Shaadi Mein Dhokha (Story On Fraud In Marriage)

सजाए थे ख्वाब संग तेरे जिंदगी गुजारने के

देख तेरी बेवफ़ाई हर पल आंसू बहा रहे हैं हम

 

"सुधा तुम अपना काम करके आज जल्दी घर वापिस चली जाना, और हाँ शाम का खाना बनाने के लिए आने की ज़रूरत नहीं हैं, कुछ खाने का मन होगा तो मैं खुद ही बना लूँगी।"

"क्या हुआ मेमसाब मुझसे कोई गलती हुई हैं क्या?"

"अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, बस आज मैं अकेली रहना चाहती हूँ, थोड़ा-सा सिर में दर्द हैं तो आराम भी कर लूँगी।"

"मेमसाब मैं आपके सिर में तेल की मालिश कर देती हूँ।"

"नहीं सुधा तुम जाकर अपना काम करो, मैं ठीक हूँ।" सुधा ने भी तेल लगाने की ज्यादा ज़िद नहीं की और अपने काम में लग गयी। शालिनी भी उदास और गुमसुम-सी अपने कमरे में जाकर लेट गई, वो आज का ही तो दिन था जब शालिनी की दुनिया ही उजड़ गयी थी, कैसे भूल सकती हैं वो इस दिन को, खुशियाँ भी इसी दिन नसीब हुई और ख़ुशियों को ग्रहण भी इसी दिन लगा, आज इस ग्रहण को लगे पूरे बीस साल हो चुके थे।

"आशा, अरी ओ आशा, कहाँ चली गयी?  देख तेरे लिए खुशखबरी लाई हूँ ।"

"आई मौसी, बोलो क्या खुशखबरी लायी हो?"

"अरी पहले मुँह तो मीठा करवा फिर बताऊँगी" आशा तुरन्त रसोई की तरफ़ भागी और लड्डू से भरा डिब्बा ले आयी।

"लो मौसी, अब बताओ क्या खुशखबरी हैं?"

"तेरी बेटी शालिनी के लिए रिश्ता लाई हूँ, लड़का लाखों में एक हैं, उसकी गारंटी मैं लेती हुई।"  

"मौसी, लड़का करता क्या हैं और घर परिवार कैसा हैं?"

"लड़के की सरकारी नौकरी हैं, और परिवार तो बहुत ही अच्छा हैं, तू तो बस अमर को बोल जितना जल्दी हो सके लड़केवालों से बात करले, इतने अच्छे लड़के ज्यादा दिन रुके नहीं रहते।"

 "जी मौसी मैं आज ही इनसे बात करती हूँ।" ऐसा बोल आशा चाय बनाने के लिए रसोई में चली गयी। 

"लेकिन आप लड़के वालों को कैसे जानती हैं?" आशा ने चाय का कप रमा मौसी के हाथ में देते हुए पूछा।

"मेरी नन्द की नन्द का लड़का हैं, घर-परिवार की तो तुम बिल्कुल भी चिन्ता मत करो, लड़का भी हीरा हैं, अमर आ जाए तो उससे बात करके मुझे जवाब दे देना।"  

"जी मौसी"

"अच्छा अब मैं चलती हूँ।" मौसी के जाने के बाद आशा शाम का खाना बनाने की तैयारी में लग गयी।

 

शाम को अमर के काम से वापिस आने के बाद, "सुनिए, आज रमा मौसी आई थी, अपनी शालिनी के लिए रिश्ता लेकर"

"किसका रिश्ता लेकर आयी थी वो?"

"अपनी नन्द की नन्द के लड़के का, कह रही थी लड़का लाखों में एक हैं, और परिवार भी अच्छा हैं, वो तो तारीफ़ करते नहीं थक रही थी।"

"वो सब तो ठीक हैं आशा लेकिन लड़का करता क्या हैं ?"

"सरकारी नौकरी बता रही थी, आप जाकर उन लोगो से बात कर लीजिएगा, अगर रिश्ता अच्छा हैं तो क्या बुराई हैं बात आगे बढ़ाने में"

"ठीक हैं लेकिन इससे पहले तुम शालिनी से बात करलो, उसके मन में क्या चल रहा हैं इसकी जानकारी भी तो होनी चाहिए।"

"जी मैं आज ही बात करती हूँ।" ऐसा कह आशा रसोई की ओर चली गई।

कुछ देर बाद, "माँ, खाने में क्या बनाया हैं, बहुत भूख लग रही हैं।" शालिनी ने कॉलेज से आते ही आशा से पूछा।

"उरद की दाल, और बैंगन का भर्ता"

"अरे वाह क्या बात हैं, माँ फटाफट खाना लगा दो भूख बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हो रही हैं।" आशा को खाना लगाते हुए देख, "क्या बात हैं माँ आज कोई ख़ास बात हैं क्या, आपके चेहरे पर ख़ुशी झलक रही हैं।"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं तू खाना खा ले फिर तेरे से कुछ बात करनी हैं।" ऐसा कह आशा भी शालिनी के साथ ही खाना खाने बैठ गयी।

"बोलो ना माँ क्या बात हैं, आपके चेहरे की चमक बता रही हैं ज़रूर कोई ख़ुशी की ही बात होगी।"

"आज रमा मौसी आयी थी।"

"आज रमा नानी आयी थी, कैसे आना हुआ"  

"तेरे लिए रिश्ता लेकर"

"माँ मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी हैं।"

"तू समझती क्यों नहीं हैं शालिनी शादी तो करनी हैं ना"

"माँ अभी तो मेरी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई हैं, और मुझे पढ़ाई ख़त्म होने के बाद नौकरी करनी हैं, शादी करने का मेरा अभी कोई मन नहीं हैं।" ऐसा बोल शालिनी अपने कमरे की ओर चली गई।

