Bikharte Rishtey (Story On Family)
फिर
क्यों होता मुश्किल, औलाद के लिए ये
रिश्ता निभाना
पिछले 10 दिनों से जोधपुर के अस्पताल में
सावित्री बुआ का इलाज़ चल रहा था, डॉक्टरों को समझ नहीं आ रहा
था की क्या हुआ हैं, रिपोर्ट्स तो सारी नार्मल थी फिर भी
बुखार था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था, बच्चो के
एग्जाम होने की वजह से मैं मुम्बई में ही थी बस फ़ोन पर माँ से बुआ की जानकारी मिल
जाती, आज शनिवार
होने की वजह से ऑफिस में छुट्टी थी, सोचा घर के थोड़े काम ही
निबटा लूँ , वैसे तो वक़्त मिलता नहीं, यहाँ
तक कि शनिवार और इतवार को भी फुर्सत नहीं मिलती यह तो आज बच्चे अपनी बुआ के घर गए
हुए थे और नवीन ऑफिस के काम से टूर पर गए थे, सच में ऐसा लग
रहा था कि जैसे चारो ओर शांति ही शांति हैं।
इसी का फायदा
उठाकर मैं अपनी अलमारी की साफ़-सफाई में लग गई, अच्छे
कपडे तह कर एक तरफ़ सलीके से लगाने लगी एवं पुराने किसी को देने के लिए एक तरफ़ रखने
लगी, इतने में ही मेरी नज़र पुराने फोटो के एल्बम पर पड़ीं
सारा काम छोड़ उस एल्बम को बहुत ही उत्सुकता से देखने लगी, सारी
पुरानी फोटो मेरी शादी से पहले की थी, बचपन याद आ गया वो दिन
भी क्या दिन थे ना कोई चिंता ना कोई फ़िक्र बस खाना, पीना,
खेलना और सो जाना बीते हुए दिनों को याद करते हुए मेरे चेहरे पर एक
अलग ही ख़ुशी झलक रही थी, इतने में ही मुझे सावित्री बुआ का
फोटो दिखाई दिया और उनकी याद आ गयी, गोरा चेहरा, लंबे बाल, बड़ी-बड़ी आँखे हमारे घर में शायद ही कोई
इतना खूबसूरत हो जितनी की सावित्री बुआ लगती थी, याद हैं
मुझे वो दिन जब मैं और राहुल भैया छोटे थे, बुआ हर गर्मियों
की छुट्टियों में यश के साथ जोधपुर से अहमदाबाद आया करती थी, बहुत ही यादगार थे वो दिन, जैसे ही स्कूल की
छुट्टियाँ शुरू होती बुआ और यश अपना बोरिया-बिस्तर लेकर हमारे यहाँ आ जाते,
उसके बाद घर में जो धमाल होता उसको तो बयां ही नहीं किया जा सकता,
सच पूछो तो मैं और राहुल भैया तो पूरा साल बुआ के आने का इंतज़ार
करते थे, क्योंकि वो हमेशा अपने साथ हमारे लिए नए कपडे,
खिलौने, फल और मिठाईयाँ लेकर आती वैसे तो यश
भी माँ को उतना ही प्यारा था जितने की हम बुआ को, बुआ जैसे ही घर में कदम रखती फ़रमाइशें शुरू हो जाती और माँ
भी ख़ुशी-ख़ुशी उनकी हर इच्छा पूरी करती, बुआ तो अपना पूरा रौब
चलाती थी लेकिन उन दिनों की बात ही कुछ ओर थी एक तरफ़ हम बच्चो की मस्ती दूसरी ओर
माँ और बुआ की बातें कई बार तो पापा कह भी देते थे, "अरे
भई, मैं भी इसी घर में रहता हूँ थोड़ा ध्यान मेरी तरफ़ भी दे
लिया करो" पापा की बात सुन माँ और बुआ हँसने लगती थी।
साल दर साल
वक़्त गुज़र रहा था, हम बच्चे भी बड़े हो
