Bahate Aansu (A Heart Touching Story)
😢😢 ना जाने किन
गुनाहों की सजा मिली हैं मुझे ये
अक्सर अपनों को याद
कर आँसू बहाता हूँ मैं😢😢
पैंतालिस वर्षीय रुपेश अपने घर
की बालकनी में बैठा वहाँ लगे गमलों में रंग- बिरंगे फूलों को निहार ही रहा था कि
अचानक से एक छोटी सी बच्ची आकर उसके पैरों से लिपट गई, "नानू,
नानू मुझे एक फूल तोड़कर दो ना "
"नहीं बेटा फूल तोडना गलत
बात होती हैं, वो
तो गमलों में ही अच्छे लगते हैं।"
"प्लीज नानू, प्लीज"
"तान्या क्यों परेशान कर
रही हो नानू को?"
"ममा नानू
मुझे फूल नहीं दे रहे।"
"बेटा वो सही तो कह रहे
हैं ना कि फूल गमले में ही अच्छे लगते हैं। अच्छा चलो अब अन्दर चलकर दूध पी लो, मैं अपने लिए
चाय बना रही हूँ बाबा आप भी लेंगें चाय?"
"बिल्कुल
लूँगा, और आज तो मौसम भी अच्छा हैं, चाय
के साथ गरमागरम पकौड़े भी मिल जाते तो मज़ा आ जाता" रुपेश ने मुस्कुराते हुए
कहा।
"आप भी ना
बाबा, दिन पर दिन चटोरे होते जा रहे हैं, सादा खाना तो जैसे आपको भाता ही नहीं हैं।"
"अब तुम्हे जो समझना हैं
समझो लेकिन मैं तो आज अपनी बिटिया के हाथ से बने पकौड़े ज़रूर खाऊँगा।"
"जो हुकुम मेरे आका"
और वो तान्या को गोद में उठाए मुस्कुराते हुए रुपेश के लिए पकौड़े बनाने अन्दर चली
गई।
बाहर बारिश शुरु हो चुकी थी और
घर की बालकनी में बैठा रुपेश पकौड़ो का मज़ा ले रहा था, कि वहाँ तान्या
दौड़ती हुई आई और अचानक से फ़िसल कर गिर गई और रोने लगी। "अरे, अरे यह क्या हुआ तान्या का तो एक्सीडेंट हो
गया" एक्सीडेंट शब्द सुन रुपेश के चेहरे पर उदासी आ गयी जिसे उसने बिल्कुल भी
ज़ाहिर नहीं होने दिया।
"बाबा पकौड़े
और लाऊँ आपके लिए?"
"नहीं अब और
नहीं" रुपेश की आँखों के सामने अब उसका अतीत घूमने लगा था, बात उस वक़्त की हैं जब उन्नीस वर्षीय रुपेश कॉलेज में पढ़ता था। प्रोफेसर
शर्मा की क्लॉस चल रही थी, सभी लड़के-लड़कियाँ पूरी एकाग्रता
के साथ उनका लेक्चर सुन रहे थे, लेकिन रुपेश, उसका ध्यान तो कही ओर ही था, बी.ए. प्रथम वर्ष में
पढ़ने वाले रुपेश के पाँव आज ज़मीन पर ही नहीं टिक रहे थे, और
टिके भी क्यों, आखिरकार आज पूरे छ: साल बाद उसकी बड़ी बहन
शालिनी अपने परिवार के साथ लंदन से जो आ रही थी।छ:साल पहले शालिनी की शादी लंदन
में रहने वाले भारतीय निवासी शेखर के साथ तय हुई थी, शेखर
रुपेश के पिता जगदीश के दोस्त का बेटा हैं, इसीलिए बिना किसी
औपचारिकताओं के जल्द ही शादी तय कर दी गयी, लंदन में शेखर एक
मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करता हैं, और शालिनी भी वहाँ किसी
निजी कम्पनी में कार्यरत हैं। अब तो उन दोनों की एक तीन वर्षीय बेटी भी हैं,
ख़ुशी, सच पूछा जाए तो रुपेश को अपनी बहन और
जीजा से मिलने की इतनी उत्सुकता नहीं थी जितनी की ख़ुशी से मिलने की, क्योंकि रुपेश मामा अपनी भांजी से पहली बार जो मिल रहे थे, इससे पहले तो उसे केवल तस्वीरों में ही देखा था, रुपेश
ने तो बाजार से कई तरह के खिलौने भी ला कर रखे हुए थे ख़ुशी के लिए, और कपडे उनका तो शायद बस चलता तो पूरा बाज़ार ही ख़रीद लाता।