 

अगले दिन सुबह, "सुनिए, शालिनी तो शादी के बारे में बात करने को तैयार ही नहीं, कह रही हैं पढ़ाई पूरी कर नौकरी करना चाहती हैं।"

"हाँ तो इसमें हर्ज ही क्या हैं, आशा तुम उससे बात करो उसके नौकरी करने से हमें कोई एतराज़ नहीं हैं, और मेरी समझ से लड़केवालो को भी एतराज़ नहीं होना चाहिए, उसको समझाओ एक बार लड़के से मिलने में कोई हर्ज नहीं हैं, उसका जो भी फ़ैसला होगा हमे मंजूर हैं।"

"ठीक हैं, मैं आज शाम उससे दोबारा बात करके देखती हूँ।"

शाम को कॉलेज से लौटने पर आशा ने फिर से शालिनी के सामने शादी की बात छेड़ दी, "माँ तुम समझती क्यों नहीं हो, मुझे शादी नहीं करनी।"

"शालिनी बेटा हमें तेरे नौकरी करने से कोई एतराज़ नहीं हैं, और तेरे पापा ने कहा हैं वो लड़केवालों से भी इस बारे में बात करेंगे, हम तो सिर्फ इतना चाहते हैं तू एक बार लड़के से मिल ले, उसके बाद तेरा जो भी फैसला होगा हमें मंज़ूर हैं।"

"ठीक हैं आप पापा से कह दीजिये उन लोगो से बात करले, मैं लड़के से मिलने के लिए तैयार हूँ।" ऐसा बोल शालिनी अपने कमरे में सोने चली गई, लेकिन शालिनी की हाँ सुन आशा के होठों पर मुस्कान आ गयी।

 

रात को, "सुनिए जी, सो गए क्या?"

"नहीं बोलो, शालिनी से बात हुई?"

"हाँ वो लड़के से मिलने के लिए तैयार हैं, क्यों ना आप कल ही रमा मौसी से लड़केवालों के बारे में बात करलों।"

"हाँ तुम सही कह रही हो, ऐसे मामलों में देर नहीं करनी चाहिए, और हाँ सुबह जल्दी उठा देना ऑफिस में कुछ ज़रूरी काम हैं।"

"ठीक हैं उठा दूँगी।" अगले दिन सुबह अमर ऑफिस के लिए निकल गया और आशा भी घर के कामों में लग गयी लेकिन मन में यही कशमकश चल रही थी कि पता नहीं यहाँ रिश्ता होगा की नहीं, इतने में ही रमा मौसी का फ़ोन आ गया,

"हैलो, आशा"

"नमस्ते मौसी कैसी हो।"

"अरी मैं तो अच्छी हूँ तूने घर पर बात की जो रिश्ता मैं लेकर आयी थी उसके बारे में"

"हाँ मौसी आज अमर आपसे बात करेंगे लड़के वालो के बारे में, और शालिनी भी तैयार हो गयी हैं लड़के से मिलने के लिए"

"अरे ये तो बहुत ही अच्छी ख़बर हैं, अच्छा अब में फ़ोन रखती हूँ" और आशा भी अपने काम खत्म करने में लग गयी।

 

शाम को ऑफिस से लौटते ही, "आशा कहाँ हो, खुशखबरी हैं तुम्हारे लिए"

"आ गए आप, क्या खुशखबरी लाए हैं?" आशा ने अमर के हाथ से बैग लेते हुए पूछा,

"परसो इतवार को लड़केवाले अपनी शालिनी को देखने आ रहे हैं।"

"क्या !  इतनी जल्दी हमने तो कोई तैयारी ही नहीं की अभी तक"

"अरे पगली घबराती क्यों हैं रमा मौसी हैं ना सब संभाल लेगी, सच कह रही थी मौसी बहुत ही अच्छे लोग हैं, लड़के के पिताजी से फ़ोन पर बात हुई बहुत ही भले लगे"

"चलो अच्छा हैं, भगवान करे लड़का भी संस्कारी हो।"

"सब अच्छा ही होगा बस लड़का-लड़की एक दूसरे को पसंद कर ले, शालिनी से कहना इतवार को घर पर ही रहे।"

"इसकी चिंता आप मत करो मैं उससे कह दूँगी" आशा की ख़ुशी का तो जैसे कोई ठिकाना ही नहीं था बस भाग-भाग कर लड़के वालों के स्वागत की तैयारी कर रही थी, अमर ने भी शनिवार की ऑफिस से छुट्टी ले ली जिससे काम में आशा की मदद हो सकें।

 

इतवार का दिन था, सुबह सात बजे थे, "आशा कहाँ हैं ?"

"मौसी आप यहाँ इतनी जल्दी?" 

"अरी तेरी मदद करवाने आयी हूँ, नहीं तो कहेंगी मौसी ने आकर कुछ काम भी नहीं करवाया" "मौसी आप भी ना कुछ भी बोलती हो, लेकिन अच्छा हुआ आप आ गयी, अगर कुछ भी गलती हुई तो आप संभाल लेना"

"इस बात की तो बिल्कुल भी फ़िक्र मत कर वो लोग बहुत ही अच्छे हैं।"

"बस मौसी आपने उन लोगो की इतनी तारीफ़ कर दी हैं कि अब तो मन हो रहा हैं यहीं शादी हो जाए"

"सबकुछ अच्छा रहा तो शादी भी यहीं हो जाएगी" रमा मौसी की आवाज़ सुन अमर भी वहाँ आ गया,

"प्रणाम मौसी जी"

"अरे अमर, कैसे हैं आप?"

