Masoom Ki Chikhe (Story On A Girl)
ज़ालिम थे वो लोग
जिन्होंने दर्द हैं दिया
लेकिन अपनों ने
क्यों नाइंसाफी को हैं किया
पिछले दो दिनों से
मेरे पड़ोसी गुप्ता जी के यहाँ लोगों का आना-जाना लगा हुआ था, अभी तक पुलिस
भी कई बार आ चुकी थी, चार दिन पहले गुप्ता जी की बारह वर्षीय
बेटी रूही कही गायब हो गई, जिसका अभी तक कुछ पता नहीं चल
पाया हैं। घरवालों का कहना हैं कि रूही चार दिन पहले स्कूल बस से स्कूल के लिए
निकली थी, लेकिन स्कूल वालों का कहना हैं कि वो तो स्कूल
पहुँची ही नहीं, जब बस के ड्राइवर से पूछा गया तो उसने सभी
बच्चो के साथ स्कूल के बाहर छोड़ने की बात कही, पुलिस के
द्व्रारा बस के बाकी बच्चो से पूछताछ की गयी तो उन्होंने भी बस ड्राइवर वाली बात
पर सहमति जताई, जब रूही स्कूल तक पहुँच ही गयी थी तो अचानक
से गायब कहाँ हो गयी?, यह सवाल सभी को परेशान कर रहा था।
रूही की माँ निशा
का तो जिसमे रो-रोकर बुरा हाल था, वैसे तो गुप्ता जी के लगभग सभी नज़दीकी रिश्तेदार
वहाँ मौजूद थे, लेकिन पड़ोसी होने के नाते और निशा भाभी की
अच्छी दोस्त होने की वजह से मेरी पत्नी तारा ही सब कुछ संभाल रही थी, क्योंकि वहाँ आए हुए ज्यादातर रिश्तेदार तो इधर-उधर की बेफ़िजूल बातें कर
गुप्ता जी के परिवार को डरा ही रहे थे।
"अतुल आप थक
गए होंगे घर जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए।" अचानक से तारा की आवाज़ सुन मैं चौंक
गया।
"नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं मैं ठीक हूँ,
तुम चाहो तो घर जाकर थोड़ी देर आराम कर लो"
"रात बहुत हो
गयी हैं, मेरी
मानो तो तुम दोनों ही घर चले जाओ कोई भी ज़रुरत होगी तो मैं बुलवा लूँगा।" मेरी
और तारा की बातें सुन गुप्ता जी भी वहाँ आ गए थे, और
उन्होंने ज़बरदस्ती हम दोनों को घर भेज दिया।
"आपको क्या
लगता हैं, कहाँ
चली गयी होगी रूही?"
"कुछ नहीं कह सकते, कुछ भी कहना मुश्किल हैं, सच पूछो तो मेरा दिमाग़ ही काम नहीं कर रहा, मैं तो
सिर्फ इतना चाहता हूँ कि वो छोटी-सी बच्ची सही-सलामत हो।"
"आप सही कह
रहे हैं, ना
जाने इस वक़्त किन हालातों में होगी।"
"तारा क्या एक
कप चाय मिलेगी सिर बहुत दर्द कर रहा हैं।"
"अभी बना कर
लाई" तारा चाय बनाने जा ही रही थी कि अचानक से मेरे फ़ोन की घंटी बजने लगी, देखा तो गुप्ता
जी का फ़ोन था।
"हैलो गुप्ता जी"
"हैलो अतुल, तुम जल्दी से
मेरे घर आ जाओ।" और फ़ोन कट गया, मैं और तारा नंगे पाँव
ही गुप्ता जी के घर की ओर भागे।
"क्या हुआ कुछ पता चला रूही का?" मेरे पूछते ही,
निशा भाभी फूट-फूट कर रोने लगी, लेकिन गुप्ता
जी ने उन्हें संभालते हुए कहा,
"पुलिस स्टेशन से फ़ोन था, कह रहे थे कि उनको शहर के
बाहर झाड़ियों में रूही जैसी दिखने वाली किसी लड़की की लाश मिली हैं, लाश को पहचानने के लिए बुलाया हैं, तुम चलो मेरे
साथ" गुप्ता जी ने रुंधी हुई आवाज़ में कहा और डगमगाते हुए वहीं बैठ गए।
"अपनेआप को संभालिए आप, ज़रुरी नहीं हैं कि वो रूही ही
हो, हमे अच्छा सोचना चाहिए।" मैं गुप्ता जी को हिम्मत
तो दे रहा था लेकिन खुद भी अन्दर से बहुत घबराया हुआ था, क्योंकि
