Musibat Hain Ya Sasural Wale (A Short Funny Story)
😧😧तौबा मेरी तौबा हाय
कैसे हैं ये मेरे ससुराल वाले
कोई तो बचाए मुझे इनसे
और लाख दुआएं पाए मुझसे😧😧
आज सुबह से ही मेरी
पत्नी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं हैं, आखिरकार ख़ुशी हो भी क्यों ना अरे भई
उसके मायके वाले जो आ रहे हैं, और मेरी मुसीबत, ख़ैर छोड़ो वो सब, मुद्द की बात यह हैं कि मेरी पत्नी
के मायके वाले आ रहे हैं, आप समझ रहे हैं ना मेरा मतलब कि मैं
क्या कहना चाहता हूँ। फिर तो आप लोग मेरा
दर्द भी समझ पा रहे होंगे, अब यह दर्द मैं अपनी पत्नी के साथ
तो बाँट नहीं सकता, तो सोचा आप ही से कह दूँ, ना चाहते हुए भी आज ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ी, ससुराल
वालों के स्वागत की तैयारी जो करनी हैं।
"अजी यह क्या
बड़बड़ा रहे हो, कही
मेरे मायके वालों के बारे में तो कुछ बुरा भला नहीं
कह रहे हो?"
"मेरी तौबा भाग्यवान, इतनी हिम्मत कहाँ मुझ मैं"
"हाँ तो फिर
ठीक हैं, ऐसा
करने का सोचा भी तो मुझसे बुरा कोई ना होगा।"
"वो तो वैसे
भी कोई नहीं हैं।" मैने धीमे से बड़बड़ाया,
"कुछ कहा तुमने?"
"नहीं, नहीं कुछ नहीं, तुम बताओ
कुछ काम हो तो मेरे लायक"
"काम,अब यह भी मुझे
ही बताना पड़ेगा क्या, अरे कभी तो अपनी अक्ल से कुछ कर
लिया करो।"
"नहीं वो मेरा
मतलब था कि खैर छोड़ो मैं बाजार से मिठाई वगैरहा ले आता हूँ, अजीब
मुसीबत हैं अपने मन
से काम करो तो मरे और नहीं करो तो मरे"
"यह तुम फिर
से क्या बड़बड़ाने लगे, ज़रुर
मेरी या मेरे मायके वालो की बुराई ही कर रहे होंगे।"
"अरे भाग्यवान
ऐसी कोई बात नहीं हैं" मैने बचने की कोशिश की इतने में ही एक बड़ी सी दिखने
वाली गाड़ी घर के सामने आकर रुकी।
"भैया-भाभी
कितनी देर लगा दी।" कहती हुई मेरी पत्नी गाड़ी की ओर दौड़ी,
"मुझे लगता हैं वक़्त से पहले ही आ गए।" मैं फिर से बड़बड़या,
"आइए, आइए साले साहब स्वागत हैं आपका" मैंने
मुस्कुराने की शायद एक सफल कोशिश की,
"आओ बच्चो आज कितने दिनों बाद अपनी बुआ के घर आए हो।"
“लेकिन आए ही क्यों
हैं,” मैने मन में कहा, क्यों कि बड़बड़ता तो सब सुन जो लेते।
"अरे आप क्या कर रहे हैं यहाँ, आप तो मिठाई लेने जा
रहे थे ना?"
"दीदी क्यों तकलीफ दे रही हो जीजाजी को हमे कुछ नहीं चाहिए।"
"भाभी चाहिए
क्यों नहीं बच्चे कौनसे रोज़-रोज़ आ रहे हैं अपनी बुआ के यहाँ"
"सो तो हैं
दीदी, इस
बार भी बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिली हैं।"
"अब यह क्या
औरतों की बातें सुनने लगे?"