रहे थे, और एक दिन ऐसा भी आया जब मेरे रिश्ते की बातें होने
लगी, एक दो लड़के देखने के बाद आखिरकार मेरा रिश्ता नवीन के
साथ तय हो गया, नवीन पापा के दोस्त का बेटा था, जान-पहचान होने की वजह से ज्यादा पूछताछ भी नहीं करनी पड़ी और जल्द ही शादी
हो गयी, अभी मेरी शादी को कुछ ही महीने गुज़रे थे की राहुल
भैया के लिए भी लड़कियाँ देखी जाने लगी लेकिन भैया तो छुपे रुस्तम निकले उन्होंने
तो पहले से ही अपने लिए लड़की पसंद कर रखी थी, अपने बचपन की
दोस्त अंकिता वैसे तो अंकिता को मैं भी जानती थी लेकिन भैया और उसके बारे में मुझे
कुछ नहीं पता था अंकिता एक अच्छी लड़की थी इसलिए पापा-मम्मी शादी के लिए जल्द ही मान
गए और भैया की शादी भी धूमधाम से हो गयी, उसके बाद तो सब
अपनी-अपनी घर-गृहस्थी में ऐसे व्यस्त हुए की कभी-कभार ही बात हो पाती, बस माँ से इतना पता चला की बुआ यश के लिए लड़की देख रही हैं, अब वो भी उसकी शादी जल्दी ही करना चाहती हैं।
एक दिन ऑफिस
में मेरे मोबाइल पर बुआ का फ़ोन आया, पता
चला कि यश का रिश्ता पक्का हो गया हैं अगले हफ्ते सगाई हैं, बुआ
ने कसम भी दे दी आना ही पड़ेगा नहीं तो ज़िन्दगी भर बात नहीं करेंगी, मैं और नवीन अपने बेटे तनय के साथ सगाई में गए, उस
वक़्त तनय 6 महीने का था मेरा सारा वक़्त उसी के साथ गुज़र जाता
था, फिर भी भाई की सगाई थी वो भी सबसे छोटे और लाड़ले इसलिए
मैं थोड़ी-थोड़ी देर में तनय को नवीन को देकर सगाई के कार्यक्रमो में शामिल हो जाती
और नवीन तनय को संभालते हुए झल्लाने लगते, लेकिन मैं नवीन को
अनदेखा कर पूरा ध्यान सगाई के कार्यकर्मो में ही लगा रही थी, "क्या बात हैं बुआ लाखों में एक बहु लायी हो सच बुआ किस्मत की तो धनी हो
आप"
"हाँ भई
आखिरकार मेरे यश की पत्नी बनकर आएगी अच्छी तो होगी ही ना" बुआ ने गर्व से कहा,
और गर्व हो भी क्यों ना रिया थी ही ऐसी सुंदर, सुशील बड़ो का आदर करने वाली जो भी एक बार देख ले उस पर फ़िदा हो जाये,
इन्ही सब मस्ती मज़ाक के बीच सगाई भी हो गयी, शादी
अगले महीने थी, बुआ ने शादी में आने का पक्का वादा लिया उसके
बाद ही वापिस जाने दिया, यह एक महीना कैसे गुज़र गया पता ही
नहीं चला, और वो दिन भी आ गया जब यश की बारात जानी थी,
मैने पहली बार फूफाजी को इतना नाचते हुए देखा और बुआ के चेहरे की
ख़ुशी तो बयान ही नहीं की जा सकती थी, और हो भी क्यों ना यश
उनकी इकलौती संतान जो हैं, शादी की सभी रस्मे बहुत ही
धूम-धाम से सम्पन हुई और हम रिया को विदा करवा घर ले आए, "दीदी अब तो आपकी भी बहु आ गयी हैं बधाई हो" माँ ने बुआ को गले लगाते
हुए कहा,
"आपको भी बहुत-बहुत बधाई हो भाभी बस अब तो यह देखना हैं हम कैसी सासे साबित
होती हैं।"
"कैसी
क्या बुआ अच्छी ही साबित होगी, बल्कि मुझे तो
