Dikhawa
हमेशा की तरह रामनाथ जी आज भी सुबह पाँच बजे ही उठ गए, और पिछले चार घंटे से सुबह की चाय का इन्तज़ार कर रहे हैं, उन्होंने तो कई बार अपने बेटे और बहू से कहा भी किसुबह की चाय वो स्वयंही बना लेंगे, लेकिन इस बात की भी इज़ाज़त नहीं मिली, क्योंकि रेणु को लगता हैं कि ससुर जी रसोईमें से खानेपीने का सामान उठा कर अपने पास रख लेंगेजेल से भी बदत्तर ज़िन्दगी जी रहे हैं वो अपने बेटेबहू के यहाँ, लेकिन अपना दुःख कहे भी तो किससे, अगर पत्नी ज़िंदा होती तो यह नौबत ही नहीं आती,बहुत ख़्याल रखती थी वो रामनाथ जी का, उनकी थोड़ीसी भी तकलीफ शारदा के बर्दाश्त के बाहर थी, और अब हर वक़्त रामनाथ जी तक़लीफो से घिरे रहते हैं और किसी को कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।
"यह लीजिए पापा चाय"रेणु के चाय देते ही,
"बेटा साथ में बिस्कुट भी मिल जाते तो अच्छा रहता, वो क्या हैं ना कि सुबह जल्दी उठ जाता हूँ तो...".अभी रामनाथ जी ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी।
"अगर आप जल्दी उठ जाते हैं तो इसमें हमारी क्या गलती हैं, रोज़रोज़ आपको चाय के साथ बिस्कुट दिए जाये यह हमारे लिए सम्भव नहीं हैं।" रामनाथ जी के दिन की शुरुआत हमेशा की तरह आज भी अपनी बहु रेणु के मुँह से कड़वे बोल सुनकर ही हुई, लेकिन वो अब इन सबके आदी हो चुके हैं।
"बहू, मैं थोड़ा टहलने जा रहा हूँ, अगर बाजार से कुछ मँगवाना हो तो बता दो।" "सब्जियाँ और फल ले आना और हाँ जल्दी घर आ जाना, आज घर में किट्टीपार्टी हैं, मेरी सहेलियाँ आएँगी, सो थोड़ी घर की साफ़सफ़ाई कर देना।" रेणु को कोई भी प्रतिक्रिया दिए बिना ही रामनाथ जी घर से निकल गए वो भी क्या दिन थे जब शारदा जिन्दा थी, किसी राजा की तरह से रहते थे रामनाथ जी, उनकी हर ज़रुरत का ख्याल रखती थी वो, जैसे की शारदा की दुनिया ही रामनाथ जी थे, और अब, नौकर बना कर रख दिया हैं बहु ने, कहें भी तो किससे अपना दर्द, कोई भी तो नहीं हैं ऐसा जो उन्हें समझ सके, एक बेटा हैं वो भी पत्नी का आज्ञाकारी, सच पूछा जाए तो रामनाथ जी अपनी मौत का इन्तज़ार करते हुए ज़िन्दगी जी रहे हैं।
"ददू,ददू कहा गए थे आप मुझे छोड़कर?"
"कहीं नहीं बेटा यहीं पास में बाजार गया था सब्जी लेने" सब्जी का थैला ज़मीन पर रखकर तुरन्त ही रामनाथ जी ने पिंटू को गोद में उठा लिया, पिंटू रामनाथ जी का पोता हैं और उनकी कभीकभार ख़ुश रहने की वजह, क्यों कि अधिकतर तो रेणु उन दोनों के बीच एक दूरी बनाए रखती हैं, कहीं ना कहीं उसे लगता हैं कि रामनाथ जी पिंटू को बिगाड़ देंगे।
"यहाँ क्या कर रहे हैं आप?, इतना समय लगता हैं बाजार में?"
"मम्मा,मम्मा ददू से कहो मेरे साथ खेलेंगे।"
"पिंटू तुम अपने कमरे में जाओ, ददू को कुछ ज़रुरी काम करना हैं।" और रामनाथ जी गर्दन झुकाए चुपचाप सफाई करने में लग गए, कुछ ही देर में रेणु की सहेलियों के आने का सिलसिला भी शुरु हो गया, दोपहर को शुरु हुई किट्टीपार्टी को ख़त्म होतेहोते रात के आठबज गए, और इस दौरान रेणु से इतना भीनहीं हो पाया कि अपने ससुर से पूछ ले कि आपनेखाना खाया या नही, पूरी रात गुज़र गयी किसी ने भी रामनाथ जी की सुध नहीं ली।
सुबह जब नौ बजे तक भी रामनाथ जी नहीं उठे तो परिवार वाले कुछ हरकत में आए, "पापा, पापा क्या हो गया आपको?" रामनाथ जी के बेटे संजय ने घबराते हुए पूछा, "मैं डॉक्टर को फ़ोन करती हूँ" और रेणु के फ़ोन करते ही तुरन्त वहाँ डॉक्टर साहब भी आ गए जिन्होने जाँच कर रामनाथ जी को मृत घोषित कर दिया।
"हें राम, यह क्या हो गया, हम तो अनाथ हो गए" रेणु फूटफूटकर रोने लगी, और रोते हुए रामनाथ जी का गुणगान करने लगी, यहाँ तक की उसने दुनिया को दिखाने के लिए ना जाने कितना खर्चा कर दिया अपने ससुर की अंतिमयात्रा में, उसके बाद तो पंडित का खर्चा, दान दक्षिणा और ना जाने क्याक्या, यहाँ तक की रिश्तेदार भी कहने लगे बेटेबहु हो तो ऐसे वरना ना हो, सभी के मुँह से अपने लिए तारीफें सुन संजय और रेणु की ख़ुशी का ठिकाना हीनहीं था, लेकिन क्या इन सब दिखावों से रामनाथ जी ख़ुश हुए होंगे ?
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