Adhura Pyar (A Sad Love Story))
ख़बर
नहीं थी कि इस शिद्दत से प्यार निभाओगे तुम
कितना
भी समझाऊँ अपने दिल को याद आओगे तुम
प्यार एक ऐसा
खूबसूरत एहसास हैं, जिसे वो ही महसूस कर
सकता हैं जिसने कभी प्यार किया हो, या फिर वो जो प्यार में
हो, यह गरीबी-अमीरी, जात-पात किसी में
भी भेद-भाव नहीं करता, बल्कि इसको तो कुछ सुनाई भी नहीं देता
सिवाय दिल की आवाज़ के, लेकिन अफ़सोस खुद को साबित करने के लिए
इस खूबसूरत एहसास को ना जाने कितने ही इम्तिहानों से गुज़रना पड़ता हैं, ऐसी ही एक प्रेम-कहानी मैं आपके साथ बाँटना चाहती हूँ।
यह कहानी एक
छोटे से शहर में रहने वाली लड़की अंजलि की हैं, अंजलि
के माता-पिता बहुत ही गरीब थे, उसके पिता रिक्शा चला कर एवं
माँ किसी बँगले पर काम कर घर का गुज़ारा चलाते थे, घर में
अंजलि के सिवा उसकी चार बहनें और थी, दो बड़ी बहनों की शादी
हो चुकी थी, अंजलि तीसरे नम्बर की थी, अंजलि
और उससे छोटी दो बहनें अभी पढ़ रही थी। जिस समाज में अंजलि और उसका परिवार रहता था
वहाँ लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता था, इसका एक कारण यह
भी था कि उनके पास इतना पैसा नहीं होता था कि वो अपने बच्चों को पढ़ा सके। फिर भी
अंजलि के माता-पिता ने उसे और उसकी बहनों को बारहवीं तक पढ़ाने का फ़ैसला कर रखा था।
"अंजलि बेटा मेरी तबियत ठीक नहीं हैं, आज मेरी जगह
तुम जाकर बँगले पर काम कर लो।"
"माँ मैं नहीं जाऊँगी,
आप किसी ओर को भेज दो"
"किसी ओर को कैसे भेजूँ, तेरी दो बहनें तो शादी कर
अपने ससुराल चली गई, बाकी की दो स्कूल गयी हैं, बची तू अब तुझे ही तो भेजूँगी ना"अंजलि बेमन से काम करने के लिए चल
दी।
बँगले पर
सुमेर सिंह और उसका परिवार रहता था, सुमेर
सिंह के के दो बेटे थे, बड़ा राज सिंह जो इस वक़्त लंदन में
रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था, और छोटा आदित्य सिंह जो यहीं
बँगले में रहता और कॉलेज में पढ़ रहा था।
"कौन हो, किससे मिलना हैं?" बँगले के बाहर खड़े हुए चौकीदार ने अंजलि से पूछा,
"काका, मैं कंचन की बेटी हूँ, आज
उनकी तबियत ठीक नहीं हैं, सो मैं काम पर आई हूँ।"
"अन्दर जाकर मालकिन से मिल लो।"
बँगले के
अन्दर पहुँचते ही अंजलि की आँखे विश्वास ही नहीं कर पा रहीं थी कि उसकी माँ यहाँ
काम करती हैं।
"मालकिन मैं अंजलि, कंचन की बेटी, आज माँ की तबियत ठीक नहीं हैं सो मैं
काम पर आई हूँ।"
"ठीक हैं आ जाओ अन्दर"
अंजलि घर की साफ़-सफाई करने लगी,
इतने में ही सुमेर सिंह के बेटे आदित्य की नज़र उस पर पड़ी, ना जाने अंजलि का कैसा जादू था यह, जो आदित्य की नज़र
उस पर से हट ही नहीं रही थी, लेकिन अंजलि को इन सब बातों से
कोई लेना देना नहीं था, उसने तो अपना काम ख़त्म किया और वापिस
घर चली गयी।
"माँ आज यह नई लड़की कौन आयी हैं काम पर?"
"अरे वो तो कंचन की बेटी अंजलि हैं, उसकी तबियत ठीक
नहीं थी सो यह काम पर आ गई।"
उस दिन के
बाद से अंजलि फिर से काम पर नहीं आयी, और
आदित्य उसकी एक झलक देखने के लिए तरस गया, उसके पास कोई भी
ऐसा जरिया नहीं था जिसके द्वारा वो अंजलि से मिल सके, फिर भी
उसने हिम्मत नहीं हारी।
"मौसी अभी कुछ दिन पहले आपकी बेटी काम पर आयी थी, आप
उसे पढ़ने नहीं भेजती हैं क्या?"