लगता हैं बहुओं के आने से आप दोनों मुझे भूल जाओंगे"
"हट
पगली कुछ भी बोलती हैं" बुआ ने हल्के से गाल पर चपत लगाते हुए कहा,
इसी मस्ती मज़ाक में हमारा वापिस जाने का दिन भी आ गया।
"अच्छा बुआ अब चलते हैं, यश से कहना जब भी टाइम मिले
रिया को मुम्बई लेकर आए" "अरे मुझे क्यों कह रही हैं सीधा यश से ही बात
कर लेना, मेरे से तो तुम लोग बस फ़ोन पर बात करते रहा करो
अच्छा लगता हैं, अब आने के लिए कहूँगी तो वक़्त नहीं होने का
बहाना बनाओगे"
"बुआ आप
भी ना कुछ भी बोलती हो वक़्त मिलेगा तो मिलने भी आयेंगे,
और फ़ोन पर तो बात करते ही रहेंगे, बस आप तो
अपनी और फूफाजी की तबीयत का ध्यान रखना" इन्ही औपचारिक बातों के साथ हमने भी
बुआ के यहाँ से विदा ली मम्मी-पापा एक दिन पहले अहमदाबाद के लिए निकल चुके थे।
उसके बाद तो व्यस्त दिनचर्या होने की वजह से बातचीत का सिलसिला धीरे-धीरे कम हो
गया, बस कभी-कभी माँ से ही बुआ के हालचाल पता चल जाया करते
थे, सब अच्छा ही चल रहा था, माँ और बुआ
दोनों ही अपनी-अपनी बहुओं से खुश थी।
एक दिन अचानक
आधी रात को माँ का फ़ोन आया की दिल का दौरा पड़ने से फूफाजी का देहांत हो गया हैं,
सुनकर झटका सा लगा ऐसा क्या हो गया वो तो बिल्कुल स्वस्थ थे,
खैर होनी को कौन टाल सकता हैं, मैं और नवीन
सुबह तड़के ही जोधपुर के लिए रवाना हो गए, वहाँ पहुँचे तो बुआ
की हालत देखी नहीं जा रही थी, उनका तो रो रोकर बुरा हाल था,
लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा लगा रिया और यश के चेहरों पर शिकन तक नहीं
हैं, यही बात जब मैने माँ को बताई तो उन्होंने डांट दिया
"दुःख दिल में होता हैं उसका ढिंढोरा नहीं पीटा जाता समझी" मुझे भी माँ की
बात सही लगी, फिर भी पता नहीं घर का माहौल कुछ अज़ीब सा लगा
ऐसा लगा जैसे बुआ और यश के बीच में कुछ अनबन चल रही हैं, लेकिन
अपने मन का वहम समझ मैने यह बात दिमाग से निकाल दी, एक-एक कर
बारह दिन भी गुज़र गए, पगड़ी की रस्म हुई और सभी मेहमान वापिस
चले गए,
मैं और नवीन
भी बुआ से विदा ले मुम्बई के लिए रवाना हो गए, लेकिन
मेरा मन वही बुआ के पास अटका हुआ था, "क्या हुआ रश्मि
क्या सोच रही हो" नवीन ने ट्रेन में मेरे पास बैठते हुए पूछा,
"पता नहीं क्यों इस बार बुआ के घर का माहौल कुछ अच्छा नहीं लगा।"
"तुम भी
कमाल करती हो उस घर में मौत हुई हैं माहौल अच्छा कैसे होगा।"
"वो बात
नहीं हैं मुझे लगता हैं बुआ और यश के बीच में अनबन हुई हैं,
तुमने देखा दोनों कैसे एक दूसरे से कटे-कटे थे और इस बार तो रिया का
व्यवहार भी कुछ ठीक नहीं लगा।"
"रश्मि
हो सकता हैं तुम जो कह रही हो वो सही हो लेकिन हम किसी के घर के मामलों में तो
नहीं बोल सकते ना"
"हाँ
तुम सही कह रहे हो मैं तो यह चाहूँगी की यह मेरे मन का वहम हो"
"तुमने