शादी के दस साल बाद भी मेरे और तारा के कोई औलाद नहीं थी, शायद
इसलिए हम गुप्ता जी के बच्चो को अपना समझते थे।
पुलिस स्टेशन
पहुँचकर जैसे ही मैने उस बच्ची का चेहरा देखा आँखों के आगे अँधेरा छा गया और
गुप्ता जी तो बेहोश होकर गिर पड़े, वो रूही ही थी। पुलिस ने बताया कि किसी
दरिंदे ने रूही का बलात्कार कर गोली मार दी, विश्वास ही नहीं
हो रहा था कि इतनी छोटी-सी बच्ची के साथ कोई इतनी घिनौनी हरकत भी कर सकता हैं।
गुप्ता जी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो कोई भी कागज़ी कार्यवाही पूरी कर सके,
इसलिए सब कुछ मैंने ही किया, सब कुछ होने के
बाद जब हम रूही को लेकर घर आये तो वहाँ के हालात ऐसे नहीं थे कि मैं वहाँ एक पल भी
खड़ा रह पाता और मैं अपने घर वापिस आ गया,
बार-बार मेरी नज़रों के सामने रूही का चेहरा आ रहा था,
उसकी चीखें सुनाई दे रही थी, उन दरिंदो ने जब
उसके साथ ज़बरदस्ती की होगी तो वो मासूम कितना चीखी चिल्लाई होगी ,यही सोच मैं काँप रहा था, क्या इतने बेदर्द होते
हैं कुछ लोग, और हम
क्यों उस मासूम को नहीं बचा पाए, सच पूछा जाए तो मुझे
अपने-आप से भी नफ़रत हो रही थी, मैं खुद को बहुत ही बेबस सा
महसूस कर रहा था, और हाथ-पैरो से तो जैसे जान ही निकल गयी थी
, दूसरी ओर गुप्ता जी के घर के सभी सदस्यो का रो-रोकर बुरा
हाल था, तारा सबको संभाल रही थी।
धीरे-धीरे वक़्त
गुजरता गया, यूँ
तो हमारा गुप्ता जी यहाँ आना जाना लगा ही रहता, लेकिन कभी
हमने रूही के बारे में कोई बात नहीं की, क्योकि हम गुप्ता जी
के परिवार के ज़ख्मों को कुरेदना नहीं चाहते थे। लेकिन पुलिस गुनाहगार की तालाश कर
रही थी, और इसीलिए आए दिन कुछ ना कुछ पूछताछ करने गुप्ता जी
के यहाँ आना- जाना लगा ही रहता, जो कि गुप्ता जी और उनके
परिवार को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था, इसीलिए गुप्ता
जी ने केस बंद करने के लिए कह दिया, पुलिस ने समझाने की भी
बहुत कोशिश की, जहाँ तक हो सकता था मैने भी समझाया लेकिन
गुप्ता जी और उनका परिवार कुछ समझना ही नहीं चाहता था। उनका कहना था कि गुनहगार को
सज़ा देने से क्या फ़ायदा इससे उनकी बेटी तो वापिस नहीं आ जाएगी, बल्कि बार-बार पुलिस के घर आने से घर की बदनामी ही हो रही हैं। गुप्ता जी
के ऐसे विचारों के बारे में जानकर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा,क्योंकि हमारे ऐसे विचार ही लोगो को गलत काम करने में मदद करते हैं।
इस घटना के दो साल बाद मेरा तबादला दूसरे शहर में हो गया, धीरे- धीरे
हमारे और गुप्ता जी के परिवार के बीच बातचीत भी कम होने लगी या यह कह सकते हैं कि
मैं और मेरी पत्नी गुप्ता जी और उनके परिवार वालों की सोच की वजह से उनसे सम्बन्ध
नहीं रखना चाहते थे, क्योंकि अब तो उनको रूही के बारे में
किसी से बात करने में भी शर्मिंदगी का अहसास होता था, जिसमे
तो उस बेचारी बच्ची का कोई गुनाह भी नहीं था। कई बार तो ऐसा लगता कि वो मासूम
चीख-चीख कर अपने लिए इंसाफ माँग रही हो और कह रही हो कि मेरे गुनाहगारों को सज़ा
दो।
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