Bhulakkad Banwari (A Funny Story)


वक्त-बेवक्त भूलने की तेरी ये आदत

कभी हंसाती हैं तो कभी रुला जाती

 

यह कहानी राजस्थान के छोटे से गाँव में रहने वाले बनवारी और उसकी पत्नी अंगूरी की हैं, बनवारी और अंगूरी का एक छोटा-सा सुखी परिवार था, जिसमें केवल वो दोनों ही थे, बनवारी की अपनी कोई सन्तान नही थी लेकिन वो और उसकी पत्नी गाँव के सभी बच्चों को अपने बच्चों की तरह ही मानते थे, और उन पर अपना प्यार भी खूब लुटाते थे, गाँव के सभी बच्चे उन्हें माँ और बाबा कहकर पुकारते थे, सब कुछ अच्छा था सिवाय एक बात के और वो थी बनवारी की भूलने की आदत, इस आदत ने गाँव वालों को कई बार हंसाया भी तो कई बार रुलाया भी।

उस दिन तो हद ही हो गई, गाँव में हर इतवार बाजार लगता था, जरूरत का सभी सामान वहाँ मिल जाया करता था, अंगूरी भी बनवारी से कह गाँव की औरतों संग खरीदारी के लिए निकल पड़ी, शाम को जब वापिस आ घर का दरवाजा खटखटाया तो बनवारी दरवाजा खोल उसे अजीब सी नज़रों से देखने लगा, "बहिनजी किससे मिलना है आप को ?" अंगूरी कुछ कह पाती इससे पहले ही, "देखिए मेरी पत्नी किसी काम से बाहर गई हुई है, आप बाद में आना" और बनवारी ने दरवाजा बंद कर लिया, अंगूरी कुछ देर तक तो एकटक दरवाजे को ताकती रही, फिर वही सिर पकड़ कर बैठ गई.  

"अरी अंगूरी क्या हुआ ऐसे क्यों बैठी हैं?" पड़ोस में रहने वाली चम्पा ने पूछा,

"क्या बताऊँ आज फिर मेरा पति मुझे भूल गया।"

"कोई बात नहीं तू मेरे घर आ जा, थोड़ी देर में जब तेरी याद आएगी तो ख़ुद ढूँढता हुआ आ जाएगा।" अंगूरी भी बिना देर किए चम्पा के घर चली गई ।

देर रात, अचानक से चम्पा के घर का दरवाजा कोई ज़ोर-ज़ोर से खटखटाने लगा, जैसे ही चम्पा के पति श्याम ने दरवाजा खोला बनवारी घबराता हुआ अन्दर घुस गया, "क्या हुआ बनवारी इतना घबराए हुए क्यों हो?"

"श्याम तेरी भाभी सुबह से बाजार गई हुई हैं, अभी तक नहीं लौटी, मुझे बहुत घबराहट हो रही हैं, चल ढूँढने चलते हैं।" श्याम कुछ कह पाता इससे पहले ही अंगूरी वहां आ गई,

"अरे तुम यहाँ हो कम से कम बता तो दिया होता मैं कितनी चिन्ता कर रहा था, अच्छा कोई बात नहीं अब घर चलो" बनवारी की बात सुन अंगूरी मुस्कुराने लगी,

"अब यहाँ खड़ी-खड़ी दाँत क्या दिखा रही हो घर चलकर कुछ खाने को बना दो भूख के मारे जान निकली जा रही हैं।" अंगूरी भी बिना कुछ बोले बनवारी के साथ चली गयी, यह नज़ारा देख श्याम व चम्पा भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए।

बनवारी के भूलने के किस्से एक नहीं बहुत सारे थे, कुछ तो ऐसे भी थे जिन्हे गाँव वाले आज भी याद करते हैं, उनमे से ही एक किस्सा ऐसा था जिसको याद कर अंगूरी आज भी मुस्कुराए बिना नहीं रहती, हुआ यूँ कि एक दिन बनवारी घर के आँगन में बैठा दाढ़ी बना रहा था और अंगूरी रसोईघर में खाना, इतने में ही बाहर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आयी, बनवारी ने दरवाज़ा खोला तो सामने दो सज़्ज़न पुरुष खड़े हुए थे , "जी कहिए" बनवारी के पूछते ही, "देखिए हम जनगणना विभाग से आए हैं कृप्या आप अपने परिवार के सदस्यों की हमे जानकारी दे , कौन-कौन हैं आपके परिवार में ?"

"जी केवल मैं ही हूँ।"

"आपके बीवी, बच्चे ?"

"जी बच्चे तो हुए ही नहीं और बीवी पिछले साल ही चल बसी" ऐसा कह बनवारी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा, उसके रोने की आवाज़ सुन घबराती हुई अंगूरी बाहर आई,

"क्या हुआ?"

"हम जनगणना विभाग से हैं, इनके परिवार की जानकारी लेने आए थे, इनकी पत्नी के बारे में पूछा तो पता चला उनका तो पिछली साल देहान्त हो गया हैं, इसीलिए यह भी भावुक हो गए हैं, वैसे आप कौन हैं?" जनगणना अधिकारी के पूछने पर अंगूरी ने जो जवाब दिया उसे सुन दोनों ही अधिकारी ऐसे भाग खड़े हुए जैसे की कोई भूत देख लिया हो।

गज़ब थी बनवारी की भूलने की आदत बाजार जाकर यह भूल जाना कि खरीदना क्या हैं, वापिस आकर घर भूल जाना, अपना नाम भूल जाना, तो कभी खाना खाकर ही भूल जाना, लेकिन एक बात थी जो बनवारी कभी नहीं भूलता था वो थी अंगूरी का जन्मदिन, और यही बात बनवारी की अंगूरी को बहुत अच्छी लगती थी, अब उसे अंगूरी का जन्मदिन याद रहता था या उसे याद दिलवाया जाता था यह तो भगवान ही जाने लेकिन जो भी था, जैसा भी था अंगूरी उसके साथ बहुत ख़ुश थी और उसके बिना ज़िन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

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