Rohini (Story On A Spoiler Girl)

कुछ ऐसे डूब गए हम इश्क़ में कि होश ही ना रहा

 

और बर्बाद कर गए वो ही जिनसे हमे इश्क़ था

 

 यह कहानी राजस्थान के एक छोटे से गाँव में रहने वाले दो दोस्तों की हैं, जिनका नाम रमेश और सुरेश हैं, कहने को तो वो दोनों दोस्त हैं, लेकिन दोनों को देख ऐसा लगता हैं जैसे की सगे भाई हो, हमेशा साथ रहना, साथ खाना, ख़ुशी हो या दुःख सदा एक दूसरे के साथ खड़े रहना। गाँव वाले तो उनके बारे में सब कुछ जानते थे, लेकिन अगर कोई बाहर का व्यक्ति गाँव में आ जाता तो वो यह समझ ही नहीं पाता कि इनमे से कौन किस घर का सदस्य हैं। रमेश और सुरेश गाँव के एक हाई-स्कूल में पढ़ते हैं, दोनों ही पढ़ाई में होशियार हैं और हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आते हैं, अब तो जल्द ही दोनों की स्कूल की पढ़ाई भी ख़त्म होने वाली हैं। लेकिन अब समस्या यह सामने हैं कि आगे की पढ़ाई का क्या किया जाए, क्यों कि गाँव में आगे की पढ़ाई के लिए कोई कॉलेज नहीं हैं। घरवाले बाहर शहर में उन दोनों को पढ़ने भेज देंगे इस बात का शक दोनों को ही हैं, फिर भी दोनों एक बार घर वालों से इस बारे में बात करना चाहते हैं, इसलिए एक दिन शाम को मौका देखकर रमेश ने अपने पापा श्याम से इस बारे में बात की।

"पापा मुझे आपसे कुछ बात करनी हैं।"

"हाँ बोलो क्या कहना हैं।"

"पापा हम आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर जाना चाहता हैं।"

"शहर, लेकिन वहाँ क्यों ?"

"पापा आप तो जानते ही हैं कि गाँव में कोई भी कॉलेज नहीं हैं और हम आगे पढ़ना चाहते हैं।" रमेश के कहते ही

"वो सब तो ठीक हैं बेटा, लेकिन ज़माना कितना ख़राब हैं और तुम दोनों दोस्त शहर में किसी को जानते भी तो नहीं हो।"

"पापा आप इस बात की चिन्ता मत कीजिए, हम दो हैं यानि की दो सौ के बराबर भला हमे किसी की क्या ज़रुरत"

"अच्छा ठीक हैं, मैं सोच कर जवाब देता हूँ" और रमेश की बात सुन श्याम हँसने लगा।

दूसरी ओर सुरेश ने भी अपने पिता शंकरलाल से शहर जाने आज्ञा माँगी और उसके पिताजी ने भी सोचने के लिए कुछ दिनों का वक़्त माँगा। और ख़ुशी की बात यह हैं कि दोनों को ही शहर जाने की इज़ाज़त मिल गयी, जिसके बारे में जान दोनों की ही ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं हैं, और दोनों ने ही शहर जाने की तैयारी शुरु कर दी।

शहर पहुँचकर, "यार सुरेश यह तो बहुत बडी जगह हैं, देख तो सही दोस्त कितनी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं यहाँ पर, और घर वो तो ऐसे लग रहे हैं मानो की महल हो" रमेश ने चारो और अपनी नज़रे घुमाते हुए कहा।

"तू सही कह रहा है यार मुझे भी घबराहट हो रही हैं, ऐसा करते हैं वापिस गाँव चलते हैं।" सुरेश ने कुछ डरते हुए कहा।

"पागल हो गया हैं क्या तू, हम वापिस जाने के लिए नहीं आए हैं बल्कि पढ़-लिख कर कुछ बनने के लिए आए हैं।"

"इतने बड़े शहर में ज़िन्दा रहेंगे तो कुछ बनेंगे ना"

"यार सुरेश तू भी कुछ ज्यादा ही घबरा रहा हैं, चल कॉलेज चलते हैं, फिर कहीं रहने का बंदोबस्त भी करेंगे।" और दोनों ही दोस्त कॉलेज की ओर चल दिए।

कॉलेज़ पहुँचकर, "नमस्ते जी, मैं रमेश और यह मेरा दोस्त सुरेश हम आज ही कॉलेज में नए आए हैं गाँव से, क्या आप बता सकते हैं यह फर्स्ट ईयर आर्ट्स की क्लास कहाँ हैं?"

