Mini (Story On Little Girl)
😢😢तुम क्यों चले गए छोड़ हमे दुनिया में अकेला
तुम बिन लगता हैं सूना-सूना सा दुनिया का
मेला 😢😢
"निर्मला, मिनी के स्कूल से आने का वक़्त होने वाला हैं, तुम
उसके लिए कुछ अच्छा सा नाश्ता बना दो", सुरभि की आवाज़
सुन निर्मला की आँखे नम हो गयी, पिछले दस साल से सुरभि के घर
काम करने वाली निर्मला पिछले दो सालों में अपने-आप को जितना बेबस महसूस कर रही थी,
उतना तो उसने ज़िन्दगी में कभी नहीं किया था।
दो साल पहले की ही तो बात हैं, जब उसने सुरभि की इकलौती बेटी मिनी
को स्कूल के लिए तैयार किया और सुरभि उसे स्कूल छोड़ने के लिए जा ही रही थी कि
अचानक से मिनी हाथ छुड़वा सड़क की ओर भाग गयी, लेकिन ना जाने
कहाँ से एक बेकाबू गाड़ी आयी और मिनी को कुचलते हुए निकल गयी, सबकुछ ख़त्म हो चुका था। यह दर्दनाक दृश्य देख सुरभि वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी, लेकिन जब होश
आया तो वो अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी, वो यह बात मानने
को तैयार ही नहीं थी कि उसकी तीन साल की बेटी मिनी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
दूसरी ओर निर्मला की मज़बूरी थी कि वो मिनी की मौत पर आँसू तक नहीं बहा सकती थी
क्योंकि डॉक्टर का कहना था कि घर का माहौल सुरभि के सामने ख़ुशनुमा रखा जाए यही
उसकी सेहत के लिए ठीक होगा।
अच्छे से याद हैं निर्मला को, सुरभि उसे मिनी की यशोदा माँ कहा
करती थी और कहे भी क्यों ना सिर्फ जन्म ही तो सुरभि ने दिया था मिनी का पालन-पोषण
तो निर्मला ने ही किया, अगर दो दिन के लिए भी सुरभि कही चली
जाती तो मिनी उसे याद तक नहीं करती और अगर निर्मला कही चली जाये तो रो-रोकर पूरा
घर सिर पर उठा लेती थी, आज वही यशोदा माँ मज़बूर थी, कई बार सोचती काम छोड़ मिनी की यादों से कही दूर चली जाए, लेकिन सुरभि का ख़्याल आते ही उसके क़दम रुक जाते। दूसरी ओर सुरभि का पति
ईशान भी अभी तक सदमे से बाहर नहीं आया था, पहले तो बेटी का
जाना, फिर पत्नी की ये हालत, हँसते-खेलते
घर को ना जाने किस की नज़र लग गयी थी।
"निर्मला, देखो बाहर लगता हैं मिनी की बस आ
गयी।" सुरभि के कहते ही, निर्मला बाहर की ओर दौड़ी और
कुछ देर वहीं अपना दिल हल्का करने बैठ गयी, पल-पल घुटती
निर्मला अपना दर्द भी किसी से ना कह पाती।
"यह मिनी भी ना बहुत शैतान हो गयी
हैं, देखो ना मेरे पास तो आती
ही नहीं हैं जब से स्कूल से आयी हैं बस निर्मला के पास ही हैं।" सुरभि को
ईशान से फ़ोन पर बातें करते हुए सुन निर्मला तुरंत अपने आँसू पोंछ सुरभि के सामने आ
गयी।
"निर्मला, कहाँ हैं मिनी ?"
"वो तो सो गयी, दरअसल बहुत थकी हुई थी ना इसलिए मैने
उसे खाना खिलाकर सुला दिया।"
"देखो निर्मला मैं तुमसे बहुत नाराज़
हूँ, तुम्हारी वजह से मेरी
बेटी मुझसे ही दूर हो रही हैं, देखो ना मेरे पास तो वो
बिल्कुल भी नहीं आती।"
"मैडम आप ही तो कहती हैं कि मैं
उसकी यशोदा माँ हूँ, फिर क्यों परेशान हो रही
हैं।"
"अच्छा ठीक हैं वो जब उठे तो उसे
मेरे पास लेकर आना।" सुरभि के जाने के बाद निर्मला के चेहरे पर फिर से उदासी
छा गयी, पिछले कुछ दिनों से ईशान
भी परेशान सा नज़र आ रहा था, वैसे तो उसने अपनेआप को मिनी के
जाने के बाद संभाल लिया था, लेकिन आजकल कुछ अजीब सा व्यवहार
हो गया था उसका, कहने को तो निर्मला उस घर में एक नौकरानी
हैं, लेकिन उसके लिए सुरभि और ईशान किसी अपने से कम नहीं हैं
और इसी वजह से निर्मला को रात-दिन उन दोनों की चिन्ता रहती हैं।
कुछ दिनों बाद, "साहब कुछ परेशानी हैं क्या?"