"भेजती हूँ ना छोटे मालिक, अभी वो बारहवीं में पढ़ रही
हैं, यहीं पास के सरकारी स्कूल में, वो
तो उस दिन मेरी तबियत ठीक नहीं थी इसलिए काम पर भेजना पड़ा"
"अच्छा ठीक हैं" आदित्य ने ऐसा दिखाया जैसे की उसे कोई मतलब ही नहीं,
लेकिन यह जानकारी भी उसके लिए बहुत बड़ी थी, और
वो बिना वक़्त गवाए स्कूल की ओर चल दिया, स्कूल की छुट्टी हो
चुकी थी और वो वहाँ से निकलने वाली एक-एक लड़की को बहुत ही ध्यान से देख रहा था,
इतने में ही उसकी नज़र अंजलि पर पड़ी।
"हैलो, पहचाना मुझे?"
"अरे छोटे मालिक आप यहाँ?"
"प्लीज मालिक मत बुलाओ मुझे, आदित्य नाम हैं
मेरा"
"लेकिन मैं कैसे?"
"अच्छा सुनो मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं, क्या तुम
मेरे साथ कॉफ़ी पीने चलोगी?"
"जी मैं?"
"प्लीज मना मत करना" आदित्य को गुज़ारिश करता देख अंजलि मना नहीं कर
पाई, और वो उसके साथ पास ही के कॉफ़ी हाउस में कॉफ़ी पीने चली
गयी।
"अंजलि वो दरअसल बात ये हैं
कि"
"क्या बात हैं छोटे मालिक क्या कहना चाहते हैं आप, कुछ
काम था आपको मुझसे?"
"अंजलि मैं तुम्हे पसन्द करने लगा हूँ" आदित्य एक ही सांस में अपनी
बात कह गया, और उसके बाद उन दोनों के बीच गहरी चुप्पी छा गयी,
"आपको अंदाज़ा भी हैं कि आप क्या कह रहे हैं, आप मालिक
हैं हमारे, और हम नौकर"
"देखो अंजलि मुझे इन सब बातों से कोई मतलब नहीं हैं, मैं
तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि तुम मुझे अच्छी लगने लगी हो" अंजलि आदित्य की बात
को नज़रअंदाज़ करते हुए तेज़ी से कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल गई।
उस दिन के
बाद से छुट्टी के वक़्त आदित्य का स्कूल के
बाहर खड़ा होना नियम बन गया था, कई बार तो उसे
अंजलि के दीदार हो जाते तो कई बार वो उसकी एक झलक पाने के लिए तरस जाता, शरुआत में तो अंजलि ने इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया, लेकिन कही न कही धीरे-धीरे उसे भी आदित्य से प्यार होने लगा था, लेकिन उसमे अपने प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं थी। लेकिन एक दिन
आदित्य वहाँ नहीं आया और अंजलि की निगाहें उसे तलाशने लगी, सोचा
शायद कुछ काम आ गया होगा, लेकिन अगले दिन भी वो नहीं आया तो
अंजलि की बेचैनी बढ़ने लगी इसके बाद एक-एक दिन करके पूरा हफ्ता गुज़र गया, लेकिन आदित्य वहाँ नहीं आया, अंजलि को लगने लगा कि
आदित्य उससे नाराज़ हो गया हैं, वो उससे मिलना चाहती थी,
और अपने प्यार का इज़हार करना चाहती थी, लेकिन
कोई भी ऐसा तरीका नहीं था जिससे कि वो आदित्य के बारे में जान पाती, अपनी माँ से पूछती तो वो सामने से दस सवाल पूछ लेती, लेकिन कहते हैं सच्चा प्यार करने वालों का कोई साथ दे या ना दे खुदा ज़रुर
देता हैं, और इन दोनों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, एक दिन कंचन बीमार हो गयी और इस बार भी उसने अंजलि को बँगले पर काम के लिए
भेजा, अब तो अंजलि की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था,
उसने इस बार पहले की तरह काम पर जाने से मना नहीं किया, और ख़ुशी-ख़ुशी बँगले पर चली गई।
"मालकिन आज माँ की तबियत ठीक नहीं हैं, इसलिए मैं काम
पर आयी हूँ।"
"आजकल तुम्हारी माँ बार-बार बीमार हो जाती हैं, क्या
बात हैं किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते क्यों नहीं?"