बिल्कुल सही कहा अब थोड़ा आराम कर लो कुछ ही देर में मुम्बई आने वाला हैं,
फिर तो घर पहुँच कर वही पुराने वाली दिनचर्या शुरू हो जाएँगी"
नवीन के कहने से मैने अपनी आँखे तो मूँद ली पर नींद कोसो दूर थी ना चाहते हुए भी
बुआ का चेहरा सामने आ रहा था।
कुछ ही देर
में मुम्बई भी आ गया, उसके बाद तो घर
पहुँचकर वही ऑफिस जाना, बच्चो का स्कूल, घर के काम इन सब में कुछ ओर सोचने का वक़्त ही नहीं मिलता था, धीरे-धीरे समय के साथ सब धुंधला होता चला गया, अब तो
दिनचर्या इतनी व्यस्त हो गयी थी कि माँ से भी केवल इतवार को ही बात हो पाती थी,
बाकी किसी से तो बात करने का वक़्त ही नहीं मिल पाता था, बस उन्ही से सबकी खैर-खबर पूछ लेती थी, इसी तरह 5 साल बीत गए, लेकिन एक दिन जब इतवार को माँ से बात
करने के लिए फ़ोन किया तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया, एक के बाद
एक कई फ़ोन कर लिए लेकिन कोई जवाब नहीं था,मुझे चिंता होने
लगी, जब पापा को फ़ोन किया तो उनका भी कोई जवाब नहीं, सोचा आज तो भाभी घर पर ही होगी उन्हें फ़ोन कर लेती हूँ , जब भाभी से बात हुई तो पता चला माँ और पापा बुआ के पास गए हैं, उनके पडोसी का फ़ोन आया था, बुआ को बहुत तेज़ बुखार
था इसलिए उन्हें सँभालने के लिए बुलाया था, "लेकिन भाभी
यश और रिया कहाँ हैं?"
"पता
नहीं दीदी हो सकता हैं कही बाहर घूमने गए हो और पडोसी ने हमे फ़ोन कर दिया"
"हाँ हो
सकता हैं,
और घर में सब ठीक हैं ना भाभी"
"हाँ
दीदी सब ठीक हैं आप बताओ काफी वक़्त से आप आई ही नहीं"
"हाँ
भाभी बच्चे बड़े हो रहे हैं और आप तो जानती हैं आजकल कॉम्पिटिशन का ज़माना हैं इसलिए
स्कूल से ज्यादा छुट्टी भी नहीं करवा सकते और नवीन को तो टूर से ही फुर्सत नहीं
मिलती"
"यहाँ
का भी यही हाल हैं दीदी बस कभी-कभार एक दूसरे से बात हो जाए वही काफी हैं।"
"जी भाभी अच्छा अब मैं फ़ोन रखती हूँ माँ से कोई बात हो तो मुझे बताना"
"जी
दीदी अच्छा नमस्ते" भाभी से बात करके मन को कुछ शांति तो मिली लेकिन अब बुआ
की फ़िक्र होने लगी थी, समझ नहीं आ रहा था की
वहाँ क्या चल रहा होगा।
इतने में ही
माँ का फ़ोन आ गया, "हैलो माँ,
क्या हुआ बुआ को?"
"बेटा उन्हें बहुत तेज़ बुखार हैं अभी डॉक्टर दवाई देकर गया हैं।"
"यश और
रिया कहाँ हैं कही बाहर घूमने के लिए गए हुए हैं क्या?"
"नहीं बेटा वो दोनों इसी शहर में हैं, बस अब वो तेरी
बुआ के साथ नहीं रहते बल्कि एक अलग फ्लैट में रहते हैं।"
"माँ आप
यह क्या कह रहे हो मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा हैं कि यश भी ऐसा कर सकता हैं।"
"विश्वास
तो मुझे भी नहीं हुआ था जब सुना, इसीलिए तेरी बुआ
की खबर देने के लिए मैने यश को फ़ोन कर दिया, जानती हैं उसने
क्या कहा?"
"क्या?"
