Shaatir Chorni (Story On Thief)
क्यों देते हैं धोखा बनकर अपने कुछ शातिर
क्यों कर देते हैं बदनाम शरीफ़ों को कुछ शातिर
"चाय, चाय, चाय गर्म, मसालेदार चाय, मेमसाब चाय" चाय वाले की आवाज़ सुन मैने अधखुली आँखों से देखा तो सामने एक चाय वाला मटमैले कपड़े पहने हाथ में चाय की केतली और ग्लास लिए खड़ा था।
"नहीं चाहिए चाय"
"ले लीजिये ना मेमसाब गरमागरम चाय हैं।"
"कहा ना भैया नहीं चाहिए, क्यों दिमाग खराब कर रहे हो।" मेरे चाय वाले को लताड़ते ही वो मायूस होकर चला गया, मैने थोड़ा-सा सिर ऊपर कर खिड़की से झाँकते हुए स्टेशन जानने की एक असफ़ल कोशिश की और बुदबुदाने लगी, "पता नहीं कौनसा स्टेशन हैं"
"बहनजी, अभी तो मुग़ल-सराय आया हैं, ट्रेन तीन घंटे लेट हैं।" सामने वाली सीट पर बैठी हुई महिला ने शायद मेरा बुदबुदाना सुन लिया था,
"अभी तो ना जाने कितना और लेट होगी इस ट्रेन में यही एक दिक़्क़त हैं।" शायद वो महिला बात करने के मूड़ में थी
"जी अब कर भी क्या सकते हैं" ऐसा कह मैं खिड़की से बाहर देखने लगी।
"वैसे जाना कहाँ हैं आपको"
"जी कोलकाता"
"ओहो! हम भी तो वही जा रहे हैं, आपके रिश्तेदार रहते हैं वहाँ"
"जी नहीं मेरी सहेली हैं" मैने बेमन से जवाब दिया।
"मेरा तो मायका हैं वहाँ हर गर्मियों की छुट्टियों में वहाँ जाती हूँ।"
"जी", मेरा बात करने का बिल्कुल भी मूड नहीं था, मैं सबकुछ नज़रअंदाज़ करते हुए फिर से खिड़की से बाहर झाँकने लगी।
"आप अकेली जा रही हैं, आपके पति आपके साथ नहीं जा रहे?"
"जी नहीं, उनको छुट्टी नहीं मिली" मेरे कहते ही,
"और आपके बच्चे?"
"जी उनके कॉलेज हैं।"
"ओह", महिला ने मेरे अकेले जाने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया, ऐसा लग रहा था, जैसे सारी दुनिया की चिंता केवल इसी एक महिला को हैं, अगर यह ना हो तो दुनिया कैसे चलेगी।
धक्-धक् ट्रेन फिर से चलने लगी थी, मैं उठ कर हाथ-मुँह धोने बाथरूम की तरफ़ चली गयी, जब वापिस आयी तो सामने वाली सीट पर बैठी महिला के बच्चे मेरी सीट पर कब्ज़ा कर चुके थे, "बेटा, आंटी को बैठने दो, तुम दोनों मेरे पास आ जाओ, माफ़ करना बहनजी बच्चे हैं।"
"जी कोई बात नहीं" मैने बात ख़त्म करने के लिहाज़ से कहा।
"वैसे आपके पति काम क्या करते हैं।"
"जी उनकी कपड़ों की दुकान हैं।"
"हाँ फिर तो कैसे आ सकते थे दुकान बंद करके, कोई बात नहीं जी कोई भी दिक्कत हो तो आप मेरे मायके आ जाना, मैं वहाँ का पता आपको बता देती हूँ।"
"इसकी कोई ज़रुरत नहीं पड़ेगी मैं तो केवल दो दिन के लिए आयी हूँ शादी में, होते ही वापिस चली जाऊँगी।"
"जैसी आपकी मर्ज़ी, वैसे शादी किसकी हैं?"