"दिखाया था मालकिन थोड़ा बुखार हैं, जल्द ही ठीक हो
जाएगा।"
"अच्छा ठीक हैं जाओ अन्दर और काम कर लो" अंजलि तेज़ी से अन्दर जाने लगी
और उसके नज़रे आदित्य को तलाशने लगी।
"अंजलि, आदित्य के कमरे में जाकर ज्यादा आवाज़ मत करना
वो सो रहा होगा।"
"मालकिन इस वक़्त...!"
"हाँ पिछले आठ-दस दिन से उसकी तबियत ठीक नहीं हैं, पता
नहीं कहाँ-कहाँ धूप में घूमता रहता हैं सो लू लग गयी।"
अब तो आदित्य
को देखने की बेचैनी और भी बढ़ने लगी थी क्यों कि उसकी इस हालत का दोषी अंजलि खुद को
ही मान रही थी।
अंजलि आदित्य
के कमरे में जाकर धीरे- धीरे सफाई करने लगी, लेकिन
वो यह भी चाहती थी कि आदित्य एक बार अपनी आँखे खोल उसकी ओर देख ले, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और जैसे ही अंजलि कमरे से बाहर निकलने लगी।
"अंजलि" आदित्य की आवाज़ सुनते ही उसके कदम रुक गए,
"आदित्य क्या हुआ तुम्हे, अब तबियत कैसी हैं तुम्हारी,
अंदाज़ा भी हैं तम्हे इतने दिन से तुम्हे नहीं देखा तो कितने बुरे-बुरे
ख्याल आ रहे थे दिल में मेरे" आदित्य उसे सुनता जा रहा था और वो कहती जा रही
थी,
"ऐसे क्या देख रहे हो?"
"कुछ नहीं, सोच रहा था कि तुम्हे मेरी इतनी फ़िक्र
क्यों हो रही हैं।"
"आदित्य मुझे तुमसे कुछ कहना हैं।" अंजलि का चेहरा शर्म से लाल हो रहा
था
"कहो क्या कहना चाहती हो, यही ना कि मैं तुम्हारा
पीछा छोड़ दूँ और तुम्हे चैन से जीने दूँ।
"आदित्य आई.लव.यू."
ऐसा बोल अंजलि तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गयी,
अब प्यार की आग दोनों ओर बराबर से जल रही थी, लेकिन
इनके प्यार को इनके परिवार वाले स्वीकार करेंगे इस बात का शक दोनों को था। फिर भी
दोनों ने अपनी मुलाकातों का सिलसिला जारी रखा, और इस काम में
मदद की अंजलि की एक सहेली गौरी ने वो हर बार अलग- अलग जगह दोनों की मुलाक़ात करवाती
जिससे की कोई भी देख भी ले तो किसी को शक ना हो, लेकिन इस
मामले में इन दोनों की ही किस्मत दगा दे गयी, और एक दिन
सुमेर सिंह के एक दोस्त ने इन दोनों को किसी रेस्टोरेंट में देख लिया और यह बात
सुमेर सिंह तक पहुँच गयी।
"आदित्य, यह मैं क्या सुन रहा हूँ कि तुम आजकल किसी
लड़की से मिल रहे हो।"
"पापा वो...मैं वो.... "
"क्या हुआ आप मेरे बेटे पर चिल्ला क्यों रहे हैं?"