"अच्छा हूँ और अब आप आ गयी हैं तो कोई चिंता भी नहीं हैं।"

"यह तो आप लोगो का बड़प्पन हैं जो मुझे इतना मान दे रहे हैं।" इतने में ही आशा चाय और नाश्ता ले आई,

"शालिनी कहाँ हैं उसे भी बुला लो, वो भी नाश्ता कर लेगी" अमर के कहते ही,

"लो पापा में भी आ गयी, प्रणाम नानी कैसे हो आप"

"अच्छी हूँ, अगर तेरा रिश्ता पक्का हो जाये तो और भी अच्छी हो जाऊँगी" रमा मौसी ने मुस्कुराते हुए कहा, और शालिनी ने भी बिना कुछ बोले शर्माकर नज़रे झुका ली, बातों ही बातों में कैसे वक़्त बीत गया पता ही नहीं चला, और लड़केवालों का आने का वक़्त भी हो गया।

 

"लो आ गए सब लोग, आओ जीजी आओ, कोई परेशानी तो नहीं हुई घर ढूँढने में" रमा मौसी ने मेहमानों को अंदर बुलाते हुए पूछा,

"नहीं भाभी आसानी से आ गए, और आप बताए कैसी हैं।"

"मैं अच्छी हूँ, इनसे मिलो यह मेरी भांजी हैं आशा, और यह उसके पति अमर इन्ही की लड़की शालिनी से रिश्ते की बात चलाई हैं, अमर ये हैं मेरी नन्द की नन्द कुसुम जीजी, और ये हैं इनके पति श्याम बाबू और इनका बेटा नरेन"

"नमस्कार, आप लोग खड़े क्यों हैं बैठिए ना" अमर ने सबसे बैठने का आग्रह करते हुए कहा, "रमा मौसी से आप लोगो की बहुत ही तारीफ़ सुनी हैं हमने" आशा ने पानी के गिलास टेबल पर रखते हुए कहा,

"जी ये तो इनका बड़प्पन हैं", इन्ही औपचारिकताओं के साथ बातों का सिलसिला आगे बढ़ा, "नरेन बेटा आप करते क्या हैं" अमर ने पूछा,

"जी, मैं एक सरकारी ऑफिस में अकाउंट ऑफिसर हूँ।"

"बहुत अच्छे, और महीने का कमा कितना लेते हो।"

"जी सब मिलाकर तक़रीबन पचास हज़ार मिल जाते हैं।"

"भाईसाहब किसी भी प्रकार का संकोच मत करना जो भी पूछना हो आराम से पूछ सकते हैं।"

"जी ऐसी कोई बात नहीं हैं रमा मौसी की तरफ से रिश्ता आया हैं हमारे लिए तो यही सबसे अच्छी बात हैं।"

कुछ ही देर में शालिनी भी बैठक में आ गयी, और नमस्ते कर सबका अभिवादन करने लगी, "आओ बेटा बैठो बिल्कुल भी परेशान होने की ज़रुरत नहीं हैं।" कुसुम ने शालिनी को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कहा,

"और बेटा बताओ क्या करती हो।"

"जी मैं बी. ए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही हूँ।"

"बहुत अच्छे देखो बेटा तुम जितना पढ़ना चाहो पढ़ सकती हो, हमे कोई एतराज़ नहीं हैं।" "धन्यवाद आंटी, अगर आप लोगो को कोई आपत्ति ना हो तो मैं पढ़ाई ख़त्म होने के बाद नौकरी करना चाहूँगी।"

"शालिनी बेटा इसमें पूछने वाली क्या बात हैं तुम जो भी करना चाहो कर सकती हो, हमे कोई एतराज़ नहीं हैं।" श्याम बाबू ने शालिनी को आश्वासन देते हुए कहा,

"धन्यवाद भाईसाहब बहुत ही बड़ा दिल हैं आप लोगो का" आशा ने कहा,

"बहनजी इसमें बड़े दिल वाली क्या बात हैं, अगर हम चाहते हैं हमारी बेटी नौकरी करे तो बहू क्यों नहीं?" श्याम बाबू ने कहा। 

 "आप लोगो में से अगर किसी को कोई आपत्ति ना हो तो कुछ देर लड़का-लड़की अकेले में बात कर सकते हैं" रमा मौसी ने शालिनी की ओर शरारत भरी नज़रों से देखते हुए कहा,

"जी ज़रूर हमे कोई एतराज़ नहीं हैं, नरेन जाओ बेटा" कुसुम ने कहा, और रमा मौसी शालिनी और नरेन दोनों को लेकर घर की छत पर आ गई।

"अब तुम दोनों यहाँ पर आराम से बातें कर सकते हो, और अब मैं चली" ऐसा बोल रमा मौसी मुस्कुराती हुई चली गयी।

"मुझे नहीं पता कि आप मेरे बारे में क्या सोच रही हैं, लेकिन मैं सिर्फ आपसे इतना कहना चाहता हूँ कि मुझे इस रिश्ते से कोई एतराज़ नहीं हैं, हाँ एक बात और नौकरी के दौरान मैं ज़्यादातर टूर पर ही रहता हूँ, मेरे हिसाब से यह बात आपको शादी से पहले ही पता हो तो बेहतर हैं।"

"आपने तो अपने बारे में सबकुछ बता दिया क्या मेरे बारे में कुछ नहीं जानना चाहेंगे?" शालिनी के नरेन से पूछते ही,

"जी नहीं, आप मेरे मम्मी-पापा को पसंद हैं, और वो लोग कभी भी मेरे लिए कोई ग़लत फ़ैसला नहीं लेंगे" नरेन की बात सुन शालिनी उसकी कायल हो गयी।

"अरे भई, अगर तुम दोनों की बातें हो गयी हो तो नीचे आ जाओ" रमा मौसी की आवाज़ सुन दोनों नीचे बैठक में आ गए।

