Sulah (Story On Family)


शिकायतें तो बहुत हैं तुझसे पर

बना रहे हैं अपना, अपनों के लिए

 

आज सब्जी मंडी में अपनी दोस्त मालती को देख मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, जिससे मिलने की उम्मीद मैं सालों पहले ही छोड़ चुकी थी, उसका ऐसे अचानक मिल जाना किसी चमत्कार से कम नहीं था, बिना एक भी पल गंवाए मैं भाग कर उसके पास गई, और उसको अपनी बाँहों में भर लिया, "मालती तू यहाँ?" मैंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा

"यह तो मुझे तुझसे पूछना चाहिए शीना" मालती के कहते ही,  

"मैं तो यहीं पास में ही रहती हूँ शिव विहार कॉलोनी में"

"शिव विहार कॉलोनी?, वही तो मैं भी रहती हूँ।" मालती के कहते ही,

"यह तो कमाल ही हो गया हम दोनों दोस्त एक ही कॉलोनी में रहते हैं और पता ही नहीं हैं, अच्छा अब यह तो बता कहाँ गायब हो गई थी, मुझे याद हैं तू अपने ननिहाल गयी हुई थी, उसके बाद तो तेरी कोई ख़बर ही नहीं आयी, और ना ही तू वापिस लौटकर आयी" मैंने पूछा,

"क्या बताऊँ यार बहुत लम्बी कहानी हैं।" मालती ने उदास होते हुए जैसे ही कहा।

"यहाँ पास में ही एक कॉफ़ी हाउस हैं, चल वहाँ चलकर बैठते हैं और बातें करते हैं।" मैने मालती का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ ले जाने लगी।

 

कॉफ़ी हाउस पहुँचते ही, "अब यहाँ बैठ और मुझे बता कि हुआ क्या हैं…….भैया दो कॉफ़ी देना।"

"यह तो तुझे पता ही हैं कि मेरी नानी की तबीयत ठीक नहीं थी, और मैं अपने परिवार के साथ उनसे मिलने गयी हुई थी, वहाँ जाकर पता चला कि नानी अपने सामने ही मेरी शादी होते हुए देखना चाहती हैं, यही उनकी आखिरी इच्छा हैं, क्या करती ना चाहते हुए भी मुझे उनकी बात माननी पड़ी और मेरी शादी मामा के दोस्त के बेटे राजेश से करवा दी गयी, शुरुआत में तो ससुराल में सबका व्यवहार अच्छा ही था, लेकिन बाद में पता चला कि वो लोग मेरी पढ़ाई के ख़िलाफ़ थे, वो चाहते थे कि मैं अपनी पढ़ाई छोड़ घर के कामों पर ही ध्यान दूँ, मैने राजेश को समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, आखिरकार मैं हिम्मत हार गई, और सारा समय घर के कामों को ही देने लगी, बेमन से ही सही मैने हालातों से समझौता कर लिया था, इसी दौरान मेरी और राजेश की एक बेटी भी हुई पिंकी, सबकुछ सही चलने लगा ही था कि अचानक से एक ऐसा तूफ़ान आया कि जिसने मेरी ज़िदगी ही बदल दी"

"तूफ़ान कैसा तूफ़ान मैं कुछ समझी नहीं?"

"एक दिन मुझे पता चला कि राजेश का उसके ही ऑफिस में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी के साथ चक्कर चल रहा हैं, पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन जब खुद राजेश ने यह बात बताई तो मुझे माननी ही पड़ी।"

"तूने राजेश जी को समझाने की कोशिश तो की ही होगी ना"

"मैने ही नहीं बल्कि मेरे सास-ससुर, मम्मी-पापा सभी ने समझाया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, और मैं पिंकी के साथ सबकुछ छोड़ कर मेरठ से दिल्ली आ गई, फिलहाल तो हमारे तलाक़ का केस कोर्ट में चल रहा हैं, तो यह थी मेरी कहानी, अब तू बता अपने बारे में" कुछ देर तक तो वहाँ एक अजीब-सा सन्नाटा छाया रहा, फिर मैने ही चुप्पी तोड़ी,

"तेरी ज़िन्दगी में इतना कुछ होता रहा और तू उसे सहन भी करती रही?"

"मेरी छोड़ तू बता शादी की या नहीं?" मालती के पूछते ही,

"तू विक्रम को तो जानती हैं ना?"

"हाँ वही ना जो अपना सीनियर था, और तू उसके प्यार में पागल थी।"

"हाँ वही, उसी से मेरी शादी हुई हैं।" मैने थोड़ा शरमाते हुए कहा,

 "चलो अच्छा हैं, मैडम कब मिलवा रही हैं अपने साहब से?"

"जल्द ही, बल्कि मैं तो कहती हूँ तू आज शाम ही पिंकी को लेकर खाने पर क्यों नहीं आ जाती?" मैंने मालती और पिंकी को अपने यहाँ आमंत्रित करते हुए कहा।

"बिल्कुल ज़रुर आऊँगी, पिंकी भी तो अपनी नई मौसी से मिले"

"वैसे तेरी बेटी कितने साल की हो गयी हैं ?"