"अच्छा ठीक हैं, मैं चलता हूँ" ऐसा कह जैसे ही
मैं घर से बाहर निकला और तनकर चलने लगा, अरे भई बीवी के
सामने यह सम्भव नहीं हैं ना, आप लोग तो समझते ही हैं ना मेरी
तकलीफ मिठाई लेकर जैसे ही घर पहुँचा साले साहब के छोटे सुपुत्र चिंटू ने एक ज़ोरदार
धक्का
मारा और सारी मिठाई
गिर गयी, गुस्सा
तो बहुत आया लेकिन कुछ कह नहीं सकता था।
"कोई बात नहीं
बेटा फूफाजी और मिठाई ले आएंगे।" मेरी पत्नी ने बच्चे को गोद में उठाते हुए
कहा,
"हाँ-हाँ क्यों नही" मैने भी बेमन से कहा।
"अरे जीजाजी को क्यों तकलीफ दे रही हो" साले साहब ने धीरे से कहा जो
किसी ने सुना भी नहीं मेरे सिवा, और मैने मौके का फायदा
उठाया
"इसमें तकलीफ
कैसी साले साहब" मेरे कहते ही,
"तो फिर ठीक हैं ले आइए आप मिठाई" साले के ऐसा कहते ही गुस्सा तो बहुत
आया, लेकिन बेवकूफ सा मैं फिर से बाजार की ओर चल पड़ा,
"बीवी हो या बीवी का भाई सब की सब एक से हैं।" मैं एक बार फिर बड़बड़ाने
लगा शाम को खाने की टेबल पर
"आज मैने सारा खाना आप लोगो की पसंद का बनाया हैं।" मेरी पत्नी ने
मुस्कुराते हुए अपने भाई-भाभी से कहा।
"दीदी इतनी तकलीफ करने की क्या ज़रुरत थी, हम तो कुछ
भी रुखा-सूखा खा लेते।"
"अब भाभी ऐसा तो मत बोलिए, मेरे मायके वाले मेरे
घर आए और कुछ रुखा-सूखा खाए ऐसा हो सकता हैं भला"
"अरे जीजाजी
आप भी तो कुछ लीजिए" साले साहब ने मुझ गरीब पर भी मेहरबानी की, लेकिन,
"इनकी चिंता मत कीजिए भैया, यह तो कुछ न
कुछ दिन भर खाते ही रहते हैं, देखिए ना कितनी तोंद निकल गयी
हैं इनकी" और सभी मेरी तोंद की ओर देख हँसने लगे, और
मैं भी खिसयाने लगा।
"ना जाने क्या
मिलता हैं बीवियों को अपने मायके वालों के सामने अपने पति का मज़ाक उड़ाने में"
मेरे बड़बड़ाते ही,
"अब फिर क्या बड़बड़ाने लगे आप, सुनिए जी खबरदार जो
मेरे मायके वालो के बारे में कुछ कहा"
"अरे भई ऐसा
कुछ नहीं हैं, मुझे
कोई घर से थोड़े ही निकलना हैं जो तुम्हारे मायके वालों के बारे में कुछ
कहूँगा" और वहाँ बैठे सभी लोग हँसने लगे।
अगले दिन, "चिंटू
बेटा एक जगह बैठ जाओ नहीं तो चोट लग जाएगी।" मेरे कहते ही चिंटू ज़ोर-ज़ोर से
रोने लगा।
"अरे क्या हुआ चिंटू रो क्यों रहा हैं, आपने कुछ कहा
क्या इससे?"
"नहीं वो तो मैं बस"
"आप भी ना
बच्चा हैं वो,
थोड़ा प्यार से बात करनी चाहिए, अच्छा चलिए अब चिंटू से सॉरी
बोलिए"
"क्या, सॉरी मैं?"
"हाँ तुम"
"अरे यह क्या
कर रही हो दीदी, मैं
जानती हूँ चिंटू बहुत बदमाश हो गया हैं, इसमें जीजाजी की कोई
गलती नहीं हैं" साले साहब की पत्नी के द्वारा मेरा पक्ष लेना मुझे बहुत अच्छा
लगा, कुछ देर के लिए ही सही किसी अपने का अहसास हुआ। जैसे
तैसे कर चार दिन गुज़ारे, और फिर उन लोगो के जाने का वक़्त आ
गया, और मेरे चेहरे पर मुस्कान भी, लेकिन
पत्नी का उदास चेहरा देख मुझे भी उदासी का नाटक करना पड़ा।
"आप लोग बड़ा
जल्दी जा रहे हैं, थोड़ा
ओर रुक जाते तो हमें अच्छा लगता, क्यों जी मैने सही कहा
ना" मैने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहा।
"हाँ मैं तो खुद कह रही हूँ रुकने के लिए, लेकिन यह
लोग माने तब ना" ऐसा कहते हुए मेरी पत्नी साले साहब के गले से जा लगी और मैने
भी मन ही मन ख़ुश होते हुए दुःखी होने का नाटक किया, वो लोग
चले गए मेरी पत्नी दुःखी और मैं ख़ुश हो गए। याद रखिए कभी भी पत्नी के मायके वालों
के आने पर दुःखी मत होना और ना ही चिचिड़ाना, यह बहुत ही
खतरनाक जीव होते हैं धरती पर ,अगर काट लिया तो कोई भी नहीं
बचा पाएगा, इसमें हँसने की बात नहीं हैं मेरे दिल का दर्द
हैं जो आप लोगो संग बाँट लिया, और आपको भी आने वाली मुसीबतों
से बचा लिया।
😥😥😥 😥😥😥 😥😥😥 😥😥😥
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