"अरे सुनो, सुनो सब सुनो देखो दो नए बकरे आए हैं कॉलेज में, रमेश और सुरेश"

"माफ कीजिए हम बकरे नहीं हैं।"

"अच्छा तो तुम हमे बताओगे की तुम क्या हो, बिना जुबान चलाए चुपचाप खड़े रहो, हम तुम्हारा स्वागत बहुत ही धूम-धाम से करेंगे।"

"बकवास बंद करो कपिल वो कॉलेज में नए आए हैं और तुम उनकी मदद करने की बजाए उन्हें परेशान कर रहे हो।" सामने से आती हुई एक खूबसूरत लड़की ने जब कपिल को लताड़ा तो रमेश और सुरेश दोनों को ही उसमे एक देवी का रुप नज़र आने लगा।

"हैलो, मेरा नाम रोहणी हैं, मैं आप लोगो की क्या मदद कर सकती हूँ?"

"जी...वो...हम वो... हम..." सुरेश हक़लाने लगा।

"क्या हुआ अंकल, लड़की देखते ही होश उड़ गए क्या?"

"कपिल जाओ तुम यहाँ से मुझे बात करने दो" एक बार फिर रोहिणी ने दोनों ही दोस्तों का दिल जीत लिया था।

"जी हम फर्स्ट ईयर आर्ट्स के स्टूडेंट्स हैं, क्लास कहाँ हैं बस यही पूछना चाहते हैं।" रमेश के पूछते ही,

"वहाँ ऊपर" रोहिणी ने इशारा कर बताया, और दोनों ही रोहिणी का धन्यवाद कर अपनी क्लास की ओर चल दिए।

उस दिन के बाद से रोहिणी रमेश और सुरेश की अच्छी दोस्त बन गयी, वो हर छोटे बड़े काम में उनकी मदद किया करती, यहाँ तक की उनके रहने का इंतज़ाम भी रोहिणी ने अपने किसी जानकार के यहाँ करवाया, अब तो आलम यह हैं कि दोनों दोस्तों के लिए रोहिणी के बिना एक पल भी रहना मुश्किल हैं। अनजान शहर में रोहिणी जैसी दोस्त मिल जाएगी यह बात तो रमेश और सुरेश ने सोची भी नहीं थी, गुजरते वक्त के साथ यह दोस्ती पक्की होती गई, साफ़-साफ शब्दों में कहा जाए तो अब दो नहीं तीन दोस्तों की जोड़ी हैं। लेकिन यह दोस्ती एक दिन प्यार में बदल गई, रमेश को रोहिणी से प्यार हो गया हैं, और वो अपने इस अहसास के बारे में सबसे पहले सुरेश को बताना चाहता हैं, लेकिन किस्मत को तो कुछ ओर ही मंजूर हैं ।

"रमेश, मैं तुम्हें पसंद करने लगी हूँ।" रोहिणी ने कुछ शरमाते हुए कहा।

"क्या कहा तुमने, एक बार फिर से कहो" रोहिणी ने बिना कुछ बोले ही अपनी नजरें झुका ली, "रोहिणी दरअसल मैं भी तुमसे प्यार करने लगा हूँ, और मैं यह बात सुरेश को बताने ही वाला था कि तुमने प्यार का इज़हार कर दिया।"

"प्यार, मैंने कब कहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ , मैंने तो कहा कि तुम्हें पसंद करती हूँ।" "लेकिन"

"अच्छा बाबा मैं तुमसे प्यार करती हूँ ,आईं .लव .यू .अब तो खुश हो ना"

"हाँ बहुत, और अब मैं अपनी यह खुशी सुरेश के साथ बाँटना चाहता हूँ।"

"नही, अभी नहीं, वो मेरा मतलब हैं कि अभी कुछ दिन रुक जाओ हम सुरेश को सरप्राइज देंगे।"

"लेकिन रोहिणी हमने आज तक एक दूसरे से कोई बात नहीं छुपाई हैं।"

"लेकिन आज मेरे लिए प्लीज़" रोहिणी ने रमेश के आगे हाथ जोड़कर विनती की जिसे उसको मानना ही पड़ा ।

कुछ दिनों बाद, "सुरेश मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ, आई. लव. यूं."

