Naye Saal Ki Nayi Love Story (Story On Love)


अनजान थी अपने ही दिल में छुपे प्यार से

ना जाने वो कब धड़कने लगा तेरे प्यार में

 

"माँ, मैं काम पर जा रही हूँ, वक़्त पर खाना खा लेना, और हाँ दवाई भी ले लेना"

"तू मेरी इतनी चिंता करती हैं, कभी-कभार ख़ुद के बारे में भी सोच लिया कर"

"देखो माँ मुझे पहले ही देर हो रही हैं, तुम अपनी फ़ालतू बातें करने मत लग जाना"

"क्यों, तेरी शादी की चिंता करना फ़ालतू हैं?"

"हाँ फ़ालतू हैं, क्योंकि मुझे शादी ही नहीं करनी हैं, माँ तुम समझती क्यों नहीं हो, मैं ख़ुश हूँ और हाँ अब इस बारे में कोई बात नहीं" ऐसा बोल सोनल काम के लिए निकल गई, सोनल अपनी माँ गायत्री के साथ रहती हैं और पास ही के एक स्कूल मैं टीचर हैं, दो साल पहले दिल का दौरा पड़ने से हुए पिता के देहान्त ने उसे एकाएक ही ज़िम्मेदार बना दिया था।

शाम को घर लौटते ही, "माँ सामने वाले घर में कोई नया किरायेदार आया हैं क्या रहने के लिए, बाहर सामान से लदा हुआ ट्रक खड़ा हैं ?"

"हाँ लगता तो कुछ ऐसा ही हैं, देखते हैं कौन आया हैं, कोई परिवार आया हो तो अच्छा ही हैं, मेरा भी मन लगा रहेगा" गायत्री की बातों का ज़वाब दिए बिना ही सोनल रसोईघर में चली गई,

"माँ आज खाने में क्या बनाऊँ? सब्जियाँ भी आज-कल बहुत महँगी आ रही हैं।"

"ऐसा कर दाल बना ले"

इतने में ही दरवाजे की घंटी बज उठी, 'ट्रिन, ट्रिन, देख तो कौन आया हैं?" अपनी माँ के कहने पर सोनल जैसे ही दरवाज़ा खोलती हैं, सामने लगभग तीस-बत्तीस साल का युवक गोद में सात-आठ महीने की बच्ची को लिए खड़ा था, "जी नमस्ते, मेरा नाम यश हैं, मैं आपके सामने वाले घर में  रहने आया हूँ।"

"ओह, आइए ना अन्दर"

"जी बस धन्यवाद, दरअसल यहाँ आस-पास शायद कोई दुकान नहीं हैं, मेरी बेटी को भूख लगी थी, थोड़ा-सा दूध मिल जाता तो"

"हाँ-हाँ क्यों नहीं आप बैठिये मैं अभी लेकर आई" ऐसा बोल सोनल रसोई में दूध लेने चली गयी और यश वही गायत्री के पास आकर बैठ गया।  

"नमस्ते आंटी"

"नमस्ते बेटा, किसी भी बात का संकोच करने की ज़रुरत नहीं हैं, किसी भी चीज़ की ज़रुरत हो तो बेझिझक आ जाना"

"जी आंटी धन्यवाद्"

"वैसे गुड़िया रानी का नाम क्या हैं?"

"मिली"

"यह लीजिए दूध, मैने इसमें चीनी भी मिला दी हैं आप अपनी पत्नी को बता दीजिएगा।" सोनल ने दूध का गिलास यश के हाथ में देते हुए कहा,

"जी मेरी पत्नी नहीं हैं, मिली के जन्म के वक़्त ही तबीयत ज़्यादा बिगड़ जाने की वज़ह से उसका देहांत हो गया।"

"माफ़ कीजिएगा मुझे पता नहीं था।"

"कोई बात नहीं, दूध के लिए धन्यवाद" ऐसा कह जैसे ही यश वापिस जाने के लिए मुड़ा,

"यश बेटा, क्यों ना आज शाम का खाना तुम हमारे साथ ही खाओ"

"नहीं आंटी आप लोग क्यों तक़ल्लुफ़ करते हैं।"

"अरे बेटा इसमें तक़ल्लुफ़ की क्या बात हैं, आ जाना हमे अच्छा लगेगा।"

"जी आंटी" शाम को खाने पर आने की सहमति जता यश वापिस चला गया।

"बेचारा अकेला कैसे संभालता होगा इतनी छोटी-सी बच्ची को?"

"माँ मज़बूरी इंसान को सबकुछ सिखा देती हैं" खाने की तैयारी करते हुए सोनल ने कहा,

"हाँ तू ठीक कह रही हैं, मैं मदद करवाऊँ कुछ?"