"मेरी दोस्त के बेटे की"
"अगर आप मेरे मायके आती तो मैं अपनी माँ के हाथ के बने पकौड़े ज़रूर खिलवाती आपको"
"जी धन्यवाद", कुछ तो थकान की वजह से और कुछ उस महिला की वजह से मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा था, लेकिन वो थी की चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी, दूसरी ओर उसके बच्चों की किच-किच, अब तो गुस्सा आने लगा था।
ट्रेन फिर से रुकी, इस बार भभुआ रोड स्टेशन आया था, यहाँ तो ट्रेन मात्र दो मिनट ही रूकती हैं, भूख लग रही थी कुछ खाने का सामान भी नहीं था साथ में, "बहनजी, भेल लीजिये ना, बच्चों के लिए लायी थी, आप भी लीजिये"
"जी नहीं भूख नहीं हैं।" मैने झूठ बोल दिया
"अरे ऐसे कैसे आपने तो सुबह से कुछ नहीं खाया" इतने में ही एक चाय वाला वहाँ आ गया,
"भैया चाय देना, और साथ में बिस्कुट भी"
"मेमसाब बिस्कुट तो नहीं हैं।"
"अच्छा ठीक हैं चाय तो दो" चाय लेकर मैं पीने लगी,
"लीजिये बिस्कुट, कुछ खा लेंगी तो अच्छा लगेगा" सामने सीट पर बैठी महिला ने बिस्कुट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा,
"जी नहीं, रहने दीजिए" उससे तो मना कर दिया लेकिन भूख से चक्कर आने लगे थे, लेकिन दूसरी तरफ डर भी था कि ज़माना ख़राब हैं किसी का भी विश्वास नहीं करना चाहिए, सिर में दर्द होने की वजह से मैने चाय के साथ सिर दर्द की गोली लेना उचित समझा, सोचा दवाई लेकर सो जाऊँगी इसलिए मैं अपने बैग में दवाई ढूँढने लगी।
"क्या हुआ बहनजी आप कुछ परेशान लग रही हैं।"
"जी कुछ नहीं"
"अरे आप ये दवाई क्यों ले रही हैं, तबियत तो ठीक हैं ना आपकी?"
"जी बस थोड़ा सिर में दर्द था।"
"आप दवाई लेकर सो जाइये, आराम मिलेगा"
"जी धन्यवाद", दवाई लेकर मैं सो गई उस महिला की आवाज़ थी की बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी, कभी कुछ तो कभी कुछ बोले ही जा रही थी लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे नींद आ गयी।
"बहनजी, बहनजी उठिये धनबाद आने वाला हैं, उठकर कुछ खा लीजिए" वो महिला मेरे सिर पर हाथ फेरती हुई मुझे उठा रही थी,
"वक़्त क्या हुआ हैं" मैने अपनी आँखे मसलते हुए पूछा,
"तीन बज रहे हैं ट्रेन तक़रीबन चार घंटे लेट चल रही हैं।"
"हे भगवान, इससे अच्छा तो मैं फ्लाइट से ही आ जाती" मैने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा,
"फ्लाइट का तो कोई मुक़ाबला ही नहीं है बहनजी लेकिन हर कोई तो नहीं आ सकता ना"
"आप बिल्कुल सही कह रही हैं, उठाने के लिए धन्यवाद"
"इसमें धन्यवाद किस बात का,, धनबाद में ट्रेन दस मिनट के लिए रुकेगी, सोचा यहाँ पर आप कुछ खा ले इसलिए उठा दिया, वैसे अब आपका सिर दर्द कैसा हैं?"
"जी अब तो ठीक हैं" इतने में ही धनबाद स्टेशन आ गया और मैं कुछ लेने के लिए ट्रेन से नीचे उतर गयी, चाय और दो समोसे लेने के बाद ट्रेन की तरफ वापिस आने लगी लेकिन कदम खुद-बा-खुद रुक गए और मैने कुछ चॉकलेट भी खरीद ली।
"बच्चो एक तरफ बैठ जाओ आंटी को कुछ खा लेने दो सुबह से भूखी हैं"
"बच्चो ये चॉक्लेट आप लोगो के लिए" मैने चॉकलेट बच्चो की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
"बहनजी इसकी क्या ज़रुरत थी"
"जी बस मन हुआ इसलिए ले आई, आप भी लीजिए ना समोसा गरम हैं।"
"नहीं आप खाइये, मैने तो खाना खा लिया" ज्यादा कुछ बात ना करते हुए मैं समोसा खाने लगी क्योंकि अब तो भूख बर्दाश्त ही नहीं हो रही थी,
"आप पहली बार ट्रेन में सफर कर रही हैं?"