"क्या बात हैं नरेन बेटा शालिनी पसंद आयी या नहीं?" रमा मौसी ने पूछा,

"जी मुझे यह रिश्ता मंज़ूर हैं।"

"और शालिनी तुम्हारा क्या ज़वाब हैं।" कुसुम ने शालिनी की ओर देखते हुए पूछा,

"जी मेरी भी हाँ हैं" ऐसा कह शालिनी वहाँ से शर्माकर चली गयी।

"बहुत-बहुत बधाई हो, अब तो जल्द ही शादी का मुहूर्त निकलवाया जाए।" श्याम बाबू ने अमर को गले लगाते हुए कहा, दूसरी ओर कुसुम ओर आशा ने भी एक दूसरे को बधाई दी।

 "अरे यह क्या रिश्ता हुआ नहीं कि रमा को सब भूल गए"

"मौसी ऐसे क्यों बोल रही हो अगर आप नहीं होती तो यह रिश्ता हो सकता था क्या" आशा ने रमा के गले लगते हुए कहा,

"भाभी आभारी तो हम भी आपके बहुत हैं आपकी वजह से ही तो शालिनी जैसी संस्कारी लड़की हमारे घर आएगी।"

"अरे भई रिश्ते तो भगवान के घर से बनकर आते हैं, मैं तो बस दोनों तो मिलवाने का ज़रिया बनी थी।" इन्हीं सब बातों के साथ सभी मेहमानों ने विदा ली।

 

 कुछ देर बाद, "शालिनी बेटा तू खुश तो हैं ना ?" आशा ने पलंग पर लेटी हुई शालिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।

"हाँ माँ" ऐसा कह शालिनी शरमा गयी, आशा भी आज बहुत खुश थी, उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि घर बैठे इतना अच्छा रिश्ता मिल जाएगा, रमा मौसी कभी यहाँ तो कभी वहाँ रिश्ता निभाने भागती ही रहती, इसी भागदौड़ के बीच कब शादी की रस्में शुरू हो गयी पता ही नहीं चला,

"अरे भई शादी की तैयारियों में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए आख़िरकार मेरी इकलौती बेटी की शादी हैं।" अमर ने शादी के आयोजकों को निर्देश देते हुए कहा,

"मेरे पास तो दोनों ही घरों से न्यौता हैं।" रमा मौसी के कहते ही,

"हाँ मौसी क़िस्मत वाली हो जब ही तो दोनों घरों में आपको इतना सम्मान मिल रहा हैं।"

"हाँ यह तो तुम सबका प्यार हैं मेरे लिए" रमा मौसी ने कहा।

"रमा नानी आप भी बहुत भोली हैं, अगर मैं होती तो अपने लिए दोनों ही घरों से सोने के ज़ेवर माँग लेती।" शालिनी ने ठिठोली की,

"शालिनी बेटा मुझे कुछ नहीं चाहिए, तेरा घर बस जाये और तू सुखी रहे मेरी तो बस यही एक इच्छा हैं।" इन सभी बातों के बीच वो दिन भी आ गया जब शालिनी की विदाई होनी थी, अमर और आशा दोनों की ही आँखों में आंसू थे,

"श्याम बाबू, अगर मेरी बेटी से कोई गलती हो जाये तो माफ़ कर दीजियेगा।"

"आप दोनों बिल्कुल भी फ़िक्र मत कीजिए आपकी बेटी हमारे यहाँ राज करेंगी क्योंकि हम इसे बहु नहीं बेटी बनाकर ले जा रहे हैं।" श्याम बाबू ने अपने सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए अमर को आश्वासन देते हुए कहा,

"यह तो आप लोगों का बड़प्पन हैं श्याम बाबू" अमर ने कहा, इन सभी औपचारिक बातों के साथ-साथ विदाई की रस्में भी चल रही थी, और कुछ ही देर में शालिनी विदा हो ससुराल चली गयी।

 

शालिनी के गृहप्रवेश की रस्में चल रही थी, चारों ओर हँसी- मज़ाक का माहौल था, पूरा घर मेहमानों से भरा हुआ था, ऐसे में शालिनी खुद को असहज महसूस कर रही थी, "शालिनी क्या हुआ बेटा तुम्हारी तबीयत तो ठीक हैं ना" शालिनी की सास कुसुम ने शालिनी के पास बैठते हुए पूछा,

"जी, मैं ठीक हूँ" शालिनी ने दबी हुई आवाज़ में कहा,

"मैं तुम्हारे लिए खाना लगवाती हूँ, खाकर सो जाओ कुछ देर आराम करोगी तो अच्छा लगेगा।" ऐसा बोल कुसुम रसोईघर की ओर चली गयी, घर में शादी का माहौल, मेहमानों की विदाई, उसके बाद घर समेटना, इन सभी कार्यकर्मो में एक हफ्ता कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, इसी बीच शालिनी की पगफेरें की रस्म भी हो गयी।

"शालिनी तुम्हे यहाँ कोई शिकायत तो नहीं हैं ना" नरेन के पूछते ही,

"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं मैने तो सोचा भी नहीं था कि मुझे इतना अच्छा ससुराल मिलेगा।" "तारीफ़ के लिए धन्यवाद, और हाँ मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ जिसके लिए पहले से ही माफ़ी माँगता हूँ।"

"यह आप क्या कर रहे हैं?"  शालिनी ने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े नरेन से कहा,

"शालिनी वो मेरी छुट्टियाँ खत्म हो गयी हैं, मुझे काम पर वापिस जाना होगा, मैने तो तुम्हें पहले ही बताया था कि मेरा टूर जॉब हैं, इसलिए मुझे ज़्यादातर बाहर ही रहना पड़ता हैं।"

