Internet Dhoka (Story On Internet Fraud)
😠😠ज़िंदगी से खेल ना जाने क्या हासिल हुआ
इन बेग़ैरत लोगो को
ख़ुदा भी ना करे कभी माफ़
इन बेग़ैरत लोगो को😠😠
उस दिन भी हमेशा की तरह वाणी कॉलेज से लौटते ही
लेपटॉप चला कर बैठ गई, "वाणी बेटा,
खाना खाने आ जाओ"
"अभी आई मम्मी" अपनी मम्मी
गरिमा को आने का कहकर वाणी अपना फेसबुक देखने लगी ही थी कि किसी अनजान व्यक्ति की
फ्रेंड रिक्वेस्ट देख उसका प्रोफ़ाइल देखने लगी, "वाणी ने बुदबुदाया और तुरंत ही रिक्वेस्ट डीलिट कर
दी।
खाने की टेबल पर, "तुम्हारा आज का दिन कैसा रहा ?"
"अच्छा था
मम्मी"
"और क्या सोचा है तुमने, कॉलेज के बाद क्या करना चाहती हो?"
“एम.बी.ए.करने के बारे में
सोच रही हूँ" वाणी के कहते ही,
"ठीक हैं लेकिन जो भी
करो मन लगा कर करना, अभी की गयी पढ़ाई भविष्य में तुम्हारे ही
काम आएगी।" "जी मम्मी"
"अच्छा अब मैं ज़रा बाजार होकर आती
हूँ, घर का ध्यान रखना"
गरिमा के जाने के कुछ देर बाद वाणी भी अपने कमरे में आराम करने चली गयी।दिन ऐसे ही
गुज़रते जा रहे थे, इसी प्रकार हफ्ता, दस
दिन गुज़र गए,
फिर एक दिन जब वाणी अपना फेसबुक देखने
लगी तो, "ओह उस लड़के की
रिक्वेस्ट फिर से, आखिर ये हैं कौन मानव ?" वाणी ने उस लड़के का प्रोफाइल देखते हुए बुदबुदया, और
फिर से उसकी रिक्वेस्ट डिलीट कर दी और यही सिलसिला तक़रीबन 6
महीने तक चला, वो लड़का मानव फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेजता और वाणी
डिलीट कर देती, लेकिन एक दिन वो मानव का फेसबुक पर मैसेज पढ़
चौंक गयी, (हैलो वाणी, तुम पिछले 6 महीने से मेरी रिक्वेस्ट डिलीट कर रही हो, मैं
तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ, एक बार मुझसे बात कर लो अगर
अच्छा ना लगे तो फिर कभी रिक्वेस्ट नहीं भेजूँगा), उसका
मैसेज पढ़ ना जाने वाणी को क्या हुआ उसने तुरंत ही उसको अपना फेसबुक फ्रेंड बना
लिया और इसके बाद तो दोनों फेसबुक पर रोज़ाना ही चैट करने लगे, कई बार तो ये बातें कई-कई घंटो तक चलती, कुछ ही
दिनों बाद दोनों ने एक-दूसरे के फ़ोन नंबर भी ले लिए, अब
दोनों बहुत अच्छे दोस्त जो बन चुके थे।
"मानव मैं तुमसे
मिलना चाहती हो"
"ठीक हैं, वैसे मैं भी यही सोच रहा था, तो कहाँ मिलना हैं ?"
"मेरे घर के पास एक
कॉफ़ी हाउस हैं वहीं आ जाओ लेकिन मैं तुम्हे पहचानूँगी कैसे?"
"अरे भई बहुत आसान
हैं जो भी लड़का सबसे ज्यादा हैंडसम हो वही मैं हूँ " ऐसा कहते ही मानव फ़ोन पर
हँसने लगा,
"मज़ाक बंद करो और
अपनी कोई पहचान बताओ"
"तुम वहाँ पर टेबल बुक कर लो और
उसका टेबल नंबर मुझे बता दो वहीं हम मिलेंगे"
"ठीक हैं"
मानव को कॉफी हाउस में पहली नज़र देखते ही
वाणी उसको अपना दिल दे बैठी, "हैलो मानव, मैं वाणी" "वाणी, तुम तो बहुत खूबसूरत हो, अपनी प्रोफाइल फोटो से भी
ज्यादा"
"तुम भी" वाणी ने मुस्कुराते हुए कहा, इसके बाद दोनों की बातों का जो
सिलसिला शुरु हुआ वक़्त का पता ही नहीं चला,
"ओहो, आठ बज गए मम्मी इंतज़ार कर रही होगी, और पापा भी ऑफिस
से वापिस आ गए होंगे, अब मैं चलती हूँ।"
"ठीक हैं, क्या मुझे अपने घर नहीं बुलाओगी?"