"लेकिन रोहिणी हम अच्छे दोस्त हैं और इसके अलावा मैं कुछ सोच भी नहीं सकता।"

"इसका मतलब तुम मेरा प्यार का प्रस्ताव ठुकरा रहे हो, क्या मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती?" "नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, मैं तो बस, सच पूछो तो रोहिणी मैने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं"

"कोई बात नहीं सुरेश मैं तुमसे प्यार करती हूँ इसका मतलब यह तो नहीं ना कि तुम भी मुझसे प्यार करो लेकिन हम अच्छे दोस्त बनकर तो रह सकते हैं ना" रोहिणी उदास हो गई, क्योकि जो वो चाल चलना चाहती हैं उसमें स्वयं को असफल महसूस कर रही हैं, लेकिन फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और वो सुरेश के दिल में अपने लिए प्यार जगाने में सफल हो ही गई। शातिर दिमाग रोहिणी अब अलग-अलग वक्त पर दोनों ही दोस्तों से प्यार का नाटक करती इसके साथ ही दोनों से ही किसी ना किसी बहाने से पैसे भी लेती रहती और दोनों से ही वादा लिया हुआ था किसी को ना बताने का, इसी प्रकार कई महीने गुजर गये

एक दिन, "रमेश,आज मैं तुमसे कुछ माँगना चाहती हूँ।"

"बोलो रोहिणी क्या चाहिए?"

"तुम्हारा थोड़ा-सा वक़्त"

"मैं कुछ समझा नहीं"

"मैं चाहती हूँ कि आज शाम पाँच बजे हम नेशनल पार्क चले, मैं वहाँ तुमसे ढेर सारी बातें करना चाहती हूँ, तम्हारे साथ अकेले में वक़्त गुज़ारना चाहती हूँ।"

"लेकिन बातें तो हम कहीं भी कर सकते हैं, इसके लिए नेशनल पार्क जाना क्या ज़रुरी हैं?" "क्या तुम मेरी यह एक इच्छा भी पूरी नहीं करोगे।"

"चलो ठीक हैं, चलते हैं, लेकिन मैं भी तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।"

"हाँ बोलो"

"क्यों ना हम अपने रिश्ते के बारे में सुरेश को सब कुछ बता दे, दरअसल रोहिणी मैने आज तक सुरेश से कोई बात नहीं छुपाई हैं, अब इतनी बड़ी बात छुपानी पड़ रही हैं तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा हैं।"

"रमेश बस कुछ दिन और उसके बाद मैं खुद बताऊँगी, प्लीज  मान जाओ ना मेरी बात"

"अच्छा ठीक हैं, चलो आज शाम को नेशनल पार्क चलते हैं।" रमेश ने मुस्कुराते हुए रोहिणी का हाथ धीमे से दबा दिया।

दूसरी ओर, "सुरेश क्या तुम मेरे लिए आज थोड़ा-सा वक़्त निकाल पाओगे?"

"रोहिणी तुम ऐसे क्यों बोल रही हो मेरा सारा वक़्त तुम्हारा ही तो हैं।"

"तो फिर ठीक हैं, आज शाम छ; बजे तुम मुझसे मिलने नेशनल पार्क में आओ।"

"नेशनल पार्क….! लेकिन वहाँ क्यों" सुरेश ने आशचर्य से पूछा,

"अरे मेरे प्यारे सुरेश राजा कुछ देर वहाँ बैठेंगे प्यार भरी बातें करेंगे।"

"लेकिन बातें तो कहीं भी हो सकती हैं, नेशनल पार्क ही क्यों?" सुरेश के ऐसा कहते ही रोहणी नाराज़ हो गई।

"ठीक हैं, जैसा तुम चाहो बस तुम नाराज़ मत हो, लेकिन मुझे भी तुमसे कुछ कहना हैं।"

"मैं जानती हूँ कि तुम्हे क्या कहना हैं, यही ना कि तुम हमारे रिश्ते के बारे में रमेश को बताना चाहते हो।"

"हाँ, तुमने तो मेरे दिल की बात भी समझ ली, कितनी अच्छी हो तुम" (इसमें समझने जैसा क्या हैं तुम दोनों दोस्तों की सुई एक जगह ही तो अटकी हुई हैं) रोहिणी ने मन में कहा, "प्यार करती हूँ तुमसे समझूँगी नहीं क्या, लेकिन सुरेश बुरा मत मानना मैं सोच रही थी कि कुछ दिन और रुक जाते हैं फिर दोनों मिलकर बताएँगे”

"चलो ठीक हैं तुम कहती हो तो कुछ दिन ओर रुक जाते हैं, अच्छा मैं अब चलता हूँ मेरी क्लास हैं, ; बजे मिलते हैं नेशनल पार्क में" ऐसा कह सुरेश चला गया और रोहिणी भी एक कुटिल मुस्कान लिए दूसरी दिशा की ओर चल दी।

