Bewaffa Premi (Story On Fraud In Love)
😢😢तेरे
इश्क़ में इस क़दर डूब गई
कि
तेरे इरादों को भी ना समझ सकी😢😢
जेल की
सलाखों के पीछे बैठी उर्मी को अपने किए का कोई पछतावा नहीं हैं,
आखिर हो भी क्यों उसने इस धरती पर से एक गुनाहगार का बोझ ही तो कम
किया हैं, ऐसा क्या हो गया था कि उर्मी उसी व्यक्ति का कत्ल
करने पर मजबूर हो गईं जिसे वो कुछ साल पहले अपना दिल दे बैठी थी।
दो साल पहले
की बात हैं, उर्मी की एक प्राइवेट कंपनी में
नई-नई नौकरी लगी थी, इससे पहले उर्मी को नौकरी का कोई
तजुर्बा नहीं था, इसलिए वो अपने-आप को असहज महसूस कर रही थी,
लेकिन उसी कम्पनी में काम करने वाले विपुल को उर्मी की परेशानी समझ
में आ रही थी, परन्तु वो इस डर से उर्मी से कुछ बात नहीं कर
पा रहा था कि कहीं वो कुछ ग़लत ना समझ ले, शुरूआती कुछ दिन
तो यूं ही गुजर गए, फिर एक दिन हिम्मत करके विपुल ने उर्मी
के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ा ही दिया, जिसे अपने-आप को कम्पनी
में अकेला महसूस करने वाली उर्मी ने जल्द ही स्वीकार कर लिया ।
"अगर आप
मेरे साथ नहीं होते तो शायद मैं आफिस का काम नहीं सीख पाती"
"ऐसा
कुछ नहीं हैं, आपने काम मेरी वजह से नहीं बल्कि
अपनी काबिलियत की वजह से सीखा हैं।"
"विपुल
जी क्यों ना आप किसी दिन हमारे घर पर आए, मां
भी आपसे मिलकर बहुत खुश होगी।"
"जरूर मुझे भी उनसे मिलकर अच्छा लगेगा।"
कुछ दिन बाद
जब विपुल उर्मी के घर गया तो पहली ही नजर में उसकी मां की सुन्दरता का कायल हो गया,
"आंटी आप तो गज़ब ढा रही हैं, उर्मी की
मां नहीं बल्कि उसकी बहन लग रही हैं।"
"धन्यवाद बेटा, लेकिन अगर तुम मुझ पर लाईन मार रहे हो
तो मैं बता दूं मैं तुम्हारी मां की उम्र की हूं।"
"अरे
नहीं आंटी ऐसी कोई बात नहीं हैं, मैं तो बस ऐसे
ही"
"कोई
बात नहीं विपुल जी मेरी मां है ही इतनी सुन्दर कि हर कोई इनकी सुंदरता का कायल हो
जाता हैं।" इसी तरह से हंसी मजाक करते हुए वो शाम गुज़र गई,
उस दिन के बाद से विपुल का उर्मी के घर आना-जाना लगा ही रहता,
इसके साथ ही उन दोनों के बीच की नजदीकियां भी बढ़ने लगी थी।
"आज शाम
फ्री हो तो मूवी देखने चलें?" एक दिन उर्मी
के पूछते ही,
"ठीक हैं, लेकिन मैं सोच रहा था क्यों ना आंटी को भी साथ ले चलें"
"मां को
भी लेकिन क्यों?"
"उनकी भी तो इच्छा होती होगी घुमने-फिरने की और हम उनके बारे में नहीं
सोचेंगे तो कौन सोचेगा?"
"विपुल जी आप कितने अच्छे हैं।" इसी प्रकार धीरे धीरे-धीरे विपुल ने
उर्मी और उसकी मां के दिल में जगह बना ली थी, उर्मी को कब
विपुल से प्यार हो गया पता ही नहीं चला ।
"विपुल
जी आईं लव यू, क्या आप मुझसे शादी करेंगे?"