"अभी नहीं बाद में
कभी" ऐसा कहते ही वाणी शर्माकर वहाँ से चली गयी, और
उसके शर्माने से मानव सबकुछ समझ गया।
वाणी के दिल में मानव के लिए प्यार का
अंकुर फूट चुका था और यही तो वो चाहता था, अब तो लगभग रोज़ाना ही दोनों की मुलाकाते होने लगी, इस दौरान एक-दो बार मानव वाणी के घर भी आ गया एवं बातों ही बातों में उसने
गरिमा को भी अपना मुरीद बना लिया, लेकिन वाणी के पापा अजय को
उसमे एक धोखेबाज़ नज़र आता था, उसका इस तरह आये दिन घर आ जाना
उन्हें बिल्कुल भी पैसा पसंद नहीं था।
"गरिमा मुझे यह मानव का रोज़-रोज़ आना बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं,
अगर मैं कहूँगा तो शायद वाणी को अच्छा ना लगे इसलिए तुम उसे समझाओ
कि मानव से दूरी बनाए रखे।"
"लेकिन मुझे तो उस लड़के में कोई
बुराई नज़र नहीं आती, संस्कारी हैं बड़ो की
इज़्ज़त करता हैं, आजकल के बच्चे कहाँ ऐसे होते हैं, अजय तुम कुछ ज्यादा ही सोच रहे हो, मेरी नज़र में
मानव एक बहुत ही अच्छा लड़का हैं।" ऐसा कह गरिमा घर के काम करने लगी, अजय ने यही बात वाणी को भी समझाने की कोशिश की, लेकिन
गरिमा और वाणी की ज़िद के आगे उसकी एक ना चली।
दूसरी ओर अब वाणी मानव के संग शादी के
सपने देखने लगी थी, "मानव, मुझे तुमसे कुछ कहना हैं।"
"हाँ बोलो"
"आई.लव.यू, क्या तुम मुझसे शादी करोगे?" मानव को वाणी के
कहे पर विश्वास ही नहीं हुआ,
"क्या हुआ, क्या मैं तुम्हे पसंद नहीं?"
"अरे नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, बस मैं तो अपनी
ख़ुशकिस्मती पर विश्वास करने की कोशिश कर रहा था" मानव के ऐसा कहते ही वाणी ने
उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया और शर्माने लगी,
"तुम जल्दी ही मेरे
पापा-मम्मी से अपनी शादी के बारे में बात कर लो"
"अरे भई इतनी भी क्या जल्दी हैं ?"
"मुझे हैं, मैं जल्द से जल्द तुम्हारे घर आना चाहती हूँ।"
"ठीक हैं, मौका देख कर बात करता हूँ, और मेरे घरवालो से भी तो बात करनी होगी।"
"जो भी करना हैं जल्दी करो"
शादी के लिए वाणी को बेचैन देख मानव मन ही मन बहुत खुश था।
मानव के परिवार वालो को इस रिश्ते से कोई
एतराज़ नहीं था, बस अजय ने ही थोड़ी बहुत
ना-नकुर की लेकिन उसने भी अपनी बेटी की ख़ुशी के सामने अपनी घुटने टेक दिए और वो
दिन भी आ गया जब मानव और वाणी की शादी होनी थी, सबकुछ बहुत
ही धूमधाम से हुआ, आखिर होता भी क्यों नहीं वाणी अपने
पापा-मम्मी की इकलौती बेटी जो थी। जैसे-जैसे विदाई का वक़्त नज़दीक आ रहा था अजय की
घबराहट बढ़ती ही जा रही थी, लेकिन उसने यह बात किसी के ऊपर भी
ज़ाहिर नहीं होने दी एवं ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बेटी को विदा किया।
दूसरी ओर वाणी के ससुराल में
"तुम्हारा स्वागत हैं वाणी ससुराल में" वाणी की सास उर्मिला ने उसकी
आरती उतारते हुए कहा, वाणी ने भी गृहप्रवेश कर
सभी बड़ो के पैर छू आशीर्वाद लिया, "वाणी बेटा तुम थक
गयी होगी अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आराम कर लो" उर्मिला ने वाणी को उसके
कमरे में भेजते हुए कहा।
वाणी बहुत ख़ुश थी मानव जैसा पति और इतना
अच्छा ससुराल पाकर वो निहाल हो गई थी, शादी को तक़रीबन एक हफ्ता बीत चुका था, "वाणी मैं सोच रहा था कि क्यों ना हम हनीमून पर चले, लेकिन
एक समस्या हैं।"
"समस्या वो क्या?"
"अभी पैसो की थोड़ी
किल्लत हैं, तुम्हे बुरा ना लगे तो बाद में चले।"
"ठीक हैं, लेकिन मुझे तुम्हारी एक बात बिल्कुल
भी अच्छी नहीं लगी"
"वो क्या?"