"बेहतर होगा यह बात तुम अपने
बेटे से ही पूछ लो।"
"माँ, पापा, वो लड़की जिससे मैं
आजकल मिलने जाता हूँ, वो अंजलि हैं।"
"अंजलि? अब यह अंजलि कौन हैं कॉलेज में तेरे साथ पढ़ती
हैं क्या?" सुमेर सिंह
ने सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा
"पापा वो अपने घर काम पर.... मेरा मतलब हैं वो कंचन मौसी की बेटी
हैं।"
"क्या...! तेरा दिमाग खराब हो गया हैं क्या, तुझे
पूरी दुनिया में वो कामवाली की बेटी ही मिली थी।" आदित्य की माँ ने चिल्लाते
हुए कहा
"आज से इसका घर से बाहर निकलना बंद करो और हाँ उस कंचन को भी काम से निकालो,
मैं आज से ही इसको लंदन भेजने का बंदोबस्त करना शुरु करता हूँ।
"
"लंदन, लेकिन वहाँ क्यों, पापा
मुझे कही नहीं जाना हैं, मैं यहीं ठीक हूँ, मैं अंजलि से प्यार करता हूँ, उससे शादी करना चाहता
हूँ।"
"बेशर्म, दूर हो जा इसी वक़्त मेरी नज़रों से, और हाँ समझा लो तुम अपने बेटे को नहीं तो उड़ा देंगे इसे, यह भी नहीं सोचेंगे कि बेटा हैं हमारा" सुमेर सिंह चिल्लाया
आदित्य तेज़ी
से दौड़ता हुआ घर के अन्दर चला गया, बँगले
पर अब सब कुछ बहुत बदल चुका था, वहाँ चारों ओर कड़ा पहरा लगा
दिया गया था और आदित्य की लंदन जाने की तैयारियाँ तेजी से चल रही थी एवं दूसरी ओर
अंजलि के माँ-पापा ने उसे गाँव भेज दिया था। और जल्द ही उसकी शादी करवाने का फ़ैसला
भी कर लिया। यह जो कुछ भी हो रहा था वो आदित्य को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था,
वो किसी भी तरह से अंजलि से मिलना चाहता था, लेकिन
यह मुमकिन नहीं था, क्यों कि सुमेर सिंह ने अपने बँगले के
चारो ओर कड़ा पहरा लगवा रखा था। उसके पास अंजलि से मिलने का केवल एक ही जरिया था और
वो थी गौरी, इसलिए उसने गौरी को फ़ोन कर अंजलि की जानकारी
हासिल की, और जब उसे अंजलि के बारे में पता चला तो उसने उसके
गाँव जाने का फ़ैसला कर लिया।
आदित्य जो
क़दम उठाने जा रहा था बहुत ही मुश्किल था, वो
अंजलि से शादी करने जा रहा था और इस बात की ख़बर केवल गौरी को ही थी, गौरी की मदद से आदित्य बँगले से भागने में तो सफल हो गया, लेकिन किसी जानकार के देख लेने की वजह से गौरी वहीं फंस गयी, उसे सुमेर सिंह के पास ले जाया गया, बहुत पूछने पर
भी गौरी ने कुछ नहीं बताया। दूसरी ओर आदित्य अब अंजलि के पास पहुँच चुका था,
और उसके पीछे सुमेर सिंह के आदमी भी थे, जिन्हे
सुमेर सिंह ने ही उसके पीछे लगया था, जिसकी ख़बर आदित्य को
बिल्कुल भी नहीं थी, उन आदमियों को सुमेर सिंह की सख्त
हिदायत थी कि अगर दोनों को साथ देखो तो बिना सोचे समझे दोनों को उड़ा देना, और उन्होंने अपने मालिक की आज्ञा का बड़ी ही वफ़ादारी से पालन किया, अंजलि और आदित्य को एक दूसरे से मिलता देख बन्दूक चला दी, यह भी नहीं सोचा की सुमेर सिंह केवल यह बात गुस्से में कह रहा हैं,
लेकिन उनसे एक चूक हो गयी अंजलि तो बच गयी लेकिन आदित्य इस दुनिया
से रुखसत हो गया, किसे पता था कि आदित्य का यह कहना कि मैं
बस एक नज़र अंजलि को देखना चाहता हूँ उसकी ज़िन्दगी की आखिरी ख़्वाहिश बन जाएगी।
अंजलि की
ज़िन्दगी में अब सबकुछ ख़त्म हो चुका था, वो
सदमे में थी क्योकि आदित्य का उसकी आँखों के सामने जाना उसकी बर्दाश्त के बाहर था,
दरअसल जो कुछ भी हुआ उसके लिए वो ख़ुद को दोषी मान रही थी और इसके
लिए वो अपनेआप को माफ़ भी नहीं करना चाहती थी, लेकिन ज़िन्दगी
हमेशा एक सी नहीं चलती हैं, कुछ वक़्त गुज़र जाने के बाद फिर
से अंजलि के माँ-पापा उसके लिए लड़का देखने लगे, वो शादी नहीं
करना चाहती थी और यह बात उसने अपनी माँ से कई बार कही भी लेकिन उसकी एक ना चली,
और एक ठीक-ठाक से दिखने वाले और परिवार का गुज़ारा चलाने लायक कमाने
वाले लड़के से उसकी शादी तय कर दी गयी।
अब अंजलि की
शादी हो चुकी हैं, उसके परिवार में पति
हैं, बच्चे हैं, और हैं ढेर सारी
खुशियाँ, लेकिन वो जी रही हैं तो बस आदित्य की यादों के
सहारे।
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