Badalte Vichaar (Story On Thoughts)


अभी शादी को पाँच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि अचानक निशा के पति राघव की सड़क दुर्घटना में हुई मौत ने उसे अन्दर तक हिला दिया था, राघव की छोटी-सी मिठाई की दुकान थी, घर के बड़ों के पुराने विचार और समाज की बातों के रहते निशा का दुकान सम्भालना या कहीं ओर नौकरी करना संभव ही नहीं था, दुकान की जिम्मेदारी अब राघव के छोटे भाई समर की थी, आर्थिक रूप से पूरी तरह से निर्भर निशा के लिए तीन साल के अभि और एक साल की शुचि की परवरिश आसान नहीं थी, छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए घर के बाकी लोगों के आगे हाथ फैलाना उसे कतई अच्छा नहीं लगता था, लेकिन उसके पास यह सबकुछ करने के अलावा कोई और चारा भी तो नहीं था ।

आज राघव को इस दुनिया से विदा हुए पूरे 15 साल हो चुके थे, और अभि 18 का एवं शुचि 16 की, जहाँ अभि का स्वभाव शान्त था, वहीं शुचि गुस्से वाली, कई बार तो शुचि की वजह से निशा की अपनी सास कावेरी से अनबन हो जाया करती थी, दूसरी ओर अभि का शान्त स्वभाव चिन्ता का विषय बन गया था, ऐसा लगता था मानो दिल में कोई दर्द दबा कर बैठा हो, निशा को कई बार तो राघव की कमी बहुत ही अखरती थी, सोचती काश राघव होता तो बच्चों को सम्भालना आसान हो जाता ।

लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई जब शुचि ने स्कूल से लौटते ही निशा से कहा, "माँ क्यों ना आप अब नौकरी कर लो"

"ये कैसी बातें कर रही हैं, जानती हैं ना तेरी दादी सुनेगी तो कितना गुस्सा करेगी"

"मुझे तो समझ में ही नहीं आता हैं कि आप दादी से इतना डरती क्यों है, अरे अपनी इच्छाओं को पूरा करना क्या ग़लत हैं, क्या आप नौकरी नहीं करना चाहती, आपको अच्छा लगता हैं छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दादा जी के सामने हाथ फैलाना, माँ अब तो भैया और मैं भी बड़े हो गए हैं, आप बिना किसी चिन्ता के काम पर जा सकती हैं।" निशा कुछ कह पाती इससे पहले ही बाहर से उसकी सास बोल पड़ी।  

"अरी क्या कान भर रही हैं अपनी माँ के, तुम लोगों को क्या भूखा मार रहे हैं हम, जो अब नौकरी कर हमारी बदनामी करेगी"

"दादी आप ग़लत सोच रहीं हैं, मेरा वो मतलब नहीं था।"

"देख लड़की, बच्ची है और बच्ची बन कर ही रह, तू क्या सोचती हैं कि मैं समझती नहीं हूँ, अरे तेरी माँ ने ही तेरे कान भरे होंगे।"

"नहीं माँजी आप ग़लत सोच रहीं हैं, बल्कि मैं तो इससे कहने ही वाली थी कि आप सबने मिलकर हमारा बहुत ध्यान रखा हैं , कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी"

"अगर ऐसा हैं तो ठीक हैं, और समझा लेना अपने बच्चों को, आज के बाद अगर तुम्हारी नौकरी करने की बात भी सोची तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।" ऐसा कह कावेरी वहाँ से चली गयी,