"पाँच की, अच्छा तो अब मैं चलती हूँ उसके स्कूल से आने का वक़्त हो रहा हैं।"

"अच्छा ठीक हैं, यह ले मेरा पता आज शाम का खाना मेरे घर पर" हम दोनों ने एक दूसरे को अपने-अपने घर के पते दिए और वापिस लौट गए, लेकिन मेरा मन बहुत ही बेचैन हो रहा था, बार-बार मालती का ही ख्याल आ रहा था।

 

शाम को "क्या हुआ शीना उदास क्यों बैठी हो, तुम्हारी तबीयत तो ठीक हैं ना?" विक्रम ने मेरे सिर पर हाथ फ़ेरते हुए पूछा,

"हाँ मैं ठीक हूँ, चाय बनाऊँ तुम्हारे लिए?" मेरे कहते ही,

"नहीं, उसकी ज़रुरत नहीं हैं, बल्कि तुम्हे जो भी परेशानी हैं, मैं चाहता हूँ तुम वो मुझे बताओ"

"विक्रम सब ठीक हैं।"

"शीना मैं तुम्हारा पति हूँ तुम्हारा चेहरा देख कर तुम्हारे दिल का हाल समझ सकता हूँ, इसलिए मुझसे कुछ छुपाने की कोशिश मत करना।"

"दरअसल आज सब्ज़ी ख़रीदते वक़्त मेरी सहेली मालती मिल गयी थी।"

"हाँ तो इसमें इतना दुःखी होने वाली क्या बात हैं।"

"नहीं विक्रम बात वो नहीं हैं।" और मैंने विक्रम को मालती के द्वारा बताई गयी सारी बात बता दी,

"ओह, यह तो तुम्हारी सहेली के साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं हुआ, लेकिन हम उसके लिए कर ही क्या सकते हैं, यह उसकी लड़ाई हैं और उसे अकेले ही लड़नी होगी।"

"तुम सही कह रहे हो लेकिन इस मन का क्या करूँ बार-बार उसी की बातें याद आ रही हैं।"

"शीना हिम्मत से काम लेना होगा और यही हिम्मत तुम्हे मालती को भी देनी होगी और अभी तो खाने की तैयारी भी करनी होगी, क्योंकि तुम्हारी सहेली जो आने वाली हैं।"

"अरे हाँ बहुत देर हो गयी मैं खाने की तैयारी करती हूँ" मैंने सामने लगी दीवार-घड़ी पर नज़र ड़ालते हुए कहा, और फिर मैं खाना बनाने की तैयारी करंने लगी, और कुछ ही देर में मालती और पिंकी हमारे यहाँ यहाँ चुकी थी, हमने बहुत सारी बातें की, विक्रम भी हमारी बातों में शामिल हुआ, उसने तो पिंकी के साथ भी बहुत मस्ती की, कुछ पुराने किस्से भी ताज़ा किये गए, इसी दौरान हमने खाना खाया और फिर मेरे हाथ से बनी खीर का आनंद लिया, इन सब में काफी देर हो चुकी थी, इसलिए विक्रम और मैं अपनी गाड़ी से मालती को उसके घर छोड़कर आए।

 

विक्रम के व्यस्त रहने की वजह से विक्रम और मेरे बीच मालती को लेकर लम्बे समय तक कोई बात नहीं हो पाई, लेकिन हम दोनों सहेलियों का फ़ोन पर बात करना और मिलना जुलना लगा ही रहता था।

 

लेकिन एक दिन अचानक सुबह पाँच बजे कोई हमारे घर का दरवाज़ा ज़ोरज़ोर से खटखटाने लगा, "इतनी सुबह-सुबह कौन होगा?" मैं बड़बड़ाते हुई दरवाज़े की ओर जाने लगी, लेकिन जैसे ही दरवाज़ा खोला सामने मालती खड़ी थी।  

"शीना, बचा ले मेरी बेटी को" मालती मेरे पैरो में गिर फूट-फूट कर रोने लगी।

"कौन हैं शीना?" विक्रम ने पूछा,

"विक्रम जी, वो मेरी बेटी को मुझसे छीन कर ले गया, अब मेरा क्या होगा"

"मालती हुआ क्या हैं ज़रा शांति से पूरी बात बताओ"

"शीना मेरा पति राजेश आया था, और पिंकी को अपने साथ ले गया हैं।"

"लेकिन वो ऐसा कैसे कर सकता हैं, क्या उसे पता नहीं हैं कि पिंकी अभी छोटी हैं और अपनी माँ के बिना नहीं रह सकती" मेरे कहते ही,

"लेकिन मालती तुम इतना ज्यादा क्यों परेशान हो रही हो, वो उसका पिता हैं, मुझे नहीं लगता कि वो उसको कोई नुक़सान होने देगा" इतने में ही विक्रम ने कहा,

"आप सही कह रह हैं विक्रम जी, मैं जानती हूँ वो पिंकी को कुछ नहीं करेगा बल्कि वो तो उससे बहुत प्यार करता हैं, मुझे तो डर हैं कि ऐसा ना हो वो मुझे मेरी बेटी वापिस ही ना दे"

