Bahu Ki Samjhdaari (Story On Family)


बेवजह तुम अपनों से करो ना तकरार

मुश्किल से मिलता हैं अपनों का प्यार

 

 अभी धरमसिंह का देहान्त हुए एक महीना भी नहीं बीता हैं कि घर में ज़मीन के बँटवारे को लेकर झगड़े शुरु हो गए हैं, एक-दूसरे को अपनी जान से भी ज्यादा चाहने वाले धरमसिंह के बेटे कुशल और दर्शन अब एक-दूसरे के दुश्मन हो चुके हैं। इस झगड़े के चलते दोनों ने इतना भी नहीं सोचा कि उनकी माँ पर क्या बीतेगी, वैसे तो धरमसिंह ने वसीयत में अपनी पूरी ज़मीन ज़ायदाद का मालिक अपनी पत्नी गायत्री को घोषित किया हुआ हैं, लेकिन इस बात की दोनों भाईयों के लिए कोई अहमियत नहीं हैं, उन्हें तो बस अपने हिस्से से मतलब हैं।

"अरे कुछ तो शर्म करो तुम दोनों, मुझे कुछ नहीं चाहिए, सबकुछ तुम दोनों ही ले लो बस ये जानवरों की तरह से लड़ना बंद करो।"

"माँ तुम बीच में मत बोलो, यह सारी गलती पिताजी की हैं कि उन्होंने सबकुछ तुम्हारे नाम कर दिया, अब इस ज़मीन पर अपना हक़ जताने के लिए ना जाने कितना वक़्त और लगेगा।" कुशल के कहते ही,

"क्या, क्या कहा तूने, तुझे मेरे मरने का इंतज़ार हैं कुशल?"

"माँ तुम गलत समझ रही हो।"

"माँ जो भी समझ रही हैं सही हैं, मैने सोचा भी नहीं था कि मेरा भाई इतना लालची होगा।" इतने में ही दर्शन बीच में बोल पडा।

"आप तो चुप ही रहिए भैया, ज़मीन पर नज़र तो आपकी भी हैं।"

"हाँ हैं, लेकिन मैं तेरी तरह से माँ का बुरा नहीं सोच रहा हूँ।"

"गजब करते हैं आप दोनों भाई भी, माँ को क्यों बीच में घसीट रहे हैं, माँ का क्या हैं, वो तो थोड़े से प्यार, इज़्ज़त और अपनेपन में ही खुश हैं, आज नहीं तो कल यह सब आप दोनों का ही होने वाला हैं, क्यों माँ मैने सही कहा ना?" इतने में ही दोनों भाईयों की बातचीत में दर्शन की पत्नी साधना ने दखलंदाज़ी की।

"तुम लोगो की जो इच्छा हो वो करो मुझे तो बस एक कोने में जगह दे देना गुज़ारा कर लूँगी, इस वक़्त तुम्हारे पिताजी अगर तम्हारी बातें सुन रहे होंगे तो मैं समझ सकती हूँ कि कितना दुःखी हो रहे होंगे।"

"आइए माँजी, आप आराम कीजिए, सब सही हो जाएगा।" साधना गायत्री को सहारा देते हुए उसके कमरें मे ले जाने लगी लेकिन गायत्री साधना का हाथ झटक खुद ही अपने कमरे में चली गयी और धरमसिंह की तस्वीर के सामने बैठ फूट-फूटकर रोने लगी।

"दर्शन, आप समझते क्यों नहीं हैं जो मसला आसानी से हल हो सकता हैं उसके लिए इतना झगड़ा क्यों।"

"मैं कुछ समझा नहीं साधना...!"

"अरे भई, हम दोनों मिलकर माँजी की जी जान से सेवा करेंगे, फिर देखना वो हमसे खुश होकर सारी जायदाद हमारे नाम कर देंगी।"

"तुम समझती क्यों नहीं हो इस बीच में अगर कुशल ने कोई चाल चल दी तो हम क्या करेंगे।"

