Bura Naa Mano Holi Hain (Story On Holi)
ना
कोई रोको,
ना कोई टोको, खेलूँगी मैं तो होली
होली
हैं भई होली हैं बुरा ना मानो होली हैं
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मंसाराम के
दो ही तो शौक हैं , पहला सोना और दूसरा
होली खेलना। सोने का काम तो रोजाना किया जा सकता हैं लेकिन होली, वो तो साल में एक बार ही आती हैं और इसकी तैयारी मंसाराम कई दिन पहले से
करना शुरु कर देता है। हौद की सफाई, रंगों का इंतज़ाम ,ठंडाई की व्यवस्था आदि। अरे हाँ, ठंडाई से याद आया
ऐसी वैसी ठंडाई नहीं बल्कि भांग वाली ठंडाई, बस यह कह लीजिए
मंसाराम के घर में होली की महफ़िल जमती हैं। रही खाने-पीने के सामान की बात तो वो
ज़िम्मेदारी हैं अनोखी की। ओहो आपको अनोखी के बारे में तो बताया ही नहीं, अनोखी मंसाराम की पत्नी हैं। रसोई के कामों में निपुण अनोखी होली पर
मंसाराम और उसके दोस्तों के लिए तरह-तरह के पकवान बना डालती हैं, बेसन की चक्की, गुंजियाँ, मठरी,
गुलाबजामुन, नमकीन और ना जाने क्या-क्या।
मंसाराम भी तो अपनी पत्नी की इस आदत से बहुत ख़ुश होता हैं।
आज होली हैं
और मंसाराम व उसकी पत्नी सुबह से ही होली खेलने के लिए उत्साहित हैं। वो बहुत ही
बेसब्री से उसके दोस्तों का इंतज़ार कर रहे हैं कि मंसाराम को अपने जीवन का एक
पुराना होली का किस्सा याद आ गया। बात दो साल पहले की हैं उस वक़्त मंसाराम को
अनोखी का होली खेलना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। उसके दोस्तों के आने पर अनोखी के घर
से निकलने पर पूरी तरह से पाबन्दी थी लेकिन होली खेलने के लिए अनोखी हमेशा ही
बेचैन रहती पर उसकी एक ना चलती। वो कर भी क्या सकती थी बेचारी अपना मन मार कर रह
जाती लेकिन दो साल पहले की वो होली भी अनोखी ही तरह अनोखी थी। मंसाराम अपने
दोस्तों का इंतज़ार कर रहा था।
"कमाल
करते हैं यह लोग भी, अब क्या दिन ढलने के
बाद आएंगे होली खेलने।" मंसाराम ने कहा।
दूसरी ओर
अनोखी को ना जाने क्या सूझी, उसने अपने पति
से नज़रे चुरा थोड़ी-सी भांग पी ली, जिसकी अनोखी को सख्त मनाही
थी। कुछ ही देर में मंसाराम के दोस्तों का आना भी शुरु हो गया। अभी तक सब दोस्तों
ने मिलकर होली खेलना शुरु भी नहीं किया था कि भांग के नशे में धुत अनोखी ने अपना
रंग दिखाना शुरु कर दिया।
"आओ,
आओ भैया जी, होली मुबारक़ हो।" नशे में धूत
अनोखी के कहते ही,
"तू
यहाँ क्या कर रही हैं, मना किया था ना बाहर
आने के लिए, कोई बात एक बार में समझ नहीं आती।"
"ऐ मंसा,
तू समझता क्या हैं अपने आप को, क्या मेरा मन
नहीं करता होली खेलने का, होली मत खेलो, दोस्तों के सामने घर से मत निकलो, खेलूँगी मैं भी
होली, देखती हूँ तू मेरा क्या बिगाड़ लेता हैं। अनोखी का यह
रूप देख मंसाराम सकते में आ गया। उसने अपने दोस्तों से वापिस जाने का आग्रह किया
लेकिन वो सब तो अनोखी की इस हालत के मज़े लेना चाहते थे, जो
कि मंसाराम को कतई भी पसंद नहीं आ रहा था। अनोखी भी नशे की हालत में ना जाने
कैसी-कैसी हरकते कर रही थी। कभी सबके ऊपर रंग डालना, तो कभी
पानी से भरी पिचकारी छोड़ना, और जुबान उस पर तो जैसे आज अनोखी
का कोई क़ाबू ही नहीं था, कुछ भी अनाप-शनाप बोले जा रही थी,
कभी मंसाराम को तानाशाह कहना, तो कभी उसके
दोस्तों को आवारा कहना। अनोखी की ऐसी हालत देख मंसाराम के घर के बाहर लोगो की भीड़
तमाशा देखने के लिए आ खड़ी हुई । बेचारा मंसाराम इस स्थिति के लिए बिल्कुल भी तैयार