विपुल आश्चर्य से उर्मी की ओर देखने लगा,
"क्या हुआ ऐसे क्या देख रहे हैं, क्या एक लड़की
प्रपोज नहीं कर सकती?"
"अरे नहीं वो बात नहीं हैं, दरअसल मैं इन सब बातों के
लिए तैयार ही नहीं था।"
"कोई
बात नहीं आप आराम से सोच कर ज़वाब दीजिए" उर्मी विपुल की ओर देख मुस्कुराने
लगी,
विपुल ने भी जल्द ही उर्मी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, उसके बाद तो दोनों का मिलना लगा ही रहता, कभी फिल्म,
कभी रेस्टोरेंट तो कभी शापिंग, और विपुल का
उर्मी के यहां आना तो जैसे रोज़ का नियम ही बन गया था, और
जिस तरह से विपुल उर्मी की मां का ख्याल रखता, उसे देख उर्मी
को बहुत अच्छा लगता ।
एक दिन,
"हैलो उर्मी, कहां हो तुम?"
"आफिस में, और तुम कहाँ हो अभी तक आफिस क्यों नहीं आए?"
"मेरी आज तबीयत ठीक नहीं हैं, मैं आफिस नहीं आ
पाऊंगा"
"क्या
हुआ?
मैं अभी तुम्हारे घर आती हूँ।"
"नहीं-नही इसकी कोई जरूरत नहीं हैं,
तुम अपना काम करो, आराम करूँगा तो ठीक हो
जाएगा।"
"ठीक है
तुम अपना ख्याल रखना मैं शाम को तुम्हारे घर आती हूँ।" लेकिन उर्मी का काम
में मन ही नहीं लग रहा था, जैसे-तैसे करके उसने
लंच तक का समय तो निकाला, फिर छुट्टी लेकर विपुल के घर के
लिए रवाना हो गई, लेकिन वहाँ ताला लगा देख पहले तो विपुल को
लेकर थोड़ा चिंतित हुई फिर सोचा, हो सकता है डाक्टर को
दिखाने गया हो, कुछ देर तो उर्मी उसका इन्तज़ार करती रही,
फोन भी करके देखा लेकिन फोन भी बंद आ रहा था, इतने
इन्तजार के बाद उर्मी ने अपने घर जाना ही उचित समझा।
बहुत देर तक
घर के बाहर लगी घंटी बजाने के बाद, "लगता है माँ किसी काम से बाहर गई हुई है।" बड़बड़ाते हुए उर्मी ने
अपने बैग में से चाबी निकाली और ताला खोलने लगी, लेकिन जैसे
ही वो घर के अन्दर घुसी, अपनी माँ की आवाजें सुन सहम गई,
तुरंत भागकर जैसे ही उनके कमरे की ओर गईं, वहां
का दृश्य देख उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गई, एक आदमी उसकी
मां के साथ जबरदस्ती कर रहा था और उसकी माँ अपने-आप को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी,
कमरा भी पूरी तरह से फैला हुआ था जैसे की यहाँ हाथापाई हुई हो,
घबरायी हुई उर्मी ने तुरंत वहां रखा फूलदान उठाया और पूरी ताकत से
उस आदमी के सिर पर दे मारा, "उर्मी बेटा" सुषमा
उर्मी के गले लग फूट-फूट कर रोने लगी, लेकिन जैसे ही उर्मी
की नज़र उस आदमी के चेहरे पर पड़ी, "विपुल?"
"हाँ बेटा, ये विपुल ही हैं, जिसको
हम अपना फरिश्ता समझते रहे वो तो राक्षस निकला, मैं समझती
रही उसकी नज़रों में मेरे लिए इज्जत हैं, मैं ग़लत थी वो
इज्जत नहीं उसकी हवस थी।"
"मां
मुझे माफ़ कर दो मैं भी इसे नहीं समझ पायी।" और उर्मी विपुल की लाश के पास
बैठ फूट-फूट कर रोने लगी।
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