"यह भी तो हो सकता हैं कुशल भैया और सुनीता(कुशल की पत्नी) भी माँजी की सेवा वाली बात सोच रहे हो, मुझे लगता हैं आप दोनों भाइयों को एक होकर रहना चाहिए, जिससे की उनके दिमाग में क्या चल रहा हैं हमे पता रहे और हमारी कोशिश यह रहनी चाहिए कि माँजी की खूब सेवा करे, दर्शन अगर कोई बात शांति से संभल सकती हैं तो उसके लिए लड़ाई-झगड़े क्यों करने, वैसे भी आप दोनों भाईयों के झगड़े से माँजी को दुःख ही होगा, और कही गुस्से में आकर उन्होंने अपनी पूरी जायदाद कही दान कर दी तो दोनों ही हाथ मलते रह जाओगे।"

"तुम बिल्कुल सही कह रही हो सुनीता, मैं अभी कुशल से बात करता हूँ, लेकिन हम माँ की ज्यादा सेवा करके जायदाद अपने नाम करवाना चाहते हैं यह बात उन दोनों को पता नहीं चलनी चाहिए।"

“आप बेफिक्र रहिये, बिल्कुल पता नहीं चलेगी।“ साधना की समझदारी रंग लाई, अब गायत्री की खूब सेवा होने लगी इतना ही नहीं बल्कि पूरा परिवार एकता के साथ रहने लगा, उसका मकसद तो सिर्फ इतना था कि पूरा परिवार एक होकर रहे और जमीन-जायदाद की बात किसी के दिमाग में भी ना हो लेकिन साधना को दुःख था तो बस इस बात का कि उसे दोनों भाईयों के बीच होने वाले झगड़े को मिटाने के लिए जायदाद का ही लालच देना पड़ा। धीरे-धीरे करके साधना ने अपनी देवरानी सुनीता को भी सभी बातों से अवगत करवा दिया, और दोनों ही बहुओं की समझदारी से परिवार के सभी सदस्य खुश रहने लगे, हालात यह हो गए कि ज़मीन-जायदाद वाली बात तो अब किसी के दिमाग में ही नहीं थी और यही तो साधना चाहती थी।

"दीदी आपकी कोशिशें रंग लाई, देखिए ना दोनों भाई पूरी तरह से एकता के सूत्र में बंध चुके हैं, अब तो ज़मीन-जायदाद को लेकर कोई भी बात नहीं होती हैं"

"हाँ सुनीता, मैं भी यही चाहती थी कि जायदाद को लेकर हमारे परिवार में कोई दरार ना आए, लेकिन दुःख हैं तो बस इस बात का कि मुझे इन दोनों को करीब लाने के लिए जमीन-जायदाद का ही लालच देना पड़ा।"

"साधना बहू, मैने तो सोचा भी नहीं था कि मेरी बहू इतनी समझदार हैं, आज उसकी वजह से मेरे दोनों बेटों के परिवार एकता के सूत्र में बँधे हुए हैं, भगवान ऐसी बहू हर घर में दे।"

"माँजी आप यहाँ"

"एक कप चाय की तलब लगी थी तो सोचा आकर बना लूँ।“

"लेकिन माँजी आपने क्यों तक़लीफ़ की मुझे बुला लिया होता" सुनिता के कहते ही,

"अगर तुम्हे बुला लेती तो मुझे अपनी साधना बहु का देवी जैसा रूप कैसे दिखाई देता।"

"माँजी आप तो कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ कर रही हैं, इसकी हक़दार मैं अकेली नहीं बल्कि सुनीता भी हैं, अगर इसने साथ नहीं दिया होता तो कुछ भी संभव नहीं था।"

"दीदी, लेकिन यह बात दिमाग में तो आपके ही आयी थी ना।"

"कहते हैं बहु के आते ही परिवार में फूट पड़ जाती हैं बेटा माँ का नहीं रहता बल्कि अपनी बीवी का गुलाम हो जाता है जिसका फ़ायदा बहुएँ खूब उठाती हैं, लेकिन मेरी बहुएँ तो घर की लक्ष्मी हैं, बस अब तो एक ही इच्छा हैं ऊपरवाले से।"

"वो क्या मांजी ?"

"मेरे हर जन्म में भगवान तुम दोनों को ही मेरी बहू बना कर भेजे।" ऐसा कहते ही गायत्री ने अपनी दोनों बहुओं को गले लगा लिया।

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

O.T.P. / ओ. टी. पी. (Story On Cyber Crime)

Galat Kaun Saas Ya Bahu ? / गलत कौन सास या बहु ? (Story On Society )

Premi Sang Katl / प्रेमी संग कत्ल ( Story On Murder)