"आप बेफ़िक्र होकर जाइये, और माँ- पापा की चिंता मत करना उनका ख्याल मैं रखूँगी।" शालिनी ने नरेन का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, नरेन के होठों पर मुस्कान थी जैसे की उसकी सारी चिन्ता खत्म हो गयी हों।

 

 "कुछ तो शर्म कर अभी दस दिन भी नहीं हुए हैं शादी को और बहू को अकेला छोड़कर जा रहा हैं।" कुसुम ने गुस्सा होते हुए कहा,

"माँ मैने शालिनी से बात कर ली हैं, उसे कोई एतराज़ नहीं हैं मेरे जाने से"

"अगर उसने नहीं कहा तो तेरे पास भी दिमाग नहीं हैं क्या, ऐसा कर उसे भी साथ ले जा"

"माँ मैने आप दोनों की सब बातें सुन ली हैं, इस बार नरेन को जाने दीजिये लेकिन अगली बार मैं भी साथ चलूँगी अभी से कह देती हूँ, सुन रहे हैं ना नरेन आप?" शालिनी के कहते ही,

"जो हुकुम सरकार का" नरेन और शालिनी की बातें सुन कुसुम अपनी हँसी नहीं रोक पायी, और शालिनी नरेन के टूर जाने की तैयारी में जुट गयी, उसके बाद तो यह एक सिलसिला ही बन गया था, नरेन एक-एक महीना टूर पर रहता और कुछ दिनों के लिए ही घर आता और जब भी शालिनी साथ जाने के लिए कहती कुछ ना कुछ बहाना बना कर टाल देता, शादी की पहली वर्षगाँठ कब आ गयी पता ही नहीं चला,

"नरेन अगले हफ़्ते अपनी शादी को पूरा एक साल हो जाएगा क्यों ना उस दिन एक छोटी-सी पार्टी रखे"

"नहीं शालिनी तुम तो जानती हो मुझे टूर पर जाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही हैं, बल्कि मैं तो शादी की वर्षगाँठ भी शायद तुम्हारे साथ नहीं मना पाऊँगा, मुझे आज रात ही ऑफिस के काम से दिल्ली जाना होगा।"

"कोई बात नहीं आप परेशान मत होना, मैं तो बस ऐसे ही कह रही थी, अच्छा मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूँ।" ऐसा बोल शालिनी रसोई की ओर चली गयी लेकिन नरेन की बात सुन उसकी आँखे भर आयी थी फिर भी उसने स्वयं पर संयम रखा और अपने मन का दुःख किसी पर भी ज़ाहिर नहीं होने दिया।

"शालिनी कैसी हैं बेटा" उसी वक्त अचानक से आशा का फ़ोन आ गया,

"माँ आप, लगता हैं शादी करके आप तो अपनी बेटी को भूल ही गयी हैं।"

"अरे नहीं बेटा ऐसी बात नहीं हैं, अच्छा बता शादी की वर्षगाँठ पर क्या कर रहे हो, उस वक़्त दामाद जी तो यहीं रहेंगे ना"

"नहीं माँ मेरी नरेन से अभी बात हुई थी, उनको टूर पर जाना होगा।"

"कोई बात नहीं दामाद जी यहाँ नहीं रुक सकते, तू तो उनके पास जा सकती हैं।"

"माँ मैं !"

"हाँ तू..... सोच दामाद जी कितने खुश हो जाएँगे तुझे वहाँ देख कर"

"यह विचार मेरे मन में क्यों नहीं आया, धन्यवाद माँ आप बहुत अच्छी हैं।" अब तो जैसे शालिनी की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, "बस एक ही अड़चन हैं नरेन कौनसे होटल में ठहरता हैं यह तो मुझे पता ही नहीं"

"अरे पगली बातों ही बातों में पूछ क्यों नहीं लेती।"

"कोशिश करती हूँ, नरेन अपने काम के बारे में मुझसे कोई बात ही नहीं करते, अच्छा माँ अब मैं फ़ोन रखती हूँ।"

अब शालिनी के सामने एक नयी समस्या आ गयी थी, नरेन के ठहरने की जगह का पता लगाना, माँ से बात कर शालिनी नरेन के पास जाती हैं "नरेन, मैं सोच रही थी तुम आधे से ज्यादा समय टूर के काम से दिल्ली ही रहते हो, क्यों ना वहाँ एक घर ले लो और मुझे भी साथ ले चलो" शालिनी ने नरेन के गले में हाथ डालते हुए कहा।

"क्या बात हैं आज पति देव पर बहुत प्यार आ रहा हैं, और वैसे तुम तो मेरे लिए चाय बनाने गई थी ना?" 

"वो तो रोज़ ही आता हैं लेकिन तुम्हारे पास वक़्त कहाँ मेरे लिए" शालिनी ने नाराज़ होने का नाटक करते हुए कहा,

"तुम तो जानती हो मैं कितना व्यस्त रहता हूँ चाहकर भी तुम्हारे लिए वक़्त नहीं निकाल पाता"

"नहीं नरेन तुम परेशान मत हो वो तो मुझे तुम्हारी चिन्ता रहती हैं खाने पीने की, तुम तो जानते हो होटल का खाना रोज़-रोज़ नुकसान करता हैं इसलिए तुम्हारे साथ चलने की बात कर रही थी।"

"मेरा वहाँ एक दोस्त रहता हैं राहुल मैं उसी के यहाँ ठहर जाता हूँ घर का खाना भी मिल जाता हैं।" नरेन ने शालिनी को आश्वासन देते हुए कहा,

"कौनसा दोस्त?"