नहीं था। फ़िलहाल तो अनोखी से भी कुछ कहने का फ़ायदा नहीं था। आज तो मंसाराम की होली
खेलने की सारी तैयारियों पर पानी फिर चुका था। आज तो अपनी पत्नी की वजह से मंसाराम
की पूरे मोहल्ले में फ़ज़ीहत हो गयी थी। क्रोधित मंसाराम बार-बार अनोखी को घर के
अन्दर भेजने की कोशिश कर रहा था लेकिन सफलता हासिल नहीं हो पा रही थी। नशे में धुत
अनोखी में ना जाने इतनी ताक़त कहाँ से आ गयी थी कि उसने बेचारे मंसाराम को ही हौद
में धकेल दिया, वो निकलने का प्रयास कर ही रहा था कि किसी
दोस्त ने आकर फिर से धकेल दिया और सभी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लग
बड़ी मुश्किल
से मंसाराम बाहर निकला ही था कि अनोखी ने हौद में छलाँग लगा दी,
बाहर खड़े लोग भी घर के अन्दर आ मज़ा लेने लगे। यह कह लीजिए कि वहाँ
खड़े लोगो को मुफ़्त की फिल्म देखने को मिल रही थी और साथ ही अनोखी का एक नया रूप।
मंसाराम की भी सारी कोशिशें बेकार हो रही थी, वो बेचारा क्या
करता हार कर एक कोने में जा बैठा
"यार
मंसा,
आज तो मज़ा आ गया होली खेलने का, हमे तो पता ही
नहीं था कि भाभी का स्वभाव इतना ज्यादा मज़ाकिया हैं।" मंसाराम के एक दोस्त ने
मज़ाक करते हुए कहा,
"चुप हो
जा,
शर्म आनी चाहिए तुझे अपने दोस्त की मज़बूरी का फ़ायदा उठाता
हैं।" मंसाराम जोर से चिल्लाया।
"आज जितना मज़ा आया हैं होली खेलने का पहले
कभी नहीं आया, ये भांग तो बहुत मज़े की चीज़ हैं,
अरे ओ मंसा आज तो मैने तेरी ऐसी की तेसी कर दी।" अनोखी हौद में
पानी के साथ खेलते हुए कहने लगी।
इतना सुन मंसाराम
गुस्से में आ अनोखी को मारने के लिए दौड़ा ही था कि उसके एक दोस्त जगत ने पानी से
भरी बाल्टी मंसाराम पर उड़ेल दी, जिससे की संतुलन
बिगड़ने से वह गिर पड़ा। मंसाराम दोस्त को मारने के लिए उठता इससे पहले ही वो भाग
खड़ा हुआ, और मंसाराम के सभी दोस्त मिलकर एक साथ चिल्लाए,
"होली हैं भई, होली हैं, बुरा ना मानो होली हैं।"
"होली हैं भई, होली हैं, बुरा
ना मनो होली है", साथ ही अनोखी की आवाज़े भी दूर-दूर तक
गूँज रही थी।
"आज की होली तो ज़िन्दगीभर नहीं भूलूँगा", अपना
सर पकड़कर मंसाराम बड़बड़ाया।
अरे ओ
मंसाराम क्या सोच रहा हैं ,अरे भई आज होली नहीं
खेलनी हैं क्या ?" जगत ने मंसाराम को झकझोरते हुए पूछा।
"खेलनी
क्यों नहीं हैं यार, बस तुम लोगो का
इंतज़ार करते -करते दो साल पहले की होली याद आ गयी थी।" इतने में ही मंसाराम का
दोस्त जगत वहाँ आ गया।
"अरे
यार वो दिन तो हम कभी नहीं भूल सकते वैसे भाभी कहाँ हैं ?"
मंसाराम के एक दूसरे दोस्त मणि ने चारो ओर निगाहें घुमाते हुए पूछा,
"अनोखी आ जाओ तुम भी बाहर
होली खेलने, सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं , होली खेलना लेकिन भांग पीकर कोई हंगामा मत कर देना।"
"भूल
क्यों नहीं जाते हैं आप लोग उस किस्से को , उस
बारे में सोचती हूँ तो मुझे बहुत शर्मिन्दगी होती हैं।"
"इसमें शर्मिन्दा होने वाली क्या बात हैं भाभी अगर आप उस दिन ऐसा नहीं करती
तो क्या आज हमारे साथ होली खेल पाती?"
"हाँ भई सो तो हैं, मैं तो कभी समझ ही नहीं पता कि
अनोखी के अंदर होली खेलने की इतनी भूख हैं।" ऐसा बोलते ही मंसाराम ने अनोखी
के चेहरे पर पीछे से रंग लगा दिया और सारे दोस्त मिलकर एक साथ चिल्ला पड़े होली हैं
भई होली हैं बुरा ना मानो होली हैं।
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