"अभी तो संभाल लिया मैने सबकुछ लेकिन आज के बाद इस विषय पर कभी कोई बात मत करना समझी ना तुम, और हाँ मै खाना लगाने रसोई में जा रही हूँ आकर खा लेना" ऐसा बोल निशा रसोई में चली गई और शुचि बिना कोई प्रतिक्रिया दिए वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गई, शुचि अब इतनी छोटी भी नहीं थी कि उसको कुछ भी कहकर बहला दिया जाए और इतनी बड़ी भी नहीं कि बिन समझाए सब कुछ समझ जाए, अभि का बारहवी की परीक्षा देते ही दुकान पर बैठा देना और निशा का पढ़ा-लिखा होने के बाद भी नौकरी करने की इज़ाज़त ना मिलना शुचि की समझ से परे था, "शुचि क्या हुआ इतनी देर क्यों लग रही हैं।" निशा ने लगभग चिल्लाते हुए कहा और कुछ ही देर में शुचि वहाँ आ चुपचाप खाना खाने लगी, निशा ने भी उससे कुछ नहीं कहा, वो जानती थी शुचि के सवालों का जवाब देना उसके लिए आसान नहीं होगा, दूसरी ओर वो अभि को लेकर भी बहुत चिंतित रहती थी, बारहवीं की परीक्षा होते ही निशा के ससुर माणिक ने यह फ़रमान सुना दिया कि अब अभि आगे की पढ़ाई घर से ही करेगा और दुकान पर जाकर अपने चाचा की मदद करेगा, अभि ने भी बिना आपत्ति जताए अपने दादाजी की बात मान ली, लेकिन कहीं ना कहीं निशा यह बात जानती थी कि अभि इन सब से खुश नहीं हैं, लेकिन उससे इस बारे में बात करने की उसके अंदर हिम्मत नहीं थी।

कहते हैं इंसान के विचार वक़्त के अनुसार बदलते रहते हैं, माणिक के विचार भी बदले लेकिन जिस कारण से वो बदले इसकी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, हुआ यूँ कि एक दिन दुकान की भट्टी पर मिठाई बनाते हुए अचानक ही आग लग गयी, जब तक परिस्थिति को संभाला जाता दुकान पूरी तरह से जलकर राख हो चुकी थी, इतने बड़े नुकसान के बाद घर के सभी सदस्य सदमे में थे, आमदनी भी पूरी तरह से बंद हो चुकी थी, घर का कोई भी सदस्य इतना पढ़ा लिखा भी नहीं था कि कही ओर जाकर नौकरी करने की सोचे सिवाय निशा के, निशा ने हिंदी में एम. ए  किया हुआ था, और शादी से पहले वो एक स्कूल में पढ़ाती भी थी, वैसे तो निशा के ज्यादा पढ़े लिखे होने की वजह से राघव के घरवाले उसकी शादी निशा से करवाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, लेकिन राघव की ज़िद के आगे उनकी एक ना चली और निशा का यही गुण आज परिवार के लिए वरदान साबित हुआ, "पापा घर के आर्थिक हालात दिन पर दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं, अगर आप इज़ाज़त दे तो मैं किसी स्कूल में नौकरी कर लूँ" निशा ने काँपती हुई आवाज़ में पूछा,

"दिमाग खराब हो गया हैं तुम्हारा, घर में मर्दों के होते हुए बाहर जाकर काम करोगी" माणिक के कुछ कहने से पहले ही कावेरी ने निशा को डांटते हुए कहा।

"चुप हो जाओ तुम, क्या ग़लत कह रही हैं वो, अरे परिवार की मदद ही तो करना चाहती हैं।"

"लेकिन आप ही तो कहते हैं घर की औरतों का बाहर काम करना घर के मर्दों के लिए डूब मरने वाली बात हैं।"

"हाँ कहता था क्योंकि मैं बेवकूफ था, हमेशा लड़कों और लड़कियों में अन्तर करता रहा और साथ ही यह भी सोचता रहा कि घर की दुकान हैं ज्यादा पढ़-लिख कर क्या हो जाएगा, बैठना तो आखिरकार दुकान पर ही है ना, मुझे माफ़ करना निशा बेटी पढ़ाई के महत्व को मैं समझ ही नहीं पाया, जाओ बेटा मैं तुम्हें इजाज़त देता हूँ नौकरी कर अपने परिवार की मदद करो, और हाँ आज के बाद इस घर के बच्चे खूब पढ़ेंगे और लड़कों व लड़कियों में कोई फर्क नहीं किया जाएगा।" माणिक ने शर्मिन्दा होते हुए कहा,

"पापा, मैं आपसे वादा करती हूँ कि सबकुछ सही कर दूँगी बस आप मुझ पर विश्वास रखिए"

"बेटा विश्वास हैं इसीलिए तो इस परिवार की बागड़ोर तुम्हारे हाथ में दी हैं, अब जाओ और अपनी ज़िम्मेदारी निभाओं" निशा खुश थी, वो घर के बड़ो की सोच बदलना चाहती थी, लेकिन जिस वजह से सोच बदली ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था और ना ही वो ऐसा कभी चाहती थी।

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