"मेरे पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं हैं।"
"आपको
उसी वक़्त उसे ज़ोर से डाँटना चाहिए था।"
"नहीं
बेटा यश अब बहुत बदल गया हैं, तुझे तो कुछ पता
ही नहीं हैं तेरी बुआ कितनी परेशान हैं, अरे जिस औलाद को
उन्होंने अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया, उसकी ख़ुशियों
में ही अपनी ख़ुशियों को तलाशा वही औलाद अगर अपनी माँ को त्याग दे तो सोच उस माँ को
कैसा लगेगा"
"माँ आप
एक काम करो सबसे पहले तो बुआ के ठीक होते ही उन्हें अपने साथ अहमदाबाद ले आओ,
फिर बाद में देखते हैं क्या करना हैं।"
"हाँ
ऐसा ही करुँगी मुझे पहले पता होता तो कभी तेरी बुआ को अकेला नहीं छोड़ती,
लेकिन उन्होंने तो कभी यह सब मुझे बताया ही नहीं बल्कि वो तो हमेशा
यश और रिया की तारीफ़ ही करती थी"
"आप
समझती क्यों नहीं हो वो यश की माँ हैं और कोई माँ कभी भी अपने बच्चो के बारे में
बुरा नहीं बोलती हैं चाहे बच्चा कितना ही नकारा क्यों ना हो"
"हाँ यह
तो तू सही कह रही हैं, अच्छा अब मैं फ़ोन
रखती हूँ तेरी बुआ के लिए कुछ खाने को बना दूँ" ऐसा कह माँ ने फ़ोन रख दिया और
मैं भी घर के काम खत्म करने लगी लेकिन शायद दिमाग मेरे साथ नहीं था वो तो बस
बार-बार बुआ के पास चला जाता था।
अगले दिन मैं
ऑफिस में काम कर रही थी कि माँ का फ़ोन आ गया "हैलो माँ क्या हुआ बुआ कैसी हैं।'
"रश्मि तेरी बुआ की तबियत बहुत ख़राब हैं तेरे पापा और मैं उन्हें अस्पताल
लेकर जा रहे हैं, अभी राहुल को फ़ोन किया था वो भी यहाँ आ रहा
हैं।"
"माँ आप
यश को फ़ोन करो उसको आना चाहिए।"
"किया
था बेटा वो दोनों शिमला घूमने गए हैं।"
"हे
भगवान,
क्या हो गया हैं दोनों को, ज़रा भी चिंता नहीं
हैं अपनी माँ की"
"अब
क्या कर सकते हैं हमसे जितना हो पायेगा तेरी बुआ की देखभाल करेंगे आगे भगवान की
मर्ज़ी"
"आप
हिम्मत से काम लो माँ, बुआ जल्द ही अच्छी हो
जाएगी, अच्छा अब मैं फ़ोन रखती हूँ आप बुआ की खैर-खबर देते
रहना" ऐसा कह मैने फ़ोन तो रख दिया लेकिन अब चिंता पहले से भी ज्यादा होने लगी
थी, और साथ ही यश और रिया पर गुस्सा भी बहुत आ रहा था,
मन हो रहा था दौड़ के यश के पास जाऊँ और ज़ोर से उसको एक थप्पड़ लगाऊँ,
तरस आ रहा था बुआ पर बल्कि बुआ ही नहीं उन सभी माँओं पर तरस आ रहा
था जो अपने बच्चो के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा देती हैं, खुद की खुशियाँ यह शब्द तो जैसे उनकी ज़िन्दगी में होता ही नहीं है,
बच्चो की ख़ुशी में ही खुश हो लेती हैं, उनका
छोड़ा हुआ खाना खाकर ही पेट भर लेती हैं, और बच्चे को थोड़ी सी
भी तकलीफ हो तो पूरी दुनिया सिर पर उठा लेती हैं, आज वही माँ
तकलीफ में हैं तो उसके बच्चे को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा, क्या
यही दुनियादारी हैं माँ-बाप अपने बच्चे के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाते हैं,