पाँच बजे नेशनल पार्क में, "यहाँ का मौसम कितना अच्छा हैं, खासतौर से प्यार करने वालों के लिए" रोहिणी ने रमेश का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

"हाँ, तुम सच कह रही हो, अब मन कर रहा हैं कि हम रोज़ ही यहाँ आए।"

“आपकी बहुत मेहरबानी जहाँपनाह जो आपने मेरे लिए वक़्त निकालने की बात सोची, रमेश कई बार मुझे बहुत डर लगता हैं कि कहीं तुम्हारे माँ-पापा ने हमारा रिश्ता स्वीकार नहीं किया तो"

"मेरे होते हुए तुम्हे किसी भी प्रकार की चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं हैं, तुम मेरी हो रोहिणी और अगले सात जन्म तक मेरी ही रहोगी।"

"अरे वाह बाबू मुशाए, क्या बात हैं आपने तो मेरी बुकिंग सात जन्मों तक के लिए कर ली।" और दोनों ही एक साथ हँस पड़ेइसी प्रकार से इधर-उधर की बातें करते हुए रोहिणी समय निकाल रही थी, इतने में ही उसे दूर से सुरेश आता हुआ दिखाई दिया, और उसको देखते ही रोहिणी ने एक ऐसी चाल चली जिसकी सपने में भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। "छोड़ो ना रमेश मेरा हाथ कोई क्या सोचेगा।"

"अरे भई इसमें सोचना क्या हैं , प्यार करते हैं हम एक दूसरे से" ऐसा बोलते ही रमेश ने रोहिणी को गले से लगा लिया और रोहिणी अपनेआप को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। जिसे की रमेश समझ ही नहीं पाया क्यों कि इतनी देर से तो रोहिणी ही बार-बार उसके गले लग रही थी, यह सारा दृश्य सुरेश ने देख लिया और गलतफहमी में वो बिना कुछ सोचे-समझे ही रमेश पर आक्रमण कर बैठा, "रमेश मुझे तुझसे यह उम्मीद नहीं थी, तेरी हिम्मत कैसे हुई रोहिणी को हाथ लगाने की"

"अरे दोस्त तू गलत समझ रहा हैं, पहले मेरी बात सुन" लेकिन सुरेश इतने गुस्से में था कि उसने रमेश की एक ना सुनी और उसे मारता ही चला गयारोहिणी ने बीच-बचाव करने का थोड़ा सा दिखावा किया, लेकिन सुरेश इतने गुस्से में था कि उसने बिना सोचे-समझे एक ज़ोरदार धक्का रमेश को मार दिया जिससे की वो पास ही पड़े हुए पत्थर से जा टकराया, और उसके सिर से खून बहने लगा।

"अरे इसके सिर से तो खून बह रहा हैं, कितने ज़ालिम आदमी हो तुम कोई क्या किसी को इतनी ज़ोर से मारता हैं, कोई तुरन्त एम्बुलेंस को बुलाओ इसे तो अस्पताल लेकर जाना पड़ेगा" पार्क में आए हुआ किसी व्यक्ति ने कहा।

"रहने दो भाई एम्बुलेंस नहीं अब तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा, यह तो अब इस दुनिया में नहीं रहा।" किसी दूसरे व्यक्ति के कहते ही

"खूनी हो तुम, खून किया हैं तुमने, अब तो ज़िन्दगी भर जेल की हवा खाओगे जब अक्ल ठिकाने आएगी तुम्हारी" भीड़ में से एक ओर आवाज़ गूँजी

"जेल की हवा नहीं फाँसी होनी चाहिए ऐसे लोगो को तो" सब अपना-अपना तर्क दे रहे थे, लेकिन सुरेश बुत बना बिना किसी प्रक्रिया के सब कुछ सुन रहा था, उसके सोचने समझने की शक्ति बिल्कुल ही ख़त्म हो चुकी थी, कुछ ही देर में वहाँ पर पुलिस भी आ गयी और ले गयी सुरेश को गिरफ्तार करके, और रोहिणी, ना जाने कहाँ गायब हो गयी शायद अपने अगले शिकार की तलाश में।

  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

O.T.P. / ओ. टी. पी. (Story On Cyber Crime)

Galat Kaun Saas Ya Bahu ? / गलत कौन सास या बहु ? (Story On Society )

Premi Sang Katl / प्रेमी संग कत्ल ( Story On Murder)