"यह सब इतना आसान नहीं हैं मालती, पिंकी अभी बहुत छोटी हैं वो तुम्हे ही मिलेगी जब तुम्हारा तलाक होगा तो कोर्ट में तुम्हारे हक़ में ही फैसला सुनाया जाएगा" मेरे कहते ही,

"मैं जानती हूँ शीना लेकिन जब तक मैं अपनी बेटी के बिना कैसे रहूँगी"

"तुम्हे हिम्मत से काम लेना होगा, शीना तुम मालती को अन्दर ले जाओ थोड़ा आराम कर लेगी।"

 

जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया मालती के हालत ख़राब होती गयी, क्योंकि राजेश मिलवाना तो दूर पिंकी की उससे बात भी नहीं करवाता था, मालती की हालत देख मैंने उसकी मम्मी को फ़ोन कर बुलवा लिया, लेकिन अपनी मम्मी के समझाने का भी मालती पर कोई असर नहीं पड़ा, उसकी तबीयत दिन-प्रतिदिन पिंकी की याद में गिरती ही जा रही थी, शायद अब ऊपर वाले से भी मालती की हालत नहीं देखी जा रही थी, इसीलिए एक लम्बे इन्तज़ार के बाद कोर्ट का फ़ैसला आया और पिंकी मालती को मिल गयी, बेटी के आने से वो अब बहुत खुश थी, साथ ही मेरी और विक्रम की शुक्रगुज़ार भी, जिसने उसका इतना ख्याल रखा, लेकिन एक दिन पिंकी ने उससे कुछ ऐसा माँग लिया, जिसे सुन मालती को यकीन ही नहीं हुआ, "मम्मा मुझे पापा भी चाहिए, क्या हम सब साथ नहीं रह सकते" दूसरी ओर राजेश को महसूस होने लगा था कि मालती और उसके टूटे हुए रिश्ते का पिंकी पर गलत असर पड़ेगा, कही ना कही राजेश को अपनी गलतियों का एहसास होने लगा था, वैसे तो यह सब सोचने के लिए बहुत देर हो चुकी थी और मालती का भी तो राजेश को माफ़ करना मुश्क़िल था, फिर भी राजेश ने मालती से अपनी गलतियों की माफ़ी भी माँगी और उसे समझाने की कोशिश भी की, लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

 

"मम्मा, क्या हम पापा के साथ नहीं रह सकते?"

 "नहीं रह सकते और आज के बाद अपने पापा का नाम भी मत लेना मेरे सामने"  मालती के डाँटने से पिंकी सहम गई, बिना कुछ बोले अपने कमरे में जाकर रोने लगी , कुछ देर बाद मालती का गुस्सा शांत हुआ तो वो पिंकी को मनाने उसके कमरे में गयी, लेकिन कमरा खाली देख घबऱा गयी, "पिंकी, पिंकी कहा हो बेटा, मम्मा आपसे सॉरी बोलना चाहती हैं" लेकिन कोई ज़वाब नहीं था, पूरा घर छान मारा पिंकी कही नहीं थी, मालती काफ़ी ड़र चुकी थी, उसने आस पास भी पूछताछ की लेकिन पिंकी का कुछ पता नहीं चला, कि अचानक से राजेश वहाँ पिंकी को लेकर आ गया, "पिंकी कहा चली गयी थी तुम, तुम्हे पता भी हैं मैं कितना परेशान हो गयी थी, और तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

"मैं किसी काम से दिल्ली आया हुआ था, बाज़ार में पिंकी को अकेले घुमते हुए देखा तो घबरा गया, पूछने पर उसने तुम्हारे और उसके बीच हुई सारी बात मुझे बताई, मालती क्या तुम्हे नहीं लगता हमे दोबारा शादी कर लेनी चाहिए, अपनी बेटी के लिए"

"मज़ाक समझ कर रखा हैं तुमने, मन किया शादी कर ली, मन किया छोड़ कर चल दिए, और वैसे तुम्हारी उस गर्ल फ्रेंड का क्या हुआ?"

"मैं उससे माफ़ी माँग लूँगा, मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया हैं।"

"सॉरी मम्मा, लेकिन मुझे आप दोनों के साथ रहना हैं।" पिंकी बीच में बोल पड़ी,

"मालती मैं जानता हूँ तुम मुझसे बात भी नहीं करना चाहती, लेकिन पिंकी की ख़ुशी के लिए" मालती ने पिंकी की आँखों में देखा तो लगा जैसे वो उससे कुछ गुज़ारिश कर रही हैं , कुछ सोचने के बाद मालती राजेश के साथ शादी करने को तैयार हो गयी, शादी तो हो गयी, लेकिन उनके रिश्ते में जो दरार आयी थी वो नहीं भर सकी, वक़्त गुज़रता गया, राजेश और मालती एक ही छत के नीचे ऐसे रहते जैसे की अजनबी हो, लेकिन धीरे-धीरे यही दूरियाँ कब नज़दीकियों में बदल ही गयी, इस बात का एहसास तो उन दोनों को भी तब हुआ जब पता चला कि मालती फिर से गर्भवती हैं।  

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