"रुपेश कहाँ
ध्यान हैं तुम्हारा?" प्रोफेसर शर्मा की आवाज़ सुन अचानक
से रुपेश ख़यालों की दुनिया से बाहर आया।
"जी सर वो,
वो मैं"
"यह क्या मैं, मैं लगा रखी
हैं, बाहर निकल जाओ इसी वक़्त मेरी क्लास से"
"माफ़ कर दीजिए सर आगे से
ध्यान रखूँगा।"
"ठीक हैं अब तुम पढ़ाई पर
ध्यान दो" क्लास ख़त्म होने में अभी भी पन्द्रह मिनट बाकी थे, और यह वक़्त
निकालना रुपेश के लिए बहुत ही मुश्किल था, लेकिन कर भी क्या
सकता था। शाम को घर पहुँचते ही, "माँ जल्दी से कुछ खाने
को दे दो, मुझे दीदी और जीजाजी को लेने हवाई अड्डे जाना हैं।"
"उन लोगो का विमान तो रात
दस बजे तक आएगा, तू
अभी से वहाँ जाकर क्या करेगा….!" "तुम कुछ नहीं
समझती हो माँ, देखो ना आजकल कितना ट्रैफिक रहता हैं, पहुँचने में ज़रा भी देर हुई तो उनको लगेगा कि तुम्हे उनके आने से ख़ुशी
नहीं हुई हैं।"
"मुझे ख़ुशी नहीं हुई हैं, मैं कुछ समझी
नहीं.....!"
"अरे माँ जब
दीदी देर से आने का कारण पूछेगी तो मैं कहूँगा ना कि माँ ने आने में देर करवाई हैं।"
"बदमाश, अभी तो तेरी
बहन आयी भी नहीं जिसमे तेरा यह हाल हैं, जब आ जाएगी तो दोनों
भाई-बहन मिलकर ना जाने मेरा क्या हाल करोगे।" इन्ही खट्टी-मीठी बातों के बीच
वो वक़्त भी आ गया जब रुपेश अपनी माँ और पिताजी के साथ हवाई-अड्डे पर दीदी और
जीजाजी का इंतज़ार कर रहा था।
"लगता हैं
फ्लाइट देर से आएगी"
"माँ अंतर्राष्ट्रीय उड़ान
हैं, थोड़ी
बहुत तो देर हो ही सकती हैं।" लगभग बीस पच्चीस मिनिट इंतज़ार करने के बाद,
"लो आ गई
मेरी दीदी" और रुपेश दौड़ कर अपनी दीदी के गले से जा लगा।
"अरे साले
साहब हम भी आए हैं, हम से भी मिल लीजिए" रुपेश ने अपने
जीजाजी को प्रणाम कर ख़ुशी को गोद में उठा लिया, सारी
औपचारिकताओ के बाद,
"रात बहुत
हो रही हैं, मुझे लगता हैं अब घर चलना चाहिए।" जगदीश के
कहते ही,
"पापा सामान
बहुत ज्यादा हैं, मुझे लगता हैं दो टैक्सी करनी पड़ेंगी।"
शालिनी के कहते ही,
"हाँ तो ठीक हैं ना मैं और
ख़ुशी सामान के साथ एक टैक्सी में आते हैं और आप सब दूसरी टैक्सी में आ जाओ"
"लेकिन ख़ुशी तुझे परेशान
कर देगी।"
"दीदी, ख़बरदार जो आपने
मेरी ख़ुशी के बारे में कुछ भी कहा तो"
"अच्छा बाबा ठीक हैं, जाओ तुम दोनों
एक टैक्सी में" अभी सब लोग हवाई अड्डे से निकले ही थे कि कुछ दूर पहुँचते ही
एक ज़बरदस्त धमाका हुआ, जिस टैक्सी में शालिनी अपने पति और
मम्मी-पापा के साथ बैठी थी उसका एक्सीडेंट हो गया था, सामने
से आते हुए एक बेकाबू ट्रक ने टक्कर मार दी थी, पीछे वाली
गाड़ी में रुपेश और ख़ुशी थे, जब तक वो कुछ समझ पाता सबकुछ
ख़त्म हो चुका था, टक्कर इतनी भयंकर थी कि उस गाड़ी में बैठे
सभी लोगो की दुर्घटनास्थल पर ही मौत हो गयी और सब कुछ खत्म हो गया।
अस्पताल में, "माँ,
पापा , दीदी" रुपेश को बड़बड़ाता हुआ सुन,
"डॉक्टर,
डॉक्टर लगता हैं मरीज़ को होश आ रहा हैं।" नर्स ने डॉक्टर को
आवाज़ लगाई, डॉक्टर के आते ही, "डॉक्टर
साहब मेरे परिवार वाले ठीक तो हैं ना, क्या मैं उनसे मिल
सकता हूँ?"