"नहीं माँ मैं कर लूँगी" कुछ ही देर बाद यश भी वहाँ मिली के साथ आ गया, उसके बाद तो यश का आना-जाना लगा ही रहता था, कभी-कभार ही ऐसा होता जब यश गायत्री व सोनल से मिलने नहीं आता, मिलने आना व घंटो बैठकर ढेरो बातें करना, वैसे भी अब तो आलम यह था कि यश से ज्यादा मिली से नज़दीकियाँ बढ़ने लगी थी, यश जब भी घर से बाहर जाता सोनल ही मिली को संभालती, लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा भी हो रहा था जिसको केवल गायत्री की पारखी नज़र ही देख पा रही थी, वो यह कि सोनल का यश के प्रति चिंतित रहना, मिली का रोना सुन उसका विचलित हो जाना, अगर एक भी दिन यश को आने में देर हो जाती तो सोनल दरवाज़े के पास जाकर उसका इंतज़ार करने लगती।

"सोनल तुझे यश कैसा लगता हैं?" गायत्री के अचानक पूछे जाने पर सोनल सकपका गयी, "अच्छा हैं माँ, तुम तो ऐसे पूछ रही हो जैसे तुम उसे नहीं जानती"

"तू अच्छे से समझती हैं मैं क्या पूछना चाहती हूँ" गायत्री ने सोनल का मन टटोलने की कोशिश की,

"माँ आज मौसम कितना अच्छा हैं ना, लगता हैं बारिश आएगी" सोनल ने बात ही बदल दी, और गायत्री ने भी इस बारे में कोई बात नहीं की, वक़्त गुज़रता रहा और उसी के साथ यश व सोनल के बीच की नज़दीकियाँ भी बढ़ती गयी, लेकिन सोनल यह बात स्वीकार करने को तैयार ही नहीं थी कि वो यश को पसन्द करने लगी हैं, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि सोनल के दिल की बात जुबां पर आ ही गयी।

"माँ रात के दस बज रहे हैं, यश अभी तक नहीं आया, तुमसे कुछ कहकर गया था क्या?"

"नहीं मुझसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन इसमें फ़िक्र करने वाली क्या बात है आ जाएगा, वैसे भी आज 31 दिसम्बर हैं मस्ती कर रहा होगा दोस्तों के साथ" गायत्री ने सोनल को टालते हुए कहा,

"तुम भी कमाल करती हो मां मुझे उसकी चिंता हो रही हैं और तुम्हें उसकी कुछ पड़ी ही नहीं, अरे कम से कम एक फोन तो कर ही सकता था, हमारे बारे में नहीं तो मिली के बारे में ही सोच लेता" सोनल ने चिंतित होते हुए कहा,

"तो तू ही फ़ोन कर ले उसे"

"किया था लेकिन फ़ोन बंद आ रहा हैं, लगता हैं उसका फ़ोन डिस्चार्ज हो गया होगा।"

"तो फिर कैसे फ़ोन करता बेचारा"

"माँ किसी ओर के फ़ोन से तो कर सकता था न" ऐसा बोल सोनल घर में इधर से उधर चक्कर लगाने लगी, लेकिन यह सब देख गायत्री को बहुत मज़ा आ रहा था और वो मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

"अच्छा भई मैं तो अब सोने चली" गायत्री के कहते ही,

"हाँ सो जाओ, मुझे तो जब तक यश नहीं आ जाता नींद नहीं आएगी।" सोनल कभी कमरे में जाकर मिली को सहलाती तो कभी दरवाज़े के पास खड़ी होकर यश की राह देखती, जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया सोनल की चिन्ता बढ़ती ही गयी।

"माँ, माँ" "क्या हुआ?" गायत्री ने हड़बड़ाते हुए पूछा,

"माँ दो बज गए यश अभी तक नहीं आया, मैं उसे ढूँढ़ने जा रही हूँ।"

"तेरा दिमाग ख़राब हो गया हैं, किसी पराए मर्द के लिए आधी रात को सड़कों पर घूमेगी" "माँ वो पराया नहीं हैं, प्यार करती हूँ मैं उससे, चिंता हो रही मुझे उसकी" ऐसा कहते ही सोनल अपनी गर्दन झुकाए चुपचाप अपने कमरे में चली गयी, दूसरी ओर गायत्री खुश थी, क्योंकि वो यही तो सुनना चाहती थी।

 

अगले दिन सुबह आठ बजे, "माफ़ करना, मिली ने ज्यादा परेशान तो नहीं किया ना" यश ने घर में घुसते ही सोनल से पूछा।

"यश तुम एक फ़ोन तो कर सकते थे ना?"

"लेकिन सोनल मैं आंटी को बता कर गया था कि ऑफिस में नए साल की पार्टी हैं मैं सुबह ही वापिस आऊँगा।" यश के कहते ही सोनल ने जब गायत्री की ओर देखा तो उसकी शरारत भरी मुस्कान देख सबकुछ समझ गयी और शर्माकर कमरे की ओर भाग गयी,

"यह सोनल को क्या हुआ आंटी?"

"जैसे तो तुम कुछ समझते ही नहीं कि सोनल को क्या हुआ हैं, शादी करोगे मेरी बेटी से?" गायत्री ने यश को छेड़ते हुए पूछा,

"आंटी वो घर पर कुछ काम था, अभी आता हूँ थोड़ी देर में" यश भी वहाँ से शर्माकर भाग गया, लेकिन गायत्री की पारखी नज़रे यश की आँखों में अपनी बेटी के लिए प्यार देख चुकी थी,

"तो यह हैं मेरे घर की नए साल की नई लव स्टोरी" ऐसा बोल गायत्री मन ही मन मुस्कुराने लगी।

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