Bhaskar Bechara (A funny Story)
यह तो मैं थी कोई
ओर सी होती
तो तुम्हें पता चल
जाता
"सुनती हो जी,
आज अपनी शादी को बीस साल हो गए, यक़ीन ही नहीं
कर पा रहा हूँ, कि मैं पिछले बीस सालों से तुम्हारी डाँट खा
रहा हूँ"। भास्कर के कहते ही,
"ज़ुबान संभाल कर बात करो,
यह तो मैं थी, कोई ओर सी होती तो तुम्हें पता
चल जाता, अरे कितना सहन करती हूँ, तुम्हे
पता भी हैं, सुबह से रसोई में लगी रहती हूँ, उसके बाद भी तुम्हारी माँ की चिकचिक ख़त्म ही नहीं होती"।
"भाग्यवान आज तो मीठा बोल लो,
और कम से कम आज तो मेरी माँ को बख़्श दो, चलो
बैठो दो बातें प्यार भरी करे, आज तो तुम्हारे मुँह से दो
मीठे बोल सुन लूँ"।
"देखो जी फ़ालतू बातों के लिए
मेरे पास वक़्त नहीं हैं, यह लो थैला और बाजार से सब्जी,आटा
और चावल ले आओ, और हाँ आज कामवाली भी नहीं आएगी, तो वापिस आकर घर की साफ़-सफाई भी करनी हैं।“ भास्कर उदास मन से बाजार के लिए
निकल गया, और सोचने लगा कि कैसी अज़ब हैं ये लीला जब तक शादी
ना करो घर वाले चैन नहीं लेने देते, शादी करो तो बीवी चैन
नहीं लेने देती, शाम को घर लौट कर आओ तो बीवी की शिकायतों का
सिलसिला शुरु, बीवी चुप तो माँ की शिकायते शुरु, सच कहा हैं किसी ने शादी का लडडू खाए जो भी पछताए ना खाए जो भी पछताए,
सोचा था आज खुशियाँ मनाऊँगा, आखिरकार बीस साल
से रोज़-रोज़ की खटर-पटर के बीच भी ज़िंदा रहना आसान नहीं होता, लेकिन एक दिन का सुख भी शायद मेरे नसीब में नहीं।
"राम-राम भास्कर भैया कैसे हो ?"
बाज़ार में एकाएक ही भास्कर का दोस्त बनवारी सामने से आ गया।
"ठीक हूँ बनवारी लाल और तुम बताओ?"
"मैं भी ठीक ही हूँ भैया बस बीवी
दो पल के लिए भी चैन से नहीं बैठने देती कभी कुछ तो कभी कुछ काम बताती ही रहती हैं।“
"भैया हाल तो मेरा भी कुछ ऐसा ही
हैं, अच्छा भैया अब में चलता हूँ ज़रा भी देर हुई तो बीवी
गुस्सा करेगी"।
घर में घुसते ही,
"कहाँ थे इतनी देर से, यह भी कोई वक़्त
हैं घर आने का।“
"अरे भाग्यवान नाराज़ क्यों होती
हो, तुम्ही ने तो भेजा था राशन लाने।“
"राशन लाने भेजा था,
पूरा बाजार खरीदने नहीं, अरे यह तो मैं हूँ जो
तुमसे कभी कुछ नहीं कहती, कोई ओर सी होती तो पता चल जाता।“ भास्कर
बिना कोई प्रतिक्रिया दिए कमरे में जाकर बैठ गया, और सोचने
लगा यह भी क्या ज़िन्दगी हैं, काम पर बड़े कर्मचारियों की डाँट
सुनो घर पर बीवी की। आज शादी की वर्षगाँठ
हैं, सोचा था बीवी संग बैठकर दो प्यार भरी बात करूँगा लेकिन
लगता हैं मेरी किस्मत ही ख़राब हैं।
"अजी कहाँ गए,
घर की साफ़-सफाई भी करनी है।“
"आया", भास्कर बेचारा
मन मसोस कर घर की सफ़ाई करने लगा, एक चाय की तलब लगी थी लेकिन
वो भी माँगने की हिम्मत नहीं हुई।
कुछ देर बाद भास्कर ने फिर से थोड़ी
हिम्मत जुटाई और बीवी से कहा, "सुनो जी,
आज कही बाहर घुमने चले, फिल्म देखेंगे और खाना
भी बाहर ही खा लेंगे आखिरकार आज हमारी शादी को बीस साल हो गए जश्न तो करना बनता
हैं।“
"लेकिन तुम्हारी माँ का क्या ?"
"उनकी चिंता मत करो उन्हे तो मैं
छोटे के यहाँ छुड़वा दूँगा", आखिरकार भास्कर अपनी
बीवी को इतना तो समझता ही था कि वो उसकी माँ को कतई भी पसंद नहीं करती थी।
"आपने पहले क्यों नहीं कहा,
अच्छा अब आप बैठिए मैं चाय बनाकर लाती हूँ, आप
सुबह से भाग रहे हैं थक गए होंगे।“
अपनी बीवी का अचानक से बदला हुआ रूप
देख भास्कर पहले तो कुछ घबराया लेकिन कुछ समझ पता इससे पहले ही।
"सुनो जी,
जब बाहर जा ही रहे है तो क्यों ना मैं अपने लिए कुछ साड़ियाँ ले
लूँ"।
“ओहो तो अब समझा मैडम के तेवर
अचानक से बदल क्यों गए।“ भास्कर बडबडाया।
"जी,
मैं कह रहा था आज खरीददारी रहने देते हैं, नहीं
तो सारा वक़्त दुकानों के चक्कर लगाते हुए ही बीत जाएगा।“
"जी,
अगर कुछ नहीं दिलाना हैं तो साफ़-साफ़ मना कर दो, बेकार के बहाने मत बनाओ, अरे यह तो मैं हूँ जो तुमसे
कभी कुछ नहीं माँगती कोई ओर सी होती तो पता चल जाता।“
"ठीक हैं कम से कम आज के दिन तो
नाराज़ मत हो, यह साड़ियाँ मेरी तरफ से तुम्हारे लिए शादी की
वर्षगाँठ का तोहफ़ा।“
"तो ठीक हैं यह साड़ियाँ तुम्हारी
ओर से बाकी की मेरी अपनी पसंद से क्यों ठीक हैं ना?"
"हाँ जी आप कह रही हैं तो ठीक ही
होगा, यह तो आप हैं कोई ओर सी होती तो मुझे पता चल जाता।“
किस्मत का मारा भास्कर बेचारा अपना
सिर पकड़ कर बैठ गया।
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