ladki Hui Hai (Story On Family)


अनोखी-सी ना जाने किसने हैं ये रीत बनाई

बेटी की पीर समझ आई बहु की ना आई

 

यह बात लगभग तीस साल पुरानी हैं, मध्य-प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाले निहाल सिंह के घर में उस वक़्त मातम छा गया, जब नर्स ने लेबर-रूम से बाहर निकल निहाल सिंह की बड़ी बहु के बेटी पैदा होने की बात कही। "हे राम मेरी तो मति ही मारी गयी थी जो अपने बेटे की शादी इस मनहूस के संग की, मैं तो इंतज़ार कर रही थी कि मेरा पोता आएगा, जी भर कर लाड लड़ाऊँगी उसके संग, आखिरकार हमारे ख़ानदान का वारिस होगा वो, लेकिन मेरी तो क़िस्मत ही ख़राब हैं।"

"धीरज से काम लो होनी को कौन टाल सकता हैं, इस बार लड़की हुई तो क्या अगला लड़का ही होगा।" निहाल सिंह ने उदास होते हुए कहा। 

"वो सब तो ठीक हैं जी, इस पीढ़ी की पहली लड़की हुई हैं, अपशगुन तो हो ही गया ना “

"बस करो माँ, इंसानियत के नाते कम से कम एक बार तो अपनी बहु की ख़ैरियत पूछ लो" "अरे क्या ख़ैरियत पूछू उसकी, वो तो अच्छी ही होगी पूरे सात महीने  तक खूब काजू,बादाम खिलाए हैं उसे, इतनी ही चिन्ता हो रही हैं तो तू ही ख़ैर-ख़बर ले अपनी बीवी की"

"मैं तो लूँगा ही माँ अपनी बीवी की भी और अपनी बेटी की भी लेकिन एक बार तुम मुस्कुरा कर अपनी पोती को गोद में उठा लेती तो सुजाता खुश हो जाती।"

"अगर वो पोता पैदा करके देती तो ज़रूर गोदी में उठाती, और चिल्ला-चिल्ला कर पूरे मौहल्ले में उसके आने की खबर देती, लेकिन मेरी ऐसी किस्मत कहाँ" अपनी माँ की बात अनसुनी कर गोविन्द अपनी पत्नी सुजाता और अपनी नवजात बेटी से मिलने जनरल वार्ड में चला गया।

"माँजी नज़र नहीं आ रही हैं।" 

"दरअसल वो बहुत थक गई थी सो मैने ही थोड़ी देर पहले घर वापिस भेज दिया"

"मैं जानती हूँ मांजी मुझसे नाराज़ हैं वो पोता चाहती थी और पोती हो गई।"

"सुजाता तुम ज्यादा मत सोचो, तुम तो बस अपना और बच्ची का ध्यान रखो, माँ की नाराज़गी भी जल्द ही दूर हो जाएगी।"

"भगवान करे ऐसा ही हो" सुजाता ने उदास होते हुए कहा, "आप बहुत थक गए होंगे घर जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए।"

"नहीं, नहीं बस थोड़ी सी थकान हैं।"

"आप घर जाइए मैं ठीक हूँ।"

"अरे भई जैसे ही मैने अपनी बेटी को देखा सारी थकान छू-मंतर हो गयी।" गोविन्द ने अपनी बेटी को गोद में उठाते हुए कहा,

"बस दो-तीन दिन की बात हैं उसके बाद तो हम दोनों घर आ जाएंगे फिर जी भर कर लाड लड़ाना आप इसके साथ" बच्ची के लिए गोविन्द का प्यार देख सुजाता के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी। और वो इस बात से संतुष्ट भी थी कि उसका पति उसके साथ हैं, अस्पताल के दो दिन भी ऐसे ही गुज़र गए, लेकिन सुजाता की सास गायत्री एक बार भी अस्पताल में ख़ैर-ख़बर पूछने नहीं आई।

दो दिन बाद अस्पताल से घर पहुँचकर, "माँजी देखिए, आपकी पोती आशीर्वाद दीजिए इसे" "दूर हटा इसको मेरी नज़रों से नहीं देखनी मुझे इसकी सूरत"