"जी, लेकिन आपको कैसे पता चला?" मैने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा,
"आपको देखकर, कल जब अजमेर से ट्रेन रवाना हुई थी तबसे देख रही हूँ, ऐसा लग रहा हैं आपका बिल्कुल भी मन नहीं था इस ट्रेन में सफर करने का, कल तो आपने कुछ बात भी नहीं की, मैने भी कुछ नहीं बोला यह सोच की आपको बुरा ना लगे" महिला ने मुस्कुराते हुए पूछा,
"दरअसल मैने कभी ट्रेन में सफर ही नहीं किया हैं, मेरे सारे रिश्तेदार और फ्रेंड्स अजमेर में रहते हैं, यही एक सहेली हैं जो कोलकाता में हैं।" मेरे कहते ही,
"फिर तो आपको फ्लाइट से ही आना चाहिए था।"
"मेरे पति ने तो कहा भी था लेकिन मैने ही ट्रेन से जाने की ज़िद की, सोचा ट्रेन में बैठने का भी अनुभव होना चाहिए", ना जाने क्यों मुझे अब उस महिला से बात करना अच्छा लग रहा था।
"बिल्कुल सही कहा आपने, मैं तो हर साल आती हूँ यहाँ इसलिए मुझे तो अच्छा अनुभव हैं।" उस महिला की बात पर हम दोनों ही हॅसने लगे, इसके बाद तो बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि रुकने का नाम ही नहीं लिया, कभी घर-गृहस्थी की बातें, कभी सासों की बुराई, तो कभी पतियों की बुराई, हमारी बाते थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, कुछ देर पहले जो महिला मुझे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लग रही थी, वो अब मेरी दोस्त बन गयी थी, अजीब होता हैं यह ट्रेन का सफर जिनको हम जानते भी नहीं अपने से लगने लगते हैं।
"अरे देखो सियालदह स्टेशन आ गया" मैने खुश होते हुए कहा,
"जी बहनजी अब तो आपको अच्छा लग रहा होगा" महिला के पूछने पर मैने भी मुस्कुराते हुए हाँ में गर्दन हिलाई, और हम दोनों ही अपना-अपना सामान ट्रेन से उतारने लगे।
"लाइए बहनजी मैं आपकी मदद करती हूँ।"
"अरे नहीं रहने दीजिए आपके साथ तो बच्चे भी हैं आप उन्हें संभालिए" इतने में ही मेरी सहेली शिखा और उसके पति राजन मुझे लेने आ गए, "वो देखो मेरी सहेली भी आ गई, आप फ़िक्र मत कीजिये अब मैं चली जाऊँगी।"
"हैलो जी क्या हाल-चाल हैं आपके, शादी में आने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद" मेरी सहेली ने मुझे गले लगाते हुए कहा,
"धन्यवाद किस बात का दे रही हैं, तेरा बेटा मेरा कुछ नहीं लगता हैं क्या?"