"तुम नहीं जानती कॉलेज में साथ पढ़ता था"

"ओह, ऐसा करो उसका फ़ोन नंबर और पता दे दो, आखिरकार मुझे भी तो सब कुछ पता होना चाहिए" शालिनी ने नरेन के हाथों में डायरी और पेन थमाते हुए कहा, नरेन ने बहुत मना करने कि कोशिश की लेकिन शालिनी की ज़िद के आगे उसकी एक ना चली और ना चाहते हुए भी उसे पता लिखने का नाटक करना पड़ा, क्योंकि वो नहीं चाहता था कि शालिनी वहाँ आए या फ़ोन करे।

 "शालिनी मैं चाहता हूँ कि तुम जब भी फ़ोन करो मेरे मोबाइल पर ही करना इस नंबर पर मत करना, अच्छा नहीं लगता"

"आप चिंता ना करिए पति देव इतना तो मैं भी समझती हूँ, अच्छा मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूँ।" ऐसा कह शालिनी किचन की ओर चली गई, और कोई ज़रूरी फ़ोन आ जाने की वजह से नरेन भी भूल गया कि उसने अपनी पर्सनल ड़ायरी छुपाने के बारे में सोचा था, क्योंकि उसमे वो सभी अड्रेस और फोन नंबर थे जो की वो किसी को नहीं बताना चाहता था।

 

नरेन के दिल्ली जाने के बाद, "माँ मैं सोच रही थी कि क्यों ना मैं दिल्ली जाकर नरेन को सरप्राइज दूँ।"

"यह तो बहुत ही अच्छा विचार हैं, लेकिन तुम्हे पता हैं वो कहाँ ठहरा होगा?"

"जी, मैने उनसे अड्रेस लिखवा लिया था।"

"तो फिर देर किस बात की सामान बाँधो और निकलो और अच्छे से अपनी शादी की सालगिरह मनाना, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ हैं।" शालिनी शर्माकर वहाँ से चली गई और दिल्ली जाने की तैयारी करने लगी, लेकिन उसे वो अड्रेस वाला पेपर ही नहीं मिला, लेकिन किस्मत से नरेन की दराज में वो ड़ायरी मिल गई, बस उसी के जरिए उसे नरेन का एड्रैस भी मिल गया।  

अगले दिन दिल्ली पहुँचकर शालिनी टैक्सी कर उस पते पर पहुँच गयी जो नरेन ने उसे दिया था, "लगता हैं यही घर हैं।" बड़बड़ाते हुए शालिनी ने घर की घंटी बजा दी, सामने से किसी महिला ने दरवाज़ा खोला, 

"जी किससे मिलना हैं?" उस महिला के पूछते ही,

"नरेन से, वो यही ठहरे हैं ना?"

"अरे यह उनका घर हैं यहाँ नहीं रहेंगे तो कहाँ रहेंगे, लेकिन अभी काम से बाहर गए हैं आप कौन?"

"जी मैं शालिनी लखनऊ से आयी हूँ।"

 "आप बैठिए नरेन आता ही होगा।"

"यह तो आप लोगो का बड़प्पन है जो नरेन को अपने परिवार का सदस्य ही मानते हैं, वैसे आप राहुल की क्या लगती हैं ?" शालिनी ने पूछा,

"कौन राहुल?"

"जी जिनका यह घर हैं।"

"लगता हैं आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं, यह घर नरेन का हैं और वो मेरे पति हैं।" शालिनी कुछ समझ पाती इससे पहले ही नरेन वहाँ आ गया।

"कौन है जेनिफर?" नरेन ने घर के अन्दर आते हुए पूछा,

"कोई नहीं हैं नरेन, लगता है इनको कोई ग़लतफहमी हो गयी हैं" जेनिफर ने कहा, लेकिन शालिनी को वहाँ देख नरेन के तो होश ही उड़ गए।

"क्या हुआ नरेन तुम्हारे माथे पर पसीना, तबीयत तो ठीक हैं?" जेनिफर ने चिंतित होते हुए पूछा,

"हाँ, हाँ मैं ठीक हूँ, जी आपको किससे मिलना हैं?" शालिनी को नरेन से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी।

"लगता हैं मैं गलत घर में आ गयी हूँ माफ़ कीजिए" ऐसा बोल शालिनी तेज़ी से बाहर निकल गई।

"मुझे तो समझ ही नहीं आता लोग बिना पूरी जानकारी के कैसे किसी के घर में आ सकते हैं।" जेनिफर ने पानी का गिलास नरेन के हाथों में देते हुए कहा,

"जेनिफर तुम आराम करो मुझे कुछ काम याद आ गया अभी करके आता हूँ।"

"अरे अभी तो आए हो फिर जा रहे हो अच्छा ठीक है जल्दी आना, फिर खाना खाने बाहर चलेंगे।" जेनिफर को जल्दी आने का आश्वासन दे नरेन शालिनी को ढूँढने निकल पड़ा।

 

नीचे बिल्डिंग के बगीचे में शालिनी को बैठा हुआ देख, नरेन ने पुकारा "शालिनी"

"बताओ नरेन, कौन है वो लड़की जो तुम्हें अपना पति बता रही थी" शालिनी ने अपने सामने खड़े नरेन का कॉलर खींचते हुए पूछा,

"शालिनी तुम यहाँ अचानक, आने से पहले कुछ बताया भी नहीं"

"मैंने पूछा कौन है वो लड़की?"

"वो वो लड़की वो"

"यह क्या इतनी देर से वो-वो किए जा रहे हों, कुछ बताते क्यों नहीं", इस वक्त शालिनी का गुस्सा सातवें आसमान पर था,

"शालिनी, उसका नाम जेनिफर हैं और वो मेरी पत्नी हैं" नरेन ने कांपती हुई आवाज में कहा, "अगर वो तुम्हारी पत्नी हैं तो मैं कौन हूँ?"