"रुपेश तुम
आराम करो तुम्हे आराम की ज़रुरत हैं।"
"नहीं मैं ठीक हूँ, कही आप मुझसे
कुछ झुपा तो नहीं रहें हैं, और खुशी मेरी भांजी वो कहाँ हैं?,
वो तो मेरी ही गाड़ी में थी।"
"वो ठीक हैं, लेकिन"
"लेकिन, लेकिन क्या,
आप कुछ बोलते क्यों नहीं ?"
"माफ़ कीजिए
रुपेश जी हम परिवार के दूसरे सदस्यों को नहीं बचा पाए।" डॉक्टर ने अफ़सोस
जताते हुए कहा।
"नहीं बचा
पाए, आप कहना क्या चाहते हैं, आप का
दिमाग तो ठिकाने पर हैं, आप को पता हैं आज पूरे छ:साल बाद
मेरी दीदी अपने परिवार के साथ आई हैं, घर में सब बहुत ख़ुश
हैं, मेरी भांजी खुशी वो तो पहली बार भारत आई हैं, माँ, पापा सब बहुत ख़ुश हैं।" रुपेश की मानसिक
स्थिति बिगड़ते देख डॉक्टर ने तुरन्त ही नर्स को उसे नींद का इंजेक्शन देने का आदेश
दिया और कुछ देर बाद ही वो गहरी नींद सो गया।
लगभग एक महीने बाद, "ख़ुशी,
ख़ुशी बेटा मामा को परेशान मत करो जल्दी से कुछ खा लो, नहीं तो मामा आपसे बात नहीं करेंगे।"
"मुझे मम्मा के पास जाना
हैं, आप
क्यों नहीं लेकर चलते, कहाँ हैं वो, बोलो
ना मामा कहाँ हैं मेरे मम्मी- पापा?" रुपेश ने ख़ुशी को
गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगा, ऐसा लगभग रोज ही होता
लेकिन नन्ही सी ख़ुशी कुछ भी नहीं समझ पाती, वो तो बस एक ही
बात की रट लगाए हुए थी कि पापा-मम्मी कहाँ हैं, रुपेश के लिए
ख़ुशी को संभाल पाना मुश्किल हो रहा था, फिर भी उसने हिम्मत
नहीं हारी, उसने खुशी के लिए अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छोड़
दी, जमा पूंजी से कुछ वक्त तक तो खर्च चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे पैसे की कमी अखरने लगी, बेचारा
रुपेश करता भी तो क्या इतना पढ़ा-लिखा भी तो नहीं था कि कही कोई अच्छी नौकरी मिल
जाती, आखिरकार हार कर उसने एक छोटे से होटल में वेटर की
नौकरी कर ली । इसके लिए उसे खुशी को अधिकतर समय अपने पड़ोसी के यहाँ छोडना पड़ता क्योंकि रिश्तेदारों ने तो बुरा
वक्त आते ही मुँह मोड़ लिया था, ना जाने कितनी ही मुश्किलों
का सामना करना पड़ा था रुपेश को खुशी की परवरिश करने में, गुजरते
वक्त के साथ वो कब खुशी के मामा से उसका बाबा बन गया वो स्वयं भी नहीं जान सका ।
रुपेश की जिंदगी में अब सबकुछ
बहुत बदल गया हैं, खुशी
पढ़-लिख कर एक काबिल डाक्टर बन चुकी हैं, और उसकी शादी उसी
के साथ काम करने वाले एक होनहार डाक्टर रितेश के साथ हो चुकी हैं, अब तो उनके एक चार वर्षीय बेटी तान्या भी हैं। रुपेश की जिम्मेदारी तो अब
पूरी हो चुकी हैं, लेकिन खुशी आज तक उसके लिए उसकी छोटी-सी
गुड़िया ही हैं, और खुशी उसके लिए तो जैसे रुपेश भगवान से कम
नहीं हैं।
"बाबा किन
खयालो में खो गए, मैं कितनी देर से आवाज लगा रही हूँ आप जवाब
क्यों नहीं दे रहें हैं?"
"नहीं,
नहीं कुछ नहीं मैं तो बस ऐसे ही कुछ सोचने लगा था, तुम्हें कुछ काम था?"
"आज फिर
अतीत में खो गए बाबा?" खुशी ने रुपेश के पास बैठ उसका
हाथ पकड़कर पूछा, जवाब में सिर्फ रुपेश की आँखों से आँसू बह
रहे थे और खुशी का भी तो अपने आँसुओ पर कोई काबू नहीं था, लेकिन
यह नजारा तान्या के लिए अब नया नहीं है।
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