"अच्छा बाबा माफ़ कर दे और घर चल, वहाँ सब तेरा बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।"
"हाँ चलती हूँ लेकिन मेरी अटैची कहाँ हैं।" मैने इधर-उधर ढूँढ़ते हुए कहा,
"कैसी थी देखने में"
"लाल रंग की थी ट्रॉली वाली" मेरे स्वर में घबराहट थी,
"बहनजी जैसी अटैची आप बता रही हैं वैसी तो मैने उस महिला के पास देखी थी जो ट्रेन में आपके साथ बैठी थी।"
"क्या ! आपको पूरा यक़ीन हैं" मैने पूछा,
"जी, मुझे लगा वो उसी महिला की अटैची हैं इसलिए कुछ कहा नहीं"
"हे भगवान उसमे तो मेरा सारा कीमती सामान था" मैं अपना सिर पकड़ वही बैठ गई,
"आरती तू चिंता मत कर हम पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने चलते हैं, पुलिस ज़रूर हमारी मदद करेगी" राजन ने मुझे सँभालते हुए कहा,
"लेकिन राजन वो महिला तो देखने में भले घर की ही लग रही थी, हो सकता हैं गलती से ले गयी हो।"
"हाँ लेकिन हमे पुलिस की मदद तो लेनी ही पड़ेगी ना नहीं तो इतने बड़े शहर में उसे कहाँ ढूँढेंगे" शिखा के समझाने पर मैं उन दोनों के साथ पुलिस स्टेशन की ओर चल दी।
"नमस्कार इंस्पेक्टर साहब, मेरा नाम राजन हैं।"
"जी कहिए हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं।" पुलिस इंस्पेक्टर के पूछते ही, मैं अपने आप को नहीं रोक पायी,
"इंस्पेक्टर साहब एक महिला जो मेरे साथ ही सफ़र कर रही थी वो अपने साथ मेरी अटैची ले गयी हैं, देखने में तो भले घर की लग रही थी मुझे लगता हैं वो गलती से ले गयी, आप उस महिला को ढूँढने में हमारी मदद कीजिए"
"तू बैठ जा राजन बात कर रहे हैं ना" शिखा ने मुझे सँभालते हुए कहा,
"उनका कुछ नाम या हुलिया बता सकते हैं आप"
"जी नाम तो मैने पूछा ही नहीं"
"और हुलिया ?" जो हुलिया मैने पुलिस इंस्पेक्टर को बताया उसे सुन वो चौंक गए, एवं एक फोटो मुझे दिखाते हुए बोले,
"क्या वो देखने में ऐसी लगती थी।"
"जी बिल्कुल, ये तो उसी महिला की फोटो हैं, लेकिन ये फोटो यहाँ कैसे !" मैने अचंभित होते हुए पूछा,
"यह एक नामी चोर हैं, इसका नाम सुनहरी हैं, ट्रेन में लोगो को लूटना ही इसका काम हैं, इससे पहले भी इसकी कई शिकायतें आ चुकी हैं, लेकिन यह इतनी शातिर हैं की आज तक पुलिस इसको पकड़ने में नाकामयाब ही रही हैं।"
"लेकिन इंस्पेक्टर साहब इसके साथ तो बच्चे भी थे।"
"हाँ इनका एक पूरा गैंग हैं जिसमे यह लोग बच्चो से भी काम करवाते हैं यह महिला हर बार बच्चे अपने साथ रखती हैं जिससे की कोई भी उस पर शक ना कर सके।"
"इसका मतलब आरती का सामान अब कभी नहीं मिलेगा?" राजन के स्वर में चिंता थी,
"अगर आप लोगो की किस्मत अच्छी हुई तो मिल भी सकता हैं, पुलिस तो अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करेगी ही, आप तो बस रिपोर्ट लिखवा दीजिए, और आपकी जब भी ज़रुरत होगी आपको बुलवाया जाएगा।"
"जी ज़रूर" ऐसा कह रिपोर्ट लिखवाने के बाद हम तीनो राजन और शिखा के घर आ गए।
"तू बिल्कुल भी फ़िक्र मत कर सब सही हो जाएगा, मुझे पूरा विश्वास हैं पुलिस तेरा सामान भी ढूँढ लेगी और उस महिला को भी" शिखा ने मुझे ढाँढ़स देते हुए कहा, मैने भी मुस्कुरा कर उसकी बात का समर्थन किया, क्योंकि मैं उसके घर में जो शादी का माहौल था उसे ख़राब नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब मेरा विश्वास दुनियादारी से पूरी तरह से उठ चुका था, शायद ऐसी घटनाएँ ही हमे भले लोगो को शक की नज़र से देखने पर मज़बूर कर देती हैं।
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