"शालिनी तुम इस वक्त बहुत गुस्से में हो अन्दर चलों सबकुछ बताता हूँ।"

"नहीं नरेन, जो कुछ बताना है यही बताओं"

"दरअसल मैं कालेज के वक्त से जेनिफर से प्यार करता हूँ, लेकिन मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि माँ और पापा से उसके बारे में बात कर सकूँ इसलिए मुझे उससे चुपचाप शादी करनी पड़ी।"

"तो फिर मुझसे शादी क्यों की ?"

"मां और पापा की खुशी के लिए जिससे कि उनको लगें मेरा भी घर बस गया।"

"वाह, क्या बात है एक शादी की अपने लिए और दूसरी अपने माँ-बाप के लिए, तुमने समझा क्या है मुझे ?"

"देखों शालिनी, जेनिफर एक बहुत ही अच्छी लड़की है अगर तुम चाहो तो हम सब साथ रह सकते हैं" नरेन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा,

 "साथ! कैसा साथ नरेन कानूनी तौर पर तो हमारी शादी ही नहीं हुई है, हाँ नरेन इतना कानून तो मैं भी जानती हूँ, जब तक आप पहली पत्नी को तलाक़ नहीं देते तब तक दूसरी शादी नहीं कर सकते, और अब तो मुझे तुमसे कोई बात ही नहीं करनी हैं वो काम तो अब पुलिस का होगा।" ऐसा बोल शालिनी वहाँ से उठकर जाने लगी।

"शालिनी, शालिनी एक बार मेरी बात तो सुनो" नरेन चिल्लाता रहा लेकिन शालिनी उसकी आवाज़ अनसुनी कर चली गयी।

 

अगले दिन सुबह-सुबह, "शालिनी बेटा तू यहाँ अचानक, दामाद जी भी आए हैं साथ में?" आशा ने घर के अन्दर आती हुई शालिनी से पूछा, लेकिन शालिनी बिना कोई ज़वाब दिए अंदर कमरे में चली गयी, आशा भी उसके पीछे-पीछे कमरे की ओर जाने लगी,

"क्या बात हैं बेटा सब ठीक तो हैं ना? कल तुम्हारी शादी की सालगिरह थी तुझे तो दामाद जी के साथ होना चाहिए था लेकिन तू यहाँ कानपुर में क्या कर रही हैं, और कुछ बोलती क्यों नहीं ?" आशा के स्वर में घबराहट थी,

"माँ, नरेन ने हमे धोखा दिया हैं।"

"धोखा ! कैसा धोखा तू कुछ साफ़-साफ़ क्यों नहीं बोलती"

"माँ नरेन पहले से ही शादी-शुदा हैं।"

"क्या !" आशा अपने पर काबू नहीं रख सकी और अचानक से गिर पड़ी,

"माँ संभालो अपने आप को" इतने में ही अमर भी आ जाता हैं, और जब उसे सारी हक़ीक़त मालूम चलती हैं तो वो गुस्से से बेक़ाबू हो घर से निकलने लगता हैं।

"पापा आप कहाँ जा रहे हैं?"

"तेरे ससुराल लखनऊ जा रहा हूँ।"

"नहीं पापा जब उन लोगो को इस बारे में कुछ पता ही नहीं हैं तो उनसे कुछ कहने का क्या फ़ायदा"

"यहाँ बात फ़ायदे या नुकसान की नहीं हैं आखिरकार नरेन के माँ-बाप को भी तो पता चले कि उनकी औलाद क्या गुल खिला रही हैं" ऐसा बोल अमर तैयार होकर गुस्से में घर से निकल गया।

 

कुछ घंटों बाद, "अरे भाईसाहब आप यहाँ, शालिनी तो नरेन से मिलने दिल्ली गयी हुई हैं, कल उनकी शादी की पहली वर्षगॉंठ थी ।"

"माफ़ कीजिए भाभी जी शालिनी दिल्ली में नहीं, हमारे यहाँ कानपुर में हैं।"

"मैं कुछ समझी नहीं आपके यहाँ लेकिन वो तो नरेन के पास गयी थी।"

"कुसुम कौन आया हैं ?" अन्दर से श्याम बाबू ने पूछा,

"श्याम शालिनी के पापा आए हैं।"

"अरे अमर बाबू आप यहाँ अचानक ?"

"क्या करूँ अचानक ही आना पड़ा, आपके बेटे ने काम ही ऐसा किया हैं।"

"हम कुछ समझें नहीं नरेन से कोई गलती हुई हैं क्या?"

"गलती नहीं भाभी जी गुनाह हुआ हैं, धोखा दिया हैं आपके बेटे ने मेरी बेटी को, शादीशुदा हैं आपका बेटा पहले से ही" अमर ने गुस्से से आग-बबूला होते हुए कहा,

"नहीं अमर बाबू आपको जरूर कोई ग़लतफहमी हुई हैं" श्याम ने कहा,

"आप खुद क्यों नहीं पूछ लेते अपने बेटे से" अमर ने कहा, उसके बाद श्याम बाबू अपने बेटे नरेन को फोन लगाने लगें, और उसके बाद जो उनकी फोन पर बात हुई उस पर यकीन कर पाना उनके लिए बहुत ही मुश्किल था, श्याम बाबू अपने आप को सम्भाल नहीं पाए और वहीं जमीन पर बैठ गए ।

"क्या हुआ श्याम ?"

