत्नी सुरभि चाहते हैं कि आप लोग अपनी सारी प्रॉपर्टी हमारे नाम करदे" नितिन के ऐसा कहते ही,

"इस बात का क्या मतलब हैं क्या मैं जान सकता हूँ" अशोक ने गुस्से में कहा,

"दरअसल हम चाहते हैं कि अब आप दोनों की उम्र भी हो गयी हैं तो क्यों ना आप दोनों किसी वृद्धाश्रम में जाकर रहे और यह घर हमारे नाम करदे" नितिन के ऐसा कहते ही कावेरी ने उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा और कहा

"इसी वक़्त यहाँ से निकल जाओ और इसके बाद कभी अपनी शक्ल भी मत दिखाना, पागल हो गई थी मैं तेरे इंतज़ार में लेकिन मुझे नहीं पता था की तू इंसान नहीं वो साँप हैं जिसके लिए कुछ भी कर लो एक ना एक दिन डसेगा ज़रूर" कावेरी को गुस्से में देख,

"तुम शांत हो जाओ नहीं तो तुम्हारी तबीयत ख़राब हो जाएगी" अशोक ने कावेरी को समझाते हुए कहा,

"नहीं अशोक, मुझे बोलने दो तुमने तो बहुत समझाया लेकिन मैं ही इसके लिए पागल हो रही थी मुझे माफ़ कर दो" कावेरी ने अशोक से माफ़ी माँगी, और अपनी बात बनते ना देख नितिन वहाँ से चला गया,

"कावेरी मैंने एक फ़ैसला किया है कि हमारे बाद यह सारी प्रॉपर्टी किसी ट्रस्ट में दान कर दी जाए क्या तुम मेरे साथ हो।" अशोक ने पूछा,

"हाँ अशोक मैं तुम्हारे साथ हूँ और मैंने भी एक फ़ैसला किया हैं, आज से हम दोनों केवल एक दूसरे के लिए जियेगें किसी ओर के लिए नहीं" कावेरी के ऐसा कहते ही अशोक ने उसे अपने गले से लगा लिया।


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