"बस करो माँ बहुत हो गया, हद होती हैं हर बात की आशीर्वाद नहीं देना हैं तो मत दो, कम से कम नफ़रत तो मत करो इस नन्ही सी जान से" पीछे खड़े गोविन्द ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा, गायत्री भी बिना कुछ बोले पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गयी, घर का माहौल तनावपूर्ण हो चुका था और इसी तनाव को कम करने की गोविन्द ने एक छोटी सी कोशिश की, "अरे भई, कोई कुछ भी कहे लेकिन सिमरन बेटी तो अपने पापा की जान हैं।"

"सिमरन, अब यह सिमरन कौन हैं ?" सुजाता के पूछते ही,

"हमारी बेटी और कौन, मैने इसका नाम रखा हैं सिमरन और उम्मीद करता हूँ तुम्हे भी अच्छा ही लगा होगा।"

"पापा ने रखा हैं तो अच्छा ही होगा, क्यों सिमरन ठीक कहा ना मम्मा ने ?" सुजाता ने सिमरन को प्यार करते हुए कहा। लेकिन घर का तनाव कम ना हो सका, यही तनाव एक दो दिन नहीं बल्कि कई महीनों तक चला क्योकि सुजाता और गायत्री में अब रोज़ किसी ना किसी बात पर कहासुनी हो जाती।

छ: महीने बाद, "सुजाता मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी।"

"जी माँजी, कहिए"

"सिमरन अब बड़ी हो रही हैं मुझे लगता हैं कि तुम्हे अब दूसरे बच्चे के बारे में सोचना चाहिए।" "यह आप कैसी बात कर रही हैं माँजी, हमे अभी सिमरन की परवरिश पर ध्यान देना चाहिए और दूसरे बच्चे के बारे में तो हम अगले तीन-चार साल तक सोचना भी नहीं चाहते।"

"अरे तुम दोनों समझते क्यों नहीं हो, मेरी बहुत इच्छा हैं कि मरने से पहले एक बार पोते का मुँह देख लूँ"

"माँजी लड़का, लड़की में कोई अन्तर नहीं और सिमरन भी तो आप ही की पोती हैं।"

"ज़ुबान चलाती हैं तू मेरे साथ, आने दे ऑफिस से मेरे बेटे को वो ही समझेगा मेरी बात" पोते के लिए बेचैन गायत्री पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई, और सुजाता उसका यह रवैया देख परेशान हो गयी।

शाम को गोविन्द के घर वापिस आने पर गायत्री ने अपने मन की बात कही तो उसने भी नकार दिया जिसे वो सहन नहीं कर पाई, और उसने सुजाता और गोविन्द के संग बातचीत करनी पूरी तरह से बंद कर दी। वक़्त के साथ सब सही हो जाएगा इसी उम्मीद में सुजाता और गोविन्द के दिन गुज़र रहे थे, लेकिन यहाँ तो गायत्री का व्यवहार पहले से भी ज्यादा ख़राब हो गया था। इस बात का पता जब चला तब एक दिन साल भर की सिमरन अचानक से सीढ़ियों से गायत्री के पैरो के पास जा गिरी, लेकिन वहीं सीढ़ियों के पास बैठी हुई गायत्री टस से मस भी नहीं हुए, सिमरन बुरी तरह से रो रही थी, उसकी आवाज़ सुन जब सुजाता दौड़ कर आई तो उसके सिर से खून बह रहा था और पास ही बैठी गायत्री अख़बार पढ़ने में तल्लीन थी, यह नज़ारा देख सुजाता गुस्से से आग-बबूला हो गयी और गायत्री का यह व्यवहार उसकी बर्दाश्त के बाहर था, "माँजी, आप इतनी बेरहम हो सकती हो यह तो मैने सोचा भी नहीं था, आज तो आपने हद ही कर दी" ऐसा कह बिना गायत्री की ओर देखे सुजाता सिमरन को ले अस्पताल की ओर भागी, जहाँ बाद में गोविन्द भी पहुँच गया, मामूली सी चोट थी डॉक्टर ने सिर पर टाँके लगाए और दवाई देकर वापिस भेज दिया।

"गोविन्द मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं।"

"सुजाता तुम्हे जो कहना हैं कहो इज़ाज़त लेने की कोई ज़रुरत नहीं हैं।"

"मैं चाहती हूँ कि अब हम अलग घर लेकर रहे।"

"यह तुम क्या कह रही हो, अगर हम यहाँ से चले गए तो माँ और पिताजी की देखभाल कौन करेगा?"