निर्मला के पूछते ही,
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं।" ईशान
ने निर्मला को टालते हुए कहा लेकिन ईशान के जवाब देने के तरीक़े से वो समझ गयी कि
जरूर कुछ ना कुछ बात हैं लेकिन वो किसी को बताना नहीं चाहता, निर्मला ने भी कुछ नहीं कहा क्योंकि
एक नौकरानी होने के नाते उसकी भी अपनी मर्यादा थी। इसी तरह से कुछ दिन और बीत गए
घर के माहौल में कोई बदलाव नहीं था। लेकिन एक दिन अचानक ईशान ने निर्मला को अपने
पास बुलाया।
"निर्मला,मैने एक फैसला किया हैं जिसके बारे
में तुम्हारा जानना बहुत ज़रुरी हैं।" ईशान के कहते ही,
"जी कहिए साहब"
"तुम्हे याद हैं कुछ दिन पहले तुमने
मुझसे पूछा था कि कोई परेशानी तो नहीं हैं, दरअसल उस वक़्त मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता था।
निर्मला, मैने एक बच्ची गोद लेने का फ़ैसला किया हैं, इस बारे में डॉक्टर साहब से भी बात हुई, वैसे यह
सुझाव उन्ही का हैं, उनका कहना हैं कि अगर सुरभि को सदमे से
बाहर निकालना हैं तो हमे यह क़दम उठाना ही होगा।"
"लेकिन साहब हमे कौन अपना बच्चा
देगा।"
"अनाथाश्रम, निर्मला हम अनाथाश्रम से बच्चा गोद
लेंगे, मैने सारी बात कर ली हैं, तुम
उसकी फ़िक्र मत करो हमे तो बस यह सोचना हैं कि उस बच्ची से मिल सुरभि की क्या
प्रतिक्रिया होगी, लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि सुरभि को
कतई पता नहीं लगे कि वो छोटी बच्ची हमारी मिनी नहीं हैं।" ईशान के कहते ही,
"लेकिन उस बच्ची को कैसे समझाएंगे
की उसे यहाँ मिनी बन कर रहना हैं।" निर्मला आश्चर्य से ईशान की ओर देखने लगी।
"अपनी किस्मत तो देखो निर्मला हक़ीक़त
में उस बच्ची का नाम मिनी ही हैं, ज़रूर कुछ अच्छा होने वाला हैं इसीलिए तो सब हमारा साथ दे रहे हैं।"
"जी, बिल्कुल आप बच्ची को लेकर आइए घर पर मैं सब संभाल
लूँगी।"
कुछ दिनों बाद ईशान उस छोटी सी बच्ची
मिनी को घर ले आया,
कुछ सहमी-सहमी सी वो इधर-उधर देखने लगी, निर्मला तुरन्त उसके पास गयी और उसे गोद में उठा लिया, और प्यार करने लगी, कही ना कही निर्मला को उसमे अपनी
मिनी की झलक नज़र आ रही थी।
"माँ के पास चलोगी ?"
"माँ
?"
"हाँ
माँ।" निर्मला उसे सुरभि के कमरे की ओर ले गयी,
"देखिए
मैडम कौन आया हैं, मिनी बिटिया अपनी माँ से
मिलने आई हैं"
"मिनी?"
"जी हाँ मिनी, आपकी मिनी, ये
लीजिए और जी भर कर लाड लड़ा लीजिए अपनी बेटी से, फिर शिकायत
मत कीजिएगा कि मैने आपकी बेटी को आपसे दूर कर दिया।" जैसे ही निर्मला ने मिनी
को सुरभि की गोद में बैठाया वो बच्ची को बेतहाशा प्यार करते हुए फूट-फूट कर रोने
लगी, अपनी बेटी मिनी के जाने के बाद आज पहली बार सुरभि रोई
थी, शायद आज वो पूरी तरह से सदमे से बाहर आ चुकी थी, उसने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि उसकी मिनी अब इस दुनिया में नहीं
हैं और अब यही मिनी उसके लिए सबकुछ हैं।
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