वही एक बच्चे से अपनी माँ की देखभाल नहीं हो पा रही हैं, सवाल तो और भी बहुत उठ रहे थे दिमाग में लेकिन उनके जवाब कही भी नहीं थे।
दिन में रोज़
एक बार माँ से फ़ोन पर बुआ के हाल-चाल पूछ लिया करती, लेकिन उनकी तबियत थी कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी, आज बुआ को अस्पताल में भर्ती हुए पूरे 10 दिन हो गए,
अब तो डॉक्टरों ने उन्हें आई.सी.यू में शिफ़्ट कर दिया हैं, फोटो देखते हुए ना जाने क्यों मन विचलित होने लगा, सोचा
जैसे ही नवीन टूर से वापिस आते हैं उनसे बात कर कुछ दिनों के लिए बुआ से मिलकर
आऊँगी, मैं यह सब
सोच ही रही थी इतने में ही फ़ोन की घंटी बजी, "हैलो"
"हैलो
रश्मि मैं राहुल बोल रहा हूँ।"
"भैया
आप कैसो हो, और अब बुआ की तबियत कैसी हैं।"
"रश्मि
एक अच्छी ख़बर हैं बुआ से मिलने यश आया हुआ हैं, बार-बार
अपनी गलतियों की माफ़ी माँग रहा हैं, लगता हैं वाकई में उसको
अपनी ग़लती का एहसास हो गया हैं।"
"अच्छा
हैं ना भैया देर से ही सही यश ने अपनी ग़लती मान तो ली,
और रिया, वो भी आई हैं ना साथ में?"
"नहीं, वो नहीं आयी"
"कोई
बात नहीं बेटा आ गया हैं तो अब बहु भी आ जाएगी।"
"अच्छा
अब मैं फ़ोन रखता हूँ और हाँ हो सकता हैं हम लोग आज रात ही अहमदाबाद के लिए रवाना
हो जाए,
यश ने वादा किया हैं कि अब वो बुआ को बिल्कुल भी अकेला नहीं छोड़ेगा
और उनकी पूरी तरह से देखभाल करेगा।"
"भैया
यह तो बहुत अच्छी बात हैं, लेकिन बुआ की तबियत
थोड़ा और सुधर जाती उसके बाद वापिस आते तो अच्छा था।"
"नहीं
रश्मि ऐसा करने से यश को ऐसा लग सकता हैं की हमें उसके ऊपर विश्वास नहीं हैं।"
"शायद आप सही कह रहे हैं, अच्छा अब मैं
फ़ोन रखती हूँ, यह खुशखबरी नवीन को भी तो देनी हैं।" ऐसा
बोल मैने फ़ोन रख दिया और चेहरे पर असीम मुस्कान लिए नवीन को फ़ोन लगाने लगी।
वक़्त अपनी ही
गति से गुज़र रहा था, बुआ भी अब ठीक होकर
घर चली गयी थी, कभी माँ से तो कभी बुआ से बात हो जाया करती
थी, बातों ही बातों में पता चलता था कि अब तो रिया का
व्यवहार भी बुआ के साथ अच्छा हैं, जानकर मन को सुकून मिलता
कि मेरे परिवार की खुशियाँ वापिस आ गयी हैं, लेकिन शायद यह
खुशियाँ ज़्यादा वक़्त के लिए नहीं थी, एक रात अचानक तीन बजे
फ़ोन की घंटी बजी, मैने किसी अनहोनी का अंदाज़ा लगाते हुए फ़ोन
उठाया, और हुआ भी वैसा ही भैया का फ़ोन था कि बुआ अब इस
दुनिया में नहीं रही थी, कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि अचानक
से क्या हो गया, अब तो सब कुछ सही होने लगा था, लेकिन वहाँ बैठक में आयी हुई पड़ोस की औरते बार-बार यश और रिया को कोस रही
थी, कह रही थी भगवान ऐसी औलाद किसी को भी ना दे जिसने अपनी
माँ से ही नौकरो जैसा व्यवहार किया, अब सबकुछ समझ आ गया था
उस दिन अस्पताल में यश ने केवल सुधरने का नाटक किया था हक़ीक़त तो कुछ और ही थी
लेकिन अब पछताने का कोई फ़ायदा भी नहीं था क्योंकि अब बुआ तो वापिस आ नहीं सकती थी
ना।
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