"कुसुम अमर बाबू ने जो कुछ कहा सब सच हैं हमारे बेटे ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा, जिंदगी भर के लिए हमें शालिनी का गुनाहगार बना दिया मैं जानता हूँ अमर बाबू हमारा गुनाह माफ़ी के लायक नहीं हैं इसलिए जो आपको उचित लगे वो सज़ा हमें और हमारे बेटे को दे" श्याम बाबू अमर के सामने हाथ जोड़ सिर झुकाए खड़े थे,

"सज़ा मैं नहीं क़ानून देगा आपके बेटे को श्यामबाबू" ऐसा बोल अमर बाबू दनदनाते हुए वहाँ से निकल गए।

"कुसुम जल्दी से तैयार हो जाओ हमे अभी निकलना होगा कानपुर के लिए"

"अब क्या मुँह लेकर जाएंगे वहाँ" कुसुम ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा,

"कहीं ना कहीं हम भी गुनहगार हैं शालिनी के, माफ़ी तो माँगनी हैं ना" और दोनों ही कानपुर जाने की तैयारी करने लगे।

 

कुछ घंटों बाद दूसरी ओर कानपुर के एक पुलिस स्टेशन में "इंस्पेक्टर साहब, मुझे धोखाधड़ी की रिपोर्ट लिखवानी हैं" अमर ने कहा,

"किसने दिया हैं धोखा?"

"जी मेरे दामाद ने मेरी बेटी को, वो पहले से ही शादीशुदा था"

"हवलदार ज़नाब की रिपोर्ट लिखो…….आप वहाँ जाकर रिपोर्ट लिखवाए" और अमर ने विस्तारपूर्वक सारी बात हवलदार को बता दी।

"इंस्पेक्टर साहब मैने रिपोर्ट लिखवा दी हैं, आप जितना जल्दी हो सके उसे सज़ा दीजिए।" "आप निश्चिंत होकर जाइये, ऐसे लोगो को हमे अच्छे से सबक सिखाना आता हैं।" रिपोर्ट लिखवा जैसे ही अमर घर आया सामने कुसुम और श्याम खड़े थे,

"अब आप यहाँ क्या करने आए हैं?"

"अमर बाबू हम जानते हैं कि हम आपके गुनहगार हैं, लेकिन यक़ीन करिए हम अपने बेटे के नहीं बल्कि अपनी बेटी शालिनी के साथ हैं।" कुसुम के कहते ही,

"नहीं माँ मुझे आप दोनों से कोई शिकायत नहीं, लेकिन मैं कभी नरेन को माफ़ नहीं कर पाऊँगी"

"उसको तू तो क्या हम भी कभी माफ़ नहीं करेंगे, बस हमारे साथ घर चलो वो घर तुम्हारा ही हैं।"

"नहीं माँ अब मैं वहाँ नहीं रह पाऊँगी, मुझे माफ़ कीजिए।" ऐसा बोल शालिनी तेज़ी से अपने कमरे की ओर चली गई, और श्याम और कुसुम भी सिर झुकाए वहाँ से निकल गए।

 

"अब शालिनी हर समय उदास रहने लगी, उसकी यह हालत देख अमर की तबियत भी खराब रहने लगी, दूसरी ओर पुलिस ने नरेन को गिरफ्तार तो कर लिया था और उस पर धोखाधड़ी का केस भी चला दिया लेकिन अमर ज्यादा वक़्त तक इस सदमे को सहन नहीं कर पाया और कुछ महीनों बाद ही उसका दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया, पति के जाने और बेटी की उदासी देख आशा भी पूरी तरह से टूट चुकी थी।

 

एक दिन, "माँ मैं सोच रही थी क्यों ना हम दोनों शिमला चले, आपको याद हैं बहुत साल पहले मैने आपसे डांस सीखने की बात की थी, और आपने मना कर दिया था, माँ क्या अब हम वहाँ जा सकते हैं ?" शालिनी की बात सुन आशा के मन में एक उम्मीद की किरण जागी, और उसने झट से हाँ कर दी, शालिनी खुश थी क्योंकि वो आशा को इस माहौल से बाहर लाना चाहती थी और आशा भी कुछ ऐसा ही चाहती थी, दोनों ही कुछ ही दिन बाद शिमला के लिए रवाना हो गए, लेकिन बीती बातों ने अभी भी साथ नहीं छोड़ा था, यह अलग बात हैं दोनों ही हर वक़्त एक दूसरे को ख़ुश रखने की कोशिश में लगी रहती थी, साल दर साल बीतते गए और वो दिन भी आ गया जब आशा भी शालिनी का साथ छोड़ चली गयी, अब शालिनी का इस दुनिया में कोई नहीं था, उसने शिमला में ही अपनी डांस क्लासेज खोल ली थी, जो की उसकी कमाई व वक़्त गुज़ारने का ज़रिया थी।

 

दूसरी ओर कुसुम व श्यामबाबू अपने बेटे की हरकत से बहुत ही शर्मिंदा थे, उन्होंने उसे अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया, एवं जेनिफर को जब सारी हक़ीक़त मालूम हुई तो उसने भी नरेन का साथ छोड़ने का फ़ैसला किया और तलाक़ लेकर अलग रहने लगी, अब नरेन पूरी तरह से अकेला हो चुका था, शायद यही उसकी गलतियों की सज़ा थी जो उसे अब ज़िन्दगी भर काटनी थी।

 

आज शालिनी की शादी की इकीसवीं वर्षगांठ हैं और शादी टूटने की बीसवीं वर्षगांठ कहने को तो बीस साल गुज़र चुके थे लेकिन शालिनी के लिए जैसे यह कल की ही बात हो, "मेमसाब काम हो गया, मैं घर जाऊँ ।" सुधा के बोलते ही शालिनी ने अपनी आँखे खोली,

"हाँ, लेकिन कल वक़्त पर आ जाना" सुधा के जाने के बाद शालिनी फिर से आँखे मूँद लेट गयी।

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