"यही बात सोचकर मैं अभी तक चुप थी, लेकिन आज बात बर्दाश्त के बाहर हो गयी।" और सुजाता ने गायत्री वाली बात गोविन्द को बता दी, जिसे सुन गोविन्द को भी बहुत गुस्सा आया, "गोविन्द मैं मानती हूँ कि वो जैसी भी हैं हमारी माँ हैं, लेकिन आज जो कुछ भी उन्होंने किया मैं सहन नहीं कर सकती आख़िरकार मैं भी सिमरन की माँ हूँ।" गोविन्द अजीब कशमकश में फँस चुका था, वो ना तो अपने माँ और पिताजी को छोड़ना चाहता था और ना ही सुजाता व सिमरन को, वो तो बस यही समझता रहा कि एक ना एक दिन गायत्री के दिल में सिमरन के लिए प्यार ज़रुर जागेगा, लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा हो गया।

"सुजाता हम इस बारे में बाद में बात करते हैं, अभी तुम मेरे लिए एक कप चाय बना लाओ बहुत थकान हो रही हैं।" गोविन्द ने सुजाता को तो भेज दिया लेकिन खुद गहरी सोच में डूब गया।

कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए घर पर इस बारे में कोई बात नहीं हुई, लेकिन एक दिन अचानक, "माँ, माँ"

"गरिमा तू यहाँ क्या हुआ बेटा तू रो क्यों रही हैं, और दामाद जी वो कहाँ हैं, साथ नहीं आए क्या, गायत्री ने अचानक आ गयी अपनी बेटी से पूछा।

"माँ मैने वो घर अब छोड़ दिया हैं।"

"मैं कुछ समझी नहीं"

"माँ मेरी सास रोज-रोज लड़की होने पर ताने देती हैं, नेहा पूरे पाँच साल की हो चुकी हैं लेकिन मेरी सास आज भी उससे नफ़रत करती हैं, बहुत बर्दाश्त कर लिया अब नहीं कर सकती, इसलिए अब मैं हमेशा के लिए तुम्हारे पास आ गयी हूँ।"

"लेकिन तू अपनी सास को समझाती क्यों नहीं कि आजकल लड़का और लड़की में कोई फ़र्क नहीं"

"यह बात तुम क्यों नहीं समझती माँ, क्यों सिमरन से नफरत करती हो, भेदभाव वाली बात तुम्हारी बेटी के साथ हुई तो लड़का-लड़की में कोई भेदभाव नहीं हैं और बहु के लिए भेदभाव हैं, क्यों माँ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों कर रही हो।"

"इसका मतलब तेरे भाई-भाभी ने तुझसे मेरी शिकायत की हैं।"

"नहीं माँ ऐसी कोई बात नहीं हैं बस तुम अब सिमरन से नफ़रत करना बंद कर दो कहीं ऐसा ना हो अपने व्यवहार की वजह से तुम अपना बेटा भी खो दो।" गरिमा की बातों ने गायत्री की आँखे खोल दी जो काम गोविन्द और सुजाता पिछले एक साल से नहीं कर पा रहे थे वो गरिमा ने कुछ ही वक़्त में कर दिया था। गायत्री उठ कर जाने लगी "कहाँ चली माँ?" गरिमा ने गायत्री से पूछा,

"अपनी पोती के पास आज मैं उससे खूब लाड लड़ाऊँगी, पिछले एक साल की कसर जो पूरी करनी हैं।" गायत्री के मुँह से ऐसा सुन दरवाज़े के पीछे खड़ी सुजाता के आँखों से आँसू झलक गए और गोविन्द भी हाथ जोड़ मन ही मन गरिमा का धन्यवाद् कर रहा था।

  

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