"क्या मेरे पैसे पर
तुम्हारा कोई हक़ नहीं हैं।"
"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं
हैं" मानव ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा।
कुछ देर तो कमरे में सन्नाटा छाया रहा
लेकिन थोड़ी देर बाद, "यह लो मेरे बैंक
अकाउंट की जानकारी, आज से यह सब तुम्हारा ही हैं जैसा चाहो
ख़र्च करो।"
"वाणी तुम मुझे शर्मिंदा कर रही हो।"
"नहीं, बल्कि यह अहसास करवा रही हूँ कि हम
दोनों एक हैं।"
"तो चलो ठीक हैं अगर तुम्हारी यही
मर्ज़ी हैं तो हनीमून पर चलने की तैयारी शुरु करो।" मानव ने वाणी को अपनी
बाँहो में लेते हुए कहा।
हनीमून के लिए वाणी और मानव शिमला के लिए
रवाना हो गए, "मानव मैं तुम्हे
बता नहीं सकती कि मैं कितनी ख़ुश हूँ।"
"तुम्हारी ख़ुशी के लिए कुछ भी", मानव के होंठों पर कुटिल मुस्कान थी,
जिसे वाणी समझ ही नहीं पाई । "वाणी, सफर
की वजह से थकान हो रही है, क्यों ना खाना कमरे में ही मँगवा
ले।"
"हाँ यह ठीक रहेगा, मैं नहाकर आती हूँ, तुम खाना ऑर्डर कर दो।" ऐसा कह वाणी बाथरूम की ओर चली गई, और मानव मेन्यू कार्ड देख खाना आर्डर करने लगा,
कुछ देर बाद, "वाणी जल्दी आ जाओ खाना ठंडा हो
रहा हैं।"
वाणी के आते, "कितनी देर लगा दी तुमने नहाने
में मुझे तो भूख लग रही थी सो मैने तो खाना खा लिया अब तुम भी खा लो।"
"तुम थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकते थे
मेरा ?" वाणी ने नाराज़
होने का नाटक करते हुए कहा,
"थोड़ा इंतजार!,
श्रीमती जी इंतज़ार करते हुए तो मेरे पेट के चूहे हाथी बन गए थे,
वैसे गज़ब ढहा रही हो ऐसा लग रहा है जैसे की कोई अप्सरा आसमां से
धरती पर उतर आयी हो।"
"अब यह अपनी चिकनी चुपड़ी बातें बंद
करो और मुझे खाना खाने दो", ऐसा कह वाणी खाना खाने लगी, और कुछ देर बाद थके हुए होने
की वजह से दोनों ही सो गए।
कुछ घंटों बाद जब वाणी की नींद खुली तो, "मानव, मानव
कहाँ हो तुम ?" वाणी मानव को आवाज़े लगाती हुई इधर-उधर ढूँढ्ने
लगी, लेकिन उसका कुछ ही पता नहीं चल रहा था, वाणी का फ़ोन भी गायब था, इसीलिए उसने होटल में किसी अपरिचित से फ़ोन माँग मानव से बात करने की कोशिश
की, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ काफी मशक्कत करने के बाद भी जब
मानव का कुछ पता नहीं चला तो वाणी ने अपने ससुराल फ़ोन लगा दिया, लेकिन वहाँ पर भी किसी से बात नहीं हो पाई। परेशान वाणी के पास इस वक़्त
कुछ भी नहीं था ना ही फ़ोन, और ना ही पैसे, बेचारी अपने आप को बहुत ही बेबस महसूस कर रही थी,
मानव की चिन्ता हो रही थी सो अलग, जब कुछ समझ नहीं आया तो
वाणी ने अपने पिता अजय को फ़ोन किया, सारी बात पता चलते ही
अजय गरिमा को ले शिमला के लिए रवाना हो गया।
अजय का शक सच साबित हो चुका था, मानव वाणी के सारे पैसे और जेवर लेकर
फ़रार था, यहाँ तक कि बैंक अकाउंट भी खाली कर दिया था और मानव
के परिवारवालो का भी कुछ पता नहीं चल रहा था। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने से पता
चला कि मानव और उसके परिवार वाले इससे पहले भी कई लड़कियों को धोखा देकर लूट चुके
हैं, बल्कि यहाँ तो खुद वाणी ने आगे बढ़कर अपने बैंक अकाउंट
की जानकारी मानव को दी थी, सबकुछ ख़त्म हो चुका था, मानव और उसके परिवार की तलाश पुलिस पहले से ही कर रही थी, लेकिन वो लोग आए दिन लड़कियों को धोखा देते, और कोई
उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता, क्या करते मज़बूरी के मारे अजय और
गरिमा अपनी बेटी वाणी को वापिस अपने घर ले आये, पैसा और ज़ेवर
गया उसका दुःख नहीं था, दुःख था तो बस इस बात का कि हमेशा
ख़ुश रहने वाली उनकी बेटी के चेहरे की मुस्कान चली गयी, अब वो
बस चुप-चुप सी ही रहा करती यह देख अजय को बहुत दुःख होता, उसे
तो पहले से ही मानव और उसके परिवार में कुछ गड़बड़ नज़र आ रही थी, लेकिन अब पछतावा हो रहा हैं कि काश उसने अपनी बेटी की ज़िद के आगे घुटने
नहीं टेके होते, लेकिन अब हो भी क्या सकता हैं जो बुरा होना
था वो तो हो गया, अब तो बस सारी बातें भुलाने में वाणी की
मदद कर उसे इस सदमे से बाहर निकालना ही महत्वपूर्ण था।
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